श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 21-35 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 21-35 का हिन्दी अनुवाद

वही मेरा गाण्डीव धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ है, वही घोड़े हैं और वही मैं रथी अर्जुन हूँ, जिसके सामने बड़े-बड़े राजा लोग सिर झुकाया करते थे। श्रीकृष्ण के बिना ये सब एक ही क्षण में नहीं के समान सारशून्य हो गये-ठीक उसी तरह, जैसे भस्म में डाली हुई आहुति, कपटभरी सेवा और ऊसर में बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है।

राजन्! आपने द्वारकावासी अपने जिन सुहृद-सम्बन्धियों की बात पूछी है, वे ब्राह्मणों के शापवश मोहग्रस्त हो गये और वारुणी मदिरा के पान से मदोन्मत्त होकर परिचितों की भाँति आपस में ही एक-दूसरे से भिड़ गये और घूँसों से मार-पीट करके सब-के-सब नष्ट हो गये। उनमे से केवल चार-पाँच ही बचे हैं। वास्तव में यह सर्वशक्तिमान् भगवान की ही लीला है कि संसार के प्राणी परस्पर एक-दूसरे का पालन-पोषण भी करते हैं और एक-दूसरे को मार डालते हैं। राजन्! जिस प्रकार जलचरों में बड़े जन्तु छोटों को, बलवान् दुर्बलों को एवं बड़े और बलवान् भी परस्पर एक-दूसरे को खा जाते हैं, उसी प्रकार अतिशय बली और बड़े यदुवंशियों के द्वारा भगवान ने दूसरे राजाओं का संहार कराया। तत्पश्चात् यदुवंशियों के द्वारा ही एक से दूसरे यदुवंशी का नाश करा के पूर्णरूप से पृथ्वी का भार उतार दिया।

भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे जो शिक्षाएँ दी थीं, वे देश, काल और प्रयोजन के अनुरूप तथा हृदय के ताप को शान्त करने वाली थीं; स्मरण आते ही वे हमारे चित्त का हरण कर लेती हैं।

सूत जी कहते हैं- इस प्रकार प्रगाढ़ प्रेम से भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करते-करते अर्जुन की चित्तवृत्ति अत्यन्त निर्मल और प्रशान्त हो गयी। उनकी प्रेममयी भक्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के अहर्निश चिन्तन से अत्यन्त बढ़ गयी। भक्ति के वेग ने उनके हृदय को मथकर उसमें से सारे विकारों को बाहर निकाल दिया। उन्हें युद्ध के प्रारम्भ में भगवान के द्वारा उपदेश किया हुआ गीता-ज्ञान पुनः स्मरण हो आया, जिसकी काल के व्यवधान और कर्मों के विस्तार के कारण प्रमादवश कुछ दिनों के लिये विस्मृति हो गयी थी। ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति से माया का आवरण भंग होकर गुणातीत अवस्था प्राप्त हो गयी। द्वैत का संशय निवृत्त हो गया। सूक्ष्म शरीर भंग हुआ। वे शोक एवं जन्म-मृत्यु के चक्र से सर्वथा मुक्त हो गये।

भगवान के स्वधामगमन और यदुवंश के संहार का वृत्तान्त सुनकर निश्चलमति युधिष्ठिर ने स्वर्गारोहण का निश्चय किया। कुन्ती ने भी अर्जुन के मुख से यदुवंशियों के नाश और भगवान के स्वधामगमन की बात सुनकर अनन्य भक्ति से अपने हृदय को भगवान श्रीकृष्ण में लगा दिया और सदा के लिये इस जन्म-मृत्युरूप संसार से अपना मुँह मोड़ लिया। भगवान श्रीकृष्ण ने लोकदृष्टि में जिस यादव शरीर से पृथ्वी का भार उतारा था, उसका वैसे ही परित्याग कर दिया, जैसे कोई काँटें से काँटा निकालकर फिर दोनों को फेंक दे। भगवान की दृष्टि में दोनों ही समान थे। जैसे वे नट के समान मत्स्यादि रूप धारण करते हैं और फिर उनका त्याग कर देते हैं, वैसे ही उन्होंने जिस यादव शरीर से पृथ्वी का भार दूर किया था, उसे त्याग भी दिया।

क्रमश:

साभार krishnakosh.org

प्रेम विवाह. (ज्योतिषीय)


प्रेम विवाह.
(ज्योतिषीय)

कुंडली में पांचवा भाव या पांचवा स्थान प्यार का प्रतिनिधित्व करता है, तो सातवां भाव या सातवां स्थान विवाह संबंधों को दर्शाता है। ज्योतिष में शुक्र ग्रह को प्रेम का कारक माना जाता है, यानी कुंडली में शुक्र ग्रह की स्थिति शुभ या मजबूत होने पर आपको सच्चा प्यार नसीब होगा। कुंडली में पहला, पांचवां, सातवां और ग्यारहवां भाव या स्थान से शुक्र का संबंध होने पर व्यक्ति प्रेमी स्वभाव का होता है।

कुंडली में पांचवें भाव का संबंध जब सातवें भाव से होता है, तो प्रेम परिणय संबंध में बदल जाता है। नौवें भाव का संबंध पांचवें भाव से होने पर ही प्रेम विवाह सफल होता है।

इसके अलावा कुंडली में और भी ग्रहयोग होते हैं, जो प्यार के अहसास को रिश्तों की डोर में बांध देते हैं। पांचवें भाव का स्वामी पंचमेश शुक्र यदि सातवें स्थान में है तो प्रेम विवाह की संभावना प्रबल होती है। कुंडली में शुक्र के अपने घर में होने पर भी प्रेम विवाह का योग बनता है।

शनि भी प्रेम को बदलते हैं परिणय में.

पहले भाव में पहले भाव के स्वामी के साथ चंद्रमा की युति हो तो प्रेम विवाह के योग बनते हैं। इसी तरह सातवें भाव में सातवें भाव के स्वामी के साथ चंद्रमा की युति हो तो भी प्रेम परिणय सूत्र में बंध जाता है। सप्तम भाव का स्वामी अगर अपने घर में है, तब स्वगृही सप्तमेश प्रेम विवाह करवाता है।

जब पड़ोसी से प्यार विवाह में बदल जाता है.

तीसरे या चौथे भाव में मंगल और शुक्र का योग हो तो पड़ोस या एक ही इमारत में रहने वाले से प्रेम होता है। यदि बृहस्पति केंद्र या त्रिकोण में हो, तो प्रेम संबंध विवाह में बदल जाते हैं। नौवे या दसवे भाग में मंगल और शुक्र की युति होने पर प्यार व्यक्ति के कार्यस्थल पर होता है।

प्रेम संबंधों में धर्म परिवर्तन.

यदि कुंडली में सातवें और नौवें भाव में एक-एक क्रूर ग्रह हो और इन दोनों का किसी अन्य बली ग्रह से कोई संबंध नहीं हो तो ऐसा व्यक्ति विवाह के लिए अपना धर्म बदल लेता है।

यदि सातवें भाव में चंद्रमा, मंगल या शनि की राशि जैसे कर्क, मेष, वृश्चिक, मकर या कुंभ हो और बारहवें भाव में कोई दो क्रूर ग्रह हो तो व्यक्ति विवाह के लिए विवाह के लिए धर्म परिवर्तन कर लेगा।

सनातन धर्म में विवाह की प्रथा.


सनातन धर्म में
विवाह की प्रथा.

विवाह को एक पवित्र और आवश्यक संस्कार माना जाता है। वंशवृद्धि और परिवार जैसे शब्द विवाह के गठबंधन से निकले हैं। परिणय संस्कार के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। घर, संसार और दुनिया का अस्तित्व सात फेरों में समाया हुआ है। लेकिन विवाह संस्कार आदि-अनादि काल से प्रचलन में नहीं थे। एक ऋषि के प्रयासों से वंशवृद्धि की इस परंपरा को विवाह के संस्कारों में पिरोया गया था।

शास्त्रों के अनुसार, विवाह संस्कार की परंपरा ऋषि श्वेतकेतु ने प्रारंभ की थी। कौशीतकि उपनिषद के अनुसार श्वेतकेतु विश्वप्रसिद्ध गुरुभक्त आरुणि के पुत्र और गौतम ऋषि के वंशज थे। आरुणि को उद्दालक भी कहा जाता है। छांदोग्य उपनिषद में भी श्वेतकेतु को आरुणि का पुत्र बताया है। वे परम ज्ञानी संत अष्टवक्र के भानजे थे। उनको तत्वज्ञानी आचार्य कहा गया है। पांचाल देश के निवासी श्वेतकेतु की उपस्थिति राजा जनक की सभा में भी थी और इनका विवाह देवल ऋषि की पुत्री सुवर्चला के साथ हुआ था।

प्राचीन-काल में जब विवाह संस्कार का अस्तित्व नहीं था, उस वक्त स्त्रियां स्वतंत्र और उन्मुक्त जीवन व्यतीत करती थीं। उनमें पशु-पक्षियों के समान यौनाचार करने की प्रवृत्ति थी। एक बार जब श्वेतकेतु अपने माता-पिता के साथ बैठे थे, तभी एक परिव्राजक आया और श्वेतकेतु की मां का हाथ पकड़कर उनको अपने साथ ले जाने लगा। यह सब देखकर श्वेतकेतु को काफी गुस्सा आया और उन्होंने परिव्राजक के आचरण पर विरोध दर्ज करवाया। उस वक्त उनके पिता ने उनको समझाया कि स्त्रियां गायों की तरह स्वतंत्र हैं और वह किसी के भी साथ समागम कर सकती हैं।

श्वेतकेतु को यह बात चुभ गई और उन्होंने कहा कि स्त्रियों को पति के प्रति वफादार होना चाहिए और पर-पुरुष के साथ समागम करने का पाप भ्रूणहत्या की तरह होगा। जो पुरुष पतिव्रता स्त्री को छोड़ कर अन्य स्त्रियों के साथ रमण करेगा उसे भी यही पाप लगेगा। इस तरह से व्याभिचार पर लगाम लगी और एक सभ्य समाज का जन्म हुआ। यानी समाज को सभ्य बनाने का सिलसिला हमारे वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ किया था।

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 12-20 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 12-20 का हिन्दी अनुवाद

उनके प्रताप से मैंने युद्ध में [पार्वती] सहित भगवान शंकर को आश्चर्य में डाल दिया तथा उन्होंने मुझको अपना पाशुपत नामक अस्त्र दिया; साथ ही दूसरे लोकपालों ने भी प्रसन्न होकर अपने-अपने अस्त्र मुझे दिये। और तो क्या, उनकी कृपा से मैं इसी शरीर से स्वर्ग में गया और देवराज इन्द्र की सभा में उनके बराबर आधे आसन पर बैठने का सम्मान मैंने प्राप्त किया। उनके आग्रह से जब मैं स्वर्ग में ही कुछ दिनों तक रह गया, तब इन्द्र के साथ समस्त देवताओं ने मेरी इन्हीं गाण्डीव धारण करने वाली भुजाओं का निवातकवच आदि दैत्यों को मारने के लिये आश्रय लिया। महाराज! यह सब जिनकी महती कृपा का फल था, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे आज ठग लिया?

महाराज! कौरवों की सेना भीष्म, द्रोण आदि अजेय महामत्स्यों से पूर्ण अपार समुद्र के समान दुस्तर थी, परन्तु उनका आश्रय ग्रहण करके अकेले ही रथ पर सवार हो मैं उसे पार कर गया। उन्हीं की सहायता से, आपको याद होगा, मैंने शत्रुओं से राजा विराट का सारा गोधन तो वापस ले ही लिया, साथ ही उनके सिरों पर से चमकते हुए मणिमय मुकुट तथा अंगों के अलंकार तक छीन लिये थे।

भाईजी! कौरवों की सेना, भीष्म, कर्ण, द्रोण, शल्य तथा अन्य बड़े-बड़े राजाओं और क्षत्रिय वीरों के रथों से शोभायमान थी। उसके सामने मेरे आगे-आगे चलकर वे अपनी दृष्टि से ही उन महारथी यूथपतियों की आयु, मन, उत्साह और बल को छीन लिया करते थे। द्रोणाचार्य, भीष्म, कर्ण, भूरिश्रवा, सुशर्मा, शल्य, जयद्रथ और बाह्लीक आदि वीरों ने मुझ पर अपने कभी न चूकने वाले अस्त्र चलाये थे; परन्तु जैसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्यों के अस्त्र-शस्त्र भगवद्भक्त प्रह्लाद का स्पर्श नहीं करते थे, वैसे ही उनके शस्त्रास्त्र मुझे छू तक नहीं सके। यह श्रीकृष्ण के भुजदण्डों की छत्रछाया में रहने का ही प्रभाव था। श्रेष्ठ पुरुष संसार से मुक्त होने के लिये जिनके चरणकमलों का सेवन करते हैं, अपने-आप तक को दे डालने वाले उन भगवान को मुझ दुर्बुद्धि ने सारथि तक बना डाला। अहा! जिस समय मेरे घोड़े थक गये थे और मैं रथ से उतरकर पृथ्वी पर खड़ा था, उस समय बड़े-बड़े महारथी शत्रु भी मुझ पर प्रहार न कर सके; क्योंकि श्रीकृष्ण के प्रभाव से उनकी बुद्धि मारी गयी थी।

महाराज! माधव के उन्मुक्त और मधुर मुस्कान से युक्त, विनोदभरे एवं हृदयस्पर्शी वचन और उनका मुझे ‘पार्थ, अर्जुन, सखा, कुरुनन्दन’ आदि कहकर पुकारना, मुझे याद आने पर मेरे हृदय में उथल-पुथल मचा देते हैं। सोने, बैठने, टहलने और अपने सम्बन्ध में बड़ी-बड़ी बातें करने तथा भोजन आदि करने में हम प्रायः एक साथ रहा करते थे। किसी-किसी दिन मैं व्यंग्य से उन्हें कह बैठता, ‘मित्र! तुम तो बड़े सत्यवादी हो!’ उस समय भी वे महापुरुष अपनी महानुभावता के कारण, जैसे मित्र अपने मित्र का और पिता अपने पुत्र का अपराध सह लेता है उसी प्रकार, मुझ दुर्बुद्धि के अपराधों को सह लिया करते थे। महाराज! जो मेरे सखा, प्रिय मित्र-नहीं-नहीं मेरे हृदय ही थे, उन्हीं पुरुषोत्तम भगवान से मैं रहित हो गया हूँ। भगवान की पत्नियों को द्वारका से अपने साथ ला रहा था, परंतु मार्ग में दुष्ट गोपों ने मुझे एक अबला की भाँति हरा दिया और मैं उनकी रक्षा नहीं कर सका।


क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः पंचदश अध्यायः श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद

कृष्ण विरहव्यथित पाण्डवों का परीक्षित को राज्य देकर स्वर्ग सिधारना सूत जी कहते हैं- भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे सखा अर्जुन एक तो पहले ही श्रीकृष्ण के विरह से कृश हो रहे थे, उस पर राजा युधिष्ठिर ने उनकी विषादग्रस्त मुद्रा देखकर उसके विषय में कई प्रकार की आशंकाएँ करते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी। शोक से अर्जुन का मुख और हृदय-कमल सूख गया था, चेहरा फीका पड़ गया था। वे उन्हीं भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में ऐसे डूब रहे थे कि बड़े भाई के प्रश्नों का कुछ भी उत्तर न दे सके। श्रीकृष्ण की आँखों से ओझल हो जाने के कारण वे बढ़ी हुई प्रेमजनित उत्कण्ठा के परवश हो रहे थे। रथ हाँकने, टहलने आदि के समय भगवान ने उनके साथ जो मित्रता, अभिन्नहृदयता और प्रेम से भरे हुए व्यवहार किये थे, उनकी याद-पर-याद आ रही थी; बड़े कष्ट से उन्होंने अपने शोक का वेग रोका, हाथ से नेत्रों के आँसू पोंछे और फिर रुँधे हुए गले से अपने बड़े भाई महाराज युधिष्ठिर से कहा।

अर्जुन बोले- महाराज! मेरे ममेरे भाई अथवा अत्यन्त घनिष्ठ मित्र का रूप धारणकर श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया। मेरे जिस प्रबल पराक्रम से बड़े-बड़े देवता भी आश्चर्य में डूब जाते थे, उसे श्रीकृष्ण ने मुझसे छीन लिया। जैसे यह शरीर प्राण से रहित होने पर मृतक कहलाता है, वैसे ही उनके क्षण भर के वियोग से यह संसार अप्रिय दीखने लगता है। उनके आश्रय से द्रौपदी स्वयंवर में राजा द्रुपद के घर आये हुए कामोन्मत्त राजाओं का तेज मैंने हरण कर लिया, धनुष पर बाण चढ़ाकर मत्स्यवेध किया और इस प्रकार द्रौपदी को प्राप्त किया था। उनकी सन्निधिमात्र से मैंने समस्त देवताओं के साथ इन्द्र को अपने बल से जीतकर अग्निदेव को उनकी तृप्ति के लिये खाण्डव वन का दान कर दिया और मय दानव की निर्माण की हुई, अलौकिक कला कौशल से युक्त मायामयी सभा प्राप्त की और आपके यज्ञ में सब ओर से आ-आकर राजाओं ने अनेकों प्रकार की भेंटे समर्पित कीं। दस हजार हाथियों की शक्ति और बल से सम्पन्न आपके इन छोटे भाई भीमसेन ने उन्हीं की शक्ति से राजाओं के सिर पर पैर रखने वाले अभिमानी जरासन्ध का वध किया था; तदनन्तर उन्हीं भगवान ने उन बहुत-से राजाओं को मुक्त किया, जिनको जरासन्ध ने महाभैरव-यज्ञ बलि चढ़ाने के लिये बंदी बना रखा था। उन सब राजाओं ने आपके यज्ञ में अनेकों प्रकार के उपहार दिये थे।

महारानी द्रौपदी राजसूय यज्ञ के महान् अभिषेक से पवित्र हुए अपने उन सुन्दर केशों को, जिन्हें दुष्टों ने भरी सभा में छूने का साहस किया था, बिखेरकर तथा आँखों में आँसू भरकर जब श्रीकृष्ण के चरणों में गिर पड़ी, तब उन्होंने उसके सामने उसके उस घोर अपमान का बदला लेने की प्रतिज्ञा करके उन धूर्तों की स्त्रियों की ऐसी दशा कर दी कि वे विधवा हो गयीं और उन्हें अपने केश अपने हाथों खोल देने पड़े। वनवास के समय हमारे वैरी दुर्योधन के षड्यन्त्र से दस हजार शिष्यों को साथ बिठाकर भोजन करने वाले महर्षि दुर्वासा ने हमें दुस्तर संकट में डाल दिया था। उस समय उन्होंने द्रौपदी के पात्र में बची हुई शाक की एक पत्ती का ही भोग लगाकर हमारी रक्षा की। उनके ऐसा करते ही नदी में स्नान करती हुई मुनि मण्डली को ऐसा प्रतीत हुआ मानो उनकी तो बात ही क्या, सारी त्रिलोकी ही तृप्त हो गयी है।
क्रमश:

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 35-44 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 35-44 का हिन्दी अनुवाद

वे आदिपुरुष बलराम जी के साथ संसार के परम मंगल, परम कल्याण और उन्नति के लिये यदुवंशरूप क्षीरसागर में विराजमान हैं। उन्हीं के बाहुबल से सुरक्षित द्वारकापुरी में यदुवंशी लोग सारे संसार के द्वारा सम्मानित होकर बड़े आनन्द से विष्णु भगवान के पार्षदों के समान विहार कर रहे हैं। सत्यभामा आदि सोलह हजार रानियाँ प्रधानरूप से उनके चरणकमलों की सेवा में ही रत रहकर उनके द्वारा युद्ध में इन्द्रादि देवताओं को भी हराकर इन्द्राणी के भोग योग्य तथा उन्हीं की अभीष्ट पारिजातादि वस्तुओं का उपभोग करती हैं। यदुवंशी वीर श्रीकृष्ण के बाहुदण्ड के प्रभाव से सुरक्षित रहकर निर्भय रहते हैं और बलपूर्वक लायी हुई बड़े-बड़े देवताओं के बैठने योग्य सुधर्मा सभा को अपने चरणों से आक्रान्त करते हैं।

भाई अर्जुन! यह भी बताओ कि तुम स्वयं तो कुशल से हो न? मुझे तुम श्रीहीन-से दीख रहे हो; वहाँ बहुत दिनों तक रहे, कहीं तुम्हारे सम्मान में तो किसी प्रकार की कमी नहीं हुई? किसी ने तुम्हारा अपमान तो नहीं कर दिया? कहीं किसी ने दुर्भावपूर्ण अमंगल शब्द आदि के द्वारा तुम्हारा चित्त तो नहीं दुखाया? अथवा किसी आशा से तुम्हारे पास आये हुए याचकों को उनकी माँगी हुई वस्तु अथवा अपनी ओर से कुछ देने की प्रतिज्ञा करके भी तुम नहीं दे सके? तुम सदा शरणागतों की रक्षा करते आये हो; कहीं किसी भी ब्राह्मण, बालक, गौ, बूढ़े, रोगी, अबला अथवा अन्य किसी प्राणी का, जो तुम्हारी शरण में आया हो, तुमने त्याग तो नहीं कर दिया?

कहीं तुमने अगम्या स्त्री से समागम तो नहीं किया? अथवा गमन करने योग्य स्त्री के साथ असत्कारपूर्वक समागम तो नहीं किया? कहीं मार्ग में अपने से छोटे अथवा बराबरी वालों से हार तो नहीं गये? अथवा भोजन कराने योग्य बालक और बूढ़ों को छोड़कर तुमने अकेले ही तो भोजन नहीं कर लिया? मेरा विश्वास है कि तुमने ऐसा कोई निन्दित काम तो नहीं किया होगा, जो तुम्हारे योग्य न हो। हो-न-हो अपने परम प्रियतम अभिन्न हृदय परम सुहृद भगवान श्रीकृष्ण से तुम रहित हो गये हो। इसी से अपने को शून्य मान रहे हो। इसके सिवा दूसरा कोई कारण नहीं हो सकता, जिससे तुमको इतनी मानसिक पीड़ा हो।

क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 16-34 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 16-34 का हिन्दी अनुवाद

शरीर को छेदने वली एवं धूलिवर्षा से अंधकार फैलाने वाली आँधी चलने लगी है। बादल बड़ा डरावना दृश्य उपस्थित करके सब ओर खून बरसाते हैं। देखो! सूर्य की प्रभा मन्द पड़ गयी है। भूतों की घनी भीड़ में पृथ्वी और अन्तरिक्ष में आग-सी लगी हुई है। नदी, नद, तालाब और लोगों के मन क्षुब्ध हो रहे हैं। घी से आग नहीं जलती। यह भयंकर काल न जाने क्या करेगा। बछड़े दूध नहीं पीते, गौएँ दुहने नहीं देतीं, गोशाला में गौएँ आँसू बहा-बहाकर रो रही हैं। बैल भी उदास हो रहे हैं। देवताओं की मूर्तियाँ रो-सी रही हैं, उनमें से पसीना चूने लगता है और वे हिलती-डोलती भी हैं। भाई! ये देश, गाँव, शहर, बगीचे, खानें और आश्रम श्रीहीन और आनन्द रहित हो गये हैं। पता नहीं ये हमारे किस दुःख की सूचना दे रहे हैं। इन बड़े-बड़े उत्पातों को देखकर मैं तो ऐसा समझता हूँ कि निश्चय ही यह भाग्यहीना भूमि भगवान के उन चरणकमलों से, जिनका सौन्दर्य तथा जिनके ध्वजा, वज्रअंकुशादी-विलक्षण चिह्न और किसी में भी कहीं भी नहीं हैं, रहित हो गयी है।

शौनक जी! राजा युधिष्ठिर इन भयंकर उत्पातों को देखकर मन-ही-मन चिन्तित हो रहे थे कि द्वारका से लौटकर अर्जुन आये। युधिष्ठिर ने देखा, अर्जुन इतने आतुर हो रहे हैं, जितने पहले कभी नहीं देखे गये थे। मुँह लटका हुआ है, कमल-सरीखे नेत्रों से आँसू बह रहे हैं और शरीर में बिलकुल कान्ति नहीं है। उनको इस रूप में अपने चरणों में पड़ा देखकर युधिष्ठिर घबरा गये। देवर्षि नारद की बातें याद करके उन्होंने सुहृदों के सामने ही अर्जुन से पूछा।

युधिष्ठिर ने कहा- ‘भाई! द्वारकापुरी में हमारे स्वजन-सम्बन्धी मधु, भोज, दशार्ह, आर्ह, सात्वत, अन्धक और वृष्णिवंशी यादव कुशल से तो हैं? हमारे माननीय नाना शूरसेन जी प्रसन्न हैं? अपने छोटे भाई सहित मामा वसुदेव जी तो कुशलपूर्वक हैं? उनकी पत्नियाँ हमारी मामी देवकी आदि सातों बहिनें अपने पुत्रों और बहुओं के साथ आनन्द से तो हैं? जिनका पुत्र कंस बड़ा ही दुष्ट था, वे राजा उग्रसेन अपने छोटे भाई देवक के साथ जीवित तो हैं न? हृदीक, उनके पुत्र कृतवर्मा, अक्रूर, जयन्त, गद, सारण तथा शत्रुजित आदि यादव वीर सकुशल हैं न? यादवों के प्रभु बलराम जी तो आनन्द से हैं? वृष्णिवंश के सर्वश्रेष्ठ महारथी प्रद्युम्न सुख से तो हैं? युद्ध में बड़ी फुर्ती दिखलाने वाले भगवान अनिरुद्ध आनन्द से हैं न? सुषेण, चारुदेष्ण, जाम्बवतीनन्दन साम्ब और अपने पुत्रों के सहित ऋषभ आदि भगवान श्रीकृष्ण के अन्य सब पुत्र भी प्रसन्न हैं न?

भगवान श्रीकृष्ण के सेवक श्रुतदेव, उद्धव आदि और दूसरे सुनन्द-नन्द आदि प्रधान यदुवंशी, जो भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के बाहुबल से सुरक्षित हैं, सब-के-सब सकुशल हैं न? हमसे अत्यन्त प्रेम करने वाले वे लोग कभी हमारा कुशल-मंगल भी पूछते हैं? भक्तवत्सल ब्राह्मणभक्त भगवान श्रीकृष्ण अपने स्वजनों के साथ द्वारका की सुधर्मा सभा में सुखपूर्वक विराजते हैं न?

क्रमश:

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद

अपशकुन देखकर महाराज युधिष्ठिर का शंका करना और अर्जुन का द्वारका से लौटना सूत जी कहते हैं- स्वजनों से मिलने के बाद पुण्यश्लोक भगवान श्रीकृष्ण अब क्या करना चाहते हैं- यह जानने के लिये अर्जुन द्वारका गये हुए थे। कई महीने बीतत जाने पर भी अर्जुन वहाँ से लौटकर नहीं आये। धर्मराज युधिष्ठिर को बड़े भयंकर अपशकुन दीखने लगे। उन्होंने देखा, काल की गति बड़ी विकट हो गयी है। जिस समय जो ऋतु होनी चाहिये, उस समय वह नहीं होती और उनकी क्रियाएँ भी उलटी ही होती हैं। लोग बड़े क्रोधी, लोभी और असत्य परायण हो गये हैं। अपने जीवन-निर्वाह के लिये लोग पापपूर्ण व्यापार करने लगे हैं। सारा व्यवहार कपट से भरा हुआ होता है, यहाँ तक कि मित्रता में भी छल मिला रहता है; पिता-माता, सगे-सम्बन्धी, भाई और पति-पत्नी में भी झगड़ा-टंटा रहने लगा है। कलिकाल के आ जाने से लोगों का स्वभाव ही लोभ, दम्भ आदि अधर्म से अभिभूत हो गया है और प्रकृति में भी अत्यन्त अरिष्टसूचक अपशकुन होने लगे हैं, यह सब देखकर युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई भीमसेन से कहा।

युधिष्ठिर ने कहा- भीमसेन! अर्जुन को हमने द्वारका इसलिये भेजा था कि वह वहाँ जाकर, पुण्यश्लोक भगवान श्रीकृष्ण क्या कर रहे हैं- इसका पता लगा आये और सम्बन्धियों से मिल भी आये। तब से सात महीने बीत गये; किन्तु तुम्हारे छोटे भाई अब तक नहीं लौट रहे हैं। मैं ठीक-ठीक यह नहीं समझ पाता हूँ कि उनके न आने का क्या कारण है। कहीं देवर्षि नारद के द्वारा बतलाया हुआ वह समय तो नहीं आ पहुँचा है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अपने लीला-विग्रह का संवरण करना चाहते हैं? उन्हीं भगवान की कृपा से हमें यह सम्पत्ति, राज्य, स्त्री, प्राण, कुल, संतान, शत्रुओं पर विजय और स्वर्गादि लोकों का अधिकार प्राप्त हुआ है।

भीमसेन! तुम तो मनुष्यों में व्याघ्र के समान बलवान् हो; देखो तो सही- आकाश में उल्कापातादि, पृथ्वी में भुकम्पादि और शरीरों में रोगादि कितने भयंकर अपशकुन हो रहे हैं। इनसे इस बात की सूचना मिलती है कि शीघ्र ही हमारी बुद्धि को मोह में डालने वाला कोई उत्पात होने वाला है। प्यारे भीमसेन! मेरी बायीं जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़क रही है। हृदय जोर से धड़क रहा है। अवश्य ही बहुत जल्दी कोई अनिष्ट होने वाला है। देखो, यह सियारिन उदय होते ही सूर्य की ओर मुँह करके रो रही है। अरे! उसके मुँह से तो आग भी निकल रही है। यह कुत्ता बिलकुल निर्भय-सा होकर मेरी ओर देखकर चिल्ला रहा है। भीमसेन! गौ आदि अच्छे पशु मुझे अपने बायें करके जाते हैं और गधे आदि बुरे पशु मुझे अपने दाहिने कर देते हैं। मेरे घोड़े आदि वाहन मुझे रोते हुए दिखायी देते हैं। यह मृत्यु का दूत पेडुखी, उल्लू और उसका प्रतिपक्षी कौआ रात को अपने कर्ण-कठोर शब्दों से मेरे मन को कँपाते हुए विश्व को सूना कर देना चाहते हैं। दिशाएँ धुँधली हो गयी हैं, सूर्य और चन्द्रमा के चारों ओर बार-बार मण्डल बैठते हैं। यह पृथ्वी पहाड़ों के साथ काँप उठती है, बादल बड़े जोर-जोर से गरजते हैं और जहाँ तहाँ बिजली भी गिरती ही रहती है।
क्रमश:

साभार krishnakosh.org

अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 46-59 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 46-59 का हिन्दी अनुवाद

हाथ वालों के बिना हाथ वाले, चार पैर वाले पशुओं के बिना पैर वाले (तृणादि) और उनमें भी बड़े जीवों के छोटे जीव आहार हैं। इस प्रकार एक जीव दूसरे जीव के जीवन का कारण हो रहा है। इन समस्त रूपों में जीवों के बाहर और भीतर वही एक स्वयं प्रकाश भगवान्, जो सम्पूर्ण आत्माओं के आत्मा हैं, माया के द्वारा अनेकों प्रकार से प्रकट हो रहे हैं; तुम केवल उन्हीं को देखो।

महाराज! समस्त प्राणियों को जीवन दान देने वाले वे ही भगवान इस समय इस पृथ्वीतल पर देवद्रोहियों का नाश करने के लिये कालरूप से अवतीर्ण हुए हैं। अब वे देवताओं का कार्य पूरा कर चुके हैं। थोड़ा-सा काम और शेष है, उसी के लिये वे रुके हुए हैं। जब तक वे प्रभु यहाँ हैं, तब तक तुम लोग भी उनकी प्रतीक्षा करते रहो।

धर्मराज! हिमालय के दक्षिण भाग में, जहाँ सप्तर्षियों की प्रसन्नता के लिये गंगाजी ने अलग-अलग सात धाराओं के रूप में अपने को सात भागों में विभक्त कर दिया है, जिसे ‘सप्तस्त्रोत’ कहते हैं, वहीं ऋषियों के आश्रम पर धृतराष्ट्र अपनी पत्नी गान्धारी और विदुर के साथ गये हैं। वहाँ वे त्रिकालस्नान और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं। अब उनके चित्त में किसी प्रकार की कामना नहीं हैं, वे केवल जल पीकर शान्तचित्त से निवास करते हैं। आसन जीतकर प्राणों को वश में करके उन्होंने अपनी छहों इन्द्रियों को विषयों से लौटा लिया है। भगवान की धारणा से उनके तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण के मल नष्ट हो चुके हैं। उन्होंने अहंकार को बुद्धि के साथ जोड़कर और उसे क्षेत्रज आत्मा में लीन करके उसे भी महाकाश में घटाकाश के समान सर्वाधिष्ठान ब्रह्म में एक कर दिया है।

उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियों और मन को रोककर समस्त विषयों को बाहर से ही लौटा दिया है और माया के गुणों से होने वाले परिणामों को सर्वथा मिटा दिया है। समस्त कर्मों का संन्यास करके वे इस समय ठूँठ की तरह स्थिर होकर बैठे हुए हैं, अतः तुम उनके मार्ग में विघ्नरूप मत बनना।

धर्मराज! आज से पाँचवें दिन वे अपने शरीर का परित्याग कर देंगे और वह जलकर भस्म हो जायगा। गार्हपत्यादि अग्नियों के द्वारा पर्णकुटी के साथ अपने पति के मृतदेह को जलते देखकर बाहर खड़ी हुई साध्वी गान्धारी भी पति का अनुगमन करती हुई उसी आग में प्रवेश कर जायेंगी। धर्मराज! विदुर जी अपने भाई का आश्चर्यमय मोक्ष देखकर हर्षित और वियोग देखकर दुःखित होते हुए वहाँ से तीर्थ-सेवन के लिये चले जायेंगे। देवर्षि नारद यों कहकर तुम्बुरु के साथ स्वर्ग को चले गये। धर्मराज युधिष्ठिर ने उनके उपदेशों को हृदय में धारण करके शोक को त्याग दिया।


क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 31-45 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 31-45 का हिन्दी अनुवाद

युधिष्ठिर ने उद्विग्नचित्त होकर वहीं बैठे हुए संजय से पूछा- ‘संजय! मेरे वे वृद्ध और नेत्रहीन पिता धृतराष्ट्र कहाँ हैं? पुत्रशोक से पीड़ित दु:खिया माता गान्धारी और मेरे परम हितैषी चाचा विदुर जी कहाँ चले गये? ताऊजी अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के मारे जाने से दुःखी थे। मैं मन्दबुद्धि हूँ, कहीं मुझसे किसी अपराध की आशंका करके वे माता गान्धारी सहित गंगाजी में तो नहीं कूद पड़े। जब हमारे पिता पाण्डु की मृत्यु हो गयी थी और हम लोग नन्हें-नन्हें बच्चे थे, तब उन्हीं दोनों चाचाओं ने बड़े-बड़े दुःखों से हमें बचाया था। वे हम पर बड़ा ही प्रेम रखते थे। हाय! वे यहाँ से कहाँ चले गये?’

सूत जी कहते हैं- संजय अपने स्वामी धृतराष्ट्र को न पाकर कृपा और स्नेह की विकलता से अत्यन्त पीड़ित और विरहातुर हो रहे थे। वे युधिष्ठिर को कुछ उत्तर न दे सके। फिर धीरे-धीरे बुद्धि के द्वारा उन्होंने अपने चित्त को स्थिर किया, हाथों से आँखों के आसूँ पोंछे और अपने स्वामी धृतराष्ट्र के चरणों का स्मरण करते हुए युधिष्ठिर से कहा।

संजय बोले- कुलनन्दन! मुझे आपने दोनों चाचा और गान्धारी के संकल्प का कुछ भी पता नहीं है। महाबाहो! मुझे तो उन महात्माओं ने ठग लिया। संजय इस प्रकार कह ही रहे थे कि तुम्बुरु के साथ देवर्षि नारद जी वहाँ आ पहुँचे। महाराज युधिष्ठिर ने भाइयों सहित उठकर उन्हें प्रणाम किया और उनका सम्मान करते हुए बोले।

युधिष्ठिर ने कहा- ‘भगवन्! मुझे अपने दोनों चाचाओं का पता नहीं लग रहा है; न जाने वे दोनों और पुत्र-शोक से व्याकुल तपस्विनी माता गान्धारी यहाँ से कहाँ चले गये। भगवन्! अपार समुद्र में कर्णधार के समान आप ही हमारे पारदर्शक हैं।’

तब भगवान के परमभक्त भगवन्मय देवर्षि नारद ने कहा- ‘धर्मराज! तुम किसी के लिये शोक मत करो; क्योंकि यह सारा जगत् ईश्वर के वश में है। सारे लोक और लोकपाल विवश होकर ईश्वर की ही आज्ञा का पालन कर रहे हैं। वही एक प्राणी को दूसरे से मिलाता है और वही उन्हें अलग करता है। जैसे बैल बड़ी रस्सी में बँधे और छोटी रस्सी से रथे रहकर अपने स्वामी का भार ढोते हैं, उसी प्रकार मनुष्य भी वर्णाश्रमादि अनेक प्रकार के नामों से वेदरूप रस्सी में बँधकर ईश्वर की ही आज्ञा का अनुसरण करते हैं। जैसे संसार में खिलाड़ी की इच्छा से ही खिलौनों का संयोग और वियोग होता है, वैसे ही भगवान की इच्छा से मनुष्यों का मिलना-बिछुड़ना होता है। तुम लोगों को जीवरूप से नित्य मानो या देह रूप से अनित्य अथवा जड़ रूप से अनित्य और चेतन रूप से नित्य अथवा शुद्ध ब्रह्मरूप में नित्य-अनित्य कुछ भी न मानो-किसी भी अवस्था में मोहजन्य आसक्ति के अतिरिक्त वे शोक करने योग्य नहीं है। इसलिये धर्मराज! वे दीन-दुःखी चाचा-चाची असहाय अवस्था में मेरे बिना कैसे रहेंगे, इस अज्ञानजन्य मन की विकलता को छोड़ दो। यह पांच भौतिक शरीर काल, कर्म और गुणों के वश में है। अजगर के मुँह में पड़े हुए पुरुष के समान यह पराधीन शरीर दूसरों की रक्षा ही क्या कर सकता है।

क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 17-30 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 17-30 का हिन्दी अनुवाद

इस प्रकार पाण्डव गृहस्थ के काम-धंधों में रम गये और उन्हीं के पीछे एक प्रकार से यह बात भूल गये कि अनजान में ही हमारा जीवन मृत्यु की ओर जा रहा है; अब देखते-देखते उनके सामने वह समय आ पहुँचा, जिसे कोई टाल नहीं सकता। परन्तु विदुर जी ने काल की गति जानकर अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र से कहा- महाराज! देखिये, अब बड़ा भयंकर समय आ गया है, झटपट यहाँ से निकल चलिये। हम सब लोगों के सिर पर वह सर्वसमर्थ काल मँडराने लगा है, जिसके टालने का कहीं भी कोई उपाय नहीं है।

काल के वशीभूत होकर जीव का अपने प्रियतम प्राणों से भी बात-की-बात में वियोग हो जाता है; फिर धन, जन आदि दूसरी वस्तुओं की तो बात ही क्या है। आपके चाचा, ताऊ, भाई, सगे-सम्बन्धी और पुत्र- सभी मारे गये, आपकी उम्र भी ढल चुकी, शरीर बुढ़ापे का शिकार हो गया, आप पराये घर में पड़े हुए हैं।

ओह! इस प्राणी को जीवित रहने की कितनी प्रबल इच्छा होती है। इसी के कारण तो आप भीम का दिया हुआ टुकड़ा खाकर कुत्ते का-सा जीवन बिता रहे हैं। जिनको आपने आग में जलाने की चेष्टा की, विष देकर मार डालना चाहा, भरी सभा में जिनकी विवाहिता पत्नी को अपमानित किया, जिनकी भूमि और धन छीन लिये, उन्हीं के अन्न से पले हुए प्राणों को रखने में क्या गौरव है। आपके अज्ञान की हद हो गयी कि अब भी जीना चाहते हैं। परन्तु आपके चाहने से क्या होगा; पुराने वस्त्र की तरह बुढ़ापे से गला हुआ आपका शरीर आपके न चाहने पर भी क्षीण हुआ जा रहा है। अब इस शरीर से आपका कोई स्वार्थ सधने वाला नहीं है; इसमें फँसिये मत; इसकी ममता का बन्धन काट डालिये। जो संसार के सम्बन्धियों से अलग रहकर उनके अनजान में अपने शरीर का त्याग करता है, वही धीर कहा गया है। चाहे अपनी समझ से हो या दूसरे के समझाने से- जो इस संसार को दुःखरूप समझकर इससे विरक्त हो जाता है और अपने अन्तःकरण को वश में करके हृदय में भगवान को धारणकर संन्यास के लिये घर से निकल पड़ता है, वही उत्तम मनुष्य है। इसके आगे जो समय आने वाला है, वह प्रायः मनुष्यों के गुणों को घटाने वाला होगा; इसलिये आप अपने कुटुम्बियों से छिपकर उत्तराखण्ड में चले जाइये’।

जब छोटे भाई विदुर ने अंधे राजा धृतराष्ट्र को इस प्रकार समझाया, तब उनकी प्रज्ञा के नेत्र खुल गये; वे भाई-बन्धुओं के सुदृढ़ स्नेह-पाशों को काटकर अपने छोटे भाई विदुर के दिखलाये हुए मार्ग से निकल पड़े। जब परम पतिव्रता सुबलनन्दिनी गान्धारी ने देखा कि मेरे पतिदेव तो उस हिमालय की यात्रा कर रहे हैं, जो संन्यासियों को वैसा ही सुख देता है जैसा वीर पुरुषों को लड़ाई के मैदान में अपने शत्रु के द्वारा किये हुए न्यायोचित प्रहार से होता है, तब वे भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

अजातशत्रु युधिष्ठिर ने प्रातःकाल सन्ध्या-वन्दन तथा अग्निहोत्र करके ब्राह्मणों को नमस्कार किया और उन्हें तिल, गौ, भूमि और सुवर्ण का दान दिया। इसके बाद जब वे गुरुजनों की चरण वन्दना के लिये राजमहल में गये, तब उन्हें धृतराष्ट्र, विदुर तथा गान्धारी के दर्शन नहीं हुए।


क्रमश:

साभार krishnakosh.org

शुभासित-25


शुभासित  
1. सच्चे ज्ञान में कोई विकार नहीं होता। यही खूबी ज्ञान की भी है। अगर आपके पास ज्ञान है तो आपका व्यक्तित्व सादगी में भी उतना ही चमकेगा। उसे किसी भी तरह की बनावटी चीजों की आवश्यकता नहीं होगी। अगर कोई विकृति है तो फिर वो ज्ञान नहीं है, कपट है। कपट और ज्ञान में इतना ही अतंर है।

2. जिन्होंने भी जीवन को रहस्यमय बनाया, उनकी मृत्यु भी रहस्यमय रूप से हुई हैं| इसीलिए कहा गया कि जीवन को सरलता से और खुली किताब की भांति जियो।

3. इच्छा और क्रोध से मुक्त हो, जिसका मन और आत्मा में एकात्म भाव आ गया हो, उसे ही शांति सहित आत्म-मुग्धता प्राप्त होती हैं।

4. ध्येय जितना महान होता है, उसका रास्ता उतना ही लम्बा और बीहड़ होता है।

5. पानी की एक बूंद गर्म तवे पर पड़े तो मिट जाती है, कमल के पत्ते पर गिरे तो मोती की तरह चमकने लगती है, सीप में गिर जाये तो खुद ही मोती बन जाती है। बस यह सब संगत का प्रभाव है।"

6. "कर्म" का ही एक ऐसा सुगम मार्ग हैं, जिसमें आदमी धोखा नहीं खाता।

7. कुटिलता पूर्ण कार्य ही एक ऐसा हैं, जिसमें प्रमाण की उपलब्धता असंभव तो नहीं किन्तु दुष्कर अवश्य होती हैं।

8. शांति पसंद व्यक्तियों को, दोषभरी बात यदि यथार्थ है, तब भी नहीं करना चाहिए, जैसे अंधे को अंधा कहना।


9. अपने से श्रेष्ठ या समकक्ष विचारों वाला साथी न मिले, तब बिना मित्र के रहना ही हितकर होता हैं।

10. घमंडी के लिए ईश्वर, ईर्ष्यालु का पड़ोसी और क्रोधी का कोई मित्र, नहीं होता।

11. राजनीति और प्रेम के क्षेत्र में अधिकारों का दुरूपयोग होता ही रहता हैं।

12. भार हल्का हो जाता है, यदि प्रसन्नतापूर्वक उठाया जाए।

13. अच्छे विचारों से मनुष्य का गुप्त मन, उसके वर्तमान जीवन और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करते हैं|

14. न, माता-पिता, न दूसरे रिश्तेदार, आदमी की उतनी भलाई करते हैं, जितनी भलाई सन्मार्ग पर गया हुआ चित्त करता है।


15. सभी समस्याएं आसानी से सुलझाई जा सकती हैं, अगर बस इंसान सोचने और समझने को तैयार हो।

16. हिन्दू विवाह कोई शर्तनामा नहीं बल्कि पवित्र धर्मसंस्कार है, जो त्याग, प्रेम, विश्वाश, स्नेह, प्रीति, अनुराग, मैत्री, करुणा, आदि पवित्र और मधुर भाव की धार्मिक शिला पर आधारित होता हैं।

17. आशाएं ऐसी हो जो मंजिल तक ले जाएँ, मंजिल ऐसी हो जो जीवन जीना सीखा दे। जीवन ऐसा हो जो संबंधों का आदर करे और संबंध ऐसे हो जो यादगार बन जाये।"


18. कोहरे से एक अच्छी बात सीखने को मिलती है कि जब जीवन में रास्ता न दिखाई दे रहा हो तो बहुत दूर तक देखने की कोशिश व्यर्थ हैं। एक एक कदम चलते चलो, रास्ता खुलता जाएगा।"

19. कभी भी दूसरों को कम ना आंके, क्योंकि हम यह नहीं जानते कि वह जीवन में किस तरह की स्तिथि का सामना कर रहे है।


20. जिस का वृतांत सुनकर, जिसको देखकर, जिसका स्मरण करके समस्त प्राणियों को आनंद होता है, उसी का जीवन सार्थक माना गया हैं

21. मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ट व्याख्या हैं।

22. जरूरी नहीं कि सारे सबक किताबों से ही सीखे जाएँ, कुछ सबक जिंदगी और रिस्ते भी सीखा देते हैं।"

23. जीवन को सफल बनाने के लिए विशेष कुछ भी नहीं हैं, बस निरंतर क्रियाशीलता और निष्ठावान होने की जरूरत हैं।

24. सच्चाई से तो बचा जा सकता हैं, किन्तु उसके नतीजों से नहीं बचा जा सकता। उसका सामना तो हर हाल में करना ही पड़ेगा।

25. अपने विचार यदि दूसरे से मेल न खाते हो; तब क्या आप उसे मार डालेंगे? यह तो आतंकवाद या नक्सलवाद का काम हैं। ऐसी हिंसक कार्यवाही का महिमा-मंडन नहीं किया जाना चाहिए।



श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः त्रयोदश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

विदुरजी के उपदेश से धृतराष्ट्र और गान्धारी का वन में जाना.

सूत जी कहते हैं-विदुर जी तीर्थ यात्रा में महर्षि मैत्रेय से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करके हस्तिनापुर लौट आये। उन्हें जो कुछ जानने की इच्छा थी वह पूर्ण हो गयी थी। विदुर जी ने मैत्रेय ऋषि से जितने प्रश्न किये थे, उनका उत्तर सुनने के पहले ही श्रीकृष्ण में अनन्य भक्ति हो जाने के कारण वे उत्तर सुनने से उपराम हो गये।

शौनक जी! अपने चाचा विदुर जी को आया देख धर्मराज युधिष्ठिर, उनके चारों भाई, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य, कुन्ती, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, कृपी तथा पाण्डव परिवार के अन्य सभी नर-नारी और अपने पुत्रों सहित दूसरी स्त्रियाँ- सब-के-सब बड़ी प्रसन्नता से, मानो मृत शरीर में प्राण आ गया हो, ऐसा अनुभव करते हुए उनकी अगवानी के लिये सामने गये। यथायोग्य आलिंगन और प्रणामादि के द्वारा सब उनसे मिले और विरहजनित उत्कण्ठा से कातर होकर सबने प्रेम के आँसू बहाये। युधिष्ठिर ने आसन पर बैठाकर उनका यथोचित सत्कार किया। जब वे भोजन एवं विश्राम करके सुखपूर्वक आसन पर बैठे थे, तब युधिष्ठिर ने विनय से झुककर सबके सामने ही उनसे कहा।

युधिष्ठिर ने कहा- चाचाजी! जैसे पक्षी अपने अंडों को पंखों की छाया के नीचे रखकर उन्हें सेते और बढ़ाते हैं, वैसे ही आपने अत्यन्त वात्सल्य से अपने करकमलों की छत्रछाया में हम लोगों को पाला-पोसा है। बार-बार आपने हमें और हमारी माता को विषदान और लाक्षागृह के दाह आदि विपत्तियों से बचाया है। क्या आप कभी हम लोगों की भी याद करते रहे हैं? आपने पृथ्वी पर विचरण करते समय किस वृत्ति से जीवन-निर्वाह किया? आपने पृथ्वीतल पर किन-किन तीर्थों और मुख्य क्षेत्रों का सेवन किया? प्रभो! आप-जैसे भगवान के प्यारे भक्त स्वयं ही तीर्थ स्वरूप होते हैं। आप लोग अपने हृदय में विराजमान भगवान के द्वारा तीर्थों को भी महातीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं। चाचाजी! आप तीर्थ यात्रा करते हुए द्वारका भी अवश्य ही गये होंगे। वहाँ हमारे सुहृद् एवं भाई-बन्धु यादव लोग, जिनके एकमात्र आराध्यदेव श्रीकृष्ण हैं, अपनी नगरी में सुख से तो हैं न? आपने यदि जाकर देखा नहीं होगा तो सुना तो अवश्य ही होगा।

युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर विदुर जी ने तीर्थों और यदुवंशियों के सम्बन्ध में जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया था, सब क्रम से बतला दिया, केवल यदुवंश के विनाश की बात नहीं कही। करुण हृदय विदुर जी पाण्डवों को दुःखी नहीं देख सकते थे। इसलिये उन्होंने यह अप्रिय एवं असह्य घटना पाण्डवों को नहीं सुनायी; क्योंकि वह तो स्वयं ही प्रकट होने वाली थी। पाण्डव विदुर जी का देवता के समान सेवा-सत्कार करते थे। वे कुछ दिनों तक अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र की कल्याण कामना से सब लोगों को प्रसन्न करते हुए सुखपूर्वक हस्तिनापुर में ही रहे।

विदुर जी तो साक्षात् धर्मराज थे, माण्डव्य ऋषि के शाप से ये सौ वर्ष के लिये शूद्र बन गये थे। इतने दिनों तक यमराज के पद पर अर्यमा थे और वही पापियों को उचित दण्ड देते थे। राज्य प्राप्त हो जाने पर अपने लोकपालों-सरीखे भाइयों के साथ राजा युधिष्ठिर वंशधर परीक्षित को देखकर अपनी अतुल सम्पत्ति से आनन्दित रहने लगे।
क्रमश:

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः द्वादश अध्यायः श्लोक 15-36 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः द्वादश अध्यायः श्लोक 15-36 का हिन्दी अनुवाद

ब्राह्मणों ने सन्तुष्ट होकर अत्यन्त विनयी युधिष्ठिर से कहा- ‘पुरुवंशशिरोमणे! काल की दुर्निवार गति से यह पवित्र पुरुवंश मिटना ही चाहता था, परन्तु तुम लोगों पर कृपा करने के लिये भगवान विष्णु ने यह बालक देकर इसकी रक्षा कर दी। इसीलिये इसका नाम 'विष्णुरात' होगा। निस्सन्देह यह बालक संसार में बड़ा यशस्वी, भगवान का परम भक्त और महापुरुष होगा’। युधिष्ठिर ने कहा- महात्माओं! यह बालक क्या अपने उज्ज्वल यश से हमारे वंश के पवित्र कीर्ति महात्मा राजर्षियों का अनुसरण करेगा? ब्राह्मणों ने कहा- धर्मराज! यह मनुपुत्र इक्ष्वाकु के समान अपनी प्रजा का पालन करेगा तथा दशरथनन्दन भगवान श्रीराम के समान ब्राह्मणभक्त और सत्य प्रतिज्ञ होगा। यह उशीनर-नरेश शिबि के समान दाता और शरणागतवत्सल होगा तथा याज्ञिकों में दुष्यन्त के पुत्र भरत के समान अपने वंश का यश फैलायेगा। धनुर्धरों में यह सहस्राबाहु अर्जुन और अपने दादा पार्थ के समान अग्रगण्य होगा। यह अग्नि के समान दुर्धर्ष और समुद्र के समान दुस्तर होगा। यह सिंह के समान पराक्रमी, हिमाचल की तरह आश्रय लेने योग्य, पृथ्वी के सदृश तितिक्षु और माता-पिता के समान सहनशील होगा। इसमें पितामह ब्रह्मा के समान समता रहेगी, भगवान शंकर की तरह यह कृपालु होगा और सम्पूर्ण प्राणियों को आश्रय देने में यह लक्ष्मीपति भगवान विष्णु के समान होगा। यह समस्त सद्गुणों की महिमा धारण करने में श्रीकृष्ण का अनुयायी होगा, रन्तिदेव के समान उदार होगा और ययाति के समान धार्मिक होगा। धैर्य में बलि के समान और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति दृढ़ निष्ठा में यह प्रह्लाद के समान होगा। यह बहुत से अश्वमेध यज्ञों का करने वाला और वृद्धों का सेवक होगा। इसके पुत्र राजर्षि होंगे। मर्यादा का उल्लंघन करने वालों को यह दण्ड देगा। यह पृथ्वी माता और धर्म की रक्षा के लिये कलियुग का भी दमन करेगा। ब्राह्मण कुमार के शाप से तक्षक के द्वारा अपनी मृत्यु सुनकर यह सबकी आसक्ति छोड़ देगा और भगवान के चरणों की शरण लेगा। राजन्! व्यासनन्दन शुकदेव जी से यह आत्मा के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करेगा और अन्त में गंगा तट पर अपने शरीर को त्यागकर निश्चय ही अभयपद प्राप्त करेगा।

ज्यौतिषशास्त्र के विशेषज्ञ ब्राह्मण राजा युधिष्ठिर को इस प्रकार बालक के जन्म लग्न का फल बताकर और भेंट-पूजा लेकर अपने-अपने घर चले गये। वही यह बालक संसार में परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ; क्योंकि वह समर्थ बालक गर्भ में जिस पुरुष का दर्शन पा चुका था, उसका स्मरण करता हुआ लोगों में उसी की परीक्षा करता रहता था कि देखें इनमें से कौन-सा वह है। जैसे शुक्ल पक्ष में दिन-प्रतिदिन चन्द्रमा अपनी कलाओं से पूर्ण होता हुआ बढ़ता है, वैसे ही वह राजकुमार भी अपने गुरुजनों के लालन-पालन से क्रमशः अनुदिन बढ़ता हुआ शीघ्र ही सयाना हो गया। इसी समय स्वजनों के वध का प्रायश्चित् करने के लिये राजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ के द्वारा भगवान की आराधना करने का विचार किया, परन्तु प्रजा से वसूल किये हुए कर और दण्ड (जुर्माने) की रकम के अतिरिक्त और धन न होने के कारण वे बड़ी चिन्ता में पड़ गये।

उनका अभिप्राय समझकर भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उनके भाई उत्तर दिशा में राजा मरुत्त और ब्राह्मणों द्वारा छोड़ा हुआ, बहुत-सा धन ले आये।

उससे यज्ञ की सामग्री एकत्र करके धर्मभीरु महाराज युधिष्ठिर ने तीन अश्वमेध यज्ञों के द्वारा भगवान की पूजा की। युधिष्ठिर के निमन्त्रण से पधारे हुए भगवान ब्राह्मणों द्वारा उनका यज्ञ सम्पन्न कराकर अपने सुहृद् पाण्डवों की प्रसन्नता के लिये कई महीनों तक वहीं रहे।

शौनक जी! इसके बाद भाइयों सहित राजा युधिष्ठिर और द्रौपदी से अनुमति लेकर अर्जुन के साथ यदुवंशियों से घिरे हुए भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका के लिये प्रस्थान किया।

क्रमश:

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः द्वादश अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः द्वादश अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद

परीक्षित का जन्म.

शौनक जी! ने कहा- अश्वत्थामा ने जो अत्यन्त तेजस्वी ब्रह्मास्त्र चलाया था, उससे उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया था; परन्तु भगवान ने उसे पुनः जीवित कर दिया। उस गर्भ से पैदा हुए महाज्ञानी महात्मा परीक्षित के, जिन्हें शुकदेव जी ने ज्ञानोपदेश दिया था, जन्म, कर्म, मृत्यु और उसके बाद जो गति उन्हें प्राप्त हुई, वह सब यदि आप ठीक समझें तो कहें; हम लोग बड़ी श्रद्धा के साथ सुनना चाहते हैं।

सूत जी ने कहा- धर्मराज युधिष्ठिर अपनी प्रजा को प्रसन्न रखते हुए पिता के समान उसका पालन करने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों के सेवन से वे समस्त भोगों से निःस्पृह हो गये थे। शौनकादि ऋषियों!

उनके पास अतुल सम्पत्ति थी, उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे तथा उनके फलस्वरूप श्रेष्ठ लोकों का अधिकार प्राप्त किया था। उनकी रानियाँ और भाई अनुकूल थे, सारी पृथ्वी उनकी थी, वे जम्बूद्वीप के स्वामी थे और उनकी कीर्ति स्वर्ग तक फैली हुई थी। उनके पास भोग की ऐसी सामग्री थी, जिसके लिये देवता लोग भी लालायित रहते हैं। परन्तु जैसे भूखे मनुष्य को भोजन के अतिरिक्त दूसरे पदार्थ नहीं सुहाते, वैसे ही उन्हें भगवान के सिवा दूसरी कोई वस्तु सुख नहीं देती थी। शौनक जी!

उत्तरा के गर्भ में स्थित वह वीर शिशु परीक्षित जब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगा, तब उसने देखा कि उसकी आँखों के सामने एक ज्योतिर्मय पुरुष है। वह देखने में तो अँगूठे भर का है, परन्तु उसका स्वरूप बहुत ही निर्मल है। अत्यन्त सुन्दर श्याम शरीर है, बिजली के समान चमकता हुआ पीताम्बर धारण किये हुए है, सिर पर सोने का मुकुट झिलमिला रहा है। उस निर्विकार पुरुष के बड़ी ही सुन्दर लम्बी-लम्बी चार भुजाएँ हैं। कानों में तपाये हुए स्वर्ण के सुन्दर कुण्डल है, आँखों में लालिमा है, हाथ में लूके के समान जलती हुई गदा लेकर उसे बार-बार घुमाता जा रहा है और स्वयं शिशु के चारों ओर घूम रहा है। जैसे सूर्य अपनी किरणों से कुहरे को भगा देते हैं, वैसे ही वह उस गदा के द्वारा ब्रह्मास्त्र के तेज को शान्त करता जा रहा था। उस पुरुष को अपने समीप देखकर वह गर्भस्थ शिशु सोचने लगा कि यह कौन है। इस प्रकार उस दस मास के गर्भस्थ शिशु के सामने ही धर्म रक्षक अप्रमेय भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्मास्त्र के तेज को शान्त करे वहीं अन्तर्धान हो गये।

तदनन्तर अनुकूल ग्रहों के उदय से युक्त समस्त सद्गुणों को विकसित करने वाले शुभ समय में पाण्डु के वंशधर परीक्षित का जन्म हुआ। जन्म के समय ही वह बालक इतना तेजस्वी दीख पड़ता था, मानो स्वयं पाण्डु ने ही फिर से जन्म लिया हो। पौत्र के जन्म की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर मन में बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने धौम्य, कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगलवाचन और जातकर्म-संस्कार करवाये।

महाराज युधिष्ठिर दान के योग्य समय को जानते थे। उन्होंने प्रजातीर्थ नामक काल में अर्थात् नाल काटने के पहले ही ब्राह्मणों को सुवर्ण, गौएँ, पृथ्वी, गाँव, उत्तम जाति के हाथी-घोड़े और उत्तम अन्न का दान दिया।

क्रमश:

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः एकादश अध्यायः श्लोक 30-39 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः एकादश अध्यायः श्लोक 30-39 का हिन्दी अनुवाद

माताओं से आज्ञा लेकर वे अपने समस्त भोग-सामग्रियों से सम्पन्न सर्वश्रेष्ठ भवन में गये। उसमें सोलह हजार पत्नियों के अलग-अलग महल थे। अपने प्राणनाथ भगवान श्रीकृष्ण को बहुत दिन बाहर रहने के बाद घर आया देखकर रानियों के हृदय में बड़ा आनन्द हुआ। उन्हें अपने निकट देखकर वे एकाएक ध्यान छोड़कर उठ खड़ी हुई; उन्होंने केवल आसन को ही नहीं; बल्कि उन नियमों को भी त्याग दिया, जिन्हें उन्होंने पति के प्रवासी होने पर ग्रहण किया था। उस समय उनके मुख और नेत्रों में लज्जा छा गयी।

भगवान के प्रति उनका भाव बड़ा ही गम्भीर था। उन्होंने पहले मन-ही-मन, फिर नेत्रों के द्वारा और तत्पश्चात् पुत्रों के बहाने शरीर से उनका आलिंगन किया। शौनक जी! उस समय उनके नेत्रों में जो प्रेम के आँसू छलक आये थे, उन्हें संकोंचवश उन्होंने बहुत रोका। फिर भी विवशता के कारण वे ढलक ही गये।

यद्यपि भगवान श्रीकृष्ण एकान्त में सर्वदा ही उनके पास रहते थे, तथापि उनके चरण-कमल उन्हें पद-पद पर नये-नये जान पड़ते। भला, स्वभाव से ही चंचल लक्ष्मी जिन्हें एक क्षण के लिये भी कभी नहीं छोड़तीं, उनकी सनिधि से किस स्त्री की तृप्ति हो सकती है। जैस वायु बाँसों के संघर्ष से दावानल पैदा करके उन्हें जला देता है, वैसे ही पृथ्वी के भारभूत और शक्तिशाली राजाओं में परस्पर फूट डालकर बिना शस्त्र ग्रहण किये ही भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें कई अक्षौहिणी सेना सहित एक-दूसरे से मरवा डाला और उसके बाद आप भी उपराम हो गये।

साक्षात् परमेश्वर ही अपनी लीला से इस मनुष्य लोक में अवतीर्ण हुए थे और सहस्रों रमणी-रत्नों में रहकर उन्होंने साधारण मनुष्य की तरह क्रीड़ा की। जिनकी निर्मल और मधुर हँसी उनके हृदय के उन्मुक्त भावों को सूचित करने वाली थी, जिनकी लजीली चितवन की चोट से बेसुध होकर विश्वविजयी कामदेव ने भी अपने धनुष का परित्याग कर दिया था- वे कमनीये कामिनियाँ अपने काम-विलासों से जिनके मन में तनिक भी क्षोभ नहीं पैदा कर सकीं, उन असंग भगवान श्रीकृष्ण को संसार के लोग अपने ही समान कर्म करते देखकर आसक्त मनुष्य समझते हैं- यह उनकी मूर्खता है। यही तो भगवान की भगवत्ता है कि वे प्रकृति में स्थित होकर भी उसके गुणों से कभी लिप्त नहीं होते, जैसे भगवान की शरणागत बुद्धि अपने में रहने वाले प्राकृत गुणों से लिप्त नहीं होती। वे मूढ़ स्त्रियाँ भी श्रीकृष्ण को अपना एकान्तसेवी, स्त्रीपरायण भक्त ही समझ बैठी थीं; क्योंकि वे अपने स्वामी के ऐश्वर्य को नहीं जानती थीं- ठीक वैसे ही जैसे अहंकार की वृत्तियाँ ईश्वर को अपने धर्म से युक्त मानती हैं।

क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः एकादश अध्यायः श्लोक 15-29 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः एकादश अध्यायः श्लोक 15-29 का हिन्दी अनुवाद

घरों के प्रत्येक द्वार पर दही, अक्षत, फल, ईख, जल से भरे हुए कलश, उपहार की वस्तुएँ और धूप-दीप आदि सजा दिये गये थे। उदारशिरोमणि वसुदेव, अक्रूर, उग्रसेन, अद्भुत पराक्रमी बलराम, प्रद्युम्न, चारुदेष्ण और जाम्बन्तीनन्दन साम्ब ने जब यह सुना कि हमारे प्रियतम भगवान श्रीकृष्ण आ रहे हैं, तब उनके मन में इतना आनन्द उमड़ा कि उन लोगों ने अपने सभी आवश्यक कार्य- सोना, बैठना और भोजन आदि छोड़ दिये।

प्रेम के आवेग से उनका हृदय उछलने लगा। वे मंगलशकुन के लिये एक गजराज को आगे करके स्वस्तयन पाठ करते हुए और मांगलिक सामग्रियों से सुसज्जित ब्राह्मणों को साथ लेकर चले। शंख और तुरही आदि बाजे बजने लगे और देवध्वनि होने लगी।

वे सब हर्षित होकर रथों पर सवार हुए और बड़ी आदर बुद्धि से भगवान की अगवानी करने चले। साथ ही भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के लिये उत्सुक सैकड़ों श्रेष्ठ वारांगनाएँ, जिनके मुख कपोलों पर चमचमाते हुए कुण्डलों की कान्ति पड़ने से बड़े सुन्दर दीखते थे, पालकियों पर चढ़कर भगवान की अगवानी के लिये चलीं। बहुत-से नट, नाचने वाले, गाने वाले, विरद बखानने वाले सूत, मागध और वंदीजन भगवान श्रीकृष्ण के अद्भुत चरित्रों का गायन करते हुए चले।

भगवान श्रीकृष्ण ने बन्धु-बान्धवों, नागरिकों और सेवकों से उनकी योग्यता के अनुसार अलग-अलग मिलकर सबका सम्मान किया। किसी को सिर झुकाकर प्रणाम किया, किसी को वाणी से अभिवादन किया, किसी को हृदय से लगाया, किसी से हाथ मिलाया, किसी की ओर देखकर मुसकुरा भर दिया और किसी को केवल प्रेमभरी दृष्टि से देख दिया। जिसकी जो इच्छा थी, उसे वही वरदान दिया।

इस प्रकार चाण्डालपर्यन्त सबको संतुष्ट करके गुरुजन, सपत्नीक ब्राह्मण और वृद्धों का तथा दूसरे लोगों का भी आशीर्वाद ग्रहण करते एवं वंदीजनों से विरुदावली सुनते हुए सबके साथ भगवान श्रीकृष्ण ने नगर में प्रवेश किया। शौनक जी!

जिस समय भगवान राजमार्ग से जा रहे थे, उस समय द्वारका की कुल-कामिनियाँ भगवान के दर्शन को ही परमानन्द मानकर अपनी-अपनी अटारियों पर चढ़ गयीं। भगवान का वक्षःस्थल मूर्तिमान् सौन्दर्य लक्ष्मी का निवास स्थान है। उनका मुखाविन्द नेत्रों के द्वारा पान करने के लिये सौन्दर्य-सुधा से भरा हुआ पात्र है। उनकी भुजाएँ लोकपालों को भी शक्ति देने वाली हैं। उनके चरणकमल भक्त परमहंसों के आश्रय हैं। उनके अंग-अंग शोभा के धाम हैं। भगवान की इस छवि को द्वारकवासी नित्य-निरन्तर निहारते रहते हैं, फिर भी उनकी आँखें एक क्षण के लिये भी तृप्त नहीं होतीं।

द्वारका के राजपथ पर भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर श्वेतवर्ण का छत्र तना हुआ था, श्वेत चँवर डुलाये जा रहे थे, चारों ओर से पुष्पों की वर्षा हो रही थी, वे पीताम्बर और वनमाला धारण किये हुए थे। इस समय वे ऐसे शोभायमान हुए, मानो श्याम मेघ एक ही साथ सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्रधनुष और बिजली से शोभायमान हो।

भगवान सबसे पहले अपने माता-पिता के महल में गये। वहाँ उन्होंने बड़े आनन्द से देवकी आदि सातों माताओं को चरणों पर सिर रखकर प्रणाम किया और माताओं ने उन्हें अपने हृदय से लगाकर गोद में बैठा लिया। स्नेह के कारण उनके स्तनों से दूध की धारा बहने लगी, उनका हृदय हर्ष से विह्वल हो गया और वे आनन्द के आँसुओं से उनका अभिषेक करने लगीं।

क्रमश:

साभार krishnakosh.org

गजेन्द्र-स्तुति.

गजेन्द्र-स्तुति.

जिसके ऊपर बहुत भारी आर्थिक संकट आ गया है, जो कर्जे में डूबा हुआ है, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है, उसके लिये एक अचूक उपाय है- “गजेन्द्र-स्तुति”। मैंने भाईजी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार द्वारा लिखित एक संस्मरण पढ़ा था, जो महामना मदनमोहन मालवीयजी से सम्बंधित है।

महामना के एक पुत्र बड़े अर्थसंकट (पैसे की कमी) में थे। उनको महामना ने तार में लिखा- “तुम आर्त होकर विश्वास से गजेन्द्र-स्तुति का पाठ करो, इससे तुम्हारा संकट दूर हो जायेगा”। फिर एक पत्र में उनको लिखा- “भगवान पर विश्वास रखो, धैर्य मत छोडो और गजेन्द्र-स्तुति का आर्त भाव से विश्वास पूर्वक पाठ करो। मैं एक बार नाक तक कर्ज़ में डूब गया था, गजेन्द्र-स्तुति के पाठ से मैं ऋणमुक्त हो गया था, तुम भी इसका आश्रय लो”।

श्रीमद्भागवत के अष्टम स्कन्ध का तीसरा अध्याय में यह स्तुति है। इसे मैं नीचे दे रहा हूँ-


श्रीमद्भागवतान्तर्गत
गजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन


श्री शुक उवाच – श्री शुकदेव जी ने कहा-


एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि ।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम ॥१॥
अर्थ ... बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदय देश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्व जन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्र का मन ही मन पाठ करने लगा ॥१॥


गजेन्द्र उवाच गजराज ने (मन ही मन) कहा -

ऊं नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम ।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥२॥
अर्थ ... जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतना को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन बन जाते हैं (चेतन की भांति व्यवहार करने लगते हैं), ‘ओम’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सम्पूर्ण शरीर में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन ही मन नमन करते हैं ॥२॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं ।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम ॥३॥
अर्थ ... जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे यह निकला है , जिन्होने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं – फिर भी जो इस दृश्य जगत से एवं इसकी कारणभूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण ) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने आप – बिना किसी कारण के – बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूं॥३॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं
क्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम ।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षते
स आत्ममूलोवतु मां परात्परः ॥४॥
अर्थ ... अपने संकल्प शक्ति के द्वार अपने ही स्वरूप में रचे हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र प्रसिद्ध कार्य कारण रूप जगत को जो अकुण्ठित दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं उनसे लिप्त नही होते, वे चक्षु आदि प्रकाशकों के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥४॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशो
लोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु ।
तमस्तदाsssसीद गहनं गभीरं
यस्तस्य पारेsभिविराजते विभुः ॥५॥
अर्थ ... समय के प्रवाह से सम्पूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादि लोकपालों के पंचभूत में प्रवेश कर जाने पर तथा पंचभूतों से लेकर महत्वपर्यंत सम्पूर्ण कारणों के उनकी परमकरुणारूप प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्ज्ञेय तथा अपार अंधकाररूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अंधकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान सब ओर प्रकाशित रहते हैं वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥५॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु-
र्जन्तुः पुनः कोsर्हति गन्तुमीरितुम ।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो
दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥६॥
अर्थ ... भिन्न भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नही जान पाते , उसी प्रकार सत्त्व प्रधान देवता तथा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नही जानते , फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है–वे दुर्गम चरित्र वाले प्रभु मेरी रक्षा करें॥६॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलम
विमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः ।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने
भूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः ॥७॥
अर्थ ... आसक्ति से सर्वदा छूटे हुए , सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले , सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु स्वभाव मुनिगण जिनके परम मंगलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रह कर अखण्ड ब्रह्मचार्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते हैं , वे प्रभु ही मेरी गति हैं ॥७॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वा
न नाम रूपे गुणदोष एव वा ।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यः
स्वमायया तान्युलाकमृच्छति ॥८॥
अर्थ ... जिनका हमारी तरह कर्मवश ना तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी समयानुसार जगत की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वेच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥८॥
तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेsनन्तशक्तये ।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे ॥९॥
अर्थ ... उन अन्नतशक्ति संपन्न परं ब्रह्म परमेश्वर को नमस्कार है । उन प्राकृत आकाररहित एवं अनेको आकारवाले अद्भुतकर्मा भगवान को बारंबार नमस्कार है ॥९॥


नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने ।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥१०॥
अर्थ ... स्वयं प्रकाश एवं सबके साक्षी परमात्मा को नमस्कार है । उन प्रभु को जो नम, वाणी एवं चित्तवृत्तियों से भी सर्वथा परे हैं, बार बार नमस्कार है ॥१०॥


सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता ।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥११॥
अर्थ ... विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुणविशिष्ट निवृत्तिधर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष सुख की अनुभूति रूप प्रभु को नमस्कार है ॥११॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे ।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥१२॥
अर्थ ... सत्त्वगुण को स्वीकार करके शान्त , रजोगुण को स्वीकर करके घोर एवं तमोगुण को स्वीकार करके मूढ से प्रतीत होने वाले, भेद रहित, अतएव सदा समभाव से स्थित ज्ञानघन प्रभु को नमस्कार है ॥१२॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे ।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः ॥१३॥
अर्थ ... शरीर इन्द्रीय आदि के समुदाय रूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षी रूप आपको नमस्कार है । सबके अन्तर्यामी , प्रकृति के भी परम कारण, किन्तु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥१३॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे ।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः ॥१४॥
अर्थ ... सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, समस्त प्रतीतियों के कारण रूप, सम्पूर्ण जड-प्रपंच एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥१४॥

नमो नमस्ते खिल कारणाय
निष्कारणायद्भुत कारणाय ।
सर्वागमान्मायमहार्णवाय
नमोपवर्गाय परायणाय ॥१५॥
अर्थ ... सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण, अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है । सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य , मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को नमस्कार है ॥१५॥ ॥
गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपाय
तत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय ।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-
स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि ॥१६॥
अर्थ ... जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानरूप अग्नि हैं, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य वृत्ति जागृत हो उठती है तथा आत्म तत्त्व की भावना के द्वारा विधि निषेध रूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित हो रहे हैं उन प्रभु को मैं नमस्कार करता हूँ ॥१।६॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय
मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोsलयाय ।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत-
प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥१७॥
अर्थ ... मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीवों की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्याधिक दयालू एवं दया करने में कभी आलस्य ना करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है । अपने अंश से संपूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्व नियन्ता अनन्त परमात्मा आप को नमस्कार है ॥१७॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै-
र्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय ।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय
ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥१८॥
अर्थ ... शरीर, पुत्र, मित्र, घर, संपंत्ती एवं कुटुंबियों में आसक्त लोगों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप , सर्वसमर्थ भगवान को नमस्कार है ॥१८॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा
भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति ।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं
करोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम ॥१९॥
अर्थ ... जिन्हे धर्म, अभिलाषित भोग, धन तथा मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं अपितु जो उन्हे अन्य प्रकार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्ती से सदा के लिये उबार लें ॥१९॥
एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थ
वांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः ।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलं
गायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः ॥२०॥
अर्थ ... जिनके अनन्य भक्त -जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान के ही शरण है-धर्म , अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नही चाह्ते, अपितु उन्ही के परम मंगलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥२०॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-
मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम ।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-
मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥२१॥
अर्थ ... उन अविनाशी, सर्वव्यापक, सर्वश्रेष्ठ, ब्रह्मादि के भी नियामक, अभक्तों के लिये प्रकट होने पर भी भक्तियोग द्वारा प्राप्त करने योग्य, अत्यन्त निकट होने पर भी माया के आवरण के कारण अत्यन्त दूर प्रतीत होने वाले , इन्द्रियों के द्वारा अगम्य तथा अत्यन्त दुर्विज्ञेय, अन्तरहित किंतु सबके आदिकारण एवं सब ओर से परिपूर्ण उन भगवान की मैं स्तुति करता हूँ ॥२१॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः ।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥२२॥
अर्थ ... ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा संपूर्ण चराचर जीव नाम और आकृति भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥२२॥


यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयो
निर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः ।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहो
बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥२३॥
अर्थ ... जिस प्रकार प्रज्ज्वलित अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार बार निकलती है और पुनः अपने कारण मे लीन हो जाती है उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीरयह गुणमय प्रपंच जिन स्वयंप्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्ही में लीन हो जात है ॥२३॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंग
न स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः ।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासन
निषेधशेषो जयतादशेषः ॥२४॥

अर्थ ... वे भगवान न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य हैं न तिर्यक (मनुष्य से नीची पशु, पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी है। न वे स्त्री हैं न पुरुष और नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश हो सके । न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जाने पर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है। ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिये आविर्भूत हों॥२४॥
जिजीविषे नाहमिहामुया कि-
मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या ।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव-
स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम ॥२५॥
अर्थ ... मैं इस ग्राह के चंगुल से छूट कर जीवित नही रहना चाहता; क्यों बाहर सब ओर से अज्ञान से ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है । मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका कालक्रम से अपने आप नाश नही होता , अपितु भगवान की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है॥२५॥

सोsहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम ।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम ॥२६॥
अर्थ ... इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मैं विश्व के रचियता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मरूप से व्याप्त , अजन्मा, सर्वव्यापक एवं प्राप्त्य वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्री भगवान को केवल प्रणाम ही करता हूं, उनकी शरण में हूँ ॥२६॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते ।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोsस्म्यहम ॥२७॥
अर्थ ... जिन्होने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे योगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हे प्रकट हुआ देखते हैं उन योगेश्वर भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ ॥२७॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-
शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय ।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये
कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥२८॥
अर्थ ... जिनकी त्रिगुणात्मक (सत्त्व-रज-तमरूप ) शक्तियों का रागरूप वेग असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे हैं, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची पची रहती हैं-ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असंभव है, उन शरणागतरक्षक एवं अपारशक्तिशाली आपको बार बार नमस्कार है ॥२८॥

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम ।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोsस्म्यहम ॥२९॥
अर्थ ... जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढंके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नही पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान की मैं शरण आया हूँ ॥२९॥


श्री शुकदेव उवाच  श्री शुकदेवजी ने कहा -

एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं
ब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः ।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वात
तत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत ॥३०॥
अर्थ ... जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान के भेदरहित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था , उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नही आये, जो भिन्न भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब सक्षात श्री हरि- जो सबके आत्मा होने के कारण सर्वदेवस्वरूप हैं-वहाँ प्रकट हो गये ॥३०॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासः
स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि : ।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान -
श्चक्रायुधोsभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥३१॥
अर्थ ... उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुःखी देख कर तथा उसके द्वारा पढी हुई स्तुति को सुन कर सुदर्शनचक्रधारी जगदाधार भगवान इच्छानुरूप वेग वाले गरुड जी की पीठ पर सवार होकर स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थान अपर पहुँच गये जहाँ वह हाथी था ।
सोsन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो
दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम ।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छा -
न्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते ॥३२॥
अर्थ ... सरोवर के भीतर महाबली ग्राह के द्वारा पकडे जाकर दुःखी हुए उस हाथी ने आकाश में गरुड की पीठ पर सवार चक्र उठाये हुए भगवान श्री हरि को देखकर अपनी सूँड को -जिसमें उसने (पूजा के लिये) कमल का एक फूल ले रक्खा था-ऊपर उठाया और बडी ही कठिनाई से “सर्वपूज्य भगवान नारायण आपको प्रणाम है” यह वाक्य कहा ॥३२॥
तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य
सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार ।
ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं
सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम ॥३३॥
अर्थ ... उसे पीडित देख कर अजन्मा श्री हरि एकाएक गरुड को छोडकर नीचे झील पर उतर आये । वे दया से प्रेरित हो ग्राहसहित उस गजराज को तत्काल झील से बाहर निकाल लाये और देवताओं के देखते देखते चक्र से मुँह चीर कर उसके चंगुल से हाथी को उबार लिया ॥३३॥