पंचकन्या – भाग-4

 

पंचकन्या – भाग-4

वह तो कुन्ती का ही अवैधानिक पुत्र कर्ण था जो कि धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन का परममित्र भी था‚ और भीष्म को समय समय पर चुनौती देता रहा। और सत्यवती जिसने कुरु राजवंश को दास कुल के रक्त की दिशा दे दी जिससे पौराणिक इतिहास में आकर्षक विपरीत मोड़ आ गया। विष्णु पुराण (1:13) और महाभारतह्य शांतिपर्व 59: 94) के अनुसार वास्तविक सम्राट तो वे ना था‚ जो कि ब्राह्मणों द्वारा मारा गया था क्योंकि उसने उनके आदेशों को मानने से इनकार कर दिया था। एक उत्तराधिकारी की आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने उसकी दायीं जांघ को मथा और एक छोटे कद का‚ काला‚ मोटी नाक वाला मानव उत्पन्न किया उसका नाम उन्होंने निषाद रखा और उसे जंगलों का मुखिया बना दिया‚ क्योंकि वह राजा जैसा ज़रा भी नहीं लगता था। इसी अभागे निषाद के वंश को बाद में सत्यवती के जरिये भविष्य में उसके अधिकार वापस मिले। बहुत पहले महापद्म नन्दा जब प्रतिष्ठित हुए तब वह देश की पहला शूद्र राजवंश था‚ सत्यवती दासेय (जैसा कि भीष्म उसके लिये कहते थे) ने इस कार्य को भली भांति पूर्ण किया हस्तिनापुर के रूप में। उसने विदुर को हमेशा खास तवज्जोह दी‚ जो कि व्यास और अम्बिका की निम्न जाति की दासी से उत्पन्न हुए थे‚ भीष्म को भी आगाह किया हुआ था कि वे भी दोनों राजकुमारों पाण्डु और धृतराष्ट्र के साथ ही पलें बढ़ें‚ एक भाई के समान ही और वे अपने शुद्ध व विवेक शील मत से राजमुकुट की देखभाल करें और नियोग से उत्पन्न पांडवों की रक्षा में रहें।

देवी भागवत पुराण में एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य है जो कि महाभारत में अनुपस्थित है।
6: 24: 15 में व्यास अपनी मां के द्वारा जन्म के एकदम बाद त्याग दिये जाते हैं और उन्हें जीने की संभावनाओं पर भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाता है …तो रोने लगते हैं (यहां कुन्ती और सत्यवती परस्पर मिलती जुलती हैं कि दोनों ने अपने पहले अवैधानिक बालक को भाग्य के भरोसे त्याग दिया थाहृ। बाद में अपने पुत्र शुक के शोक से सन्त्रस्त व्यास फिर अपने जन्मस्थान पर पहुंचते हैं और अपनी मां के बारे में पूछताछ करते हैं तो एक मछुआरा उन्हें बताता है कि वह तो अब रानी है। अपनी मां के सान्निध्य की चाह में वे सरस्वती नदी के किनारे ही अपना निवास बना लेते हैं और अपने सौतेले भाईयों के जन्म के बारे में सुनकर प्रसन्न होते हैं। और विचित्रवीर्य की विधवा स्त्रियों से बेटा पैदा करने से मना कर देते हैं‚ क्योंकि वह उन्हें अपनी पुत्रियों जैसी लगती हैं और किसी और की पत्नी से सहवास वह महापाप समझते हैं। जबकि नियोग के लिये अनुमति थी‚ वह भी पति की सहमति से ह्य जैसा कि कुन्ती के विषय में पाण्डु की आज्ञा प्राप्त थी) ‚ न कि सास की अनुमति से। व्यास ने अपनी मां से यह तक कहा कि राजवंश को इन घृणित तरीकों से बचाना ठीक नहीं।  पर सत्यवती ने एक बार फिर अपनी राजनैतिक और व्यवहारिक चतुराई दिखाई। अपने पोत्रों का मुख देखने को आतुर‚ अपनी वंशधारा विस्तार देने को उत्सुक (यही गुण विरासत में पाण्डु को मिला)‚ उसने परिवार के बड़ों से भी बहस करके इन अनुचित निर्देशों का पालन करने को बाध्य किया ताकि कोई उसे अकेले को आरोपित ना करे‚ ताकि ऐसा लगे कि इन तरीकों से पोतों को पाकर दु।खिता मां के दुख कम हो जाएंगे। भीष्म ने भी जब व्यास को अपनी मां की आज्ञा मान लेने को कहा तब उन्होंने इस सबको 'घृणित कार्य' कहा ( 6।24।56)  व्यास को घोर आश्चर्य हुआ भीष्म पर भी कि अवैध रूप से वंशपरम्परा चलाना तो व्याभिचारोद्भव ( 6।25।28) है‚ क्या ऐसा कर वे और राजवंश कभी भी प्रसन्न रह सकेंगे? कितनी सटीक भविष्यवाणी थी!

पाराशर और शान्तनु ही केवल सत्यवती के रूप के अधीन नहीं थे‚ और भी थे जिससे साबित होता है कि सच में वह कितनी खूबसूरत महिला रही होगी। हरिवंश ( हरिवंश पर्व 20।50–73) में भीष्म युधिष्ठिर को कहते हैं – शान्तनु की मृत्यु के बाद शोक के दिनों में कि उन्हें एक सन्देश मिला है पांचाल के उग्रयुद्ध पौरव से कि वे गन्धकाली यानि सत्यवती को उन्हें सौंप दें ढेर सारी धन सम्पत्ति के बदले में। किन्तु राज्य के मंत्री क्रोधित भीष्म को उग्रयुद्ध पर आक्रमण करने से रोक रहे हैं। क्योंकि वह अपाराजेय है बेहतर होगा कि शान्ति से बात चीत करके निबट लिया जाए। बाद में शोक दिवस पूर्ण होने के बाद भीष्म उग्रयुद्ध पर आक्रमण कर देते हैं जो कि एक दूसरी स्त्री के प्रति आसक्त होकर अपनी शक्ति पहले ही गंवा चुका होता है। हरिवंश की यह घटना स्पष्ट करती है कि सत्यवती क्यों अपने उत्तराधिकारी के लिये बहुत इच्छुक थी‚ उसे पता था कि पड़ौसी राज्यों की लालची दृष्टि हस्तिनापुर के उत्तराधिकारी विहीन राजमुकुट पर है। निर्ममता से अपने उद्देश्यों को पाने की उसकी मानसिकता हमें चन्द्रवंश की आरंभिक रानियों देवयानी और शर्मिष्ठा की याद दिलाने पर विवश करती है।

चलिये फिर कुन्ती की दिशा में चलें‚ कुन्ती सत्यवती की पौत्रवधू‚ स्त्रीत्व का एक विशेष चारित्रिक अध्ययन।

वह आकर्षक पाण्डु का चयन करती है स्वयंवर में‚ किन्तु शीघ्र ही उसे पता चलता है कि भीष्म ने उसकी खुशियों पर माद्री से भी पाण्डु का विवाह करा कर तुषारापात कर दिया है। जब पाण्डु वन में तपस्या के लिये जाते हैं तब कुन्ती खुशी खुशी अपने नपुंसक पति के साथ जाने की इच्छा प्रकट करती है‚ किन्तु वन में पहुंच कर वह स्वयं को बहुत ही भयावह स्थिति में पाती है जब उसका प्रिय पति उसे बाध्य करता है कि तुम दूसरे पुरुषों से संर्सग कर मुझे एक के बाद एक पुत्र दो। पहली बार तो कुन्ती सख्ती से यह कह कर मना कर देती है कि‚ " मैं विचारों में भी पर पुरुष का संर्सग नहीं कर सकती।(आदिपर्व 120 – 124)।

हालांकि विडम्बना की बात तो यह है कि वह पहले ही से सूर्य के साथ संर्सग कर कर्ण को जन्म दे अपना कौमार्य पुन: प्राप्त कर चुकी थी।

यह इस बात का साक्ष्य है कि वह यह प्रण कर चुकी थी कि वह अपनी पवित्र प्रतिष्ठा को बनाये रखेगी। इसीलिये वह अपने विवाह पूर्व जन्मे पुत्र के बारे में बता कर अपनी दादी सास सत्यवती से प्रतिस्पर्धा न कर सकी थी। राजमुकुट पाने के लिये वह अपने पति की राह में कोई बाधा नहीं चाहती थी‚ इसलिये उसने अपने पति पाण्डु को अपने पुत्र कर्ण के बारे में कुछ नहीं बताया था जबकि वह पुत्रों की कई श्रेणियों का वर्णन कर रहा था‚ उनमें पत्नि के विवाह से पहले जन्में पुत्र का भी ज़िक्र था। अपने पति की अनुमति से प्राप्त बच्चे‚ विवाह से पूर्व किशोरावस्था के समय एक निर्दोष राजकुमारी के यौन कुतुहल वश जन्मा एक बच्चा दो एकदम ही विपरीत विषयात्मक बातें हैं। उसमे पाण्डु से इच्छा प्रकट की कि काश वे एक सम्पूर्ण उदात्त वीर पुरुष होते और अपनी मृत्यु का भय न कर उसके साथ एक बार संसर्ग करते‚ व्युशिताश्व की तरह होते जो कि यौनप्रक्रिया में कुछ अधिक ही रत होने की वजह से शीघ्र ही उसी अवस्था में मृत्यु को प्राप्त हुआ था‚ बिलकुल वैसे ही जैसे कि पाण्डु के पिता… पर उनकी पत्नी भाद्रा ने उनके शव के संसर्ग से ही सात पुत्रों को जन्म दिया था। किन्तु पाण्डु ने कुन्ती के साथ इस मृत्यु के कगार पर पहुंचा देने वाले संसर्ग के लिये एक दम ही मना कर दिया ( हालांकि वास्तव में बाद में वह माद्री के साथ यही कर बैठे थे और यह इच्छा प्रकट की कि कुन्ती वही करे जिसकी कि कुरु वंश द्वारा अनुमति प्राप्त है ( 122।7)‚ और यह रीति एक पति के साथ ही प्रतिबद्ध होने की नई है‚ और औरों से पुत्र प्राप्त करने की परम्परा के तो कई उदाहरण हैं – शारदान्दायनी‚ मदयन्ती‚ अम्बिका‚ अम्बालिका।) यहां वह आश्चर्यजनक रूप से बहुत उचित और अपनी ही पूर्वजा माधवी का उदाहरण देना भूल गया) अन्तत।: वह पति की आज्ञा पालन करने के सम्बन्ध में शिवकेतु की एक स्तुति सुनाता है।

वह स्त्री जो

बच्चों को जन्म देने की

पति की आज्ञा का उल्लंघन करे

वह शिशुहत्या की अपराधिनी है।(122।19)

इससे कुन्ती पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह पति के भ्रू संकेतो पर नहीं उठती बैठती है‚ उसका चरित्र कहीं ज्यादा मजबूत है अपने पति की अपेक्षा। वह तभी समर्पण करती है जब पाण्डु उससे दीनता से निवेदन करते हैं।

" हे मधुर सौन्दर्य की स्वामिनी

मैं करबद्ध होकर

अपनी कमल की पंखुरी समान

उंगलियां बांध प्रार्थना करता हूँ

कि मेरी बात सुनो! ( 122।29)

यहाँ देखें उसकी शुद्ध शालीनता और उसके उत्तर में छिपी उसकी मानसिक शक्ति को।

हे भारत श्रेष्ठ!

महाअधर्म है यह कि पति बार बार

अपनी एक इच्छा के लिये निवेदन करे।

क्या यह पत्नी का धर्म नहीं कि

वह उसकी इच्छाओं का पूर्व ज्ञान रखे? ( 122।29)

जब पाण्डु किसी उत्कृष्ट ब्राह्मण के पास जाने को कहता है तो वह अपनी मधुरता से अपने स्त्रीत्व को प्रभावी करते हुए‚ यह उजागर करती है कि उसके पास ऐसा वरदान है कि वह अपनी शक्ति से किसी भी देवता तक को अपनी शायिका पर आमन्त्रित कर सकती है। वह अपनी सास की तरह अपना अंतिम अस्त्र प्रयोग करती है‚ जैसा कि उन्होंने अंतिम चरण पर भीष्म के सामने व्यास को लाकर किया था‚ किन्तु कुन्ती अपने मंत्र का रहस्य तभी पाण्डु पर उजागर करती है जब पाण्डु उसके सामने नत हो जाते हैं।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-3

 

पंचकन्या – भाग-3

एक कम वयस की सांवली मछुआरी कन्या काली - जो कि बाद में सत्यवती के नाम से जानी गई‚ एक बार अपने एक यात्री ऋषि पाराशर को नाव में यमुना नदी पार करा रही होती है‚ वे उस पर दबाव डालते हैं कि वह उनकी कामेच्छा संतुष्ट करे उन्हे हठी और दुराग्रही जान कर और डर कर कि कहीं बीच में ही नाव न डुबो दें यह सोच कर वह दो शर्तों पर तैयार हो जाती है‚ उसका कौमार्य नष्ट न हो‚ और उसकी देह से मछली की दुर्गन्ध समाप्त हो जाए।

तब मत्स्यगंधा योजनगंधा में बदल जाती है। जो कि बाद में हस्तिनापुर के राजा शान्तनु की पत्नी बनती है। सत्यवती अपने राजवंश की पहली रानी शकुन्तला जैसी ही है जो कि एक अप्सरा की अवैधानिक पुत्री थी‚ उसने भी दुष्यन्त के साथ सम्बंध बनाने से पूर्व यही मांगा था कि उससे उत्पन्न सन्तान ही राजमुकुट की अधिकारिणी हो। एक बार फिर यही वचन जबरन लिया गया सत्यवती द्वारा। इस महाकाव्य में सत्यवती के बारे में बहुत कम लिखा गया है। अत:यह आवश्यक है कि हम एक निगाह देवी भागवत पुराण पर भी डाल लें। जब पाराशर मुनी उसका सीधा हाथ पकड़ते हैं काली मुस्कुराती है‚ संयम के साथ‚ बहुत परिपक्वता के साथ वह कहती है–

" आप जो कुछ भी करने जा रहे हैं

क्या वह आपकी वंश परम्परा

आपके उत्थान तथा महान वेदों

के अनुरूप होगा?

आपके परिवार का नाम उज्जवल है

ऋषि वशिष्ठ के वंशज हैं आप

इसलिये ओ धर्मज्ञानी

यह कैसी इच्छा कर रहे हैं आप‚

इच्छा के दास हो गये हैं आप?

हे ब्राह्मण श्रेष्ठ!

मानव का जन्म ही इस सृष्टि पर दुर्लभ है

उस पर ब्राह्मण कुल में पुरुष योनि में

जन्म लेना अत्यन्त ही दुर्लभ है।

हे उच्च कुल में जन्मे‚ गुणी

वेद वेदान्तों के ज्ञाता‚ धर्मज्ञानी

ब्राह्मणों के बीच इन्द्र के समान श्रेष्ठवर!

आपने मेरी मत्स्यगंध से गंधाती देह में

ऐसा क्या देखा कि अनार्य अनुभूति जाग्रत हुई?

हे दो बार जन्म लेने वाले मानव श्रेष्ठ

आपकी बुद्धिमत्ता तो पूर्वाभासी है।

आपने मेरी देह में क्या शुभ चिन्ह या लक्षण देखा

कि आप इसे पाने को व्यथित हैं?

क्या आपपर आपकी इच्छा ने इतना अधिकार कर लिया कि

आप अपना धर्म तक भूल गये?

यह सब कहते हुए वह बुदबुदाती है।

" ओह ये तो पागल हैं मुझे पाने को

ये द्विजा‚ अपना विवेक खो बैठे हैं।

ये तो नाव का संतुलन बिगाड़ देंगे और हम डूब जाएंगे।

यह तो उद्धत हैं‚ इनका हृदय काम के पंचशर से विद्ध है

अब इन्हें कोई नहीं बचा सकता।"

यह स्वगत कहते हुए काली ऋषि से कहती है।

"हे महामुनी‚ धैर्य रखें जब तक कि हम उस पार तक नहीं पहुंचते।"

सुता कहते हैं कि पाराशर ने उसकी राय को माना और उसका हाथ छोड़ कर शांत बैठ गये। किन्तु उस पार पहुंचते ही ऋषि की कामेच्छा पर फिर ज्वर चढ़ा उन्होंने मत्स्यगंधा को समागम को उद्धत हो बांध लिया तो गुस्से में कांपती हुई वह ऋषि के सम्मुख हो कहने लगी।

" हे ऋषिश्रेष्ठ! मेरी देह गंधाती है क्या आपको अनुभव नहीं होता?
प्रेम और संभोग दोनों के लिये सुखकर होना आवश्यक है।"

यह कहते ही उसकी देह से कस्तूरी गंध फूटने लगी। और वह मत्स्यगंधा से योजनगंधा बन गई‚ मनोहर‚ ऋषि ने कामावेग में उसका दायां हाथ बांध लिया तब शुभ लक्षणा सत्यवती ने कामातुर ऋषि से कहा।

" नदी के तट से सभी जन और

मेरे पिता हमें देख लेंगे‚ यह दिन का प्रकाश है‚

और ऐसे दिन के प्रकाश में

यह अनैतिक काम करना

मुझे अच्छा नहीं लगता

इसलिये हे‚ ऋषिश्रेष्ठ!

रात्रि होने तक प्रतीक्षा करें

पुरुषों के लिये संभोग केवल रात्रि में ही उचित है

दिन के समय‚ प्रकाश में नहीं

अगर किसी के द्वारा देख लिया जाए तो यह महापाप है

मेरी इस इच्छा का मान रखें‚ हे बुद्धिमान ऋषि"

उसके शब्दों में तथ्य जान पाराशर ऋषि फिर झुक गये। जैसे ही शाम का धुंधलका बढ़ा और रात का अंधेरा छाने लगा तो वह कमनीय स्त्री मधुर वाणी में बोली।

मैं कुमारी हूँ‚ हे द्विजकुलीनों के सिंह

मुझे भोग कर‚

तुम मुझसे अलग हो जहां तुम चाहोगे चले जाओगे

किन्तु तुम्हारे अचूक‚ त्रुटिहीन बीजों का क्या ओ ब्राह्मण?

मेरा क्या? अगर मैं गर्भवती हो गई तो

मैं अपने पिता से क्या कहूंगी?

मुझसे देहसुख लेने के बाद‚ तुम्हारे जाने के बाद

मैं क्या करुंगी? कहो?

पाराशर ने कहा‚ " प्रिये!

आज मुझे सुख देकर

पुन: कौमार्यधारिणी बन जाओगी।

फिर भी हे स्त्री

अगर तू डरती है तो

मांग ले जो चाहे वह वरदान।

सत्यवती ने कहा‚ " हे द्विजकुल श्रेष्ठ मुझे वरदान दो कि‚

मेरे पिता या किसी को भी इस घटना का पता न चले

मेरा कौमार्य बना रहे

आपका पुत्र हो तो वह आप जैसा हो और

वरदान से प्राप्त हुआ माना जाए

मेरी देह की यह मोहक गंध बनी रहे

मेरा यौवन चिरकाल तक ऐसा ही रहे।

सत्यवती को उसके महान वेदों और पुराणों के रचयिता पुत्र का वरदान देकर‚ पाराशर ने अपनी मनोवांछित पा लिया और यमुना नदी में स्नान कर पवित्र हो चले गये‚ फिर उन्होंने सत्यवती से कोई सम्पर्क नहीं रखा। इस मछुआरी कन्या का विशिष्ट चरित्र उसकी बातचीत से ही उभर कर सामने आता है। हालांकि वह अभी एक किशोरी से युवती होने की अवस्था में ही थी‚ फिर भी उसने एक महान ऋषि को अपने ऊपर अधिकार नहीं करने दिया‚ चाहे वह कितना ही प्रसिद्ध क्यों न था। यहां तक कि उसने ऋषि को स्वामित्व और संयम का पाठ अपनी विचारशीलता और वाक्पटुता से पढ़ा दिया था। उनकी कामान्धता का आवेग जान कर उसने सीधे सीधे उनका प्रेम निवेदन नकारा नहीं‚ पर नाव के डगमगाने के स्थिति में उसने उनसे किनारे तक पहुंचने की प्रार्थना की यह सोच कर कि शायद किनारे तक जाते हुए इनका आवेग शान्त हो जाएगा और विवेक जाग जाएगा। किन्तु ऐसा न होने पर वह खीज जाती है और उनकी पाशविक कामप्रवृति पर बुरा भला कहती है और अपनी देह की अप्रिय गंध की ओर उनका ध्यान दिलाती है। अपनी परिपक्वता और साफ साफ कहने की क्षमता के अनुरूप यह कहकर कि सहवास दोनों के लिये आनन्दकर होना आवश्यक है‚ वह आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी हमें चकित कर जाती है। यहां तक कि कस्तूरी गंध प्राप्त करने के बाद भी वह आसानी से स्वयं को नहीं सौंपती यह कह कर कि दिन के प्रकाश में‚ लोगों के देखने की पूरी सम्भावना के बावजूद मैथुन करना पाशविक है‚ एक बार फिर ऋषि उसकी तर्कसंगतता के आगे नत हो जाते हैं और धुंधलका घिरने तक प्रतीक्षा कर लेते हैं। फिर भी वह स्वयं को नहीं सौंपती उसकी अंतिम आपत्ति होती है कि तब क्या होगा जब वे उसका कौमार्य भंग कर चले जाएंगे कभी न लौटने के लिये? उस उच्चजातीय ऋषि पर तो कोई उंगली नहीं उठाएगा पर उसका क्या?

यह आश्चर्यजनक है एक अशिक्षित‚ किशारी में इतनी परिपक्वता होना। उसने ऐसा कोई भ्रम नहीं पाला कि यह महान ऋषि उससे विवाह कर लेगा। सो वह उससे यह वरदान निश्चित करवाती है कि उसे उसका कौमार्य पुन: प्राप्त होगा और अगर इस समागम से कोई सन्तान हो तो वह प्रसिद्ध व महान व्यक्तित्व के रूप में जन्म लेगी।

जब वह यह सब व्यवहारिक बातें सोच समझ लेती है तभी वह अपने पवित्र स्त्रीत्व को ऋषि को सौंपती है। वह अपने इस पवित्र स्वरूप सो सदैव बनाए रखने के लिये ऋषि से चिरयुवा‚ सदैव सुगंधित होने का वरदान भी मांग लेती है। यह वह उपहार है जो हेलेन ने भी मांगा था‚ और हर युग की हर स्त्री इस उपहार के लिये लालायित रहती है और रहेगी। महाभारत में स्त्री की मानसिकता के बड़े आकर्षक और गहरे अंश उपलब्ध हैं।

" और वह‚ इन वरदानों से परमान्दित‚

पाराशर ऋषि के समागम से उसी दिन

गर्भवती हो जाती है।" ( आदिपर्व 63। 83)

जब मत्स्यगंधा ऋषि को कहती है कि वह अभी अपने पिता के अधिकार में है‚ और वह उनकी अपेक्षाएं पूरी करने के लिये स्वतन्त्र नहीं है। फिर वह अपनी स्वतन्त्रता के लिये ऋषि के वरदान द्वारा वह अपना 'स्व' तथा 'स्वातन्त्र्य' अर्जित करती है। जो कि एक कुमारी के लिये विशिष्ट बात है। पाराशर ऋषि के साथ सहवास के बाद भी वह अपना स्व तथा स्वतन्त्रता सुरक्षित रखती है‚ वह उन पर निर्भर होने या उस अलौकिक प्रेम को विवाह का रूप देने की कोई पेशकश नहीं करती। दोनों के मिलन का उद्देश्य पूर्ण होता है‚ दोनों अलग हो जाते हैं‚ किसी भावुकता भरे बंधनों में बंधे बिना। कोई रूमानी आशाएं नहीं की जातीं‚ पुन: मिलने की‚ न कोई ग्लानि‚ न ही कोई चिन्तातुर‚ खीज और आशंका से ग्रस्त प्रश्न किये जाते हैं‚ इस मिलन से उत्पन्न संतान के लिये। यह तो पूर्व ही में निर्धारित हो चुका था‚ दोनों की सहमतियां थीं। क्या वह इक्कीसवीं सदी की किसी आधुनिक महिला मुक्ति की विचारधारा वाली स्त्री से कम थी?

सत्यवती के हस्तिनापुर आने से भीषण बदलाव आते हैं। स्वयं भीष्म उन्हें अपने पिता शान्तनु के दिये गये वचनों और सुख के लिये राजपरिवार में लेकर आते हैं‚ उनसे भी वह यह वचन ले लेती है कि उनका ही रक्त होगा जो भविष्य में हस्तिनापुर का राजा होगा‚ और इस पर भीष्म स्वयं कभी राजा न बनने का और अविवाहित रहने का प्रण ले लेते हैं।

इसके लिये बाद में पुत्र की मृत्यु के बाद वह अपने ही राजकुमार पुत्र की विधवा को अपने अवैधानिक‚ मिश्रजाति के पुत्र व्यास के पास जाने को बाध्य करती है। इसीलिये न तो धृतराष्ट्र और न ही पाण्डु में कुरुवंश का रक्त था। अपने निम्नजाति के जन्म की वजह से सत्यवती को अपने अवैधानिक पुत्र को सबके समक्ष लाने में उच्च जाति की स्त्रियों जैसी कोई झिझक न थी। उसने उसे हस्तिनापुर के भविष्य में एक निर्णायक पात्र के रूप में लाने की महत्वाकांक्षा पाली थी जो कि सत्य हुई‚ भीष्म की एक अप्रत्यक्ष विरोधी छाया के रूप में जो कि स्वयं उनके आदेशों को मानने को विवश थे ही। सामाजिक संतुलन के प्रति उनकी अनास्था तब भी उजागर होती है जब उनकी पौत्र वधू चतुर व राजपरिवार की कुन्ती तक उनसे प्रतिस्पर्धा का साहस तक नहीं कर पाती।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-2

 पंचकन्या – भाग-2

तारा‚  बाली की पत्नी वह अगली कन्या है जिससे हम रामायण में मिलते हैं‚ एक विदूषी‚ दूरंदेशी और आत्मविश्वासी स्त्री। जब सुग्रीव दूसरी बार बाली को चुनौती देने आता है तो वह बाली को चेताती है कि अगर सुग्रीव हार जाने के बाद भी दुबारा आया है तो इसके पीछे कोई छल भरी भूमिका है‚ क्योंकि अच्छी तरह से हार जाने और मात खाने के इतनी जल्दी कोई भी शत्रु वापस लड़ने नहीं आता। और उसने सुन भी रखा था कि वह राम का मित्र बन गया है। किन्तु उसकी राय को बाली ने नहीं माना और बाहर गया तथा राम के बाण का शिकार हो गया। किन्तु पुत्र अंगद के भविष्य को ध्यान में रखते हुए और उसे पिता की छाया से वंचित न करने की चाह से ही वह अपने ही पति के भाई सुग्रीव की सहगामिनी बन गई। जब लक्षमण किश्किंधा  के अन्त:पुर में अचानक धड़धड़ाते हुए गुस्से में प्रविष्ट हुए तब तारा ही थी जिसे सुग्रीव ने क्रोधी शेषनाग के अवतार लक्ष्मण को संभालने के लिये भेजा था। तारा ने लक्ष्मण का अर्धोन्मिलीत नेत्रों‚ अस्थिर चाल से – सुन्दर कमनीय लज्जारहित तारा ने उनके क्रोध को शान्त तथा उन्हें अस्त्रविहीन कर दिया। उसने कोमलता से उन्हें झिड़का कि वे कामावेग की असीमित शक्ति से अज्ञात हैं‚ जो कि बड़े से बड़े ऋषियों को भी डिगा दे‚ जबकि सुग्रीव तो एक किंचित वानर मात्र है। तारा निर्भीक होकर कहती रही कि यह भर्त्सना न्यायोचित नहीं है और उसने विस्तार से बताया कि सेना को एकत्रित करने का कार्य सुचारु रूप से चल रहा है‚ आप क्रोधित न हो।
एक बार फिर गौर किया जाए तो जो तारा ने बाली को राय दी थी
‚ वह उसकी दूरदर्शिता और सूचनाओं से निष्कर्ष निकालने की अभूतपूर्व क्षमता को उजागर करती है। और बाद में जब वह सुग्रीव की ढाल बन कर लक्ष्मण के सामने आई तब उसके पीछे अपने पुत्र अंगद को राजकुमार बनाने की मंशा छिपी थी।

अब हम बात करते हैं मन्दोदरी की जो कि वाल्मिकी की रामायण की अंतिम कन्या चरित्र है। किन्तु समस्या तो यह है कि वाल्मिकी जी ने अपने महाकाव्य में मन्दोदरी के बारे में बहुत ही कम लिखा है‚ सिवा इसके कि वह बार बार अपने पति से सीता को राम को वापस लौटाने का आग्रह करती है। और बार - बार उसने सीता को रावण की कुदृष्टियों और स्पर्शों से बचाया भी। आगे उसने तारा की ही भांति अपने पति के शत्रु और भाई से विवाह कर लिया था‚ या तो राम के आग्रह से अथवा अनार्य राजाओं की प्रथा के अनुसार कि विजयी राजा हारे हुए राजा की रानी से विवाह करता है।

‘अद्भुत रामायण’ से हमें कुछ और आन्तरिक जानकारियां मिलती हैं। यहाँ मन्दोदरी रावण की आज्ञा का उल्लंघन करती है‚ उस पात्र में से घूंट भरने को मना कर देती है‚ जिसमें रावण ने तपस्या के लिये रक्त एकत्र कर रखा था। इस कृत्य द्वारा वह साबित कर देती है कि वह अपने पति की परछांई मात्र नहीं। यहां इस बात का भी वर्णन मिलता है कि कुन्ती की ही भांति मन्दोदरी गर्भवती हुई और उसने अपने नवजात शिशु को त्याग सुदूर क्षेत्र में भिजवा दिया था। यह क्षेत्र राजा जनक का था‚ जहां हल चलाने पर अनाथ सीता पाई गई थी। इस घटना के प्रकाश में देखा जाए तो यह आश्चर्यनक नहीं है कि हनुमान ने गलती से मन्दोदरी को रावण के महल में विचरते देख उन्हें सीता समझ लिया था।

तारा और मन्दोदरी दो समानान्तर पात्र हैं‚ जिन्होंने अपने अपने पतियों को समय रहते चेताया था और उन्होंने उनकी राय न मानने पर अन्तत:  पर्याप्त परिणाम भुगते भी। फिर दोनों ने अपने पति की मृत्यु के बाद पति के भाई तथा शत्रु को पति रूप में स्वीकार भी किया। ताकि वे अपना राज्य को सुरक्षित रख सकें और अयोध्या के मित्र राष्ट्र बनकर रहें‚ और उनका राजकार्यों में अधिकार पूर्ववत बना रहे। तारा और मन्दोदरी दोनों ही को अपने शक्तिशाली पति बाली और रावण की मात्र छाया की तरह वर्णित नहीं किया जा सकता।

महाभारत में द्रोपदी और कुन्ती महज सास - बहू ही नहीं थे बल्कि चरित्रों में एक दूसरे के समानान्तर पात्र थे। वृश्निक के शूरा ने अपनी पुत्री पृथा को अपने सन्तानहीन मित्र कुन्तीभोज को गोद दे दिया था। यह कसक कुन्ती के भीतर हम तब पाते हैं जब कुरुक्षेत्र युद्ध समाप्त होने पर वह कर्ण के जन्म की बात को स्वीकार करती है.।

जब वह कुन्तीभोज के महलों में बड़ी होने लगी तो वहां मां के न होने का अभाव उसे खलता था और बाद में किशोरावस्था में उसे दुर्वासा ऋषि को सौंप दिया गया जो कि बहुत सी विषमताओं के केन्द्र थे‚ और अत्यधिक चिढ़चिढ़े थे। और उसके पिता ने उसे आदेश दिया था कि उन्हें वह अप्रसन्न ना करे इसमें उसका और उसके वंश का अपमान होगा। जन्म से ही सुन्दर व कुशाग्र पृथा अपने नाम को सार्थक करती थी‚ वह अतीव सुन्दरी थी इसलिये कुन्तीभोज ने उसे सतर्क कर रखा था कि अपनी सुन्दरता के घमण्ड में अपने कर्तव्यों को कभी उपेक्षित ना करे। बाद में चार देवताओं और एक मानव ने खुशी - खुशी उसके आमन्त्रण को स्वीकार किया। शूरा और कुन्तीभोज के कुन्ती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों से पीछे हटने का ही परिणाम था कर्ण का जन्म‚ जिससे वे अपने जीवन में मस्त हो कर आजन्म अनजान ही रहे।

कुन्ती अहिल्या की ही तरह उत्सुक थी। वह दुर्वासा के वरदान को परख कर देखना चाहती थी कि क्या वह सच होगा? सूर्य की चमक से प्रभावित हो तथा उसे मन से ग्रहण कर सूर्योदय के समय वह मंत्रोच्चार से सूर्य को आमंत्रित करती है। सूर्य इन्द्र ही की तरह असंतुष्ट नहीं लौटेंगे यह निश्चित है। वह फुसला और धमका कर विवाह योग्य कुन्ती को उसके अक्षत कौमार्य को क्षति न पहुंचने देने का वचन देता है और मना करने पर राज्य छीन लेने की धमकी देता है। स्वयं की कामना और सूर्य की शक्ति के भय की वजह से जहां कुन्ती एक ओर विरोध करती है वहीं यह मांग भी करती है कि इस मिलन से जो संतान पैदा हो वह पिता सूर्य के समान ही तेजस्वी हो। क्षीरोदेप्रसाद विद्याविनोद ने अपने बंगाली नाटक नरनारायण (1926) में संक्षिप्त मगर बहुत प्रभावशाली वर्णन कर्ण के मुख से करवाया है।

" एक स्त्री का गलत कदम — एक देवता की कामुक उत्सुकता
एक कन्या की उत्सुकता और उसकी लज्जाहीन कामुकता"

कुन्ती सूर्य के साथ अपने इस सम्पर्क से दो वरदान प्राप्त करती है। अक्षत कौमार्य का वरदान और पुत्र के लिये विशेष गुण और शक्ति। इस सबमें कुन्ती अपनी दादी सास सत्यवती‚ और माधवी जो कि चन्द्रवंश के राजा ययाति की पुत्री थीं और यादव वंश की भानुमती के सदृश है जिसे भी वरदान प्राप्त था कि अगर बलात्कार हुआ तब भी वह कुमारी रहेगी।

क्रमशः