पंचकन्या – भाग-9

 

पंचकन्या – भाग-9

द्रौपदी ने भीम को जिस चतुराई से किचका को नष्ट करने के लिये उकसाया वह बड़ा आकर्षक पाठ है यौन शक्ति की कला और कौशल का। वह अर्जुन की तरफ नहीं बढ़ी क्योंकि वह जानती थी कि वह युधिष्ठिर के परम शिष्य हैं‚ जैसा की चौपड़ के खेल में भी देखा गया था। ऐसे भी भीम ही था जिसने उसके अत्याचार के लिये क्रोध गर्जना की थी।

अब वह उससे रात के अंधेरे में बाहर निकल कर ढूंढती है‚ वह रसोई में सो रहा है‚ वह उसे ऐसे जा लिपटती है जैसे कोई उत्तेजित स्त्री‚ जैसे जंगली सारस की मादा अपने साथी के करीब जाकर सट जाती है‚ जैसे तीन वर्षीय गाय अपने पहली ऋतु में बैल से अपनी देह रगड़ती है। वह भीम को चतुर्दिक गोमती के किनारे लगे एक बड़े शाल वृक्ष पर लिपटी लता की तरह अपने अंक में भर लेती है‚ जैसे सिंहनी सोये हुए जंगल के राजा को घने जंगल में कस लेती है‚ जैसे कि कोई उन्मत्त हथिनी एक बड़े हाथी का आलिंगन करती है।

भीम उसकी बांहों में जागते हैं‚ दौपदी उसका परिचारन कर अंतिम आघात करती है‚ उसे वीणा के गंधार स्वर में जो कि सरगम में तीसरे स्थान पर होता है‚ उसके गुस्से को भड़काने के लिये वह अपने दुर्भाग्य का रोना रोती है कि कैसे वह एक राजकुमारी होकर आज विराट की राजकुमारी के लिये स्नानकक्ष में पानी भर कर ले जाती है और यह उल्लेख करना नहीं भूलती कि कैसे वह मूच्र्छित हो गई थी जब वह जंगली जनवरों से लड़ रहा था‚ और अन्य स्त्रियों की चुभने वाली टिप्पणियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है। अंतत: अपने नारीत्व से भरे अनिवर्चनीय स्पर्श के साथ वह अपनी हथेली उसकी ओर बढ़ाती है‚ जो कि रानी के लिये मक्खन मथ कर फट चुके हैं। उसकी वही प्रतिक्रिया होती है जिसके लिये द्रौपदी ने यह सब रचा और सोचा था‚ पूर्ण सफल।

" भेड़िये के समान कटि वाले

शत्रु का दमन करने वाले भीम ने

अपना चेहरा अपनी पत्नी के

कोमल मगर फटे हुए हाथों से ढक लिया

और उसके आँसू बह निकले" ( विराट पर्व‚ 20।30)

अब किचका की मृत्यु निश्चित थी। जब किचका मृत्यु को प्राप्त हुआ तो उसके शव को छिपाने की जगह द्रौपदी ने निर्दयता से अकड़ कर शव उसके सम्बन्धी के सामने फेंक दिया जो कि उसके बदले की भावना को उजागर करता है। उन्होंने उसका अपहरण कर लिया और उसे फिर से भीम ने जलने से बचाया।

आरंभ में‚ जब चौपड़ खेला जा रहा था‚ और उसे दांव पर लगाने के लिये बुलवाया गया तब कायरता के साथ पति के आदेश का पालन करने की जगह यह यजनासनी सभी कुरुवंश के बुर्जुगों को धर्मसम्बन्धी चुनौती देकर सकते में डाल देती है। वह अपने पति का आदेश मानने की बजाय वह एक प्रश्न भेजती है वापस जिसका उत्तर कोई नहीं दे पाता। युधिष्ठिर जो कि स्वयं पहले ही स्वयं को दांव में हार चुके हैं तो वे उसे कैसे दांव पर लगा सकते हैं?

वह बड़ी कुशाग्र बुद्धि थी‚ नि।सन्देह अपने आप में पूर्ण एकरूपा‚ वह कुरुवंश के बड़े और पूजनीय लोगों के पक्षपात पूर्ण अत्याचार के लिये झिड़कने से भी हिचकी नहीं। जब कर्ण उसे दासों के स्थान की ओर धकेलने का आदेश देते हैं तब वह अपने मूक बैठे पतियों की ओर देख रो पड़ती है। किन्तु उधर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती। तब अपने मस्तिष्क की त्वरा से वह प्रणाम की सामाजिक रीति के लिये रुक जाती है‚ कुछ पलों की छूट के कारण खींचातानी के बाद अपने बंधे हाथ छुड़ा लेती है। उसकी आवाज़ में व्यंग्य भरा है। परिवार के बुर्जुग जिन्हें वह प्रणाम करती हुई जानबूझ कर ' कर्तव्य' शब्द का प्रयोग करती है‚ जिसमें मूक सन्देश है‚ विदुर के शान्त चेहरे की ओर देख वह जताती है कि अपना कर्तव्य निभाओ और राजवधू को इस अत्याचार से बचाओ‚ यहां शब्दों का चयन देखिये।

" एक कर्तव्य शेष रह गया है‚ जिसे

मुझे अभी पूर्ण करना है‚ जिसे मैं इस महान योद्धा

के खींचे जाने पर लगभग भूल गई थी।

मैं इतने असमंजस में थी।

श्रीमन्तों‚ मैं आप सभी को झुककर प्रणाम करती हूं

सभी मेरे बुर्जुगों‚ मेरे बड़ों‚ मुझे क्षमा कर दीजियेगा

पहले मैं ऐसा न कर सकी।

यह मेरी भूल नहीं थी

सभा के भद्रजनों! ( सभा पर्व‚ 67।30)

यहां 'महान योद्धा' जो कि अपनी ऋतुस्त्राविता अपनी भाभी को उसके बालों से पकड़ खींच रहा है‚ जो कि आजकल एकवसना है। इसलिये वह परेशान हो अपना कर्तव्य भूल गई‚ जबकि उसके बड़े बुर्जुग जो कि पूरी तरह से भुलक्कड़ हैं जबकि उन्हें एक दासी पुत्र ने याद भी दिलाया था। यह उसकी गलती नहीं है कि उसके साथ अत्याचार हुआ‚ और निश्चय ही कुरुवंश के बड़े लोगों की अपेक्षा वह असमंजस में नहीं है‚ जिन्हें भीष्म कहते हैं।

"हमारे बुजुर्ग जो कि धर्म पारंगत थे

द्रोण और अन्य‚ बैठे रहे आंखे नीची कर मृत पुरुषों की भांति

जैसे कि जीवन और सांस चले गये हों।" ( सभा पर्व‚ 69।20)

यजनासनी सफल हुई अपने दास पतियों की स्वतन्त्रता फिर से जीतने में। कर्ण ने उसे विशेष श्रद्धा दी‚ यह कह कर कि विश्व में कोई भी प्रसिद्ध व सुन्दर स्त्री इतनी दक्ष और निपुण नहीं हो सकती है । जिसने एक नाव की तरह उसने अपने पतियों को दु:ख के समुद्र में डूबने से बचाया। (सभा 72।1)

वह आश्चर्यजनक सम्मान के साथ धृतराष्ट्र द्वारा दिया गया तीसरा वचन ठुकरा देती है‚ कि अगर उसके पति अपने हथियारों के साथ स्वतन्त्र हैं तो उसे किसी अन्य वरदान या वचन की आवश्यकता नहीं। कोई भी इक्कीसवीं सदी की महिलामुक्ति विचारधारा वाली स्त्री स्वयं सिद्धा होने में द्रौपदी को मात नहीं दे सकती। क्या हम कल्पना भी कर सकते हैं कि किसी स्त्री को जबरन ले जाया जा रहा हो और उसके पति खामोश बैठे हों‚ फिर जंगल में वह अपहृत हो और उसके पति अपहरणकर्ता को क्षमा कर पक्षपात करें‚ फिर दरबार में उसके साथ अत्याचार हो और अपने ही पतियों द्वारा वह सचेत की जाए कि ' तमाशा मत करना'। फिर उसे जीवित जलाने के लिये ले जाया जाए‚ फिर जब युद्ध की भयावह स्थिति सामने हो तो उसके पतियों द्वारा उसे आगे कर दिया जाए कि कृष्ण से शान्ति की प्रार्थना करे‚ और अन्तत: उसे प्राप्त क्या हो अपने मृत सम्बन्धी और पुत्र ? और फिर भी वह मानसिक रूप से संतुलित रह सकती है?

एक स्पष्ट विरोधाभास देखा जा सकता है द्रौपदी और शैव्या हरिश्चन्द्र की पत्नी में‚ उसके मुख से एक शब्द नहीं निकला था जब विश्वामित्र ने उसे उसके राज्य से बाहर निकाल दिया था‚ और उसे एक छड़ी से उधेड़ डाला क्योंकि थकान की वजह से वह जल्दी नहीं चल पा रही थी ह्य( 7।29)। वह स्वयं हरिश्चन्द्र को कहती है कि अब मैंने अपना कर्तव्य आपको पुत्र देकर पूरा कर लिया है‚ तो आप मुझे बेच कर विश्वामित्र को बकाया दे दें जो वे चाहते हैं। जिस ब्राह्मण को उसे बेचा जाता है वह उसे उसके बाल पकड़ कर खींच ले जाता है‚ और वह मौन रहती है। यह निश्चय ही सती के अनूकूल व्यवहार है जो कि अन्तत। अपने स्व को मिटा देती है‚ और अपने पति के लिये ही वह जीती है।

दूसरी ओर कन्या का चरित्र अपनी ही चमक से दीप्तिमान होता है जो कि उसके पति और बच्चों से एकदम स्वतन्त्र होता है। वह अपने लिये आत्मसंतुष्टी ढूंढती है‚ समाज और परिवार के मानदण्डों की परवाह किये बिना। इसलिये द्रौपदी ने तब तक विश्राम नहीं किया जब तक कि उसका बदला पूरा नहीं हुआ‚ जिसके लिये उसके पिता ने उसके अवतरित होने का आव्हान किया था‚ और जब तक कि उसने अपने ऊपर हुए अत्याचार के अपमान को रक्त से नहीं धो डाला। वनवास के पूरे तेरह साल उसने अपने पति और सखा कृष्ण को यह भूलने की अनुमति नहीं दी कि कैसे उस पर अत्याचार हुआ था और कैसे उन्हें धोखे से उनके राज्य से वंचित कर दिया गया। जब उसे पता चलता है कि उसके पति सहदेव को छोड़ कर सभी युद्ध की बजाय शान्ति चाहते हैं‚ तो वह अपने सारे स्त्रियोचित गुण और आकर्षणों का सहारा लेती है और घटनाक्रम को अटल होकर युद्ध की ओर मोड़ देती है। अपनी पीड़ाओं का राग अलाप कर‚ अपने सर्पिणी से काले केश खोल कर और आँसू भरे नेत्रों के साथ वह उन घटनाओं को बार बार याद दिलाती है‚ जब भी कृष्ण शान्तिपूर्ण सन्धि के बारे में बात करने आते हैं। सुबकते हुए वह घोषित करती है कि अभिमन्यु के नेतृत्व में उसके पांच पुत्र और उसके वृद्ध पिता और भाई उसके लिये प्रतिशोध लेंगे अगर उसके पति नहीं लेते तोॐ कृष्ण का उत्तर वही होता है जो कि उसका लक्ष्य था ही ।

" जिनके तुम पक्षधर नहीं हो

उन्हें तुम मृत ही समझो…!

हिम से ढके पर्वत खिसक सकते हैं‚

धरती हिल सकती है

स्वर्ग सौ टुकड़ों में बिखर सकता है,

किन्तु मेरा वचन नहीं डिग सकता…

तुम देखना तुम्हारे शत्रु मारे जाएंगे।" ( उद्योग पर्व 82।45‚48)

महाकाव्य का घटनाचक्र पांच श्यामवर्णी व्यक्तियों तथा कुन्ती के द्वारा निर्धारित है‚ उनमें से तीन कन्या चरित्र हैं जैसे। गन्धकाली ( सत्यवती)‚ कृष्ण द्वेपायन व्यास‚ वासुदेव कृष्ण‚ यजनासनी( द्रौपदी)‚ अर्जुन और कुन्ती। पहले तीन यमुना के श्याम जल से जुड़े हैं‚ जबकि सत्यवती‚ कुन्ती और द्रौपदी एक दूसरे का प्रारूप हैं।

द्रौपदी ही इस महाकाव्य में एक ऐसा चरित्र है जो कि सती से कन्या बना है। इस महाकाव्य के दक्षिण भारतीय पाठ में यह वर्णित है कि अपने पिछले जन्म में नलायनी जो कि इन्द्रसेना के नाम से भी जानी गई‚ के रूप में इसका विवाह मौदगल्य से हुआ‚ जो कि चिड़चिड़े और कोढ़ पीड़ित ऋषि थे। वह अपने इन बुराभला कहने वाले पति के प्रति पूर्ण समर्पिता थी‚ जब उसकी एक कोढ़ से झड़ी उंगली उनके खाने में गिर गई तो उसने उसे चुपचाप निकाला और वो बिना घृणा किये वही चावल खाती रही। इस बात से प्रसन्न होकर मौदगल्य ने उसे एक वरदान मांगने के लिये कहा इस पर उसने उनसे इच्छा जाहिर की कि वे उसे पाँच सुन्दर पुरुषों के रूप में प्रेम करें। जैसा कि वह कभी न संतुष्ट होने वाली स्त्री थी‚ मौदगल्य बहुत जल्दी ही ऊब गये और फिर उन्होंने अपने आप पर आत्मनियंत्रण कर लिया। जब उसने पुन: अपनी इच्छा का प्रदर्शन किया और उनसे बार बार ऐसा प्रेम करने का आग्रह किया तो उन्होंने गुस्से में उसे श्राप दे डाला कि जा जब तू पुर्नजन्म लेगी तो तेरी इस वासना को पूरा करने के लिये पांच पति होंगे। उसके बाद उसने शिव की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न किया और उनसे वरदान मांगा कि अगर अगले जन्म में अगर उसके पांच विवाह हों तो हर पति के साथ संर्सग के बाद उसकी कौमार्यावस्था उसे पुन: प्राप्त हो जाए। अत:अपने अपने नारीत्व की दृढ़ता के साथ जीवन भर अंधों की तरह अपने पति के उद्देश्यों को पूरा करने से मना कर दिया‚ और सती नलायनी ने स्वयं को यजनासनी कन्या के स्वरूप में ढाल लिया। ब्रह्मवैवार्ता पुराण के अनुसार वह सीता की छाया का अवतार थी‚ जिसने की रावण के हाथों शोषित होने के बाद वेदवती के रूप में जन्म लिया‚ जो कि इन्द्र के स्वर्ग की लक्ष्मी बनी।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-8

 

पंचकन्या – भाग-8

यहां तक सत्यवती से अधिक कुन्ती कुमारी कन्या मानी गई।

मूलत। यह शब्द ' वर्जिन' या कुमारी अपने शाब्दिक अर्थ के एकदम विपरीत अर्थ का संकेत देता है। ईश्तर और एफ्रोडाईट‚ प्राचीन मेसोपोटामिया तथा ग्रीस के प्रेम के देवता हैं जो कि 'वर्जिन' कहलाए जाते थे। बाद में पितृसत्तात्मक संस्कृति में इन्हें अनैतिक और मर्यादाहीन घोषित कर दिया। कौमार्य का वरदान किसी स्त्री की केवल शारीरिक अवस्था नहीं वरन् मानसिक अवस्था के लिये माना जाता है‚ जो कि वह किसी के भी बन्धन से सदैव मुक्त रही हो‚ किसी के दासत्व से‚ या किसी एक निर्धारित पुरुष पर निर्भर होकर न रही हो। वह अपने आप में एक हो‚ पूर्ण स्वयंसिद्धा। एक पूर्ण व्यक्तित्व जो कि स्वयं से सम्बन्धित हो चाहे वह अविवाहिता कुमारी हो या अपनी पवित्रता अक्षुण्ण रखने को बाध्य न हो या अनचाहे संर्सग करने को भी बाध्य न हो। यह मुक्ति का अधिकार चाहे तो वह किसी अवांछित से सम्बन्ध नकार देने में प्रयोग कर सकती है या किसी भी मनचाहे पुरुष को स्वीकार करने में प्रयोग कर सकती है। यह किसी भी स्त्री का अधिकार है‚ चाहे वह बहुत अधिक यौनअनुभव रखने वाली महिला के सन्दर्भ में ही क्यों न हो‚ यहां तक कि एक वेश्या के लिये भी यह अधिकार है।

यह सच में बहुत अर्थमय है जो कि विवाहिता के एक विपरीत अर्थ कें सदंर्भ में प्रयुक्त हुआ है। माद्री‚ अम्बिका‚ अम्बालिका‚ गांधारी और सुभद्रा इसके एकदम विपरीत हैं ' विवाहित ' स्त्रियां‚ जो कि दूसरों की सोच पर निर्भर हैं‚ वे चाह कर भी वह सब नहीं कर सकती जो कि वे पसन्द करती हैं। अम्बिका और अम्बालिका ने मौन रह कर अपनी सास का आदेश माना और अनाकर्षक व्यास को ग्रहण किया। माद्री ने पति की चिता के साथ स्वयं भी आत्मदाह कर लिया। गांधारी ने स्वेच्छा से स्वयं की आंखों पर पट्टी बांध ली ताकि वह पति के साथ रहे आगे न बढ़ जाए। "वह अपने आप में पूर्ण स्वयंसिद्धा तो नहीं मगर वह अपने आचरण से पति की अर्धांगिनी बन कर पुरुष के समानान्तर चलना चाहती है।"

दूसरी ओर‚ "वह स्त्री जो मनोवैज्ञानिक आधार पर कन्या है वह पुरुष पर कतई निर्भर नहीं है। वह जो भी है‚ इसलिये है‚ क्योंकि वह‚ वह है?  स्त्री जो कि कुमारी है‚ एकरूपा है‚ जो वह चाहती है वही करती है— किसी को प्रसन्न करने की कामना से नहीं‚ पसन्द किये जाने की चाह से नहीं‚ और न ही स्वीकार किये जाने की आकांक्षा से‚ यहां तक कि स्वयं के लिये भी नहीं‚ और ऐसी किसी शक्ति या प्रभाव को पाने की चाह से भी नहीं जिससे कि वह अपनी पसन्दीदा प्यार को पा सके‚ वरन् इसलिये कि जो भी वह करती है वही सत्य है… वह उन पहलुओं से भी प्रभावित नहीं होती जो साधारण व अकुमारी स्त्रियों को बनाने में सहायक होते हैं‚ चाहे वह विवाहित हो या नहीं। वह अपनी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा कर शीघ्रता से उन औचित्यों को ग्रहण कर लेती है‚ जो कि इस बात पर निर्भर करते हैं कि लोग क्या साचेंगे। माना कि उसके कृत्य निश्चय ही अपारम्परिक हो सकते हैं ।" क्या यह सब अहिल्या‚ सत्यवती और कुन्ती के चरित्रों को वर्णित नहीं करता?

द्रौपदी का क्या? अहिल्या और सीता की भांति ही द्रौपदी अयोनिजा मानी गई है‚ जिसका जन्म स्त्री से ना हुआ हो। जबकि अहिल्या तिलोत्तमा का आदिरूप है और सीता खेत मे हल चलाने के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थी‚ द्रुपद द्वारा प्रतिशोध के लिये यज्ञ के दौरान आव्हान किये जाने पर द्रौपदी उत्पन्न हुई‚ दरअसल वह एक द्रुपद को एक अतिरिक्त लाभ के रूप में प्राप्त हुई क्योंकि वे तो द्रौण से अपमान का बदला लेने हेतु एक पुत्र प्राप्ति के प्रयोजन से यज्ञ कर रहे थे और उन्होंने पुत्री की तो कामना ही नहीं की थी‚ किन्तु वह एथेना की तरह ही पूर्ण यौवना रूप में यज्ञ वेदी से अवतरित हुई‚ जब यज्ञ करवाने वाले पुजारी ने उनका आव्हान किया तब द्रुपद की महारानी उपस्थित न हो सकीं क्योंकि वे प्रसाधन में व्यस्त थी‚ अत:द्रौपदी को अवतरित होने के लिये अपनी मां के गर्भ की आवश्यकता ही नहीं हुई। वह एकमात्र कन्या है जिसके अवतरण की कथा विस्तार से लिखी गई है‚ जो कि उल्लेखनीय है।

" आँखों को भा जाने वाली पांचाली‚

काली मुस्कुराती आंखों वाली…

चमकते ताम्बई तराशे हुए नख

कोमल पलकें‚

सुडोल स्तन‚ सुन्दर आकार वाली जंघा

न छोटे कद की‚ न लम्बी

न काली ‚ न पीताभ गौरवर्णा

गहरे नीलाभ घुंघराले केशों वाली

नेत्र जैसे पताझड़ के कमल की अर्धोन्मीलित पांखुरी से

कमल की गंध से महकती हुई

असाधारण रूप से सर्वांगसुन्दरी तथा सर्वगुण सम्पन्न

स्वर तथा व्यवहार में माधुर्य

सबसे अन्त में सोने वाली

और सबसे पहले जागने वाली

यहां तक कि सबसे पहले उठने वाले

चरवाहों से भी पहले…

उसका सद्यस्नात:सुन्दर मुख

कमल के समान या जैसे कि चमेली का फूल

उसकी पतली कमर जैसे

पवित्र यज्ञवेदी का मध्यभाग

लम्बे केश‚ गुलाबी होंठ

और स्निग्ध त्वचा।" ( आदिपर्व 169। 44 – 46)

द्रोपदी गन्धकाली की ही भांति ज़रा सांवली थी‚ इसलिये उसका नाम पड़ा कृष्णा‚ और उसे नीलकमल की सी देह सुगन्ध का प्रकृति प्रदत्त उपहार प्राप्त था‚ जो कि दूर दूर तक फैल जाती थी योजनगंधा की तरह‚ उसे अपनी सास और अपनी दादी सास के अतीत के बारे में पता था। कुन्ती की तरह ही उसे एक कामी प्रणयिनी की तरह वर्णित किया गया है । दौपदी भ्रात्रीपतिका पंचनाम कामिनी तथा(  ब्रह्मवैवार्ता पुराण‚ 4।115।73)। फिर भी यहां बहुत अधिक अमर्यादित तरीके से उसके चरित्र की दुरावस्था का वर्णन हुआ है। द्रौपदी को अपना पूरा जीवन पांच पुरुषों के बीच विवाह की मर्यादाओं के साथ बंट कर रह गया था। सत्यवती और कुन्ती की तरह हर एक से विवाहोपरान्त भी उसे कौमार्यावस्था पुन: प्राप्त हुई।  देवर्षि नारद‚ यह अद्भुत वर्णन सुनाते हैं।

" सुन्दर व क्षीण कटि और निश्चित रूप से बहुत अभिमानिनी

वह कुमारी हो गई अपने हर नये विवाह के साथ।" ( आदिपर्व‚ 197। 14)

महाभारत के विल्लिपुत्तुर के तमिल रूपान्तरण में द्रौपदी हर विवाह के बाद अग्निस्नान करती है‚ और ध्रुव तारे की भांति निष्पाप और पवित्र होकर उभरती है। दक्षिणभारतीय पूजागृहों में तथा द्रौपदी की धार्मिक धारणा में उसे हमेशा एक बन्द कमल की कली पकड़े दिखाया जाता जो कि कौमार्य का प्रतीक है जबकि इसके विपरीत खुला हुआ कमल जो कि उर्वरता का प्रतीक है उसे सुभद्रा को पकड़े हुए दिखाया गया है। अहिल्या की तरह उसने स्वयं को एक पत्थर में तब्दील कर लिया था और जब उसे एक दानव स्पर्श किया था‚ फिर उसने अपनी पवित्रता का आव्हान किया और अपनी सत्यता साबित की। कुन्ती की तरह ही वह कुरु वंश की एक रानी माधवी से मिलती जुलती है‚ पांच पुरुषों से विवाह कर के भी अपना कौमार्य पुन: प्राप्त करने की क्षमता में। कुन्ती स्वयं ने कृष्णा का वर्णन सर्वधर्मोपचायिनाम ( उद्योगपर्व 137। 16)‚ यही परिभाषा ययाति ने अपनी पुत्री के लिये कही थी जब उसे गालव ऋषि को उपहार में दिया था। ( उद्योगपर्व  115।11)

सही अर्थों में कन्या मानी जाने वाली द्रौपदी का मस्तिष्क उसका अपना था। जब स्वयम्वर सभा में कृष्ण और द्रौपदी पहली बार साथ साथ उपस्थित होते हैं और दृढ़ता से हस्तक्षेप करते हैं। यह पांचाली की सुस्पष्ट अस्वीकृति थी‚ पूर्णत। अप्रत्याशित — कर्ण को वर के रूप अस्वीकार कर के‚ जिसने सम्पूर्ण सभा का रुख बदल दिया था‚ यहाँ तक कि महाकाव्य का भीॐ कर्ण को खुलेआम सभा में अपमानित कर उसने यहीं पर चौपड़ के खेल में स्वयं पर हुए प्रहार के बीज बो दिये थे। यह उसके होने वाले सखा कृष्ण ही थे जो आगे आए और उन्होंने क्रुद्ध राजाओं और नाराज़ पाण्डवों के बीच हो रहे झगड़े का अन्त करवाया। उसने अकेले ही इस सखा कृष्ण की सखि होकर इस अनोखे सम्बन्ध का आनन्द लिया। केवल वही थी इस पूरे महाकाव्य में जिसके पास कृष्ण को झिड़कने का अधिकार प्राप्त था।

" मेरा कोई पति नहीं‚ न ही पुत्र

न भाई‚ न पिता और यहां तक कि

हे मधुसूदन तुम भी मेरे नहीं हो।"( वनपर्व 10। 125)

वह कृष्ण को प्रेरित करती है कि वह उसे बचाने के लिये बाध्य हैं ही।

"चार कारणों की वजह से‚ कृष्ण

तुम मुझे हमेशा बचाने के लिये बाध्य हो

मैं तुमसे संबन्धित हूँ‚ मैं प्रसिद्ध हूँ

मैं तुम्हारी सखि हूँ और तुम सबके पालक हो ।"( वनपर्व 10। 127)

पांचाली अपने रूप और शक्ति को बखूबी जानती समझती थी‚ उसने इसका इस्तेमाल भी किया‚ अज्ञात वास में भीम के साथ विराट की रसोई में अपने लिये रास्ता निकालते समय (विराटपर्व 20)‚ और कृष्ण को शान्ति दूत की बजाय युद्ध की घोषणा करने वाले में बदल कर। जब वह काम्यक वन में अकेली होती है तब अपनी मोहक मुद्रा से जयद्रथ को मोहित करती है। एक कदम्ब के वृक्ष से टिक कर खड़ी होती है‚ उसकी एक टहनी हाथ उपर उठा कर पकड़ती है‚ तो उसका अधोवस्त्र ऊपर उठ जाता है‚ वह ऐसी प्रतीत होती है जैसे बादलों में एकाएक चमकी दामिनी या रात को तेज़ हवा में जलते दीपक की कांपती लौ हो। सीता की तरह वह सुन्दर और वन में अकेली होती है‚ किन्तु किसी रावण का साहस नहीं कि द्रौपदी को उठा ले जाए। जब जयद्रथ उसे बांध लेता है भुजाओं में वह उसे धक्का देती है इतना तेज़ कि वह ज़मीन पर गिर पड़ता है। शरीर की समस्त शक्ति और मन का विरोध एकत्रित कर वह उसके ही रथ पर सवार हो जाती है‚ और उसे झुकने पर विवश कर देती है‚ बाद में शान्ति से अपने परिवार के पुजारी को कहती है कि वह उसके पतियों को खबर कर दे। यहां सीता की भांति विवशता भरा विलाप नहीं है‚ न ही किसी से मदद की गुहार लगाई गई है? जैसे ही उसके पति जयद्रथ के पास आते हैं वह जयद्रथ पर व्यंग्य कसती है अपने हर पति की वीरता का विस्तृत वर्णन करके और आने वाले समय में अवश्यंभावी हार के बार में कहती है।

क्रमशः

पंचकन्या – भाग-7

 

पंचकन्या – भाग-7

पांचाल जाकर वह सब एक कुम्हार की कुटिया में ठहरते हैं‚ जो कि एकचक्र के ब्राह्मण से भी जाति और आर्थिक स्तर पर निम्न श्रेणी का है। वह अपने पुत्रों को बड़े प्रभावशाली ढंग से पाल कर समाज की सबसे नीचे वाली सीढ़ी से होकर ही राज्य के राजसिंहासन तक पहुंचाना चाहती है। इस प्रक्रिया में वह मूलभूत आवश्यकताओं को गौरवपूर्ण उपलब्धि में बदल देने को कटिबद्ध है। देशनिकाला तथा वनप्रवास से उसके पुत्रों की आम जनता के साथ अंतरंगता को बढ़ावा मिलता है‚ इससे उनके अन्दर वह भावना विकसित होती है कि बहुसंख्यक जनता और समाज की क्या – क्या आवश्यकताएं होती हैं‚ इससे वे सही मायनों में राजा होने के इस गुण को धारण कर लेते हैं‚ जो कि उन राजाओं में नहीं होता जो अपने विषय व स्वार्थपूर्ति में अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। कुन्ती की दूरदृष्टि ने यह जान लिया था कि इन पांचों भाईयों के बीच कोई भी दरार हस्तिनापुर प्राप्ति के लक्ष्य में बाधक बन सकती है। और एकचक्र में निवास के समय व्यास पहले ही बता चुके थे कि द्रोपदी के भाग्य में पांच पति हैं‚ क्योंकि उसे शिव ने वरदान दिया था उसके पूर्व जन्म में‚ उन्होंने उन्हें यह भी कहा कि आप लोग सीधे पांचाल की ओर जाएं और उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वयंवर से जीत लाएं। ( आदिपर्व। 168)

इसलिये वह यह क्रूर अनुमान लगाने का नाटक करती है कि उसे नहीं पता कि भीम और अर्जुन किस वस्तु के घर लाने की सूचना दे रहे हैं। आदि पर्व 190।29 में हम पाते हैं कि युधिष्ठिर और दोनों माद्री पुत्र स्वयंवर की समाप्ति और द्रौपदी के जीते जाने के तुरन्त बाद ही चले जाते हैं। ये तीनों पहले ही अपनी मां के साथ होते हैं जब द्रौपदी को लाया जाता है। कुन्ती जानती थी कि यही एक अटूट कड़ी है जो इन पांचों भाइयों को एक साथ जोड़े रखेगी‚ और अलग - अलग पत्नियां होती तो अलग - अलग दिशा में व्यस्त रखतीं। इस तरह एक लम्बे समय तक उनका जीवन उसके प्रभाव द्वारा संचालित हुआ और उसके ही चतुर्दिक घूमता रहा। जहां तक कि एकता का सवाल था‚ वह केवल एक स्त्री द्वारा ही प्रतिस्थापित की जा सकती थी न कि पांच विभिन्न स्त्रियों द्वारा। यह ठीक वैसा ही था जैसे कि वह इस अर्थव वैदिक आदेश का ही जीवन में पालन कर रही हो।

" तुम्हारा आसव एक हो

तुम्हारा भोजन भी एक सा हो

मैं तुम्हें एक बंधन में एक साथ बांधता हूँ

संगठित‚ एकत्रित यज्ञ की पवित्र अग्नि के चारों ओर

जैसे कि रथ के एक पहिये की काड़ियां मध्यचक्र से जुड़ी होती हैं" ( 3।30।6)

द्रौपदी वास्तव में यज्ञ की अग्नि से ही उत्पन्न हुई थी। अत: कुन्ती जानबूझ कर कहती है कि जो भी कुछ तुम घर लाये हो उसे आपस में बांट लो और उसका आनन्द लो हमेशा की तरह। बाद में अपनी 'गलती पता चलने पर' उसकी एकमात्र चिन्ता यही थी कि कुछ होना चाहिये कि उसका आदेश असत्य साबित न हो ( आदिपर्व। 193। 4‚5)। फिर युधिष्ठिर ने द्रुपद से स्पष्टीकरण के सम्वाद में यही कहा कि यह कुन्ती का आदेश था‚ हालांकि सारे भाईयों की इस आदेश में उत्सुकता भरी मौन स्वीकृति अवश्य थी‚ सबके हृदय में द्रौपदी जो बसी थी (193। 12)। इस सम्पूर्ण महाकाव्य में पांचों भाइयों की कुन्ती की प्रति आज्ञाकारिता की यह घटना बहुत प्रभावशाली व सम्मानजनक श्रद्धांजली है‚ जो कि अन्यत्र नहीं मिलती। गांधारी के गुणगान में अनेको स्तुतियों के बावजूद‚ दुर्योधन की अनाज्ञाकारिता के सन्दर्भ में उसका मातृत्व असफल ही रहा‚ इन सब सन्दर्भों में कुन्ती महाभारत में पात्रित सभी स्त्रियों में अग्रगण्य होकर उभरती है।

" मेरी माता की इच्छा मेरी इच्छा

क्योंकि मैं समझता हूँ‚ वह सही है…"

क्या यह नहीं कहा गया है कि

गुरु के प्रति आज्ञाकारिता सर्वश्रेष्ठ गुण है?

तो फिर

मां से बड़ा गुरु आखिर कौन हो सकता है?

मेरे लिये यही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।" ( 197।29‚ 198।17)

यह उल्लेखनीय है कि यहां कुन्ती कितनी उत्सुक है कि उसकी युक्ति विफल न हो जाए। जैसे ही युधिष्ठिर अपना वाक्य समाप्त करते हैं‚ वह तुरन्त व्यास से आग्रह करती है।

धर्मबद्ध युधिष्ठिर जो भी कह रहे हैं

वह उचित है।

मुझे भय है कि मेरे शब्द व्यर्थ न हो जाएं

और अगर ऐसा हुआ तो‚ क्या मैं

असत्य से कलंकित न हो जाऊंगी? (198।18)

शायद वह अवचेतन मानसिकता में कहीं स्वयं को दोषी होने से बचा रही थी। कूटनीति से द्रोपदी को पांच पुरुषों की पत्नी बनाकरह्यइतने ही पुरुष कुन्ती के जीवन में आए थेहृ‚ इस प्रभावशाली तरीके से उसने यह निश्चित कर लिया था कि उसकी पुत्रवधू उसे कभी दोषी इंगित न करे कि उसके पति के अतिरिक्त पांच पुरुषों से सम्बन्ध रहे हैं‚ हमेशा की तरह कुन्ती ने यह साबित कर दिया कि उसके पास अपने तरीके हैं‚ इस बार व्यास (अपने श्वसुर) की सहायता से। कुन्ती की अपने पुत्रों के सम्बंध में महत्वाकांक्षा वहां मुखर हुई जब उसने औपचारिक रूप से द्रौपदी को विवाह के अवसर पर आर्शिवचन कहे।

" तुम कुरु राजवंश की महारानी बनो

अपने धर्मप्रिय पति के साथ

कुरुजंगल की राजधानी में।" ( 209।9)

उनके भतीजे कृष्ण अपनी यदुवंशी सम्पदा और शक्ति के साथ पाण्डवों का साथ देने के लिये आगे आते हैं। कुन्ती की कूटनीति की दृढ़ता तब सिद्ध होती है जब कौरव पाण्डवों की एकता समाप्त करने के प्रयास में एक सुन्दर मोहक गणिका नियुक्त करते हैं उन्हें आकर्षित करने के लिये। तब कर्ण कहते हैं कि जैसा कि वे सभी एक अतीव सुन्दरी स्त्री द्रौपदी से विवाहित हैं‚ तो यह प्रयास असफल होगा ही।

बाद में कुन्ती पीछे हट जाती है‚ अपना यह गौरवमय स्थान द्रौपदी को सौंप कर। चौपड़ खेलने से पूर्व पाण्डवों का उससे न पूछा जाना तथा उसे भुला दिया जाना उसके लिये आश्चर्यजनक होता है‚ जो कि विवाह होने तक उसके प्रभाव में रहने वाले पांचों भाइयों के सन्दर्भ में बहुत अजीब सी बात है। यह पहली घटना होती है‚ जिससे सबक लेकर वह स्वयं को निर्णायक की भूमिका में से हटा लेती है…जो कि उन्हें विनाश की ओर ले जाती है।

इसके बाद वह तीन बार इस छाया से निकल कर निर्णायक रूप से हस्तक्षेप करती है। जब उसके पुत्रों को अज्ञातवास में भेजा जाता है‚ तो वह हस्तिनापुर में ही रह जाती है‚ धृतराष्ट्र को अपने पुत्रों के अधिकारों के हनन में हुए अन्याय के लिये एक लगातार मूक फटकार लगाती सी प्रतीत होती है। बाद में उद्योग पर्व में‚ वह कृष्ण से कहती है‚ जो कि शान्तिदूत बन कर आए होते हैं‚ कि युधिष्ठर को एक क्षत्रिय की भांति अपने अधिकारों के लिये लड़ना ही होगा। वह उनकी  भर्त्सनाकरती है एक राजा होकर अपने कर्तव्य को उपेक्षित करने के लिये तथा यह मिथ्या विश्वास पालने के लिये कि शांति को ग्रहण करना ही उचित धर्म है? उन्हें प्रेरित करने के लिये वह एक युक्ति दोहराती है जो कि उसने वरनावत में वनवास के दौरान अपनाई थी।

" इससे अधिक अपमानजनक क्या हो सकता है

कि तुम्हारी मां मित्रहीन व अकेली हो

दूसरों का दिया भोजन खाने को विवश हो ?

शक्तिमान भुजाओं वाले‚

विनम्रता‚ फिर विरोध‚ उपहार

बल और विचारविमर्श के द्वारा

अपने पूर्वजों का राज्य फिर से प्राप्त करते हैं।

राजा के धर्म का पालन करो

अपना पारिवारिक सम्मान पुन: प्राप्त कर। ( 132।32)

उन्हें फिर प्रेरित करने के लिये वह विदुला का उदाहरण देती है जो कि उसके पुत्र संजय को समझाती है जो कि हारने के बाद युद्ध में नहीं जाना चाहता ।

" तिन्दुक की लकड़ी की तरह भभको

न कि अन्दर ही अन्दर जलो और आगविहीन धुंआ उगलो।" ( 133। 14)

यह जुडवां कांटा उन्हें चुभा कर कुन्ती उन्हें अब प्राकृतिक प्रेरणा देती है। उसकी पुत्रवधू का अपमान‚ बिना शब्दों को तोड़े – मरोड़े वह पांचों को फटकारती है जब तक कि उनका सुषुप्त पुरुषार्थ जाग नहीं जाता।

" पांचाल की राजकन्या सारे धर्मों को मानती है‚

तुम्हारी उपस्थिति में उन्होंने इसको अपमानित किया

— कैसे तुम इस अपराध को क्षमा कर सकते हो?

राजपाट हमसे छिना‚ मैं आहत नहीं हुई

चौपड़ में तुम हार गये‚ मैं आहत नहीं हुई

मेरे पुत्रों को वनवास दिया‚ मैं आहत नहीं हुई

किन्तु यह अपमान‚ भरी सभा में द्रोपदी का रुदन

जैसा कि उन्होंने इसके साथ दुवर््यवहार किया‚

उससे अधिक पीड़ादायक मेरे लिये कुछ नहीं हो सकता।ह्य 137।16‚18हृ

अपने पुत्रों को सुरक्षित रखने के लिये तो वह अपने विवेक के साथ कर्ण के समक्ष अपने प्रथम पुत्र होने की स्वीकारोक्ति का लज्जाजनक और स्वयं के लिये संत्रासदायक निर्णय तक ले लेती है‚ जिसे की उसने लम्बे समय तक गोपनीय रखा होता है। जबकि वह यह नहीं जानती कि कृष्ण पहले ही यह राज कर्ण को बता कर कर्ण को मनाने में असफल हो चुके हैं‚ इस बात का प्रलोभन देकर भी कि इस तरह तो द्रोपदी तुम्हारी भी पत्नी हुई।

" वृशिनी नारी‚ कुरुवंश की वधू

प्रतीक्षारत थी‚

वह सूर्य की गर्मी में

मुरझाए कमल की माला की तरह

उदास हो गयी।

उसने कर्ण के वस्त्रों की छाया में आश्रय लिया।"( उद्योग पर्व 144।29)

माना कि वह कर्ण द्वारा नकार दी गई‚ पर इस असफलता के पीछे कुन्ती की सफलता छिपी थी। उसने उससे यह वचन ले लिया था कि वह किसी पाण्डव को नहीं मारेगा‚ अर्जुन के सिवा। उसने कर्ण को अन्दर से कमज़ोर कर दिया था‚ जबसे वह जान गया था कि वह अपनी मां के पुत्रों के साथ युद्धरत है‚ जबकि वे लोग सोचते थे कि वह एक सारथी का पुत्र है‚ जिसे कि द्रोपदी और अभिमन्यु के प्रति किये अपराध का दण्ड अवश्य दिया जाएगा।

 

कुन्ती के पास वह दुर्लभ क्षमता है जो हमें आश्चर्यचकित करती है कि कन्या के रूप में यह कितनी अलग है औरों से। जबकि उसने जो काम किया उसमें विजय हासिल की‚ उसने सबको चकित किया वनवास के दौरान धृतराष्ट्र और गांधारी को भी‚ उसने अपने अंतिम दिन उन लोगों के साथ बिताये जो कि उसके संघर्षों का कारण बने थे। इसकी प्रतिक्रिया में कुन्ती का अपने पुत्रों के क्रोध का उत्तर था कि हां उसने उन्हें प्रेरित किया कि वे लड़ें ताकि वे जुल्म का शिकार न हों‚ और वह अपने पति के शासनकाल में खूब मन भर कर शासन का सुख ले चुकी है। उसकी कोई इच्छा नहीं कि वह अपने पुत्रों द्वारा विजित राज का उपभोग करे। बिना प्रयास के सहज ही उसने स्वयं को मातृत्व के बंधनों से परे कर लियाॐ

शांति से बैठ उसने मृत्यु स्वीकार कर ली कि जंगल की आग उसे समेट ले। यहां बहुत गहरा अभिप्राय है कि यह महाकाव्य उसे सिद्धि अर्थात पूर्णता का अवतार घोषित करता है।वह निश्चित रूप से स्त्रीत्व की पूर्णता‚ सिद्धि की प्रतीक है और वह आधुनिक व्यवहार जगत में आजकल के सन्दर्भों में एक आदर्श स्त्री है‚ एक अकेली मां के रूप में।

कुन्ती कन्या का एक परम उत्कृष्ट उदाहरण है हमारे पुराण में। एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व‚ अपनी कामेच्छा पर यथोचित संयम के साथ‚ उसने अपने हर सम्बन्ध के साथ एक से अधिक पुत्रों की कामना नहीं की‚ और उसने पाण्डु की नि:स्सहायता का फायदा नहीं उठाया और पुरुषों के साथ शारीरिक संपर्क रख कर। उसने इस विपरीत परिस्थितियों और बैरी संसार में अपनी राह स्वयं बनाई। उसने अपने पुत्रों को पुर्नप्रतिस्थापित किया और अन्तत। अपने आहत अहम को संतुष्ट किया। उसने अपना पूरा जीवन सामन्जस्य स्थापित करने में समर्पित कर दिया‚ उसकी मानसिक शान्ति‚ सारा उत्साह इसी में चुक गया।

क्रमशः