पंचकन्या – भाग-3

 

पंचकन्या – भाग-3

एक कम वयस की सांवली मछुआरी कन्या काली - जो कि बाद में सत्यवती के नाम से जानी गई‚ एक बार अपने एक यात्री ऋषि पाराशर को नाव में यमुना नदी पार करा रही होती है‚ वे उस पर दबाव डालते हैं कि वह उनकी कामेच्छा संतुष्ट करे उन्हे हठी और दुराग्रही जान कर और डर कर कि कहीं बीच में ही नाव न डुबो दें यह सोच कर वह दो शर्तों पर तैयार हो जाती है‚ उसका कौमार्य नष्ट न हो‚ और उसकी देह से मछली की दुर्गन्ध समाप्त हो जाए।

तब मत्स्यगंधा योजनगंधा में बदल जाती है। जो कि बाद में हस्तिनापुर के राजा शान्तनु की पत्नी बनती है। सत्यवती अपने राजवंश की पहली रानी शकुन्तला जैसी ही है जो कि एक अप्सरा की अवैधानिक पुत्री थी‚ उसने भी दुष्यन्त के साथ सम्बंध बनाने से पूर्व यही मांगा था कि उससे उत्पन्न सन्तान ही राजमुकुट की अधिकारिणी हो। एक बार फिर यही वचन जबरन लिया गया सत्यवती द्वारा। इस महाकाव्य में सत्यवती के बारे में बहुत कम लिखा गया है। अत:यह आवश्यक है कि हम एक निगाह देवी भागवत पुराण पर भी डाल लें। जब पाराशर मुनी उसका सीधा हाथ पकड़ते हैं काली मुस्कुराती है‚ संयम के साथ‚ बहुत परिपक्वता के साथ वह कहती है–

" आप जो कुछ भी करने जा रहे हैं

क्या वह आपकी वंश परम्परा

आपके उत्थान तथा महान वेदों

के अनुरूप होगा?

आपके परिवार का नाम उज्जवल है

ऋषि वशिष्ठ के वंशज हैं आप

इसलिये ओ धर्मज्ञानी

यह कैसी इच्छा कर रहे हैं आप‚

इच्छा के दास हो गये हैं आप?

हे ब्राह्मण श्रेष्ठ!

मानव का जन्म ही इस सृष्टि पर दुर्लभ है

उस पर ब्राह्मण कुल में पुरुष योनि में

जन्म लेना अत्यन्त ही दुर्लभ है।

हे उच्च कुल में जन्मे‚ गुणी

वेद वेदान्तों के ज्ञाता‚ धर्मज्ञानी

ब्राह्मणों के बीच इन्द्र के समान श्रेष्ठवर!

आपने मेरी मत्स्यगंध से गंधाती देह में

ऐसा क्या देखा कि अनार्य अनुभूति जाग्रत हुई?

हे दो बार जन्म लेने वाले मानव श्रेष्ठ

आपकी बुद्धिमत्ता तो पूर्वाभासी है।

आपने मेरी देह में क्या शुभ चिन्ह या लक्षण देखा

कि आप इसे पाने को व्यथित हैं?

क्या आपपर आपकी इच्छा ने इतना अधिकार कर लिया कि

आप अपना धर्म तक भूल गये?

यह सब कहते हुए वह बुदबुदाती है।

" ओह ये तो पागल हैं मुझे पाने को

ये द्विजा‚ अपना विवेक खो बैठे हैं।

ये तो नाव का संतुलन बिगाड़ देंगे और हम डूब जाएंगे।

यह तो उद्धत हैं‚ इनका हृदय काम के पंचशर से विद्ध है

अब इन्हें कोई नहीं बचा सकता।"

यह स्वगत कहते हुए काली ऋषि से कहती है।

"हे महामुनी‚ धैर्य रखें जब तक कि हम उस पार तक नहीं पहुंचते।"

सुता कहते हैं कि पाराशर ने उसकी राय को माना और उसका हाथ छोड़ कर शांत बैठ गये। किन्तु उस पार पहुंचते ही ऋषि की कामेच्छा पर फिर ज्वर चढ़ा उन्होंने मत्स्यगंधा को समागम को उद्धत हो बांध लिया तो गुस्से में कांपती हुई वह ऋषि के सम्मुख हो कहने लगी।

" हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी देह गंधाती है क्या आपको अनुभव नहीं होता?
प्रेम और संभोग दोनों के लिये सुखकर होना आवश्यक है।"

यह कहते ही उसकी देह से कस्तूरी गंध फूटने लगी। और वह मत्स्यगंधा से योजनगंधा बन गई‚ मनोहर‚ ऋषि ने कामावेग में उसका दायां हाथ बांध लिया तब शुभ लक्षणा सत्यवती ने कामातुर ऋषि से कहा।

" नदी के तट से सभी जन और

मेरे पिता हमें देख लेंगे‚ यह दिन का प्रकाश है‚

और ऐसे दिन के प्रकाश में

यह अनैतिक काम करना

मुझे अच्छा नहीं लगता

इसलिये हे‚ ऋषिश्रेष्ठ!

रात्रि होने तक प्रतीक्षा करें

पुरुषों के लिये संभोग केवल रात्रि में ही उचित है

दिन के समय‚ प्रकाश में नहीं

अगर किसी के द्वारा देख लिया जाए तो यह महापाप है

मेरी इस इच्छा का मान रखें‚ हे बुद्धिमान ऋषि"

उसके शब्दों में तथ्य जान पाराशर ऋषि फिर झुक गये। जैसे ही शाम का धुंधलका बढ़ा और रात का अंधेरा छाने लगा तो वह कमनीय स्त्री मधुर वाणी में बोली।

मैं कुमारी हूँ‚ हे द्विजकुलीनों के सिंह

मुझे भोग कर‚

तुम मुझसे अलग हो जहां तुम चाहोगे चले जाओगे

किन्तु तुम्हारे अचूक‚ त्रुटिहीन बीजों का क्या ओ ब्राह्मण?

मेरा क्या? अगर मैं गर्भवती हो गई तो

मैं अपने पिता से क्या कहूंगी?

मुझसे देहसुख लेने के बाद‚ तुम्हारे जाने के बाद

मैं क्या करुंगी? कहो?

पाराशर ने कहा‚ " प्रिये!

आज मुझे सुख देकर

पुन: कौमार्यधारिणी बन जाओगी।

फिर भी हे स्त्री

अगर तू डरती है तो

मांग ले जो चाहे वह वरदान।

सत्यवती ने कहा‚ " हे द्विजकुल श्रेष्ठ मुझे वरदान दो कि‚

मेरे पिता या किसी को भी इस घटना का पता न चले

मेरा कौमार्य बना रहे

आपका पुत्र हो तो वह आप जैसा हो और

वरदान से प्राप्त हुआ माना जाए

मेरी देह की यह मोहक गंध बनी रहे

मेरा यौवन चिरकाल तक ऐसा ही रहे।

सत्यवती को उसके महान वेदों और पुराणों के रचयिता पुत्र का वरदान देकर‚ पाराशर ने अपनी मनोवांछित पा लिया और यमुना नदी में स्नान कर पवित्र हो चले गये‚ फिर उन्होंने सत्यवती से कोई सम्पर्क नहीं रखा। इस मछुआरी कन्या का विशिष्ट चरित्र उसकी बातचीत से ही उभर कर सामने आता है। हालांकि वह अभी एक किशोरी से युवती होने की अवस्था में ही थी‚ फिर भी उसने एक महान ऋषि को अपने ऊपर अधिकार नहीं करने दिया‚ चाहे वह कितना ही प्रसिद्ध क्यों न था। यहां तक कि उसने ऋषि को स्वामित्व और संयम का पाठ अपनी विचारशीलता और वाक्पटुता से पढ़ा दिया था। उनकी कामान्धता का आवेग जान कर उसने सीधे सीधे उनका प्रेम निवेदन नकारा नहीं‚ पर नाव के डगमगाने के स्थिति में उसने उनसे किनारे तक पहुंचने की प्रार्थना की यह सोच कर कि शायद किनारे तक जाते हुए इनका आवेग शान्त हो जाएगा और विवेक जाग जाएगा। किन्तु ऐसा न होने पर वह खीज जाती है और उनकी पाशविक कामप्रवृति पर बुरा भला कहती है और अपनी देह की अप्रिय गंध की ओर उनका ध्यान दिलाती है। अपनी परिपक्वता और साफ साफ कहने की क्षमता के अनुरूप यह कहकर कि सहवास दोनों के लिये आनन्दकर होना आवश्यक है‚ वह आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी हमें चकित कर जाती है। यहां तक कि कस्तूरी गंध प्राप्त करने के बाद भी वह आसानी से स्वयं को नहीं सौंपती यह कह कर कि दिन के प्रकाश में‚ लोगों के देखने की पूरी सम्भावना के बावजूद मैथुन करना पाशविक है‚ एक बार फिर ऋषि उसकी तर्कसंगतता के आगे नत हो जाते हैं और धुंधलका घिरने तक प्रतीक्षा कर लेते हैं। फिर भी वह स्वयं को नहीं सौंपती उसकी अंतिम आपत्ति होती है कि तब क्या होगा जब वे उसका कौमार्य भंग कर चले जाएंगे कभी न लौटने के लिये? उस उच्चजातीय ऋषि पर तो कोई उंगली नहीं उठाएगा पर उसका क्या?

यह आश्चर्यजनक है एक अशिक्षित‚ किशारी में इतनी परिपक्वता होना। उसने ऐसा कोई भ्रम नहीं पाला कि यह महान ऋषि उससे विवाह कर लेगा। सो वह उससे यह वरदान निश्चित करवाती है कि उसे उसका कौमार्य पुन: प्राप्त होगा और अगर इस समागम से कोई सन्तान हो तो वह प्रसिद्ध व महान व्यक्तित्व के रूप में जन्म लेगी।

जब वह यह सब व्यवहारिक बातें सोच समझ लेती है तभी वह अपने पवित्र स्त्रीत्व को ऋषि को सौंपती है। वह अपने इस पवित्र स्वरूप सो सदैव बनाए रखने के लिये ऋषि से चिरयुवा‚ सदैव सुगंधित होने का वरदान भी मांग लेती है। यह वह उपहार है जो हेलेन ने भी मांगा था‚ और हर युग की हर स्त्री इस उपहार के लिये लालायित रहती है और रहेगी। महाभारत में स्त्री की मानसिकता के बड़े आकर्षक और गहरे अंश उपलब्ध हैं।

" और वह‚ इन वरदानों से परमान्दित‚

पाराशर ऋषि के समागम से उसी दिन

गर्भवती हो जाती है।" ( आदिपर्व 63। 83)

जब मत्स्यगंधा ऋषि को कहती है कि वह अभी अपने पिता के अधिकार में है‚ और वह उनकी अपेक्षाएं पूरी करने के लिये स्वतन्त्र नहीं है। फिर वह अपनी स्वतन्त्रता के लिये ऋषि के वरदान द्वारा वह अपना 'स्व' तथा 'स्वातन्त्र्य' अर्जित करती है। जो कि एक कुमारी के लिये विशिष्ट बात है। पाराशर ऋषि के साथ सहवास के बाद भी वह अपना स्व तथा स्वतन्त्रता सुरक्षित रखती है‚ वह उन पर निर्भर होने या उस अलौकिक प्रेम को विवाह का रूप देने की कोई पेशकश नहीं करती। दोनों के मिलन का उद्देश्य पूर्ण होता है‚ दोनों अलग हो जाते हैं‚ किसी भावुकता भरे बंधनों में बंधे बिना। कोई रूमानी आशाएं नहीं की जातीं‚ पुन: मिलने की‚ न कोई ग्लानि‚ न ही कोई चिन्तातुर‚ खीज और आशंका से ग्रस्त प्रश्न किये जाते हैं‚ इस मिलन से उत्पन्न संतान के लिये। यह तो पूर्व ही में निर्धारित हो चुका था‚ दोनों की सहमतियां थीं। क्या वह इक्कीसवीं सदी की किसी आधुनिक महिला मुक्ति की विचारधारा वाली स्त्री से कम थी?

सत्यवती के हस्तिनापुर आने से भीषण बदलाव आते हैं। स्वयं भीष्म उन्हें अपने पिता शान्तनु के दिये गये वचनों और सुख के लिये राजपरिवार में लेकर आते हैं‚ उनसे भी वह यह वचन ले लेती है कि उनका ही रक्त होगा जो भविष्य में हस्तिनापुर का राजा होगा‚ और इस पर भीष्म स्वयं कभी राजा न बनने का और अविवाहित रहने का प्रण ले लेते हैं।

इसके लिये बाद में पुत्र की मृत्यु के बाद वह अपने ही राजकुमार पुत्र की विधवा को अपने अवैधानिक‚ मिश्रजाति के पुत्र व्यास के पास जाने को बाध्य करती है। इसीलिये न तो धृतराष्ट्र और न ही पाण्डु में कुरुवंश का रक्त था। अपने निम्नजाति के जन्म की वजह से सत्यवती को अपने अवैधानिक पुत्र को सबके समक्ष लाने में उच्च जाति की स्त्रियों जैसी कोई झिझक न थी। उसने उसे हस्तिनापुर के भविष्य में एक निर्णायक पात्र के रूप में लाने की महत्वाकांक्षा पाली थी जो कि सत्य हुई‚ भीष्म की एक अप्रत्यक्ष विरोधी छाया के रूप में जो कि स्वयं उनके आदेशों को मानने को विवश थे ही। सामाजिक संतुलन के प्रति उनकी अनास्था तब भी उजागर होती है जब उनकी पौत्र वधू चतुर व राजपरिवार की कुन्ती तक उनसे प्रतिस्पर्धा का साहस तक नहीं कर पाती।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-2

 पंचकन्या – भाग-2

तारा‚  बाली की पत्नी वह अगली कन्या है जिससे हम रामायण में मिलते हैं‚ एक विदूषी‚ दूरंदेशी और आत्मविश्वासी स्त्री। जब सुग्रीव दूसरी बार बाली को चुनौती देने आता है तो वह बाली को चेताती है कि अगर सुग्रीव हार जाने के बाद भी दुबारा आया है तो इसके पीछे कोई छल भरी भूमिका है‚ क्योंकि अच्छी तरह से हार जाने और मात खाने के इतनी जल्दी कोई भी शत्रु वापस लड़ने नहीं आता। और उसने सुन भी रखा था कि वह राम का मित्र बन गया है। किन्तु उसकी राय को बाली ने नहीं माना और बाहर गया तथा राम के बाण का शिकार हो गया। किन्तु पुत्र अंगद के भविष्य को ध्यान में रखते हुए और उसे पिता की छाया से वंचित न करने की चाह से ही वह अपने ही पति के भाई सुग्रीव की सहगामिनी बन गई। जब लक्षमण किश्किंधा  के अन्त:पुर में अचानक धड़धड़ाते हुए गुस्से में प्रविष्ट हुए तब तारा ही थी जिसे सुग्रीव ने क्रोधी शेषनाग के अवतार लक्ष्मण को संभालने के लिये भेजा था। तारा ने लक्ष्मण का अर्धोन्मिलीत नेत्रों‚ अस्थिर चाल से – सुन्दर कमनीय लज्जारहित तारा ने उनके क्रोध को शान्त तथा उन्हें अस्त्रविहीन कर दिया। उसने कोमलता से उन्हें झिड़का कि वे कामावेग की असीमित शक्ति से अज्ञात हैं‚ जो कि बड़े से बड़े ऋषियों को भी डिगा दे‚ जबकि सुग्रीव तो एक किंचित वानर मात्र है। तारा निर्भीक होकर कहती रही कि यह भर्त्सना न्यायोचित नहीं है और उसने विस्तार से बताया कि सेना को एकत्रित करने का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है‚ आप क्रोधित न हो।
एक बार फिर गौर किया जाए तो जो तारा ने बाली को राय दी थी
‚ वह उसकी दूरदर्शिता और सूचनाओं से निष्कर्ष निकालने की अभूतपूर्व क्षमता को उजागर करती है। और बाद में जब वह सुग्रीव की ढाल बन कर लक्ष्मण के सामने आई तब उसके पीछे अपने पुत्र अंगद को राजकुमार बनाने की मंशा छिपी थी।

अब हम बात करते हैं मन्दोदरी की जो कि वाल्मिकी की रामायण की अंतिम कन्या चरित्र है। किन्तु समस्या तो यह है कि वाल्मिकी जी ने अपने महाकाव्य में मन्दोदरी के बारे में बहुत ही कम लिखा है‚ सिवा इसके कि वह बार बार अपने पति से सीता को राम को वापस लौटाने का आग्रह करती है। और बार - बार उसने सीता को रावण की कुदृष्टियों और स्पर्शों से बचाया भी। आगे उसने तारा की ही भांति अपने पति के शत्रु और भाई से विवाह कर लिया था‚ या तो राम के आग्रह से अथवा अनार्य राजाओं की प्रथा के अनुसार कि विजयी राजा हारे हुए राजा की रानी से विवाह करता है।

‘अद्भुत रामायण’ से हमें कुछ और आन्तरिक जानकारियां मिलती हैं। यहाँ मन्दोदरी रावण की आज्ञा का उल्लंघन करती है‚ उस पात्र में से घूंट भरने को मना कर देती है‚ जिसमें रावण ने तपस्या के लिये रक्त एकत्र कर रखा था। इस कृत्य द्वारा वह साबित कर देती है कि वह अपने पति की परछांई मात्र नहीं। यहां इस बात का भी वर्णन मिलता है कि कुन्ती की ही भांति मन्दोदरी गर्भवती हुई और उसने अपने नवजात शिशु को त्याग सुदूर क्षेत्र में भिजवा दिया था। यह क्षेत्र राजा जनक का था‚ जहां हल चलाने पर अनाथ सीता पाई गई थी। इस घटना के प्रकाश में देखा जाए तो यह आश्चर्यनक नहीं है कि हनुमान ने गलती से मन्दोदरी को रावण के महल में विचरते देख उन्हें सीता समझ लिया था।

तारा और मन्दोदरी दो समानान्तर पात्र हैं‚ जिन्होंने अपने अपने पतियों को समय रहते चेताया था और उन्होंने उनकी राय न मानने पर अन्तत:  पर्याप्त परिणाम भुगते भी। फिर दोनों ने अपने पति की मृत्यु के बाद पति के भाई तथा शत्रु को पति रूप में स्वीकार भी किया। ताकि वे अपना राज्य को सुरक्षित रख सकें और अयोध्या के मित्र राष्ट्र बनकर रहें‚ और उनका राजकार्यों में अधिकार पूर्ववत बना रहे। तारा और मन्दोदरी दोनों ही को अपने शक्तिशाली पति बाली और रावण की मात्र छाया की तरह वर्णित नहीं किया जा सकता।

महाभारत में द्रोपदी और कुन्ती महज सास - बहू ही नहीं थे बल्कि चरित्रों में एक दूसरे के समानान्तर पात्र थे। वृश्निक के शूरा ने अपनी पुत्री पृथा को अपने सन्तानहीन मित्र कुन्तीभोज को गोद दे दिया था। यह कसक कुन्ती के भीतर हम तब पाते हैं जब कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त होने पर वह कर्ण के जन्म की बात को स्वीकार करती है.।

जब वह कुन्तीभोज के महलों में बड़ी होने लगी तो वहां मां के न होने का अभाव उसे खलता था और बाद में किशोरावस्था में उसे दुर्वासा ऋषि को सौंप दिया गया जो कि बहुत सी विषमताओं के केन्द्र थे‚ और अत्यधिक चिढ़चिढ़े थे। और उसके पिता ने उसे आदेश दिया था कि उन्हें वह अप्रसन्न ना करे इसमें उसका और उसके वंश का अपमान होगा। जन्म से ही सुन्दर व कुशाग्र पृथा अपने नाम को सार्थक करती थी‚ वह अतीव सुन्दरी थी इसलिये कुन्तीभोज ने उसे सतर्क कर रखा था कि अपनी सुन्दरता के घमण्ड में अपने कर्तव्यों को कभी उपेक्षित ना करे। बाद में चार देवताओं और एक मानव ने खुशी - खुशी उसके आमन्त्रण को स्वीकार किया। शूरा और कुन्तीभोज के कुन्ती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हटने का ही परिणाम था कर्ण का जन्म‚ जिससे वे अपने जीवन में मस्त हो कर आजन्म अनजान ही रहे।

कुन्ती अहिल्या की ही तरह उत्सुक थी। वह दुर्वासा के वरदान को परख कर देखना चाहती थी कि क्या वह सच होगा? सूर्य की चमक से प्रभावित हो तथा उसे मन से ग्रहण कर सूर्योदय के समय वह मंत्रोच्चार से सूर्य को आमंत्रित करती है। सूर्य इन्द्र ही की तरह असंतुष्ट नहीं लौटेंगे यह निश्चित है। वह फुसला और धमका कर विवाह योग्य कुन्ती को उसके अक्षत कौमार्य को क्षति न पहुंचने देने का वचन देता है और मना करने पर राज्य छीन लेने की धमकी देता है। स्वयं की कामना और सूर्य की शक्ति के भय की वजह से जहां कुन्ती एक ओर विरोध करती है वहीं यह मांग भी करती है कि इस मिलन से जो संतान पैदा हो वह पिता सूर्य के समान ही तेजस्वी हो। क्षीरोदेप्रसाद विद्याविनोद ने अपने बंगाली नाटक नरनारायण (1926) में संक्षिप्त मगर बहुत प्रभावशाली वर्णन कर्ण के मुख से करवाया है।

" एक स्त्री का गलत कदम — एक देवता की कामुक उत्सुकता
एक कन्या की उत्सुकता और उसकी लज्जाहीन कामुकता"

कुन्ती सूर्य के साथ अपने इस सम्पर्क से दो वरदान प्राप्त करती है। अक्षत कौमार्य का वरदान और पुत्र के लिये विशेष गुण और शक्ति। इस सबमें कुन्ती अपनी दादी सास सत्यवती‚ और माधवी जो कि चन्द्रवंश के राजा ययाति की पुत्री थीं और यादव वंश की भानुमती के सदृश है जिसे भी वरदान प्राप्त था कि अगर बलात्कार हुआ तब भी वह कुमारी रहेगी।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-1

 

साभार...पंचकन्या- मूल लेख अंग्रेजी में - प्रदीप भट्टाचार्य, अनुवाद : मनीषा कुलश्रेष्ठ का मैं आभार प्रकट करता हूँ.

पंचकन्या – भाग-1

एक प्राचीन प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक है..

अहिल्या द्रोपदी कुन्ती तारा मन्दोदरी तथा
पंचकन्या स्वरानित्यम महापातका नाशका.

इन पांच अक्षतकुमारियों अहिल्या‚ द्रोपदी‚ कुन्ती‚ तारा और मन्दोदरी के लिये कहा जाता है कि इनका स्मरण भी महापापों को भी नष्ट करने में सक्षम हैं। इस श्लोक में दो बातें खटकती हैं कि इनमें कुमारियों यानि कन्या शब्द का प्रयोग किया गया है न कि नारी शब्द का। जबकि ये सभी विवाहिता स्त्रियां हैं और इस समूह के नामों के साथ पापियों को भी पाप मुक्त करने की शक्ति धारिणी का विशेषण कितना विरोधाभासी है। ऐसे ही एक पारम्परिक दोहे में पांच पवित्र सतियों का वर्णन मिलता है, जैसे सती, सीता, सावित्री, दमयन्ती और अरुन्धती। जबकि इन पांचों अहिल्या‚  द्रोपदी‚  कुन्ती‚ तारा और मन्दोदरी के साथ सती शब्द का उपयोग नहीं हुआ है क्योंकि इनमें से प्रत्येक अपने पति के अतिरिक्त एक पुरुष या अधिक पुरुषों से संबंधित, परिचित,  आरोपित रही है? अगर ऐसा है तो इन्हें पाप नाशिनी या पापनाश का क्यों माना गया? उस पर इन्हें पंचकन्याओं के रूप में क्यों माना जाता रहा है?

पंचकन्याओं के इस समूह में तीन अहिल्या‚ तारा‚ मन्दोदरी – वाल्मिकी रामायण से संबंधित हैं‚ द्रौपदी और कुन्ती महाभारत‚ हरिवंश पुराण‚ मार्कण्देय‚ देवी भागवत और भागवत पुराण में वर्णित प्रमुख पात्र हैं। सबसे पहली बात जो कि विचारणीय है कि वाल्मिकी और व्यास अपने युग के महान काव्य रचयिता थे। उन्होंने सत्य को दिव्यदृष्टि से जान यह महाकाव्य रचे थे‚ इन चरित्रों का मूल्यांकन करने के लिये यह अतिआवश्यक है कि सतही वास्तविकता से हट कर इन्हें चेतनात्मक तरीके से जांचा जाए जिससे कि उन पवित्र भावनाओं तक पहुंचा जा सके जिन्हें आधार मान कर इनकी रचना की गई। जब एक ऐसा उपदेश जब हज़ारों वर्षों बाद हम तक पहुंचता है तो इसे मात्र एक अर्थहीन पहेली मान कर इसे नकारा नहीं जा सकता। पश्चिम से आई नारी मुक्ति की शक्तिशाली लहर के संदर्भ में‚ आज हमें इसे समझने की आवश्यकता महसूस होती है कि इस गूढ़ार्थ वाले रहस्यमय दोहे के माध्यम से आखिर कहा क्या गया है?

अहिल्या नाम के ही दो अर्थ निकलते हैं‚ पहला दोष रहित‚ दूसरा जिस भूमि पर हल न चला हो अर्थात कुंवारी। उसके जन्म के बारे में एक मिथक (रामायण उत्तरकाण्ड‚ 30) प्रचलित है। एक बार ब्रह्मा जी ने एक दोष रहित सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति का निर्माण किया जो कि समस्त ब्रह्माण्ड में अद्वितीय थी और फिर उसे गौतम ऋषि को सुरक्षित रखने के लिये दे दिया। गौतम ऋषि ने इस सौन्दर्य की देवी अहिल्या को बड़े यत्न से संभाल कर रखा जब तक कि वह वयस्क न हो गई। फिर एक दिन उन्होंने ब्रह्मा जी को सुरक्षित लौटा दिया। ब्रह्मा जी उनके संयम से अति प्रसन्न हुए और उन्होंने इस युवती को गौतम को ही भेंट कर दिया और उनका विवाह करवा दिया। इन्द्र ने जब अहिल्या को देखा तो वे मुग्ध हो गये और उन्होंने सोचा कि यह अद्वितीय सौंदर्य की स्वामिनी यह स्त्री इस वनवासी ऋषि की पत्नी कैसे हो सकती है इसे तो मेरा होना चाहिये। आदिकान्ड‚ 46 में विश्वामित्र कहते हैं कि इन्द्र गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में उनका रूप लेकर उन अहिल्या के पास पहुंचे। और उनसे संभोग की प्रार्थना की कि ' संभोग के लिये व्याकुल प्राणी‚ उर्वर समय की प्रतीक्षा नहीं कर सकते‚ मैं तुम्हारे साथ सहवास करना चाहता हूँ‚ हे क्षीण कटि वाली सुन्दरी।' ( 48।18) हालांकि वे जान गईं थीं कि यह गौतम नहीं इन्द्र हैं फिर भी कुतुहल मात्र के लिये उन्होंने इन्द्र की प्रार्थना स्वीकार कर ली। वही कुतुहल जो महाभारत की कुन्ती को सूर्य के प्रति हुआ था‚ और उसने सूर्य को स्वयं को सौंप दिया था। संभोग के उपरान्त अहिल्या ने इन्द्र से कहा कि‚ हे सर्वश्रेष्ठ‚ मैं कृतार्थ हुई अब आप यहां से शीघ्र ही जाएं। स्वयं को और मुझे महर्षि गौतम के क्रोध से बचाएं वे अभी आते ही होंगे ( 48।21)। जैसे ही इन्द्र मुड़े‚ गौतम ऋषि लौटे और उनके श्राप से इन्द्र के वृषण गिर गये। और उन्होंने अहिल्या को त्याग दिया। अहिल्या को आत्मग्लानि लिये घने जंगलों में भूखा प्यासा‚ हवा पर ज़िन्दा रहने के लिये‚ मिट्टी पर सोने के लिये प्रायश्चित के लिये छोड़ दिया गया। गौतम ने आदेश दिया कि वर्षों बाद जब राम वनवास पर आएंगे तो अहिल्या की भक्ति से प्रसन्न होकर वही उसे इस अभिशाप से मुक्त करेंगे। तब वह अपने पूर्व रूप में आकर गौतम के पास लौट सकती है। ( 48। 29 – 32)

आदिकान्ड के वर्णनों में कुछ तथ्यात्मक स्पष्टता है‚ कि उसमें अहिल्या जैसी अतीव व अद्वितीय सुन्दरी अपनी उत्सुकतावश जानते बूझते अपने यौन कौतुहल को संतुष्ट करती है। वह अपने सनातन नारीत्व की प्रतिक्रिया स्वरूप स्वर्ग के राजा‚ चिरयुवा इन्द्र के ज्वलन्त प्रणय निवेदन और अपने पति गौतम ऋषि के उम्रदराज और वनवासी व्यक्तित्व की तुलना में इन्द्र के चकाचौंध भरे व्यक्तित्व से आकर्षित हो जाती है। एक लौकिक स्त्री अलौकिक स्वर्ग के राजा के अन्तरंग स्पर्शों का स्वागत कर बैठती है‚ वह इस अद्भुत अनुभव के प्रति अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाती और खतरा मोल लेने को तैयार हो जाती है‚ जो कि नारीत्व को चिन्हित करता है। यह बहुत सही घटना है जो इन्द्रीय लोलुपता और परस्पर विरोधी भावनाओं को आपस में जोड़ती है। अहिल्या इन्द्र से आकर्षित हुई क्योंकि वह अपने मन का विरोध इस तरह प्रकट करना चाहती थी‚ और इन्द्र इस लौकिक अतीव सुन्दरी के प्रति अपनी एन्द्रिक लोलुपता की वजह से आकर्षित हुआ। यह एक आपसी परस्पर बढ़ावा देता हुआ दुर्निवार आकर्षण था। हालांकि इस घटना से पहले ही अहिल्या गौतम ऋषि के पुत्र शतानंदा की मां थी। फिर भी कहीं न कहीं उसका स्त्रीत्व असंतुष्ट था। यहां कन्या होने का गूढ़ार्थ केवल मां हो जाने से ही नहीं बल्कि एक प्रिया के सन्दर्भ में भी है‚ और इस आधार पर वह अपने और गौतम ऋषि के सम्बंधों के यथार्थ तक नहीं पहुंच सकी। इस तरह पहली 'कन्या' स्त्री न हो सकी‚ उसके अन्दर अपनी आन्तरिक इच्छाओं की पुकार सुनने की क्षमता तो थी‚ किन्तु उसमें उसमें पितृमूलक समाज के आदेशों को चुनौती देने का साहस न था।

उत्तरकाण्ड का वर्णन दोषमोचक है‚ जैसे कि बाद के संस्करणों में इस महाकाव्य से इसी दोष-रहितता की अपेक्षा की गई हो। अगस्त्य ने कहा है कि‚ जब ब्रह्मा ने अहिल्या को गौतम को सौंपा तो क्रुद्ध इन्द्र ने अहिल्या का शारीरिक शोषण किया। बलात्कार की शोषिता अहिल्या अपने ऊपर हुए अत्याचार की ग्लानि के कारण अपने मन की शांति खो बैठी और वह सुन्दर देह तो रह गई पर वे अद्वितीय सुन्दर भाव खो गये जो एक सुन्दर स्त्री के पास जन्मजात होते हैं। जब अहिल्या ने प्रतिवाद में कहा कि वह इन्द्र को पहचान न सकी थी और वह अपराधिनी नहीं है इस कुकृत्य की। तब गौतम ने कहा कि वे उसे पुन: स्वीकार कर लेंगे जब राम उसे अपने स्पर्श से पवित्र करेंगे। यहां हम साक्षी हैं कि पुरुष स्त्री को अपवित्र मान कर अस्वीकार कर देता है चाहे वह अपराधी हो न हो।

कथासरित्सागर के वर्णनों में अहिल्या की मानसिक अवस्था का हल्का सा संकेत मिलता है। जब गौतम लौटते हैं‚ इन्द्र बिल्ली का रूप धारण कर भाग जाते हैं। लोलुप होने के कारण श्राप की वजह से इन्द्र के पूरे शरीर पर योनि के चिन्ह बन जाते हैं। गौतम आकर पूछते हैं कि कुटिया में कौन था। अहिल्या उन्हें अर्धसत्य बताती है कि ' मार्जार' ( प्राकृत में जिसका अर्थ है बिल्ला या फिर मेरा प्रेमी )। बाद में उसे शिला हो जाने का श्राप मिलता है। यहां कोई परीकथाओं की तरह शरीर पत्थर में नहीं बदला माना जाना चाहिये। यह सामाजिक बहिष्कार और स्वयं की मानसिक पीड़ा ही इस रूप में प्रायश्चित का संकेत हैं। अहिल्या एक जीती जागती शिला बन कर रह गई थी‚ भावशून्य‚ आत्मसम्मान रहित। यहां तक कि माता के रूप में भी अहिल्या को पूर्णता नहीं मिली उसका पुत्र स्वयं यह कहते हुए भी " मम माता यशस्विनी" उसे वन में छोड़ गया था। राम ने उन्हें दोषरहित मान कर सम्मान दिया और जब उन्होंने और लक्ष्मण ने सम्मान से उनके पैर छुए तब जाकर उन्हें खोया हुआ सामाजिक सम्मान व प्रतिष्ठा पुन: मिली। ताकि वे फिर से अपना जीवन सच्चे अर्थों में जी सकें। विश्वामित्र ने बार बार उन्हें 'महाभागा' कहा है‚ गुणों और पवित्रता से ओत - प्रोत। वाल्मिकी के विवरणों में यह कहा गया है कि राम ने उनकी आवश्यकता को जाना कि उन्हें उनके स्पर्श से मुक्ति मिल सकती है। किन्तु विश्वामित्र ने उनके सौन्दर्य का वर्णन बहुत सुन्दर तरीके से किया है‚ जिसका अनुवाद मेरे शब्दों में इस प्रकार है— “आदिकान्ड 14‚ 15”

ब्रह्मा ने अपनी तल्लीनता के साथ

इस सम्पूर्ण सौन्दर्य के रूप में

जिसे रचा‚

वह है दैविक‚ मनमोहक

जैसे कि जिव्हा हो अग्नि की

धूम्र रेखाओं से घिरी

हिम पर पड़ता पूर्णचन्द्र का प्रतिबिम्ब

नेत्रों को मूंदती सूर्यप्रभा

पानी पर परावर्तित हो मानो। 

यह उसके चरित्र की पवित्रता है‚ उसकी असाधारण सुन्दरता और यही कालातीत सत्य है अहिल्या को पांच कन्याओं में प्रथम कन्या का पवित्र व प्रमुख स्थान देने का। विश्वामित्र की दृष्टि में‚ (जो कि विद्रोही महर्षि माने गये हैं‚ जिन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि एक क्षत्रिय भी स्वयं को महान विश्वपूजनीय‚ पवित्र ऋषि में परिवर्तित कर सकता है‚ जिन्होंने विश्व को महान गायत्री मंत्र दिया) अहिल्या पतित स्त्री नहीं थी। वह अपनी स्वतन्त्र प्रकृति में अपने आप में एक सत्य थी। उसने अपने नारीत्व को अपनी समझ से एक तरह से संतुष्ट किया था‚ माना कि वह इस सम्बंध में अंतत: कोई तर्क प्रस्तुत करने में असफल रही। क्या अहिल्या असफल कन्या थी? इस तरह के अनोखे पति के अतिरिक्त स्थापित यौन सम्बंध में?  जो कि न तो बलात्कार था न ही परपुरुषगमन. इन पांच कुमारी कन्याओं के कौमार्य का रहस्य इसी में छिपा है।

क्रमशः