“कृष्ण की चेतावनी”.. (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)


कृष्ण की चेतानी
(रामधारी सिंह दिनकर’)

(श्री रामधारी सिंह "दिनकर" की कविता “रश्मिरथी” काव्य खंड से यह अंश लिया गया हैं। महाभारत के पूर्व पांडव की ओर से श्रीकृष्ण दूत बनकर कौरवों की सभा में जाते तथा चर्चा करते हैं तब कौरव उन्हें ही निरूध्द करने का प्रयास करते हैं, उस समय का हृदयग्राही वर्णन ही इसकी विशेषता हैं)
  
वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे जय-जय’!

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 1-18 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 1-18 का हिन्दी अनुवाद

पृथ्वी-दोहन.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस समय महाराज पृथु के होठ क्रोध से काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वी ने अपने हृदय को विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा। ‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये। बुद्धिमान् पुरुष भ्रमर के समान सभी जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं। तत्त्वदर्शी मुनियों ने इस लोक और परलोक में मनुष्यों का कल्याण करने के लिये कृषि, अग्निहोत्र आदि बहुत-से उपाय निकाले और काम में लिये हैं। उन प्राचीन ऋषियों के बताये हुए उपायों का इस समय भी जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भलीभाँति आचरण करता है, वह सुगमता से अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है। परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायों का आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं।

राजन्! पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने जिन धान्य आदि को उत्पन्न किया था, मैंने देखा कि यम-नियमादि व्रतों का पालन न करने वाले दुराचारी लोग ही उन्हें खाये जा रहे हैं। लोकरक्षक! आप लोगों ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरों के समान हो गये हैं। इसी से यज्ञ के लिये ओषधियों को मैंने अपने में छिपा लिया। अब अधिक समय हो जाने से अवश्य ही वे धान्य मेरे उदर में जीर्ण हो गये हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्यो के बतलाये हुए उपाय से निकाल लीजिये। लोकपालक वीर! यदि आपको समस्त प्राणियों के अभीष्ट एवं बल की वृद्धि करने वाले अन्न की आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र और दुहने वाले की व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़े के स्नेह से पिन्हाकर दूध के रूप में आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी। राजन्!

एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा-ऋतु बीत जाने पर भी मेरे ऊपर इन्द्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे-मेरे भीतर की आर्द्रता सूखने न पावे। यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा’।

पृथ्वी के कहे हुए ये प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार कर महाराज पृथु ने स्वयाम्भुव मनु को बछड़ा बना अपने हाथ में ही समस्त धान्यों को दुह लिया। पृथु के समान अन्य विज्ञजन भी सब जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं, अतः उन्होंने भी पृथु जी के द्वारा वश में की हुई वसुन्धरा से अपनी-अपनी अभीष्ट वस्तुएँ दुह लीं।

ऋषियों ने बृहस्पति जी को बछड़ा बनाकर इन्द्रिय (वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्र में पृथ्वीदेवी से वेदरूप पवित्र दूध दुहा।

देवताओं ने इन्द्र को बछड़े के रूप में कल्पना कर सुवर्णमय पात्र में अमृत, वीर्य (मनोबल), ओज (इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा।

दैत्य और दानवों ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद जी को वत्स बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा।

गन्धर्व और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्र में संगीतमाधुर्य और सौन्दर्य रूप दूध दुहा।

श्राद्ध के अधिष्ठाता महाभाग पितृगण ने अर्यमा नाम के पित्रीश्वर को वत्स बनाया तथा मिट्टी के कच्चे पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य (पितरों को अर्पित किया जाने वाला अन्न) रूप दूध दुहा।



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 18-36 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 18-36 का हिन्दी अनुवाद

तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दुःखित चित्त से पीछे की ओर लौटी और महाभाग पृथु जी से कहने लगी- ‘धर्म के तत्त्व को जानने वाले शरणागतवत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्री का वध आप कैसे कर सकेंगे? स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? मैं तो सुदृढ़ नौका के समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधार पर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपने को और अपनी प्रजा को जल के ऊपर कैसे रखेंगे?

महाराज पृथु ने कहा- पृथ्वी! तू मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली है। तू यज्ञ में देवतारूप से भाग लेती है, किन्तु उसके बदले में हमें अन्न नहीं देती; इसलिये आज मैं तुझे मार डालूँगा। तू जो प्रतिदिन हरी-हरी घास खा जाती है और अपने थन का दूध नहीं देती- ऐसी दुष्टता करने पर तुझे दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। तू नासमझ है, तूने पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के उत्पन्न किये हुए अन्नादि के बीजों को अपने में लीन कर लिया है, और अब मेरी भी परवा न करके उन्हें अपने गर्भ से निकालती नहीं। अब मैं अपने बाणों से तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदे से इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनों का करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो- वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो- उसे मारना राजाओं के लिये न मारने के ही समान है। तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय माया से ही यह गौ का रूप बनाये हुए है। मैं बाणों से तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबल से प्रजा को धारण करूँगा। इस समय पृथु काल की भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभाव से हाथ जोड़कर कहा।

पृथ्वी ने कहा- आप साक्षात् परमपुरुष हैं तथा अपनी माया से अनेक प्रकार के शरीर धारणकर गुणमय जान पड़ते हैं; वास्तव में आत्मानुभव के द्वारा आप अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी अभिमान और उससे उत्पन्न हुए राग-द्वेषादि से सर्वथा रहित हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप सम्पूर्ण जगत् के विधाता हैं; आपने ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि रची है और मुझे समस्त जीवों का आश्रय बनाया है। आप सर्वथा स्वतन्त्र हैं। प्रभो! अब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारने को तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरण में जाऊँ? कल्प के आरम्भ में आपने-अपने आश्रित रहने वाली अनिर्वचिया माया से ही इस चराचर जगत् की रचना की थी और उस माया के ही द्वारा आप इसका पालन करने के लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणी को किस प्रकार मारना चाहते हैं? आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्मा को रचकर उनसे विश्व की रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्वर हैं, आपकी लीलाओं को अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय माया से विक्षिप्त हो रही है। आप ही पंचभूत, इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ देवता, बुद्धि और अहंकाररूप अपनी शक्तियों के द्वारा क्रमशः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये समय-समय पर आपकी शक्तियों का आविर्भाव-तिरोभाव हुआ करता है। आप साक्षात् परमपुरुष और जगद्विधाता हैं, आपको मेरा नमस्कार है। अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत् की स्थिति के लिये आदिवराह रूप होकर मुझे रसातल से जल के बाहर लाये थे। इस प्रकार एक बार तो मेरा उद्धार करके आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्ति से जल के ऊपर नौका के समान स्थित मेरे ही आश्रय रहने वाली प्रजा की रक्षा करने के अभिप्राय से पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देने के अपराध में मुझे मारना चाहते हैं। इस त्रिगुणात्मक सृष्टि की रचना करने वाली आपकी माया से मेरे-जैसे साधारण जीवों के चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं। मुझ-जैसे लोग तो आपके भक्तों की लीलाओं का भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रिया का उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादि के द्वारा वीरोचित यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तों को भी नमस्कार है।



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद

महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना और
पृथ्वी के द्वारा उनकी स्तुति करना.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- इस प्रकार जब वन्दीजन ने महराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवर्तियों का भी सत्कार किया।

विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वी देवी तो पहले स्वभाव से ही ऊँची-नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया और इन्द्र उनके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को क्यों हर ले गये? ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार जी से ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करके वे राजर्षि किस गति को प्राप्त हुए? पृथुरूप से सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरि के उस पृथु-अवतार से सम्बन्ध रखने वाले जो और भी पवित्र-चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्र का बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ।

श्रीसूत जी कहते हैं- जब विदुर जी ने भगवान् वासुदेव की कथा कहने के लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेय जी प्रसन्नचित्त से उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, इसलिये भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। ‘राजन्! जिस प्रकार कोटर में सुलगती हुई आग से पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेट की भीषण ज्वाला से जले जा रहे हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्वर! आप हम क्षुधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्न मिलने से पहले ही हमारा अन्त हो जाये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- कुरुवर! प्रजा का करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अन्त में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया। ‘पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं औषधादि को अपने भीतर छिपा लिया है’ अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकर के समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया। उन्हें शस्त्र उठाये देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याध के पीछा करने पर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। यह देखकर महाराज पृथु की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे जहाँ-तहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुष पर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे। दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते। जिस प्रकार मनुष्य को मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता, उसी प्रकार उसे त्रिलोकी में वेनपुत्र पृथु से बचाने वाला कोई भी न मिला।



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 17-27 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 17-27 का हिन्दी अनुवाद

ये परस्त्री में माता के समान भक्ति रखेंगे, पत्नी को अपने आधे अंग के समान मानेंगे, प्रजा पर पिता के समान प्रेम रखेंगे और और ब्रह्मवादियों के सेवक होंगे। दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे, जितना अपने शरीर को। ये सुहृदों के आनन्द को बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषों से विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टों को दण्डपाणि यमराज के समान सदा दण्ड देने के लिये उद्यत रहेंगे। ‘तीनों गुणों के अधिष्ठाता और निर्विकार साक्षात् श्रीनारायण ने ही इनके रूप में अपने अंश से अवतार लिया है, जिनमें पण्डित लोग अविद्यावश प्रतीत होने वाले इस नानात्व को मिथ्या ही समझते हैं।

ये अद्वितीय वीर और एकच्छत्र सम्राट् होकर अकेले ही उदयाचलपर्यन्त समस्त भूमण्डल की रक्षा करेंगे तथा अपने जयशील रथ पर चढ़कर धनुष हाथ में लिये सूर्य के समान सर्वत्र प्रदक्षिणा करेंगे। उस समय जहाँ-तहाँ सभी लोकपाल और पृथ्वीपाल इन्हें भेंट समर्पण करेंगे, उनकी स्त्रियाँ इनका गुणगान करेंगी और इन आदिराज को साक्षात् श्रीहरि ही समझेंगी। ये प्रजापालक राजाधिराज होकर प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिये गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे और इन्द्र के समान अपने धनुष के कोनों से बातों-की-बात में पर्वतों को तोड़-फोड़कर पृथ्वी को समतल कर देंगे।

रणभूमि में कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय वे जंगल में पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंह के समान अपने ‘आजगव’ धनुष का टंकार करते हुए भूमण्डल में विचरेंगे, उस समय सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जायेंगे। ये सरस्वती के उद्गम स्थान पर सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे। तब अन्तिम यज्ञानुष्ठान के समय इन्द्र इनके घोड़े को हरकर ले जायेंगे।

अपने महल के बगीचे में इनकी एक बार भगवान् सनत्कुमार से भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये उस निर्मल ज्ञान को प्राप्त करेंगे, जिससे परब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जब इनके पराक्रम जनता के सामने आ जायेंगे, अब ये परमपराक्रमी महाराज जहाँ-तहाँ अपने चरित्र की ही चर्चा सुनेंगे। इनकी आज्ञा का विरोध कोई भी न कर सकेगा तथा ये सारी दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से प्रजा के क्लेशरूप काँटे को निकालकर सम्पूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे। उस समय देवता और असुर भी इनके विपुल प्रभाव का वर्णन करेंगे’।



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

वन्दीजन द्वारा महाराज पृथु की स्तुति.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- महाराज पृथु ने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृत का आस्वादन करके सूत आदि गायक लोग बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। ‘आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं’, जो अपनी माया से अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेन के मृतक शरीर से लिया है, किन्तु आपके पौरुषों का वर्णन करने में साक्षात् ब्रह्मादि की बुद्धि भी चकरा जाती है। तथापि आपके कथामृत के आस्वादन में आदर-बुद्धि रखकर मुनियों के उपदेश के अनुसार उन्हीं की प्रेरणा से हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मों का कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरि के कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है। ‘ये धर्मधारियों में श्रेष्ठ महाराज पृथु लोक को धर्म में प्रवृत्त करके धर्ममर्यादा की रक्षा करेंगे तथा उसके विरोधियों को दण्ड देंगे।

ये अकेले ही समय-समय पर प्रजा के पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्य के अनुसार अपने शरीर में भिन्न-भिन्न लोकपालों की मूर्ति को धारण करेंगे तथा यज्ञ आदि के प्रचार द्वरा स्वर्गलोक और वृष्ठि की व्यवस्था द्वारा भूलोक- दोनों का ही हित साधन करेंगे। ये सूर्य के समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी होंगे।

जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा-ऋतु में उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदि के द्वारा कभी धन-संचय करेंगे और कभी उसका प्रजा के हित के लिये व्यय कर डालेंगे। ये बड़े दयालु होंगे। यदि कभी कोई दीनपुरुष इनके मस्तक पर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वी के समान उसके इस अनुचित व्यवहार को सदा सहन करेंगे। कभी वर्षा न होगी और प्रजा के प्राण संकट में पड़ जायेंगे, तो ये राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्र की भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे। ये अपने अमृतमय मुखचन्द्र की मनोहर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से सम्पूर्ण लोकों को आनन्दमग्न कर देंगे।

इनकी गति को कोई समझ न सकेगा, इनके कार्य भी गुप्त होंगे तथा उन्हें सम्पन्न करने का ढंग भी बहुत गम्भीर होगा। इनका धन सदा सुरक्षित रहेगा। ये अनन्त माहात्म्य और गुणों के एकमात्र आश्रय होंगे। इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुण के ही समान होंगे। ‘महाराज पृथु वेनरूप अरणि के मन्थन से प्रकट हुए अग्नि के समान हैं। शत्रुओं के लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे। ये उनके समीप रहने पर भी, सेनादि से सुरक्षित रहने के कारण, बहुत दूर रहने वाले-से होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे। जिस प्रकार प्राणियों के भीतर रहने वाला प्राणरूप सूत्रात्मा शरीर के भीतर-बाहर के समस्त व्यापारों को देखते रहने पर भी उदासीन रहता है, उसी प्रकार ये गुप्तचरों के द्वारा प्राणियों के गुप्त और प्रकट सभी प्रकार के व्यापार देखते हुए भी अपनी निन्दा और स्तुति आदि के प्रति उदासीनवत् रहेंगे।

ये धर्ममार्ग में स्थित रहकर अपने शत्रु के पुत्र को भी, दण्डनीय न होने पर, कोई न दण्ड ने देंगे और दण्डनीय होने पर तो अपने पुत्र को भी दण्ड देंगे। भगवान् सूर्य मानसोत्तर पर्वत तक जितने प्रदेश को अपनी किरणों से प्रकाशित करते हैं, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में इनका निष्कण्टक राज्य रहेगा। ये अपने कार्यों से सब लोकों को सुख पहुँचावेंगे- उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारों के कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी। ये बड़े दृशसंकल्प, सत्यप्रतिज्ञ, ब्राह्मण भक्त, वृद्धों की सेवा करने वाले, शरणागतवत्सल, सब प्राणियों को मान देने वाले और दीनों पर दया करने वाले होंगे।



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः श्लोक 15-26 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः श्लोक 15-26 का हिन्दी अनुवाद

वायु ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इन्द्र ने मनोहर मुकुट, यम ने दमन करने वाला दण्ड, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने सुन्दर हार, विष्णु भगवान् ने सुदर्शन चक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी ने अविचल सम्पत्ति, रुद्र ने दस चन्द्राकर चिह्नों से युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिका जी ने सौ चन्द्राकर चिह्नों वाली ढाल, चन्द्रमा ने अमृतमय अश्व, त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने सुन्दर रथ, अग्नि ने बकरे और गौ के सींगों का बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्य ने तेजोमय बाण, पृथ्वी ने चरणस्पर्श-मात्र से अभीष्ट स्थान पर पहुँचा देने वाली योगमयी पादुकाएँ, आकाश के अभिमानी द्यौ देवता ने नित्य नूतन पुष्पों की माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादी ने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जाने की शक्तियाँ, ऋषियों ने अमोघ आशीर्वाद, समुद्र ने अपने से उत्पन्न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिये बरोक-टोक मार्ग उपहार में दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करने के लिये उपस्थित हुए। तब उन स्तुति करने वालों का अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परमप्रतापी महाराज पृथु ने हँसते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा।

पृथु ने कहा- सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोक में मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणों को लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषय में तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्न किसी और की स्तुति करो।

मृदुभाषियों! कालान्तर में जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायें, तब भरपेट अपनी मधुर वाणी से मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्टपुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरि के गुणानुवाद के रहते हुए तुच्छ मनुष्यों की स्तुति नहीं किया करते। महान् गुणों को धारण करने में समर्थ होने पर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उसके न रहने पर भी केवल सम्भावनामात्र से स्तुति करने वालों द्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते-इस प्रकार की स्तुति से तो मनुष्य की वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं। जिस प्रकार लज्जाशील उदारपुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रम की चर्चा होनी बुरी समझते हैं; उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुति को भी निन्दित मानते हैं। सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा लोक में अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अब तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुम लोगों से बच्चों के समान अपनी कीर्ति का किस प्रकार गान करावें?



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श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद

महाराज पृथु का आविर्भाव और राज्याभिषेक.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़े को उत्पन्न हुआ देख और उसे भगवान् का अंश जान बहुत प्रसन्न हुए और बोले। ऋषियों ने कहा- यह पुरुष भगवान् विष्णु की विश्वपालिनी कला से प्रकट हुआ है और वह स्त्री उन परमपुरुष की अनपायिनी (कभी अलग न होने वाली) शक्ति लक्ष्मी जी का अवतार है। इनमें से जो पुरुष है, वह अपने सुयश का प्रथन-विस्तार करने के कारण परमयशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट् होगा। राजाओं में यही सबसे पहला होगा। यह सुन्दर दाँतों वाली एवं गुण और आभूषणों को भी विभूषित करने वाली सुन्दरी इन पृथु को ही अपना पति बनायेगी। इसका नाम अर्चि होगा। पृथु के रूप में साक्षात् श्रीहरि के अंश ने ही संसार की रक्षा के लिये अवतार लिया है और अर्चि के रूप में, निरन्तर भगवान् की सेवा में रहने वाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मी जी ही प्रकट हुई हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! उस समय ब्राह्मण लोग पृथु की स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वों ने गुणगान किया, सिद्धों ने पुष्पों की वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं। आकाश में शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकों से वहाँ आये। जगद्गुरु ब्रह्मा जी देवता और देवेश्वरों के साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथु के दाहिने हाथ में भगवान् विष्णु की हस्तरेखाएँ और चरणों में कमल का चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरि का ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथ में दूसरी रेखाओं से बिना कटा हुआ चक्र का चिह्न होता है, वह भगवान् का ही अंश होता है। वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के अभिषेक का आयोजन किया। सब लोग उसकी सामग्री जुटाने में लग गये। उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियों ने भी उन्हें तरह-तरह के उपहार भेंट किये। सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत महाराज पृथु का विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेकों अलंकारों से सजी हुई महारानी अर्चि के साथ वे दूसरे अग्निदेव के सदृश जान पड़ते थे। वीर विदुर जी! उन्हें कुबेर ने बड़ा ही सुन्दर सोने का सिंहासन दिया तथा वरुण ने चन्द्रमा के समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जल की फुहियाँ झरती रहती थीं।



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श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 35-46 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 35-46 का हिन्दी अनुवाद


जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमों को चले गये, तब इधर वेन की शोकाकुल माता सुनीथा मन्त्रादि के बल से तथा अन्य युक्तियों से अपने पुत्र के शव की रक्षा करने लगी।

एक दिन वे मुनिगण सरस्वती के पवित्र जल में स्नान कर अग्निहोत्र से निवृत्त हो नदी के तीर पर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे। उन दिनों लोकों में आतंक फैलाने वाले बहुत-से उपद्रव होते देखकर वे आपस में कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वी का कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर-डाकुओं के कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होने वाला है? ऋषि लोग ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओं में धावा करने वाले चोरों और डाकुओं के कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी। देखते ही वे समझ गये कि राजा वेन के मर जाने के कारण देश में अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगों का धन लूटने वाले तथा एक-दूसरे के खून के प्यासे लुटेरों का ही है।

अपने तेज से अथवा तपोबल से लोगों को ऐसी कुप्रवृत्ति से रोकने में समर्थ होने पर भी ऐसा करने में हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया। फिर सोचा कि ‘ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दोनों की उपेक्षा करने से उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे फूटे हुए घड़े में से जल बह जाता है। फिर राजर्षि अंग का वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’।

ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजा की जाँघ को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। वह कौए के समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबे के-से रंग के थे। उसने बड़ी दीनता और नम्रताभाव से पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियों ने कहा- ‘निषीद (बैठ जा)।’ इसी से वह ‘निषाद’ कहलाया। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मों में रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगर में न टिककर वन और पर्वतों में ही निवास करते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 18-34 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 18-34 का हिन्दी अनुवाद

जिसके राज्य अथवा नगर में वर्णाश्रम-धर्मों का पालन करने वाले पुरुष स्वधर्मपालन के द्वारा भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञा का पालन करने वाले उस राजा से भगवान् प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्व की आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतों के रक्षक हैं। भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्वरों के भी ईश्वर हैं, उनके प्रसन्न होने पर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तभी तो इन्द्रादि लोकपालों के सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदर से पूजपोहार समर्पण करते हैं। राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञों के नियन्ता है; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्नति के लिये अनेक प्रकार के यज्ञों से भगवान् का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये। जब आपके राज्य में ब्राह्मण लोग यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिये।

वेन ने कहा–- तुम लोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्म में ही धर्मबुद्धि कर रखी है। तभी तो तुम जीविका देने वाले मुझ साक्षात् पति को छोड़कर किसी दूसरे जारपति की उपासना करते हो। जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्वर का अनादर करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में ही। अरे! जिसमें तुम लोगों की इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहिता पति से प्रेम न करके किसी परपुरुष में आसक्त हो जायें। विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देने में समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजा के शरीर में रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं। इसलिये ब्राह्मणों! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मों द्वारा एक मेरा ही पूजन करो और और मुझी को बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजा का अधिकारी हो सकता है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- –इस प्रकार विपरीत बुद्धि होने के कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियों के बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करने पर भी उसने उनकी बात पर ध्यान न दिया।

कल्याणरूप विदुर जी! अपने को बड़ा बुद्धिमान् समझने वाले वेन ने जब उन मुनियों का इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँग को व्यर्थ हुई देख वे उस पर अत्यन्त कुपित हो गये। ‘मार डालो! इस स्वभाव से ही दुष्ट पापी को मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनों में संसार को अवश्य भस्म कर डालेगा। यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासन के योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्जलज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णु भगवान् की निन्दा करता है। अहो! जिनकी कृपा से इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरि की निन्दा अभागे वेन को छोड़कर और कौन कर सकता है’? इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोध को प्रकट कर उन्होंने उसे मारने का निश्चय कर लिया। वह तो भगवान् की निन्दा करने के कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारों से ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया।



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श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1- 17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1- 17 का हिन्दी अनुवाद

राजा वेन की कथा.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- वीरवर विदुर जी! सभी लोकों की कुशल चाहने वाले भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अंग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओं के समान उच्छ्रंखल होते जा रहे हैं। तब उन्होंने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमण्डल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया। वेन बड़ा कठोर शासक था।

जब चोर-डाकुओं ने सुना कि वही राजसिंहासन पर बैठा है, तब सर्प से डरे हुए चूहों के समान वे सब तुरंत ही जहाँ-तहाँ छिप गये। राज्यासन पाने पर वेन आठों लोकपालों की ऐश्वर्यकला के कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपने को ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषों का अपमान करने लगा। वह ऐश्वर्यमद से अंधा हो रथ पर चढ़कर निरंकुश गजराज के समान पृथ्वी और आकाश को कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा। ‘कोई भी द्विजातिय वर्ण का पुरुष कभी प्रकार का यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये।

दुष्ट वेन का ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसार पर संकट आया समझकर करुणावश आपस में कहने लगे- ‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ी के बीच में रहने वाले चीटी आदि जीव महान् संकट में पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजा के और दूसरी ओर चोर-डाकुओं के अत्याचार से महान् संकट में पड़ रही है। हमने अराजकता के भय से ही अयोग्य होने पर भी वेन को राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजा को भय हो गया। ऐसी अवस्था में प्रजा को किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है? सुनीथा की कोख से उत्पन्न हुआ यह वेन स्वभाव से ही दुष्ट है। परन्तु साँप को दूध पिलाने के समान इसको पालना, पालने वालों के लिये अनर्थ का कारण हो गया। हमने इसे प्रजा की रक्षा करने के लिये नियुक्त किया था, यह आज उसी को नष्ट करने पर तुला हुआ है।

इतना सब होने पर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करने से इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे। हमने जान-बूझकर दुराचारी वेन को राजा बनाया था। किन्तु यदि समझाने पर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोक के धिक्कार से दग्ध हुए इस दुष्ट को हम अपने तेज से भस्म कर देंगे।’

ऐसा विचार करके मुनि लोग वेन के पास गये और अपने क्रोध को छिपाकर उसे प्रिय वचनों से समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे।

मुनियों ने कहा- राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उस पर ध्यान दिजिये। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्ति की वृद्धि होगी। तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धि से धर्म का आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकों की प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपद पर पहुँचा देता है। इसलिये वीरवर! प्रजा का कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्म के नष्ट होने से राजा भी ऐश्वर्य से च्युत हो जाता है। जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदि से अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए न्यायाकूल रहता है, वह इस लोक में और परलोक में दोनों जगह सुख पाता है। 




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श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 39-49 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 39-49 का हिन्दी अनुवाद

वह बालक बाल्यावस्था से ही अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्यु का अनुगामी था (सुनीथा मृत्यु की ही पुत्री थी); इसलिये वह भी अधार्मिक ही हुआ। वह दुष्ट वेन धनुष-बाण चढ़ाकर वन में जाता और व्याध के समान बेचारे भोले-भाले हरिणों की हत्या करता। उसे देखते ही पुरवासी लोग ‘वेन आया! वेन आया!’ कहकर पुकार उठते। वह ऐसा क्रूर और निर्दयी था कि मैदान में खेलते हुए अपनी बराबरी के बालकों को पशुओं की भाँति बलात् मार डालता। वेन की ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंग ने उसे तरह-तरह से सुधारने की चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्ग पर लाने में समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। (वे मन-ही-मन कहने लगे-) ‘जिन गृहस्थों के पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्म में श्रीहरि की आराधना की होगी; इसी से उन्हें कुपूत की करतूतों से होने वाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते। जिसकी करनी से माता-पिता का सारा सुयश मिट्टी में मिल जाये, उन्हें अधर्म का भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाये, कभी न छूटने वाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाये-ऐसी नाममात्र की सन्तान के लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्मा के लिये एक प्रकार का मोहमय बन्धन ही है। मैं तो सपूत की अपेक्षा कुपूत को ही अच्छा समझता हूँ; क्योंकि सपूत को छोड़ने में बड़ा क्लेश होता है। कुपूत घर को नरक बना देता है, इसलिये उससे सहज ही छुटकारा हो जाता है’।

इस प्रकार सोचते-सोचते महाराज अंग को रात में नींद नहीं आयी। उनका चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। वे आधी रात के समय बिछौने से उठे। इस समय वेन की माता नींद में बेसुध पड़ी थी। राजा ने सबका मोह छोड़ दिया और उसी समय किसी को भी मालूम न हो, इस प्रकार चुपचाप उस महान् ऐश्वर्य से भरे राजमहल से निकलकर वन को चल दिये। महाराज विरक्त होकर घर से निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वी पर उनकी खोज करने लगे। ठीक वैसे ही, जैसे योग का यथार्थ रहस्य न जानने वाले पुरुष अपने हृदय में छिपे हुए भगवान् को बाहर खोजते हैं। जब उन्हें अपने स्वामी का कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगर में लौट आये और वहाँ जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत् प्रणाम करके उन्होंने आँखों में आँसू भरकर महाराज के न मिलने का वृत्तान्त सुनाया। 



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श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 21-38 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 21-38 का हिन्दी अनुवाद

विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! महाराज अंग तो बड़े शीलसम्पन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण-भक्त और महात्मा थे। उनके वेन जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दुःखी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा। राजदण्डधारी वेन का भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरों ने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्ड का प्रयोग किया। प्रजा का कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजा से कोई पाप बन जाये तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभाव से आठ लोकपालों के तेज को धारण करता है। ब्रह्मन्! आप भूत-भविष्य की बातें जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, इसलिये आप मुझे सुनीथा के पुत्र वेन की सब करतूतें सुनाइये। मैं आपका श्रद्धालु भक्त हूँ।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! एक बार राजर्षि अंग ने अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणों के आवाहन करने पर भी देवता लोग अपना भाग लेने नहीं आये। तब ऋत्विजों ने विस्मित होकर यजमान अंग से कहा- ‘राजन्! हम आहुतियों के रूप में आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवता लोग स्वीकार नहीं करते। हम जानते हैं आपकी होम-सामग्री दूषित नहीं है; आपने उसे बड़ी श्रद्धा से जुटाया है तथा वेदमन्त्र भी किसी प्रकार बलहीन नहीं हैं; क्योंकि उनका प्रयोग करने वाले ऋत्विज् गण याजकोचित सभी नियमों का पूर्णतया पालन करते हैं। हमें ऐसी कोई बात नहीं दीखती कि इस यज्ञ में देवताओं का किंचित् भी तिरस्कार हुआ है- फिर भी कर्माध्यक्ष देवता लोग क्यों अपना भाग नहीं ले रहे हैं?

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- ऋत्विजों की बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकों की अनुमति से मौन तोड़कर सदस्यों से पूछा। ‘सदस्यों! देवता लोग आवाहन करने पर भी यज्ञ में नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?

सदस्यों ने कहा- राजन्! इस जन्म में तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हाँ पूर्वजन्म का एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुण-सम्पन्न होने पर भी पुत्रहीन हैं। आपका कल्याण हो! इसलिये पहले आप सुपुत्र प्राप्त करने का कोई उपाय कीजिये। यदि आप पुत्र की कामना से यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे। जब सन्तान के लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरि का आवाहन किया जायेगा, तब देवता लोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे। भक्त जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते है। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासक को फल भी मिलता है। इस प्रकार राजा अंग को पुत्र प्राप्ति कराने का निश्चय कर ऋत्विजों ने पशु में यज्ञरूप से रहने वाले श्रीविष्णु भगवान् के पूजन के लिये पुरोडश नामक चरु समर्पण किया। अग्नि में आहुति डालते ही अग्निकुण्ड से सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्र में सिद्ध खीर लिये हुए थे। उदार बुद्धि राजा अंग ने याजकों की अनुमति से अपनी अंजलि में वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नी को दे दिया। पुत्रहीना रानी ने वह पुत्रप्रदायिनी खीर खाकर अपने पति के सहवास से गर्भ धारण किया। उससे यथा समय उसके एक पुत्र हुआ।


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