अन्तरिक्ष में भारत की तीसरी आँख.


अन्तरिक्ष में भारत की तीसरी आँख.

भारत ने 11 दिसंबर,2019 को अपना सर्विलांस सैटेलाइट लॉन्च किया है. ये पिछले 15 दिनों में लॉन्च किया गया दूसरा सर्विलांस सैटेलाइट है. अंतरिक्ष में चक्कर लगाते हुए, ये हमारे दुश्मनों की जासूसी भी कर सकता है. आप इसे अन्तरिक्ष में हमारा सबसे शानदार और सटीक जासूस भी कह सकते हैं. PSLV-C48 रॉकेट ने देश में बने (रिसैट) RISAT-2BR 1 सैटेलाइट के साथ 4 देशों के 9 Satellites को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया है. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से बुधवार को दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर ये Satellites लॉन्च किए गए. और सिर्फ 21 मिनट में सभी 10 उपग्रह अंतरिक्ष में अपनी कक्षा में पहुंच गए.

1. ये प्रक्षेपण ISRO के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह PSLV रॉकेट की 50वीं उड़ान है. लेकिन इसमें सबसे बड़ी खबर ये है कि देश को दुश्मनों के बारे में जानने के लिए एक और महत्वपूर्ण तकनीक मिल गई है. RISAT-2BR 1 एक Radar Imaging, Earth Observation Satellite है. इसका मतलब ये है कि इस उपग्रह में Radar की मदद से पृथ्वी की तस्वीरें लेने की क्षमता है.

2. 628 किलोग्राम वजन वाले इस स्वदेशी Satellite को पृथ्वी की कक्षा में 576 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया है. अगले 5 वर्षों तक ये काम करता रहेगा. इस उपग्रह में X-band Synthetic Aperture Radar सिस्टम मौजूद है. जो रात, बादल वाले मौसम और आंधी-तूफान जैसे हालात में भी पृथ्वी की सटीक तस्वीरें ले सकता है. अंधेरे में भी दिन की तरह काम करना इसकी एक बड़ी क्षमता है. क्योंकि अक्सर पाकिस्तान रात के अंधेरे और मौसम का फायदा उठाकर हमारी सीमा में घुसपैठ करता है.

3. इस Satellite में तस्वीरें लेने का काम कैमरा नहीं बल्कि Radar करता है. तस्वीर लेने के लिए Radar से निकली Radio Waves पृथ्वी पर मौजूद वस्तुओं से टकराकर वापस जाती हैं. और उन Radio Waves की मदद से साफ सुथरी high-resolution की तस्वीरें बनती है. इस Radar से दुश्मन के इलाके में यदि कोई बंकर या हथियार मौजूद होगा तो उसकी पूरी खबर मिलेगी और इससे बचना लगभग नामुमकिन होगा. यानी तस्वीर लेने का काम Radar करेगा.

4. ये Radar पृथ्वी पर मौजूद 1 फीट के आकार की किसी भी वस्तु की 3-D तस्वीरें ले सकता है. यानी अगर जमीन पर एक पानी की बोतल भी रखी होगी तो 576 किलोमीटर की ऊंचाई से उसका पता चल जाएगा. इसकी 3-D तस्वीरें कुछ वैसी ही होंगी जैसा आप अपने मोबाइल फोन पर Google Maps में देखते हैं.

5. खास बात ये भी है कि ये उपग्रह भारतीय उपमहाद्वीप पर नजर रखेगा यानी चीन और पाकिस्तान से लगी सीमा पर इसकी नजर होगी. इसके साथ ही ये समंदर पर भी नजर रख पाएगा. अब आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि अगर ये Satellite एक फीट की वस्तुओं की तस्वीर ले सकता है तो समुद्र में चल रहे हजारों फीट बड़े जहाजों की तस्वीर लेना इसके लिए कितना आसान काम होगा. ये उपग्रह सिर्फ 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाएगा यानी एक दिन में कई बार पृथ्वी पर मौजूद किसी लक्ष्य की तस्वीरें ली जा सकेंगी.

6. इस Satellite और इसके विशेष Radar का निर्माण वैज्ञानिकों ने देश में ही किया है. इस खबर के बारे में अतिरिक्त जानकारी के लिए हमने अंतरिक्ष वैज्ञानिकों से बात की है. जो आपको इस Satellite की सबसे बड़ी खासियत आसान भाषा में समझाएंगे. इस मिशन में देश की सुरक्षा के साथ विदेशी Satellites लॉन्च करके देश के लिए कमाई भी की गई है.

7. RISAT-2BR 1 के साथ America के 6 उपग्रह यथा इजरायल, इटली और जापान का एक-एक Satellite भी भेजा गया है. लॉन्च किए गए इजरायल के उपग्रह को छात्रों ने बनाया है. इजरायल के इस एजुकेशनल सैटेलाइट का वजन सिर्फ 2 किलोग्राम है. ये उपग्रह वायु और जल प्रदूषण पर रिसर्च करेगा और इसका कैमरा धरती की तस्वीरें लेगा.

8. भारत और इज़रायल की दोस्ती जमीन से अंतरिक्ष तक कायम है. RISAT सीरीज के Surveillance Satellites का निर्माण अप्रैल 2009 में इज़रायल की मदद से किया गया था. वर्ष 2008 में मुंबई आतंकी हमले के बाद दुश्मनों पर नजर रखने के लिए इसे लॉन्च किया गया था.

9. इस सीरीज का चौथा Satellite लॉन्च किया गया है. इस वक्त अंतरिक्ष में ऐसे 2 Satellites हैं. लेकिन अगले वर्ष इस सीरीज के 2 और Satellites भेज दिए जाएंगे. ये उपग्रह पृथ्वी की निचली कक्षा में लगातार चक्कर लगाते रहते हैं. अंतरिक्ष में RISAT सीरीज के 4 Satellites होने का मतलब ये है कि हम अपने दुश्मनों पर हमेशा नजर रख पाएंगे. अगर सीमा पर किसी जगह घुसपैठ हो रही होगी.. तो ये चारों मिलकर उस लोकेशन की लगातार कवरेज करेंगे और देश की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

10. ये Surveillance Satellites नए जमाने के जासूस हैं.जिन्हें किसी दुश्मन देश की सीमा में जाकर जान खतरे में डालने की जरूरत नहीं पड़ती है. जासूसी Satellite से जुड़ी हर जानकारी को छिपाकर रखा जाता है.

(जी न्यूज के साभार से)

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 61-73 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 61-73 का हिन्दी अनुवाद

यदि उपासक को इन्द्रियसम्बन्धी भोगों से वैराग्य हो गया हो तो वह मोक्ष प्राप्ति के लिये अत्यन्त भक्तिपूर्वक अविच्छिन्नभाव से भगवान् का भजन करे। श्रीनारद जी से इस प्रकार उपदेश पाकर राजकुमार ध्रुव ने परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने भगवान् के चरणचिह्नों से अंकित परमपवित्र मधुवन की यात्रा की। ध्रुव के तपोवन की ओर चले जाने पर नारद जी महाराज उत्तानपाद के महल में पहुँचे। राजा ने उनकी यथायोग्य उपचारों से पूजा की; तब उन्होंने आराम से आसन पर बैठकर राजा से पूछा।

श्रीनारद जी ने कहा- राजन्! तुम्हारा मुख सूखा हुआ है, तुम बड़ी देर से किस सोच-विचार में पड़े हो? तुम्हारे धर्म, अर्थ और काम में से किसी में कोई कमी तो नहीं आ गयी? राजा ने कहा- ब्रह्मन्! मैं बड़ा ही स्त्रैण और निर्दय हूँ। हाय, मैंने अपने पाँच वर्ष के नन्हे-से बच्चे को उसकी माता के साथ घर से निकाल दिया। मुनिवर! वह बड़ा ही बुद्धिमान् था। उसका कमल-सा मुख भूख से कुम्हला गया होगा, वह थककर कहीं रास्ते में पड़ गया होगा। ब्रह्मन्! उस असहाय बच्चे को वन में कहीं भेड़िये न खा जायें। अहो! मैं कैसा स्त्री का गुलाम हूँ! मेरी कुटिलता तो देखिये- वह बालक प्रेमवश मेरी गोद में चढ़ना चाहता था, किन्तु मुझ दुष्ट ने उसका तनिक भी आदर नहीं किया।

श्रीनारद जी ने कहा- राजन्! तुम अपने बालक की चिन्ता मत करो। उसके रक्षक भगवान् हैं। तुम्हें उसके प्रभाव का पता नहीं है, उसका यश सारे जगत् में फैल रहा है। वह बालक बड़ा समर्थ है। जिस काम को बड़े-बड़े लोकपाल भी नहीं कर सके, उसे पूरा करके वह शीघ्र ही तम्हारे पास लौट आयेगा। उसके कारण तुम्हारा यश भी बहुत बढ़ेगा।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- देवर्षि नारद जी की बात सुनकर महाराज उत्तानपाद राजपाट की ओर से उदासीन होकर निरन्तर पुत्र की ही चिन्ता में रहने लगे। इधर ध्रुव जी ने मधुवन में पहुँचकर यमुना जी में स्नान किया और उस रात पवित्रतापूर्वक उपवास करके श्रीनारद जी के उपदेशानुसार एकाग्रचित्त से परमपुरुष श्रीनारायण की उपासना आरम्भ कर दी। उन्होंने तीन-तीन रात्रि के अन्तर से शरीर निर्वाह के लिये केवल कैथ और बेर के फल खाकर श्रीहरि की उपासना करते हुए एक मास व्यतीत किया। दूसरे महीने में उन्होंने छः-छः दिन के पीछे सूखे घास और पत्ते खाकर भगवान् का भजन किया।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 45-60 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 45-60 का हिन्दी अनुवाद

भगवान् के नेत्र और मुख निरन्तर प्रसन्न रहते हैं; उन्हें देखने से ऐसा मालूम होता है कि वे प्रसन्नतापूर्वक भक्त को वर देने के लिये उद्यत हैं। उनकी नासिका, भौंहें और कपोल बड़े ही सुहावने हैं; वे सभी देवताओं में परम सुन्दर हैं। उनकी तरुण अवस्था है; सभी अंग बड़े सुडौल हैं; लाल-लाल होठ और रतनारे नेत्र हैं। वे प्रणतजनों को आश्रय देने वाले, अपार सुखदायक, शरणागतवत्सल और दया के समुद्र हैं। उनके वक्षःस्थल में श्रीवत्स का चिह्न है; उनका शरीर सजल जलधर के समान श्यामवर्ण है; वे परमपुरुष श्यामसुन्दर गले में वनमाला धारण किये हुए हैं और उनकी चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा एवं पद्म सुशोभित हैं। उनके अंग-प्रत्यंग किरीट, कुण्डल, केयूर और कंकणादि आभूषणों से विभूषित हैं; गला कौस्तुभ मणि की भी शोभा बढ़ा रहा है तथा शरीर में रेशमी पीताम्बर है। उनके कटिप्रदेश में कांचन की करधनी और चरणों में सुवर्णमय नूपुर (पैजनी) सुशोभित हैं।

भगवान् का स्वरूप बड़ा ही दर्शनीय, शान्त तथा मन और नयनों को आनन्दित करने वाला है। जो लोग नयनों को आनन्दित करने वाला है। जो लोग प्रभु का मानस-पूजन करते हैं, उनके अन्तःकरण में वे हृदयकमल की कर्णिका पर अपने नख-मणिमण्डित मनोहर पादारविन्दों को स्थापित करके विराजते हैं। इस प्रकार धारणा करते-करते जब चित्त स्थिर और एकाग्र हो जाये, तब उन वरदायक प्रभु का मन-ही-मन इस प्रकार ध्यान करे कि वह मेरी ओर अनुरागभरी दृष्टि से निहारते हुए मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं।

भगवान् की मंगलमयी मूर्ति का इस प्रकार निरन्तर ध्यान करने से मन शीघ्र ही परमानन्द में डूबकर तल्लीन हो जाता है और फिर वहाँ से लौटता नहीं। राजकुमार! इस ध्यान के साथ जिस परम गुह्य मन्त्र का जप करना चाहिये, वह भी बतलाता हूँ-सुन। इसका सात रात जप करने से मनुष्य आकाश में विचरने वाले सिद्धों का दर्शन कर सकता है। वह मन्त्र हैं- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’।

किस देश और किस काल में कौन वस्तु उपयोगी है-इसका विचार करके बुद्धिमान् पुरुष को इस मन्त्र के द्वारा तरह-तरह की सामग्रियों से भगवान् की द्रव्यमयी पूजा करनी चाहिये। प्रभु का पूजन विशुद्ध जल, पुष्पमाला, जंगली मूल और फलादि, पूजा में विहित दुर्वादि अंकुर, वन में ही प्राप्त होने वाले वल्कल वस्त्र और उनकी प्रेयसी तुलसी से करना चाहिये। यदि शिला आदि की मूर्ति मिल सके तो उसमें, नहीं तो पृथ्वी या जल आदि में ही भगवान् की पूजा करे।

सर्वदा संयमचित्त, मननशील, शान्त और मौन रहे तथा जंगली फल-मूलादि का परिमित आहार करे। इसके सिवा पुण्यकीर्ति श्रीहरि अपनी अनिर्वचनीया माया के द्वारा अपनी ही इच्छा से अवतार लेकर जो-जो मनोहर चरित्र करने वाले हैं, उनका मन-ही-मन चिन्तन करता रहे। प्रभु की पूजा के लिये जिन-जिन उपचारों का विधान किया गया है, उन्हें मन्त्रमूर्ति श्रीहरि को द्वादशाक्षर मन्त्र के द्वारा ही अर्पण करे। इस प्रकार जब हृदयस्थित हरि का मन, वाणी और शरीर से भक्तिपूर्वक पूजन किया जाता है, तब वे निश्छलभाव से भलीभाँति भजन करने वाले अपने भक्तों के भाव को बढ़ा देते हैं और उन्हें उनकी इच्छा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्षरूप कल्याण प्रदान करते हैं।


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 28-44 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 28-44 का हिन्दी अनुवाद

यदि तुझे मानापमान का विचार ही हो, तो बेटा! असल में मनुष्य के असन्तोष का कारण मोह के सिवा और कुछ नहीं है। संसार में मनुष्य अपने कर्मानुसार ही मान-अपमान या सुख-दुःख आदि को प्राप्त होता है। तात! भगवान् की गति बड़ी विचित्र है! इसलिये उस पर विचार करके बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि दैववश उसे जैसी भी परिस्थिति का सामना करना पड़े, उसी में सन्तुष्ट रहे। अब, माता के उपदेश से तू योग साधन द्वारा जिन भगवान् की कृपा प्राप्त करने चला है-मेरे विचार से साधारण पुरुषों के लिये उन्हें प्रसन्न करना बहुत ही कठिन है।

योगी लोग अनेकों जन्मों तक अनासक्त रहकर समाधियोग के द्वारा बड़ी-बड़ी कठोर साधनाएँ करते रहते हैं, परन्तु भगवान् के मार्ग का पता नहीं पाते। इसलिये तू यह व्यर्थ का हठ छोड़ दे और घर लौट जा; बड़ा होने पर जब परमार्थ-साधन का समय आवे, तब उसके लिये प्रयत्न कर लेना। विधाता के विधान के अनुसार सुख-दुःख जो कुछ भी प्राप्त हो, उसी में चित्त की सन्तुष्ट रखना चाहिये। यों करने वाला पुरुष मोहमय संसार से पार हो जाता है। मनुष्य को चाहिये कि अपने से अधिक गुणवान् को देखकर प्रसन्न हो; जो कम गुणवाला हो, उस पर दया करे और जो अपने समान गुण वाला हो, उससे मित्रता का भाव रखे। यों करने से उसे दुःख कभी नहीं दबा सकते।

ध्रुव ने कहा- भगवन्! सुख-दुःख से जिनका चित्त चंचल हो जाता है, उन लोगों के लिये आपने कृपा करके शान्ति का यह बहुत अच्छा उपाय बतलाया। परन्तु मुझ-जैसे अज्ञानियों की दृष्टि यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। इसके सिवा, मुझे घोर क्षत्रिय स्वभाव प्राप्त हुआ है, अतएव मुझमें विनय का प्रायः अभाव है; सुरुचि ने अपने कटुवचनरूपी बाणों से मेरे हृदय को विदीर्ण कर डाला है; इसलिये उसमें आपका यह उपदेश नहीं ठहर पाता।

ब्रह्मन्! मैं उस पद पर अधिकार करना चाहता हूँ, जो त्रिलोकी में सबसे श्रेष्ठ है तथा जिस पर मेरे बाप-दादे और दूसरे कोई भी आरूढ़ नहीं हो सके हैं। आप मुझे उसी की प्राप्ति का कोई अच्छा-सा मार्ग बतलाइये। आप भगवान् ब्रह्माजी के पुत्र हैं और संसार के कल्याण के लिये ही वीणा बजाते सूर्य की भाँति त्रिलोकी में विचरा करते हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- ध्रुव की बात सुनकर भगवान् नारद जी बड़े प्रसन्न हुए और उस पर कृपा करके इस प्रकार सदुपदेश देने लगे।

श्रीनारद जी ने कहा- बेटा! तेरी माता सुनीति ने तुझे जो कुछ बताया है, वही तेरे लिये परम कल्याण का मार्ग है। भगवान् वासुदेव ही वह उपाय हैं, इसलिये तू चित्त लगाकर उन्हीं का भजन कर। जिस पुरुष को अपने लिये धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूप पुरुषार्थ की अभिलाषा हो, उसके लिये उनकी प्राप्ति का उपाय एकमात्र श्रीहरि के चरणों का सेवन ही है।

बेटा! तेरा कल्याण होगा, अब तू श्रीयमुना जी के तटवर्ती परमपवित्र मधुवन को जा। वहाँ श्रीहरि का नित्य-निवास है। वह श्रीकालिन्दी के निर्मल जल में तीनों समय स्नान करके नित्यकर्म से निवृत्त हो यथाविधि आसन बिछाकर स्थिरभाव से बैठना। फिर रेचक, पूरक और कुम्भक- तीन प्रकार के प्राणायाम से धीरे-धीरे प्राण, मन और इन्द्रिय के दोषों को दूरकर धैर्ययुक्त मन से परमगुरु श्रीभगवान् का इस प्रकार ध्यान करना।


साभार krishnakosh.org

लखन पटवारी..(कहानी)


पटवारी.
(कहानी)

एक बार नारद मुनि और यमराज में इस बात पर बहस शुरू हुई कि मनुष्य का स्वभाव कैसा होता है? यमराज का तर्क था कि ‘मनुष्य’ एक सीधा प्राणी है, कर्म करता है और अच्छे फल पर प्रसन्न और बुरे फल पर दुखित या पश्चातापी होता है। वहीं नारद जी का कहना था कि ‘आप का पाला तो मरे मनुष्यों से ही पड़ता है जबकि मनुष्य एक बड़ा ही धूर्त और समय के साथ बदलने वाला प्राणी है।

दोनों लोगों में विवाद बढ़ा फिर तय हुआ कि यमराज के सामने एक जीवित मनुष्य को लाया जाए फिर देखा जाए कि उसका स्वभाव कैसा है। यम दूतों को धरती पर भेजा गया यह बोल कर कि सबसे पहले मिले एक मनुष्य को ले आएं। यमदूत चले और सबसे पहले उनकी मुलाकात जिस व्यक्ति से हुई वह ‘लखन पटवारी’ था।

‘लखन’ जो तहसील में पटवारी के काम में लगा हुआ था और उस इलाके में ‘लखन पटवारी’ के नाम से जाना जाता था।

अब, एक तो वह पटवारी था और दूसरे बड़ा ही धूर्त किस्म का आदमी, सो हर वक्त लूट-खसोट, घोटाले और तरह-तरह के स्कीमों से पैसे कमाने की सोचता रहता था। उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य था ‘पैसा’ चाहें विधि कोई भी हो। यमदूत बोले चलो हमारे साथ ‘यमराज’ का बुलावा है। लखन पहले तो डरा फिर सम्भल कर बोला आप यमदूत हैं और आपका धर्म है कि हमें हमारी गलतियां और मृत्यु का कारण बताएं। बेचारे यमदूत लखन की बातों में फस गए तथा नारद और यमराज के बीच के विवाद का सारा वृतांत कह सुनाया।

यमदूतों की बात सुन कर लखन कुछ देर सोच में पड़ गया फिर यमदूतों से बोला ‘आप दो मिनट ठहरें मैं अभी आपके साथ चलता हूँ’ यमदूत मान गए।

लखन कमरे में गया और कलम पेपर ले कर भगवान की तरफ से यमराज के नाम एक परवाना (हुक्मनामा) तैयार किया, लिखा ‘यमराज! यह परवाना मिलते ही तुम लखन को तुरंत अपनी सत्ता सौंप दो।’

परवाना तैयार कर वह यमदूतों के साथ यमराज के दरबार में पहुचा।

पहुचते ही सबसे पहले यमराज का अभिवादन कर उनको वह परवाना दिया। यमराज ने परवाना पढ़ा और और भगवान की आज्ञा मान तुरंत अपने सिंहासन से उठ कर अपनी सत्ता लखन पटवारी को सौंप दी।

अब लखन को तो सच्चाई का पता था, वह जानता था कि एक न एक दिन बात खुलेगी और उसे नर्क में भेजा जाएगा। उसने विचार किया फिर एक योजना बनाई, उसने ऐलान किया कि ‘अब से सभी पाप के भागियों को स्वर्ग में रखा जाए और स्वर्ग भोगने वालों को नर्क में पटक दिया जाए।’

हर ओर त्राहि त्राहि मच गई, त्रिलोक कांप उठा। भगवान पकट हो गए, यमराज को हाजिर होने के लिए बोला गया। भगवान ने यमराज से पूछा ‘यह क्या अंधेरगर्दी मचा रखी है?’ यमराज वह परवाना भगवान को दिखाते हुए बोले ‘हे प्रभु! मैंने तो आपकी आज्ञा का पालन किया है, यह सब करने वाला तो लखन पटवारी है।’

भगवान बड़े नाराज़ हुए, लखन को दरबार में पेश किया गया। भगवान बोले ‘तुमने जघन्य अपराध किया है, तुम्हे इसका दण्ड मिलेगा’ ऐसा कह उन्होंने आदेश दिया कि लखन को आदि काल तक नर्क में रखा जाए। आदेश सुन लखन गिड़गिड़ाने लगा बोला प्रभु मेरी एक विनती मान लें फिर में सभी दण्ड को स्वीकार करूंगा। भगवान बोले ‘क्या?’ लखन – ‘मैं केवल 2 घंटो के लिए धरती पर जाना चाहता हूं और अपने लोगों से मिलना चाहता हूं।’

भगवान, लखन को गिड़गिड़ाते देख बोले ‘ठीक है’ लेकिन तुम लोगों से मिल कर करोगे क्या?’ लखन बोला ‘प्रभु! मैं लोगों को समझना चाहता हूं कि जिस भगवान के लिए तुम यह रोज पूजा, अर्चना, आरती करते हो उनके साक्षात दर्शन के बाद भी मुझे नर्क में जाना पड़ रहा है’।

यह सुनते ही सारा दरबार सन्न!

भगवान ने तो ‘ठीक है’ भी बोल दिया था। भगवान ने सोचा कि ऐसे तो घरती पर से मेरी पूजा अर्चना ही समाप्त हो जाएगी। सबके साथ मंत्रणा की फिर निश्चित हुआ कि लखन का अब तक के सभी कर्म को किनारे हुए दुबारा धरती पर भेजा जाए और एक महीने का समय दिया जाए फिर उन एक महीनों के कर्म के हिसाब से आगे का लेखा जोखा हो।

अब लखन पटवारी धरती पर वापस आ गए लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करते रहे, वही लूट, खसोट, पैसों की भूख लेकिन अंत में उन्होंने एक मरियल सी सफेद गाय दान करने का पुण्य कर दिया। एक महीने बाद उनकी मृत्यु हुई और उन्हें भगवान के दरबार में सभी के सामने पेश किया गया। कर्मों का लेखा जोखा हुआ। पाप ही पाप, पुण्य के नाम पर एक उजरऊ (सफेद) गाय का दान।

भगवान बोले तुम्हे समय भी दिया गया लेकिन तुमने अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म किया अब बोलो पहले पुण्य का फल चखोगे या पाप का?

लखन कुछ देर सोचने के बाद बोला ‘प्रभु! अगर आज्ञा हो तो मैं पहले पुण्य का स्वाद चखना चाहूंगा’

भगवान बोले ‘तथास्तु’ इतना कहते ही वही सफेद गाय लखन के सामने प्रकट हो गयी, बोली ‘आज्ञा दें’। लखन बोला ‘हे गऊ माता आप अपने लंबे सिंघो को इस यमराज के पेट में घुसेड़ कर तब तक हिलाती रहिये जब तक इसके प्राण न उड़ जाएं’। इतना सुनते ही गाय यमराज की ओर लपकी,

त्राहि त्राहि!

यमराज आगे- आगे और गाय उनके पीछे- पीछे, त्रिलोक में हाहाकार!

भगवान, नारद, यक्ष, गण सब लखन के सामने।

अब तो बात ईश्वर तक पहुचने वाली थी, बात भी ऐसी ही थी। लखन के सामने प्रस्ताव रखा गया कि वह जैसा चाहे वैसा करे, किसी को कोई आपत्ति नहीं है। लखन बोला कि अब में दुबारा धरती पर नहीं जाना चाहता लिहाजा मुझे स्वर्ग में उच्च स्थान दिया जाए। भगवान बोले- ‘तथास्तु’। सबकी सांस में सांस आयी।

लखन के कहने से गाय ने यमराज को मुक्त कर दिया। सब पहले जैसा हो गया।

कुछ दिनों बाद नारद मुनि फिर यमलोक की तरफ से गुजरे, सोचा यमराज से भी मुलाकात कर लिया जाये, ऐसा सोच कर यमराज के से मिलने गए, दरबार का समय समाप्त हो गया था इसलिए दोनों लोगों कि मुलाकात अकेले में ही हुई। नारद, यमराज से बोले ‘कहिये प्रभु! कैसा अनुभव रहा?’

यमराज बहुत देर शांत मन से सोचने के बाद भी नारद जी को मुस्कुरा कर प्रणाम भर ही कर पाए।

(श्रोत-https://sambhashan.in)

फांसी की प्रक्रिया. (तिहाड़ जेल)


फांसी की प्रक्रिया.
(तिहाड़ जेल)

1945 में तिहाड़ जेल बनना शुरू हुआ था. 13 साल बाद 1958 में तिहाड़ बन कर तैयार हुआ. और कैदी वहां आना शुरू हो गए. अंग्रेजों के ज़माने में ही तिहाड़ के नक्शे में फांसी घर का भी नक्शा बनाया गया था. उसी नक्शे के हिसाब से फांसी घर बनाया गया. जिसे अब फांसी कोठी कहते हैं. ये फांसी कोठी तिहाड़ के जेल नंबर तीन में कैदियों के बैरक से बहुत दूर बिल्कुल अलग-थलग सुनसान जगह पर है.

जेल नंबर तीन में जिस बिल्डिंग में फांसी कोठी है, उसी बिल्डिंग में कुल 16 डेथ सेल हैं. डेथ सेल यानी वो जगह जहां सिर्फ उन्हीं कैदियों को रखा जाता है, जिन्हें मौत की सज़ा मिली है. डेथ सेल में कैदी को अकेला रखा जाता है. 24 घंटे में सिर्फ आधे घंटे के लिए उसे बाहर निकाला जाता है टहलने के लिए. डेथ सेल की पहरेदारी तमिलनाडु स्पेशल पुलिस करती है. दो-दो घंटे की शिफ्ट में इनका काम सिर्फ और सिर्फ मौत की सजा पाए कैदियों पर नजरें रखने का होता है. ताकि वो खुदकुशी करने की कोशिश ना करे. इसीलिए डेथ सेल के कैदियों को बाकी और चीज तो छोड़िए पायजामे का नाड़ा तक पहनने नहीं दिया जाता.

ब्लैक वारंट पर दस्तखत होने के बाद फांसी की तारीख और वक्त जेल प्रशासन के सुझाव और तैयारी को देख कर अदालत तय करती है. इसके बाद सबसे पहला काम होता है, फांसी के लिए जल्लाद ढूंढना और दूसरा काम फंदे की रस्सी का इंतजाम करना. हालांकि देश में पिछली तीन फांसी जो कसाब, अफजल गुरू और याकूब मेमन को दी गई वो तीनों फांसी बगैर पेशेवर जल्लाद के दी गई. तीनों ही मामले में लिवर पुलिस वाले ने ही खींचा था.

फांसी का फंदा किसी आम रस्सी का नहीं बनाया जाता. बल्कि ये एक खास रस्सी होती है. जिसे मनीला रोप कहते हैं. फांसी के फंदे के लिए ये रस्सी देश में सिर्फ बिहार की बक्सर जेल में तैयार होती है. अफजल गुरू की फांसी के लिए बक्सर से मनीला रोप मंगवाया गई थी. जिसकी कीमत थी 860 रुपये. हालांकि रस्सी से ज्यादा पैसे तो किराए में ही खर्च हो गए थे.

एक बार मनीला रोप जेल पहुंचन जाने के बाद अब उसी रस्सी से ट्रायल होता है. ट्रायल यानी फांसी देने से पहले फांसी की प्रैक्टिस. इसके लिए बाकायदा फांसी पर चढ़ाए जाने वाले शख्स की लंबाई, वजन गर्दन की नाप, सब लिया जाता है. फिर ठीक उसी साइज और वजन के सैंड बैग को फंदे पर झुलाया जाता है. यही वजह है कि जिस शख्स को फांसी दी जानी होती है, उसके वजन और लंबाई का रिकार्ड रोजाना अपडेट होता रहता है. अफजल गुरू की फांसी के पहले ट्रायल के दौरान दो बार रस्सी टूट गई थी.

फांसी के लिए रस्सी की लंबाई भी कैदियों के वजन के हिसाब से तय होती है. दरअसल, जिस तख्ते पर फांसी दी जाती है. उस तख्ते के नीचे कुएं की गहराई 15 फीट होती है. ताकि जमीन और झूलते पैर के बीच पूरा फासला हो. फांसी के फंदे पर झूलने वाले शख्स का वजन अगर 45 किलो या उससे कम है तो फिर तख्ते के नीचे कुएं में लटकने के लिए रस्सी की लंबाई ज्यादा रखी जाती है. जो करीब आठ फीट होती है. जबकि फांसी पर चढ़ाए जाने वाले शख्स का वजन अगर 90 किलो या उससे ज्यादा है, तो कुएं में झूलने के लिए रस्सी की लंबाई कम रखी जाती है. करीब छह फीट. ऐसा इसलिए होता है वजन की वजह से रस्सी पर दबाव ज्यादा पड़ता है. रस्सी की लंबाई की नाप सिर से नहीं बल्कि बाएं कान के नीचे जबड़े से ली जाती है. क्योंकि फांसी के फंदे की गांठ वहीं से शुरू होती है.

तिहाड़ के जेल नंबर तीन में जो फांसी कोठी है उस फांसी कोठी में पहली और आखिरी बार एक साथ दो लोगों को फांसी अब से 37 साल पहले 31 जनवरी 1982 को रंगा-बिल्ला को दी गई थी. चार लोगों को एक साथ फांसी तिहाड़ में कभी नहीं हुई. मगर निर्भया के गुनहगारों की तादाद चार है. हालांकि देश में चार लोगों को एक साथ इससे पहले भी फांसी हो चुकी है. पर वो पुणे की यड़वडा जेल में हुई थी. 27 नवंबर 1983 को. जोशी अभयंकर केस के नाम से मशहूर दस लोगों का कत्ल करने वाले चार लोगों को तब एक साथ फांसी दी गई थी. तो क्या निर्भया के चारों गुनहगारों को भी एक साथ तिहाड़ में फांसी दी जा सकती है?

तिहाड़ में जो फांसी कोठी है उसके तख्ते की लंबाई करीब दस फीट है. यानी इतनी जगह काफी है. जिसके ऊपर एक साथ चार लोगों को खड़ा किया जा सके. बस इसके लिए तख्ते के ऊपर लोहे के रॉड पर चार फांसी के फंदे कसने होंगे. तख्ते के नीचे भी लोहे की रॉड होती है. जिससे तख्ता खुलता और बंद होता है. इस रॉड का कनेक्शन तख्ते के साइड में लगे लिवर से होता है. लिवर खींचते ही नीचे का रॉड हट जाता है और तख्त के दोनों सिरे नीचे की तरफ खुल जाते हैं. जिससे तख्त पर खडे शख्स के पैर नीचे कुएं में झूल जाते हैं.

फांसी से एक या दो दिन पहले फांसी दिए जाने वाले शख्स को डेथ सेल से निकाल कर दूसरे सेल में डाल दिया जाता है. चूंकि फांसी कोठी डेथ सेल के करीब है. ऐसे में फांसी की तैयारी को लेकर क्या कुछ चल रहा है. कैसे ट्रायल हो रहा है. ये सब वो देख ना सके इसलिए ऐसा किया जाता है.

फांसी से पहले अगर मरने वाला कोई वसीयत करना चाहता है तो बाकायदा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को जेल बुलवाकर उनके सामने उसकी वसीयत लिखी जाती है. इसी तरह आखिरी बार जिस रिश्तेदार से भी वो मिलना चाहे उससे भी उसे मिलवाया जाता है.

जिस सुबह फांसी दी जानी है. उस सुबह करीब चार बजे ही फांसी पर चढ़ने वाले को उठा दिया जाता है. उससे नहाने और नए कपड़े पहनने को कहा जाता है. कई बार कैदी नहाने या नए कपड़े पहनने से मना कर देता है. जैसे रंगा-बिल्ला ने किया था. मौत की सुबह कैदी को सिर्फ चाय के लिए पूछा जाता है.

इसके बाद ब्लैक वारंट पर लिखे वक्त के हिसाब से कैदी को उसके सेल से बाहर निकाला जाता है. उसके इर्द-गिर्द 12 हथियारबंद गार्ड होते हैं. कई बार तो कैदी को बाकायदा कंधे से उठा कर ले जाया जाता है क्योंकि मौत के डर की वजह से उसके पैर तक कांप रहे होते हैं. कैदी को सेल से फांसी के तख्ते तक उसका चेहरा ढक कर ले जाया जाता है. ताकि उसके आस-पास क्या चल रहा है वो देख ना सके.

फांसी घर में कितने लोग रहेंगे. इसके लिए भी जेल मैन्यूअल में साफ लिखा है. एक डाक्टर जो डेथ सर्टिफिकेट पर दस्तखत करता है. एक सब डिविजनल मजिस्ट्रेट. जिनकी निगरानी में फांसी की पूरी प्रक्रिया होती है. जेलर और डिप्टी सुप्रीटेंडेंट जेलर. इसके अलावा 10 कांस्टेबल और दो हेड कांस्टेबल या फिर इतने ही हथियारबंद गार्ड वहां मौजूद रहते हैं.

फांसी कोठी पहुंचने के बाद आम तौर पर कोई भी जेल स्टाफ या जल्लाद आपस में बात नहीं करते हैं. सब खामोश रहते हैं. इसके आगे की सारी कार्रवाई इशारों में होती है. जेलर ब्लैक वारंट के हिसाब से तय वक्त होते ही रूमाल नीचे की तरफ गिरा कर इशारा करता है. लिवर पकड़े जल्लाद या पुलिसवाला लिवर खींच देता है. लिवर खींचने के आधे घंटे बाद पहली बार डॉक्टर मरने वाले की धड़कनें और नब्ज टटोलता है. अगर ध़ड़कन रुक गई और नब्ज थम गई तब डॉक्टर के इशारे पर फांसी के फंदे से लाश नीचे उतार ली जाती है.

क़ैदी जितना भारी होता है, फांसी के दौरान उसकी गर्दन भी उतनी ही ज़्यादा खिंचती है. जेलर या जल्लाद हमेशा यही दुआ मांगते हैं कि फांसी के दौरान क़ैदी की मौत गर्दन की हड्डी टूटने से ही हो. क्योंकि इससे मौत कम तकलीफदेह और कम वक्त में होती है. पूरी फांसी की कार्रवाई के दौरान जब तक फांसी अपने अंजाम को नहीं पहुंच जाती और जब तक लाश फंदे से नीचे नहीं उतार ली जाए, तब तक पूरी जेल के अंदर हर काम रोक दिया जाता है. हर कैदी अपने सेल अपने बैरक में होता है. जेल में कोई मूवमेंट नहीं होता. ये जेल मैनुअल का हिस्सा है. पर एक बार जैसे ही फांसी की प्रकिया खत्म होती है तो जेल की ज़िंदगी दोबारा शुरू हो जाती है.


(श्रोत-आज तक समाचार नई दिल्ली, 10 दिसंबर 2019, अपडेटेड 11 दिसंबर 2019)

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 16-27 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 16-27 का हिन्दी अनुवाद

उसका धीरज टूट गया। वह दावानल से जली हुई बेल के समान शोक से सन्तप्त होकर मुरझा गयी तथा विलाप करने लगी। सौत की बातें याद आने से उसके कमल-सरीखे नेत्रों ने आँसू भर आये। उस बेचारी को अपने दुःखपारावार का कहीं अन्त ही नहीं दिखायी देता था। उसने गहरी साँस लेकर ध्रुव से कहा, ‘बेटा! तू दूसरों के लिये किसी प्रकार के अमंगल की कामना मत कर। जो मनुष्य दूसरों को दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है। सुरुचि ने जो कुछ कहा है, ठीक ही है; क्योंकि महाराज को मुझे ‘पत्नी’ तो क्या, ‘दासी’ स्वीकार करने में भी लज्जा आती है। तूने मुझ मन्दभागिनी के गर्भ से ही जन्म लिया है और मेरे ही दूध से तू पला है।

बेटा! सुरुचि ने तेरी सौतेली माँ होने पर भी बात बिलकुल ठीक कही है; अतः यदि राजकुमार उत्तम के समान राजसिंहासन पर बैठना चाहता है तो द्वेषभाव छोड़कर उसी का पालन कर। बस, श्रीअधोयक्षज भगवान् के चरणकमलों की आराधना में लग जा। संसार का पालन करने के लिये सत्त्वगुण को अंगीकार करने वाले उन श्रीहरि के चरणों की आराधना करने से ही तेरे परदादा श्रीब्रह्माजी को वह सर्वश्रेष्ठ पद प्राप्त हुआ है, जो मन और प्राणों को जीतने वाले मुनियों के द्वारा भी वन्दनीय है। इसी प्रकार तेरे दादा स्वयंभुव मनु ने भी बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों के द्वारा अनन्यभाव से उन्हीं भगवान् की आराधना की थी; तभी उन्हें दूसरों के लिये अति दुर्लभ लौकिक, अलौकिक तथा मोक्षसुख की प्राप्ति हुई।

‘बेटा! तू भी उन भक्तवत्सल श्रीभगवान् का ही आश्रय ले। जन्म-मृत्यु के चक्र से छूटने की इच्छा करने वाले मुमुक्ष लोग निरन्तर उन्हीं के चरणकमलों के मार्ग की खोज किया करते हैं। तू स्वधर्मपालन से पवित्र हुए अपने चित्त में श्रीपुरुषोत्तम भगवान् को बैठा ले तथा अन्य सबका चिन्तन छोड़कर केवल उन्हीं का भजन कर। बेटा! उन कमल-दल-लोचन श्रीहरि को छोड़कर मुझे तो तेरे दुःख को दूर करने वाला और कोई दिखायी नहीं देता। देख, जिन्हें प्रसन्न करने के लिये ब्रह्मा आदि अन्य सब देवता ढूँढ़ते रहते हैं, वे श्रीलक्ष्मी जी भी दीपक की भाँति हाथ में कमल किये निरन्तर उन्हीं श्रीहरि की खोज किया करती हैं’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- माता सुनीति ने जो वचन कहे, वे अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति का मार्ग दिखलाने वाले थे। अतः उन्हें सुनकर ध्रुव ने बुद्धि द्वारा अपने चित्त का समाधान किया। इसके बाद वे पिता के नगर से निकल पड़े।

यह सब समाचार सुनकर और ध्रुव क्या करना चाहता है, इस बात को जानकर नारद जी वहाँ आये। उन्होंने ध्रुव के मस्तक पर अपना पापनाशक कर-कमल फेरते हुए मन-ही-मन विस्मित होकर कहा।

‘अहो! क्षत्रियों का कैसा अद्भुत तेज है, वे थोड़ा-सा भी मान-भंग नहीं सह सकते। देखो, अभी तो यह नन्हा-सा बच्चा है; तो भी इसके हृदय में सौतेली माता के कटु वचन घर कर गये हैं’। तत्पश्चात् नारद जी ने ध्रुव से कहा- बेटा! अभी तो तू बच्चा है, खेल-कूद में ही मस्त रहता है; हम नहीं समझते कि इस उम्र में किसी बात से तेरा सम्मान या अपमान हो सकता है।


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: अष्टम अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद

ध्रुव का वन-गमन

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- शत्रुसूदन विदुर जी! सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति- ब्रह्माजी के इन नैष्ठिक ब्रह्मचारी पुत्रों ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश नहीं किया (अतः उनके कोई सन्तान नहीं हुई)। अधर्म भी ब्रह्माजी का ही पुत्र था, उसकी पत्नी का नाम था मृषा। उसके दम्भ नामक पुत्र और माया नाम की कन्या हुई। उन दोनों को निर्ऋति ले गया, क्योंकि उसके कोई सन्तान न थी। दम्भ और माया से लोभ और निकृति (शठता) का जन्म हुआ, उनसे क्रोध और हिंसा तथा उनसे कलि (कलह) और उसकी बहिन दुरुक्ति (गाली) उत्पन्न हुई। साधुशिरोमणे! फिर दुरुक्ति से कलि ने भय और मृत्यु को उत्पन्न किया तथा उन दोनों के संयोग से यातना और निरय (नरक) का जोड़ा उत्पन्न हुआ।

निष्पाप विदुर जी! इस प्रकार मैंने संक्षेप से तुम्हें प्रलय का कारणरूप यह अधर्म का वंश सुनाया। यह अधर्म का त्याग कराकर पुण्य-सम्पादन में हेतु बनता है; अतएव इसका वर्णन तीन बार सुनकर मनुष्य अपने मन की मलिनता दूर कर देता है। कुरुनन्दन! अब मैं श्रीहरि के अंश (ब्रह्माजी) के अंश से उत्पन्न हुए पवित्रकीर्ति महाराज स्वायम्भुव मनु के पुत्रों के वंश का वर्णन करता हूँ।

महारानी शतरूपा और उनके पति स्वयाम्भुव मनु से प्रियव्रत और उत्तानपाद- ये पुत्र हुए। भगवान् वासुदेव की कला से उत्पन्न होने के कारण ये दोनों संसार की रक्षा में तत्पर रहते थे। उत्तानपाद के सुनीति और सुरुचि नाम की दो पत्नियाँ थीं। उनमें सुरुचि राजा को अधिक प्रिय थी; सुनीति, जिसका पुत्र ध्रुव था, उन्हें वैसी प्रिय नहीं थी।

एक दिन राजा उत्तानपाद सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में बिठाकर प्यार कर रहे थे। उसी समय ध्रुव ने भी गोद में बैठना चाहा, परन्तु राजा ने उसका स्वागत नहीं किया। उस समय घमण्ड से भरी हुई सुरुचि ने अपनी सौत के पुत्र को महराज की गोद में आने का यत्न करते देख उनके सामने ही उससे डाह भरे शब्दों में कहा। ‘बच्चे! तू राजसिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं है। तू भी राजा का ही बेटा है, इससे क्या हुआ; तुझको मैंने तो अपनी कोख में नहीं धारण किया। तू अभी नादान है, तुझे पता नहीं है कि तूने किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है; तभी तो ऐसे दुर्लभ विषय की इच्छा कर रहा है। यदि तुझे राजसिंहासन की इच्छा है तो तपस्या करके परम पुरुष श्रीनारायण की आराधना कर और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में आकर जन्म ले’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! जिस प्रकार डंडे की चोट खाकर साँप फुँफकार मारने लगता है, उसी प्रकार अपनी सौतेली माँ के कठोर वचनों से घायक होकर ध्रुव क्रोध के मारे लंबी-लंबी साँस लेने लगा। उसके पिता चुपचाप यह सब देखते रहे, मुँह से एक शब्द भी नहीं बोले। तब पिता को छोड़कर ध्रुव रोता हुआ अपनी माता के पास आया। उसके दोनों होंठ फड़क रहे थे और वह सिसक-सिसककर रो रहा था। सुनीति ने बेटे को गोद में उठा लिया और जब महल के दूसरे लोगों से अपनी सौत सुरुचि की कही हुई बातें सुनी, तब उसे भी बड़ा दुःख हुआ।


श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 46-61 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 46-61 का हिन्दी अनुवाद

वेदमूर्ते! यज्ञ और उसका संकल्प दोनों आप ही हैं। पूर्वकाल में आप ही अति विशाल वराहरूप धारणकर रसातल में डूबी हुई पृथ्वी को लीला से ही अपनी दाढ़ों पर उठाकर इस प्रकार निकाल लाये थे, जैसे कोई गजराज कमलिनी को उठा लाये। उस समय आप धीरे-धीरे गरज रहे थे और योगिगण आपका यह अलौकिक पुरुषार्थ देखकर आपकी स्तुति करते जाते थे। यज्ञेश्वर! जब लोग आपके नाम का कीर्तन करते हैं, तब यज्ञ के सारे विघ्न नष्ट हो जाते हैं। हमारा यह यज्ञस्वरूप सत्कर्म नष्ट हो गया था, अतः हम आपके दर्शनों की इच्छा कर रहे थे। अब आप हम पर प्रसन्न होइये। आपको नमस्कार है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- भैया विदुर! जब इस प्रकार सब लोग यज्ञरक्षक भगवान हृषीकेश की स्तुति करने लगे, तब परम चतुर दक्ष ने रुद्र पार्षद वीरभद्र के ध्वंस किये हुए यज्ञ को फिर आरम्भ कर दिया।

सर्वान्तर्यामी श्रीहरि यों तो सभी के भोगों के भोक्ता हैं; तथापि त्रिकपाल-पुरोडाशरूप अपने भाग से और भी प्रसन्न होकर उन्होंने दक्ष को सम्बोधन करके कहा।

श्रीभगवान् ने कहा- जगत् का परम कारण मैं ही ब्रह्मा और महादेव हूँ; मैं सबका आत्मा, ईश्वर और साक्षी हूँ तथा स्वयंप्रकाश और उपाधिशून्य हूँ। विप्रवर! अपनी त्रिगुणात्मिका माया को स्वीकार करके मैं ही जगत् की रचना, पालन और संहार करता रहता हूँ और मैंने ही उन कर्मों के अनुरूप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर- ये नाम धारण किये हैं। ऐसा जो भेदरहित विशुद्ध परब्रह्मस्वरूप मैं हूँ, उसी में अज्ञानी पुरुष ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य समस्त जीवों को विभिन्न रूप से देखता है। जिस प्रकार मनुष्य अपने सिर, हाथ आदि अंगों में ‘ये मुझसे भिन्न हैं’ ऐसी बुद्धि कभी नहीं करता, उसी प्रकार मेरा भक्त प्राणिमात्र को मुझसे भिन्न नहीं देखता।

ब्रह्मन्! हम- ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर- तीनों स्वरूपतः एक ही हैं और हम ही सम्पूर्ण जीव रूप हैं; अतः जो हममें कुछ भी भेद नहीं देखता, वही शान्ति प्राप्त करता है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- भगवान् के इस प्रकार आज्ञा देने पर प्रजापतियों के नायक दक्ष ने उनका त्रिकपाल-यज्ञ के द्वारा पूजन करके फिर अंगभूत और प्रधान दोनों प्रकार के यज्ञों से अन्य सब देवताओं का अर्चन किया। फिर एकाग्रचित्त हो भगवान् शंकर का यज्ञशेषरूप उनके भाग से यजन किया तथा समाप्ति में किये जाने वाले उदवसान नामक कर्म से अन्य सोमपायी एवं दूसरे देवताओं का यजन कर यज्ञ का उपसंहार किया और अन्त में ऋत्वियों के सहित अवभृथ-स्नान किया। फिर जिन्हें अपने पुरुषार्थ से ही सब प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त थीं, उन दक्ष प्रजापति को ‘तुम्हारी सदा धर्म में बुद्धि रहे’ ऐसा आशीर्वाद देकर सब देवता स्वर्गलोक को चले गये।

विदुर जी! सुना है कि दक्षसुता सतीजी ने इस प्रकार अपना पूर्व शरीर त्याकर फिर हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ से जन्म लिया था। जिस प्रकार प्रलयकाल में लीन हुई शक्ति सृष्टि के आरम्भ में फिर ईश्वर का ही आश्रय लेती है, उसी प्रकार अनन्यपरायणा श्रीअम्बिका जी ने उस जन्म में भी अपने एकमात्र आश्रय और प्रियतम भगवान् शंकर को ही वरण किया। विदुर जी! दक्ष-यज्ञ का विध्वंस करने वाले भगवान् शिव का चरित्र मैंने बृहस्पति जी के शिष्य परम भागवत उद्धव जी के मुख से सुना था। कुरुनन्दन! श्रीमहादेव जी का यह पावन चरित्र यश और आयु को बढ़ाने वाला तथा पापपुंज को नष्ट करने वाला है। जो पुरुष भक्तिभाव से इसका नित्यप्रति श्रवण और कीर्तन करता है, वह अपनी पापराशि का नाश कर देता है।


साभार krishnakosh.org

लोभ और भय.


लो और .

मैंने सुना है, राजा भोज के दरबार में बड़े पंडित थे, बड़े ज्ञानी थे और कभी कभी वह उनकी परीक्षा भी लिया करता था। एक दिन वह अपना तोता राजमहल से ले आया दरबार में। तोता एक ही रट लगाता था, एक ही बात दोहराता था- बार बार : 'बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है, बस एक ही भूल है।'

राजा ने अपने दरबारियों से पूछा, "यह कौन सी भूल की बात कर रहा है- तोता?" पंडित बड़ी मुश्किल में पड़ गए। और राजा ने कहा, "अगर ठीक जवाब न दिया तो फांसी, ठीक जबाब दिया तो लाखों के पुरस्कार और सम्मान।"

अब अटकलबाजी नहीं चल सकती थी, खतरनाक मामला था। ठीक जवाब क्या हो? तोते से तो पूछा भी नहीं जा सकता। तोता कुछ और जानता भी नहीं। तोता इतना ही कहता है, तुम लाख पूछो, वह इतना ही कहता है : 'बस एक ही भूल है।'

सोच विचार में पड़ गए पंडित। उन्होंने मोहलत मांगी, खोजबीन में निकल गए। जो राजा का सबसे बड़ा पंडित था- दरबार में, वह भी घूमने लगा कि कहीं कोई ज्ञानी मिल जाए। अब तो ज्ञानी से पूछे बिना न चलेगा। शास्त्रों में देखने से अब कुछ अर्थ नहीं है। अनुमान से भी अब काम नहीं होगा। जहां जीवन खतरे में हो, वहां अनुमान से काम नहीं चलता। तर्क इत्यादि भी काम नहीं देते। तोते से कुछ राज़ निकलवाया नहीं जा सकता। वह अनेकों के पास गया लेकिन कहीं कोई जवाब न दे सका कि तोते के प्रश्न का उत्तर क्या होगा।

बड़ा उदास लौटता था राजमहल की तरफ कि एक चरवाहा मिल गया। उसने पूछा, "पंडित जी, बहुत उदास हैं? जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो आप के ऊपर, कि मौत आनेवाली हो, इतने उदास! बात क्या है?" तो उसने अपनी अड़चन कही, दुविधा कही। उस चरवाहे ने कहा, "फिक्र न करें, मैं हल कर दूंगा। मुझे पता है। लेकिन एक ही उलझन है। मैं चल तो सकता हूँ लेकिन मैं बहुत दुर्बल हूँ और मेरा यह जो कुत्ता है, इसको मैं अपने कंधे पर रखकर नहीं ले जा सकता। इसको पीछे भी नहीं छोड़ सकता। इससे मेरा बड़ा लगाव है।" पंडित ने कहा, "तुम फिक्र छोड़ो। मैं इसे कंधे पर रख लेता हूँ।"

उन ब्राह्मण महाराज ने कुत्ते को कंधे पर रख लिया। दोनों राजमहल में पहुंचे। तोते ने वही रट लगा रखी थी कि एक ही भूल है, बस एक ही भूल है। चरवाहा हंसा उसने कहा, "महाराज, देखें भूल यह खड़ी है।" वह पंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा था। राजा ने कहा, "मैं समझा नहीं।" उसने कहा कि "शास्त्रों में लिखा है कि कुत्ते को पंडित न छुए और अगर छुए तो स्नान करे और आपका महापंडित कुत्ते को कंधे पर लिए खड़ा है। लोभ जो न करवाए सो थोड़ा है। बस, एक ही भूल है : लोभ और भय : लोभ का ही दूसरा हिस्सा है, नकारात्मक हिस्सा। यह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ भय, एक तरफ लोभ।

ये दोनों बहुत अलग अलग नहीं हैं। जो भय से धार्मिक है, वह डरा है- दंड से, नर्क से, वह धार्मिक नहीं है। और जो लोभ से धार्मिक है, जो लोलुप हो रहा है, वह वासनाग्रस्त है- स्वर्ग से, वह धार्मिक नहीं है।

फिर धार्मिक कौन है? धार्मिक वही है, जिसे न लोभ है, न भय। जिसे कोई चीज लुभाती नहीं और कोई चीज डराती भी नहीं। जो भय और प्रलोभन के पार उठा है, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

सत्य को देखने के लिए लोभ और भय से मुक्ति चाहिए। सत्य की पहली शर्त है- अभय क्योंकि जब तक भय तुम्हें डांवाडोल कर रहा है तब तक तुम्हारा चित्त ठहरेगा ही नहीं। भय कंपाता है, भय के कारण कंपन होता है। तुम्हारी भीतर की ज्योति कंपती रहती है। तुम्हारे भीतर हजार तरंगें उठती हैं- लोभ की, भय की।

प्रतिस्पर्धा


प्रतिस्पर्धा

राजा ने मंत्री से कहा- मेरा मन प्रजाजनों में से जो वरिष्ठ हैं उन्हें कुछ बड़ा उपहार देने का हैं। बताओ ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहाँ से और किस प्रकार ढूंढ़ें जाय?

मंत्री ने कहा - सत्पात्रों की तो कोई कमी नहीं, पर उनमें एक ही कमी है कि परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा वे एक दूसरे की टाँग पकड़कर खींचते हैं। न खुद कुछ पाते हैं और न दूसरों को कुछ हाथ लगने देते हैं। ऐसी दशा में आपकी उदारता को फलित होने का अवसर ही न मिलेगा।

राजा के गले वह उत्तर उतरा नहीं। बोले! तुम्हारी मान्यता सच है यह कैसे माना जाय? यदि कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हो तो करो।

मंत्री ने बात स्वीकार करली और प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बना ली। उसे कार्यान्वित करने की स्वीकृति भी मिल गई।

एक छः फुट गहरा गड्ढा बनाया गया। उसमें बीस व्यक्तियों के खड़े होने की जगह रखी गई और बीस व्यक्ति खड़े भी कर दिए गये। घोषणा की गई कि जो इस गड्ढे से ऊपर चढ़ आवेगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में मिलेगा।

बीसों प्रथम चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो थोड़ा सफल होता दीखता उसकी टाँगें पकड़कर शेष उन्नीस नीचे घसीट लेते। वह औंधे मुँह गिर पड़ता। इसी प्रकार सबेरे आरम्भ की गई प्रतियोगिता शाम को समाप्त हो गयी। बीसों को असफल ही किया गया और रात्रि होते-होते उन्हें सीढ़ी लगाकर ऊपर खींच लिया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिला।

मंत्री ने अपने मत को प्रकट करते हुए कहा - यदि यह एकता कर लेते तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। पर वे ईर्ष्यावश वैसा नहीं कर सकें। एक दूसरे की टाँग खींचते रहे और सभी खाली हाथ रहे।

संसार में प्रतिभावानों के बीच भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा चलती हैं और वे खींचतान में ही सारी शक्ति गँवा देते है। अस्तु उन्हें निराश हाथ मलते ही रहना पड़ता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 37-45 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 37-45 का हिन्दी अनुवाद

लोकपालों ने कहा- अनन्त परमात्मन्! आप समस्त अन्तःकरण के साक्षी हैं, यह सारा जगत् आपके ही द्वारा देखा जाता है। तो क्या मायिक पदार्थों को ग्रहण करने वाली हमारी इन नेत्र आदि इन्द्रियों से कभी आप प्रत्यक्ष हो सके हैं? वस्तुतः आप हैं तो पंचभूतों से पृथक्; फिर भी पांचभौतिक शरीरों के साथ जो आपका सम्बन्ध प्रतीत होता है, यह आपकी माया ही है।

योगेश्वरों ने कहा- प्रभो! जो पुरुष सम्पूर्ण विश्व के आत्मा आपमें और अपने में कोई भेद नहीं देखता, उससे अधिक प्यारा आपको कोई नहीं है। तथापि भक्तवत्सल! जो लोग आपमें स्वामिभाव रखकर अनन्य भक्ति से आपकी सेवा करते हैं, उन पर भी आप कृपा कीजिये। जीवों के अदृष्टवश जिसके सत्त्वादि गुणों में बड़ी विभिन्नता आ जाती है, उस अपनी माया के द्वारा जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के लिये ब्रह्मादि विभिन्न रूप धारण करके आप भेदबुद्धि पैदा कर देते हैं; किन्तु अपनी स्वरूप-स्थिति से आप उस भेदज्ञान और उसके कारण सत्त्वादि गुणों से सर्वथा दूर हैं। ऐसे आपको हमारा नमस्कार है।

ब्रह्मस्वरूप वेद ने कहा- आप ही धर्मादि की उत्पत्ति के लिये शुद्ध सत्त्व को स्वीकार करते हैं, साथ ही आप निर्गुण भी हैं। अतएव आपका तत्त्व न तो मैं जानता हूँ और न ब्रह्मादि कोई और ही जानते हैं; आपको नमस्कार है।

अग्निदेव ने कहा- भगवन्! आपके ही तेज से प्रज्वलित होकर मैं श्रेष्ठ यज्ञों में देवताओं के पास घृतमिश्रित हवि पहुँचाता हूँ। आप साक्षात् यज्ञपुरुष एवं यज्ञ की रक्षा करने वाले हैं। अग्निहोत्र, दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य और पशु-सोम- ये पाँच प्रकार के यज्ञ आपके ही स्वरूप हैं तथा ‘आश्रावय’, अस्तु श्रौषट्’, ‘यजे’, ‘ये यजामहे’ और ‘वषट्’- इन पाँच प्रकार के यजुर्मन्त्रों से आपका ही पूजन होता है। मैं आपको प्रणाम करता हूँ।

देवताओ ने कहा- देव! आप आदिपुरुष हैं। पूर्वकल्प का अन्त होने पर अपने कार्यरूप इस प्रपंच को उदर में लीन कर आपने ही प्रलयकालीन जल के भीतर शेषनाग की उत्तम शय्या पर शयन किया था। आपके अध्यात्मिक स्वरूप का जनलोकादिवासी सिद्धगण भी अपने हृदय में चिन्तन करते हैं। अहो! वही आप आज हमारे नेत्रों के विषय होकर अपने भक्तों की रक्षा कर रहे हैं।

गन्धर्वों ने कहा- देव! मरीचि आदि ऋषि और ये ब्रह्मा, इन्द्र तथा रुद्रादि देवतागण आपके अंश के भी अंश हैं। महत्तम! यह सम्पूर्ण विश्व आपके खेल की सामग्री है। नाथ! ऐसे आपको हम सर्वदा प्रणाम करते हैं।

विद्याधरों ने कहा- प्रभो! परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के साधनरूप इस मानवदेह को पाकर भी जीव आपकी माया से मोहित होकर इसमें मैं-मेरेपन का अभिमान कर लेता है। फिर वह दुर्बुद्धि अपने आत्मीयों से तिरस्कृत होने पर भी असत् विषयों की ही लालसा करता रहता है। किन्तु ऐसी अवस्था में भी जो आपके कथामृत का सेवन करता है, वह इस अन्तःकरण के मोह को सर्वथा त्याग देता है।

ब्राह्मणों ने कहा- भगवन्! आप ही यज्ञ हैं, आप ही हवि हैं, आप ही अग्नि हैं, स्वयं आप ही मन्त्र हैं; आप ही समिधा, कुशा और यज्ञपात्र हैं तथा आप ही सदस्य, ऋत्विज्, यजमान एवं उसकी धर्मपत्नी, देवता, अग्निहोत्र, स्वधा, सोमरस, घृत और पशु हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 28-36 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 28-36 का हिन्दी अनुवाद

सदस्यों ने कहा- जीवों को आश्रय देने वाले प्रभो! जो अनेक प्रकार के क्लेशों के कारण अत्यन्त दुर्गम है, जिसमें कालरूप भयंकर सर्प ताक में बैठा हुआ है, द्वन्दरूप अनेकों गढ़े हैं, दुर्जनरूप जंगली जीवों का भय है तथा शोकरूप दावानल धधक रहा है-ऐसे, विश्राम-स्थल से रहित संसार मार्ग में जो अज्ञाघननी जीव कामनाओं से पीड़ित होकर विषयरूप मृगतृष्णा जल के लिये ही देह-गेह का भारी बोझा सिर पर लिये जा रहे हैं, वे भला आपके चरणकमलों की शरण में कब आने लगे।

रुद्र ने कहा- वरदायक प्रभो! आपके उत्तम चरण इस संसार में सकाम पुरुषों को सम्पूर्ण पुरुषार्थों की प्राप्ति कराने वाले हैं; और जिन्हें किसी भी वस्तु की कामना नहीं है, वे निष्काम मुनिजन भी उनका आदरपूर्वक पूजन करते हैं। उनमें चित्त लगा रहने के कारण यदि अज्ञानी लोग मुझे आहार भ्रष्ट कहते हैं, तो कहें; आपके परम अनुग्रह से मैं उनके कहने-सुनने का कोई विचार नहीं करता।

भृगु जी ने कहा- आपकी गहन माया से आत्मज्ञान लुप्त हो जाने के कारण जो अज्ञान-निद्रा में सोये हुए हैं, वे ब्रह्मादि देहधारी आत्मज्ञान में उपयोगी आपके तत्त्व को अभी तक नहीं जान सके। ऐसे होने पर भी आप अपने शरणागत भक्तों के तो आत्मा और सुहृद् हैं; अतः आप मुझ पर प्रसन्न होइये।

ब्रह्मा जी ने कहा- प्रभो! पृथक्-पृथक् पदार्थों जानने वाली इन्द्रियों के द्वारा पुरुष जो कुछ देखता है, वह आपका स्वरूप नहीं है; क्योंकि आप ज्ञान शब्दादि विषय और श्रोत्रादि इन्द्रियों के अधिष्ठान हैं-ये सब आपमें अध्यस्त हैं। अतएव आप इस मायामय प्रपंच से सर्वथा अलग हैं।

इन्द्र ने कहा- अच्युत! आपका यह जगत् को प्रकाशित करने वाला रूप देवद्रोहियों का संहार करने वाली आठ भुजाओं से सुशोभित है, जिनमें आप सदा ही नाना प्रकार के आयुध धारण किये रहते हैं। यह रूप हमारे मन और नेत्रों को परम आनन्द देने वाला है।

याज्ञिकों की पत्नियों ने कहा- भगवन्! ब्रह्मा जी ने आपके पूजन के लिये ही इस यज्ञ की रचना की थी; परन्तु दक्ष पर कुपित होने के कारण इसे भगवान् पशुपति ने अब नष्ट कर दिया है। यज्ञमूर्ते! श्मशानभूमि के समान उत्सवहीन हुए हमारे उस यज्ञ को आप नील कमल की-सी कान्तिवाले अपने नेत्रों से निराहार पवित्र कीजिये।

ऋषियों ने कहा- भगवन्! आपकी लीला बड़ी ही अनोखी है; क्योंकि आप कर्म करते हुए भी उनसे निर्लेप रहते हैं। दूसरे लोग वैभव की भूख से जिन लक्ष्मी जी की उपासना करते हैं, वे स्वयं आपकी सेवा में लगी रहती हैं; तो भी आप उनका मान नहीं करते, उनसे निःस्पृह रहते हैं।

सिद्धों ने कहा- प्रभो! यह हमारा मनरूप हाथी नाना प्रकार के क्लेश रूप दावानल से दग्ध एवं अत्यन्त तृषित होकर आपकी कथा रूप विशुद्ध अमृतमयी सरिता में घुसकर गोता लगाये बैठा है। वहाँ ब्रह्मानन्द में लीन-सा हो जाने के कारण उसे न तो संसाररूप दावानल का ही स्मरण है और न वह उस नदी से बाहर ही निकलता है।

यजमानपत्नी ने कहा- सर्वसमर्थ परमेश्वर! आपका स्वागत है। मैं आपको नमस्कार करती हूँ। आप मुझ पर प्रसन्न होइये। लक्ष्मीपते! अपनी प्रिय लक्ष्मी जी के सहित आप हमारी रक्षा कीजिये। यज्ञेश्वर! जिस प्रकार सिर के बिना मनुष्य का धड़ अच्छा नहीं लगता, उसी प्रकार अन्य अंगों से पूर्ण होने पर भी आपके बिना यज्ञ की शोभा नहीं होती।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 16-27 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 16-27 का हिन्दी अनुवाद

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- आशुतोष शंकर से इस प्रकार अपना अपराध क्षमा कराकर दक्ष ने ब्रह्मा जी के कहने पर उपाध्याय, ऋत्विज् आदि की सहायता से यज्ञकार्य आरम्भ किया। तब ब्राह्मणों ने यज्ञ सम्पन्न करने के उद्देश्य से रुद्रगण-सम्बन्धी भूत-पिशाचों के संसर्गजनित दोष की शान्ति के लिये तीन पात्रों में विष्णु भगवान् के लिये तैयार किये हुए पुरोडाश नाम चरु का हवन किया।

विदुर जी! उस हवि को हाथ में लेकर खड़े हुए अध्वर्यु के साथ यजमान दक्ष ने ज्यों ही विशुद्ध चित्त से श्रीहरि का ध्यान किया, त्यों ही सहसा भगवान् वहाँ प्रकट हो गये। ‘बृहत्’ एवं ‘रथन्तर’ नामक साम-स्तोत्र जिनके पंख हैं, गरुड़ जी के द्वारा समीप लाये हुए भगवान् ने दसों दिशाओं को प्रकाशित करती हुई अपनी अंगकान्ति से सब देवताओं का तेज हर लिया-उनके सामने सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी। उनका श्याम वर्ण था, कमर में सुवर्ण की करधनी तथा पीताम्बर सुशोभित थे। सिर पर सूर्य के समान देदीप्यमान मुकुट था, मुखकमल भौंरों के समान नीली अलकावली और कान्तिमय कुण्डलों से शोभायमान था, उनके सुवर्णमय आभूषणों से विभूषित आठ भुजाएँ थीं, जो भक्तों की रक्षा के लिये सदा उद्यत रहती हैं। आठों भुजाओं में वे शंख, पद्म, चक्र, बाण, धनुष, गदा, खड्ग और ढाल लिये हुए थे तथा इन सब आयुधों के कारण वे फूले हुए कनेर के वृक्ष के समान जान पड़ते थे। प्रभु के हृदय में श्रीवत्स का चिह्न था और सुन्दर वनमाला सुशोभित थी। वे अपने उदार हास और लीलामय कटाक्ष से सारे संसार को आनन्दमग्न कर रहे थे। पार्षदगण दोनों ओर राजहंस के समान सफ़ेद पंखे और चँवर डुला रहे थे।

भगवान् के मस्तक पर चन्द्रमा के समान शुभ्र छत्र शोभा दे रहा था। भगवान् पधारे हैं- यह देखकर इन्द्र, ब्रह्मा और महादेव जी आदि देवेश्वरों सहित समस्त देवता, गन्धर्व और ऋषि आदि ने सहसा खड़े होकर उन्हें प्रणाम किया। उनके तेज से सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी, जिह्वा लड़खड़ाने लगी, वे सब-के-सब सकपका गये और मस्तक पर अंजलि बाँधकर भगवान् के सामने खड़े हो गये।

यद्यपि भगवान् की महिमा तक ब्रह्मा आदि की मति भी नहीं पहुँच पाती, तो भी भक्तों पर कृपा करने के लिये दिव्यरूप में प्रकट हुए श्रीहरि की वे अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार स्तुति करने लगे। सबसे पहले प्रजापति दक्ष एक उत्तम पात्र में पूजा की सामग्री ले नन्द-सुनन्दादि पार्षदों से घिरे हुए, प्रजापतियों के परमगुरु भगवान् यज्ञेश्वर के पास गये और अति आनन्दित हो विनीतभाव से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते प्रभु के शरणापन्न हुए।

दक्ष ने कहा- भगवन्! अपने स्वरूप में आप बुद्धि की जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं से रहित, शुद्ध, चिन्मय, भेदरहित, अतएव निर्भय हैं। आप माया का तिरस्कार करके स्वतन्त्ररूप से विराजमान हैं; तथापि जब माया से ही जीवभाव को स्वीकार कर उसी माया में स्थित हो जाते हैं, तब अज्ञानी-से दीखने लगते हैं।

ऋत्विजों ने कहा- उपाधिरहित प्रभो! भगवान् रुद्र के प्रधान अनुचर नन्दीश्वर के शाप के कारण हमारी बुद्धि केवल कर्मकाण्ड में ही फँसी हुई है, अतएव हम आपके तत्त्व को नहीं जानते। जिसके लिये ‘इस कर्म का यही देवता है’ ऐसी व्यवस्था की गयी है-उस धर्म प्रवृत्ति के प्रयोजक, वेदत्रयी से प्रतिपादित यज्ञ को ही हम आपका स्वरूप समझते हैं।



साभार krishnakosh.org


श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: सप्तम अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद

दक्ष यज्ञ की पूर्ति.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- महाबाहो! विदुर जी! ब्रह्मा जी के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्नतापूर्वक हँसते हुए कहा-सुनिये।

श्रीमहादेव जी ने कहा- ‘प्रजापते! भगवान् की माया से मोहित हुए दक्ष जैसे नासमझों के अपराध की न तो मैं चर्चा करता हूँ और न याद ही। मैंने तो केवल सावधान करने के लिये ही उन्हें थोड़ा-सा दण्ड दे दिया। दक्ष प्रजापति का सिर जल गया है, इसलिये उनके बकरे का सिर लगा दिया जाये; भगदेव मित्रदेवता के नेत्रों से अपना यज्ञभाग देखें। पूषा पिसा हुआ अन्न खाने वाले हैं, वे उसे यजमान के दाँतों से भक्षण करें तथा अन्य सब देवताओं के अंग-प्रत्यंग भी स्वस्थ हो जायें; क्योंकि उन्होंने यज्ञ से बचे हुए पदार्थों को मेरा भाग निश्चित किया है। अध्वर्यु आदि याज्ञिकों में से जिसकी भुजाएँ टूट गयी हैं, वे अश्विनीकुमार की भुजाओं से और जिनके हाथ नष्ट हो गये हैं, वे पूषा के हाथों से काम करें तथा भृगु जी के बकरे की-सी दाढ़ी-मूँछ हो जाये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- वत्स विदुर! तब भगवान् शंकर के वचन सुनकर सब लोग प्रसन्न चित्त से ‘धन्य! धन्य!’ कहने लगे। फिर सभी देवता और ऋषियों ने महादेव जी से दक्ष की यज्ञशाला में पधारने की प्रार्थना की और तब वे उन्हें तथा ब्रह्मा जी को साथ लेकर वहाँ गये। वहाँ जैसा-जैसा भगवान् शंकर ने कहा था, उसी प्रकार सब कार्य करके उन्होंने दक्ष की धड़ से यज्ञपशु का सिर जोड़ दिया। सिर जुड़ जाने पर रुद्रदेव की दृष्टि पड़ते ही दक्ष तत्काल सोकर जागने के समान जी उठे और अपने सामने भगवान् शिव को देखा। दक्ष का शंकरद्रोही की कालिमा से कलुषित हृदय उनका दर्शन करने से शरत्कालीन सरोवर के समान स्वच्छ हो गया। उन्होंने महादेव जी की स्तुति करनी चाही, किन्तु अपनी मरी हुई बेटी सती का स्मरण हो आने से स्नेह और उत्कण्ठा के कारण उनके नेत्रों में आँसू भर आये। उनके मुख से शब्द न निकल सका। प्रेम से विह्वल, परम बुद्धिमान् प्रजापति ने जैसे-तैसे अपने हृदय के आवेग को रोककर विशुद्धभाव से भगवान् शिव की स्तुति करनी आरम्भ की।

दक्ष ने कहा- भगवन्! मैंने आपका अपराध किया था, किन्तु आपने उसके बदले में मुझे दण्ड के द्वारा शिक्षा देकर बड़ा ही अनुग्रह किया है। अहो! आप और श्रीहरि तो आचारहीन, नाममात्र के ब्राह्मणों की भी उपेक्षा नहीं करते-फिर हम-जैसे यज्ञ-यागादि करने वालों को क्यों भूलेंगे। विभो! आपने ब्रह्मा होकर सबसे पहले आत्मतत्त्व की रक्षा के लिये अपने मुख से विद्या, तप और व्रतादि के धारण करने वालों ब्राह्मणों को उत्पन्न किया था। जैसे चरवाहा लाठी लेकर गौओं की रक्षा करता है, उसी प्रकार आप उन ब्राह्मणों की सब विपत्तियों से रक्षा करते हैं। मैं आपके तत्त्व को नहीं जानता था, इसी से मैंने भरी सभा में आपको अपने वाग्बाणों से बेधा था। किन्तु आपने मेरे उस अपराध का कोई विचार नहीं किया। मैं तो आप-जैसे पूज्यतम महानुभावों का अपराध करने के कारण नरकादि नीच लोकों में गिरने वाला था, परन्तु आपने अपनी करुणाभरी दृष्टि से मुझे उबार लिया। अब भी आपको प्रसन्न करने योग्य मुझमें कोई गुण नहीं हैं; बस, आप अपने ही उदारतापूर्वक बर्ताव से मुझ पर प्रसन्न हों।


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 46-53 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 46-53 का हिन्दी अनुवाद


जो महानुभाव आपके चरणों में अपने को समर्पित कर देते हैं, जो समस्त प्राणियों में आपकी ही झाँकी करते हैं और समस्त जीवों को अभेद दृष्टि से आत्मा में ही देखते हैं, वे पशुओं के समान प्रायः क्रोध के अधीन नहीं होते। जो लोग भेदबुद्धि होने के कारण कर्मों में ही आसक्त हैं, जिनकी नीयत अच्छी नहीं है, दूसरों की उन्नति देखकर जिनका चित्त रात-दिन कुढ़ा करता है और जो मर्मभेदी अज्ञानी अपने दुर्वचनों से दूसरों का चित्त दु:खाया करते हैं, आप-जैसे महापुरुषों के लिये उन्हें भी मारना उचित नहीं हैं; क्योंकि वे बेचारे तो विधाता के ही मारे हुए हैं।

देवदेव! भगवान् कमलनाभ की प्रबल माया से मोहित हो जाने के कारण यदि किसी पुरुष की कभी किसी स्थान में भेदबुद्धि होती है, तो भी साधु पुरुष अपने परदुःखकातर स्वभाव के कारण उस पर कृपा ही करते हैं; दैववश जो कुछ हो जाता है, वे उसे रोकने का प्रयत्न नहीं करते।

प्रभो! आप सर्वज्ञ हैं, परम पुरुष भगवान् की दुस्तर माया ने आपकी बुद्धि का स्पर्श भी नहीं किया है। अतः जिनका चित्त उसके वशीभूत होकर कर्ममार्ग में आसक्त हो रहा है, उनके द्वारा अपराध बन जाये, तो भी उन पर आपको कृपा ही करनी चाहिये।

भगवन्! आप सबके मूल हैं। आप ही सम्पूर्ण यज्ञों को पूर्ण करने वाले हैं। यज्ञभाग पाने का भी आपको पूरा अधिकार है। फिर भी इस दक्षयज्ञ के बुद्धिहीन याजकों ने आपको यज्ञभाग नहीं दिया। इसी से यह आपके द्वारा विध्वंस हुआ। अब आप इस अपूर्ण यज्ञ का पुनरुद्धार करने की कृपा करें।

प्रभो! ऐसा कीजिये, जिससे यजमान दक्ष फिर जी उठे, भगदेवता को नेत्र मिल जायें, भृगु के दाढ़ी-मूँछ आ जायें और पूषा के पहले के ही समान दाँत निकल आयें। रुद्रदेव! अस्त्र-शस्त्र और पत्थरों की बौछार से जिन देवता और ऋत्विजों के अंग-प्रत्यंग घायल हो गये हैं, आपकी कृपा से वे फिर ठीक हो जायें। यज्ञ सम्पूर्ण होने पर जो कुछ शेष रहे, वह सब आपका भाग होगा। यज्ञविध्वंसक! आज यह यज्ञ आपके ही भाग से पूर्ण हो।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 34-45 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 34-45 का हिन्दी अनुवाद

भगवान् भूतनाथ का श्रीअंग बड़ा ही शान्त था। सनन्दनादि शान्त सिद्धगण और सखा-यक्ष-राक्षसों के स्वामी कुबेर उनकी सेवा कर रहे थे। जगत्पति महादेव जी सारे संसार के सुहृद् हैं, स्नेहवश सबका कल्याण करने वाले हैं; वे लोकहित के लिये ही उपासना, चित्त की एकाग्रता और समाधि आदि साधकों का आचरण करते रहते हैं। सन्ध्याकालीन मेघ की-सी कान्ति वाले शरीर पर वे तपस्वियों के अभीष्ट चिह्न-भस्म, दण्ड, जटा और मृगचर्म एवं मस्तक पर चन्द्रकला धारण किये हुए थे। वे एक कुशासन पर बैठे थे और अनेकों साधु श्रोताओं के बीच में श्रीनारद जी के पूछने पर वे सनातन ब्रह्म का उपदेश कर रहे थे। उनका बायाँ चरण दायीं जाँघ पर रखा था। वे बायाँ हाथ बायें घुटने पर रखे, कलाई में रुद्राक्ष की माला डाले तर्कमुद्रा से विराजमान थे। वे योगपट्ट (काठ की बनी हुई टेकनी) का सहारा लिये एकाग्रचित्त से ब्रह्मानन्द का अनुभव कर रहे थे। लोकपालों के सहित समस्त मुनियों ने मननशील में सर्वश्रेष्ठ भगवान् शंकर को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। यद्यपि समस्त देवता और दैत्यों के अधिपति भी श्रीमहादेव जी के चरणकमलों की वन्दना करते हैं, तथापि वे श्रीब्रह्मा जी को अपने स्थान पर आया देख तुरंत खड़े हो गये और जैसे वामनवातार में परमपूज्य विष्णु भगवान् कश्यप जी की वन्दना करते हैं, उसी प्रकार सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया।

इसी प्रकार शंकर जी के चारों ओर जो महर्षि सहित अन्यान्य सिद्धगण बैठे थे, उन्होंने भी ब्रह्मा जी को प्रणाम किया। सबके नमस्कार कर चुकने पर ब्रह्मा जी ने चन्द्रमौलि भगवान् से, जो अब तक प्रणाम की मुद्रा में ही खड़े थे, हँसते हुए कहा।

श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देव! मैं जनता हूँ, आप सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं; क्योंकि विश्व की योनि शक्ति (प्रकृति) और उसके बीज शिव (पुरुष) से परे जो एकरस परब्रह्म है, वह आप ही हैं। भगवन्! आप मकड़ी के समान ही अपने स्वरूपभूत शिव-शक्ति के रूप में क्रीड़ा करते हुए लीला से ही संसार की रचना, पालन और संहार करते रहते हैं। आपने ही धर्म और अर्थ की प्राप्ति कराने वाले वेद की रक्षा के लिये दक्ष को निमित्त बनाकर यज्ञ को प्रकट किया है। आपकी ही बाँधी हुई ये वर्णाश्रम की मर्यादाएँ हैं, जिसका नियमनिष्ठ ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं। मंगलमय महेश्वर! आप शुभ कर्म करने वालों को स्वर्गलोक अथवा मोक्षपद प्रदान करते हैं तथा पापकर्म करने वालों को घोर नरकों में डालते हैं। फिर भी किसी-किसी व्यक्ति के लिये इन कर्मों का फल उलटा कैसे हो जाता है?

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 17-33 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 17-33 का हिन्दी अनुवाद

कटहल, गूलर, पीपल, बड़, गूगल, भोजवृक्ष, ओषध जाति के पेड़ (केले आदि, जो फल आने के बाद काट दिये जाते हैं), सुपारी, राजपूग, जामुन, खजूर, आमड़ा, आम, पियाल, महुआ और लिसौड़ा आदि विभिन्न प्रकार के वृक्षों तथा पोले और ठोस बाँस के झुरमुटों से वह पर्वत बड़ा ही मनोहर मालूम होता है। उसके सरोवरों में कुमुद, उत्पल, कल्हार और शतपत्र आदि अनेक जाति के कमल खिले रहते हैं। उनकी शोभा से मुग्ध होकर कलरव करते हुए झुंड-के-झुंड पक्षियों से वह बड़ा ही भला लगता है। वहाँ जहाँ-तहाँ हरिन, वानर, सूअर, सिंह, रीछ, साही, नीलगाय, शरभ, बाघ, कृष्णमृग, भैंसे, कर्णान्त्र, एकपद, अश्वमुख, भेड़िये और कस्तूरी-मृग घूमते रहते हैं तथा वहाँ के सरोवरों के तट केलों की पंक्तियों से घिरे होने के कारण बड़ी शोभा पाते हैं। उसके चारों ओर नन्दा नाम की नदी बहती है, जिसका पवित्र जल देवी सती के स्नान करने से और भी पवित्र एवं सुगन्धित हो गया है।

भगवान् भूतनाथ के निवास स्थान उस कैलास पर्वत की ऐसी रमणीयता देखकर देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। वहाँ उन्होंने अलका नाम की एक सुरम्य पुरी और सौगान्धिक वन देखा, जिसमें सर्वत्र सुगन्ध फैलाने वाले सौगन्धिक नाम के कमल खिले हुए थे। उस नगर के बाहर की ओर नन्दा और अलकनन्दा नाम की दो नदियाँ हैं; वे तीर्थपाद श्रीहरि की चरण-रज के संयोग से अत्यन्त पवित्र हो गयी हैं।

विदुर जी! उन नदियों में रतिविलास से थकी हुई देवांगनाएँ अपने-अपने निवास स्थान से आकर जलक्रीड़ा करती हैं और उसमें प्रवेश कर अपने प्रियतमों पर जल उलीचती हैं। स्नान के समय उनका तुरंत का लगाया हुआ कुचकुंकुम धुल जाने से जल पीला हो जाता है। उस कुंकुममिश्रित जल को हाथी प्यास न होने पर भी गन्ध के लोभ से स्वयं पीते और अपनी हथिनियों को पिलाते हैं। अलकापुरी पर चाँदी, सोने और बहुमूल्य मणियों के सैकड़ों विमान छाये हुए थे, जिनमें अनेकों यक्षपत्नियाँ निवास करती थीं। इनके कारण वह विशाल नगरी बिजली और बादलों से छाये हुए आकाश के समान जान पड़ती थी। यक्षराज कुबेर की राजधानी उस अलकापुरी को पीछे छोड़कर देवगण सौगन्धिक वन में आये। वह वन रंग-बिरंगे फल, फूल और पत्तों वाले अनेकों कल्पवृक्षों से सुशोभित था। उसमें कोकिल आदि पक्षियों का कलरव और भौरों का गुंजार हो रहा था तथा राजहंसों के परमप्रिय कमलकुसुमों से सुशोभित अनेकों सरोवरों थे। वह वन जंगली हाथियों के शरीर की रगड़ लगने से घिसे हुए हरिचन्दन वृक्षों का स्पर्श करके चलने वाली सुगन्धित वायु के द्वारा यक्षपत्नियों के मन को विशेषरूप से मथे डालता था।

बावलियों की सीढ़ियाँ वैदूर्य मणि की बनी हुई थीं। उसमें बहुत-से कमल खिले रहते थे। वहाँ अनेकों किम्पुरुष जी बहलाने के लिये आये हुए थे। इस प्रकार उस वन की शोभा निहारते जब देवगण कुछ आगे बढ़े, तब उन्हें पास ही एक वट वृक्ष दिखलायी दिया। वह वृक्ष सौ योजन ऊँचा था तथा शाखाएँ पचहत्तर योजन तक फैली हुई थीं। उसके चारों ओर सर्वदा अविचल छाया बनी रहती थी, इसलिये घाम का कष्ट कभी नहीं होता था; तथा उसमे कोई घोंसला भी न था। उस महायोगमय और मुमुक्षों के आश्रयभूत वृक्ष के नीचे देवताओं ने भगवान् शंकर को विराजमान देखा। वे साक्षात् क्रोधहीन काल के समान जान पड़ते थे।


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: षष्ठ अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

ब्रह्मादि देवताओं का कैलास जाकर श्रीमहादेव जी को मनाना

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार जब रुद्र के सेवकों ने समस्त देवताओं को हरा दिया और उनके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग भूत-प्रेतों के त्रिशूल, पट्टिश, खड्ग, गदा, परिघ और मुद्गर आदि आयुधों से छिन्न-भिन्न हो गये, तब वे ऋत्विज् और सदस्यों के सहित बहुत ही डरकर ब्रह्मा जी के पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृतान्त कह सुनाया।

भगवान् ब्रह्मा जी और सर्वान्तर्यामी श्रीनारायण पहले से ही इस भावी उत्पात को जानते थे, इसी से वे दक्ष के यज्ञ में नहीं गये थे। अब देवताओं के मुख से वहाँ की सारी बात सुनकर उन्होंने कहा, ‘देवताओं! परम समर्थ तेजस्वी पुरुष से कोई दोष भी बन जाये तो भी उसके बदले में अपराध करने वाले मनुष्यों का भला नहीं हो सकता। फिर तुम लोगों ने तो यज्ञ में भगवान् शंकर का प्राप्य भाग ने देकर उनका बड़ा भारी अपराध किया है। परन्तु शंकर जी बहुत शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं, इसलिये तुम लोग शुद्ध हृदय से उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो-उनसे क्षमा माँगो। दक्ष के दुर्वचनरूपी बाणों से उनका हृदय तो पहले से ही बिंध रहा था, उस पर उनकी प्रिया सती जी का वियोग हो गया। इसलिये यदि तुम लोग चाहते हो कि वह यज्ञ फिर से आरम्भ होकर पूर्ण हो, तो पहले जल्दी जाकर उनसे अपने अपराधों के लिये क्षमा माँगो। नहीं तो उनके कुपित होने पर लोकपालों के सहित इन समस्त लोकों का भी बचना असम्भव है। भगवान् रुद्र परम स्वतन्त्र हैं, उनके तत्त्व और शक्ति-सामर्थ्य को न तो कोई ऋषि-मुनि, देवता और यज्ञ-स्वरूप देवराज इन्द्र ही जानते हैं और न स्वयं मैं ही जानता हूँ; फिर दूसरों की तो बात ही क्या है। ऐसी अवस्था में उन्हें शान्त करने का उपाय कौन कर सकता है।

देवताओं से इस प्रकार कहकर ब्रह्मा जी उनको, प्रजापतियों को और पितरों को साथ ले अपने लोक से पर्वतश्रेष्ठ कैलास को गये, जो भगवान् शंकर का प्रिय धाम है। उस कैलास पर ओषधि, तप, मन्त्र तथा योग आदि उपायों से सिद्धि को प्राप्त हुए और जन्म से ही सिद्ध देवता नित्य निवास करते हैं; किन्नर, गन्धर्व और अप्सरादि सदा वहाँ बने रहते हैं। उसके मणिमय शिखर हैं, जो नाना प्रकार की धातुओं से रंग-बिरंगे प्रतीत होते हैं। उस पर अनेक प्रकार के वृक्ष, लता और गुल्मादि छाये हुए हैं, जिनमें झुंड-के-झुंड जंगली पशु विचरते रहते हैं। वहाँ निर्मल जल के अनेकों झरने बहते हैं और बहुत-सी गहरी कन्दरा और ऊँचे शिखरों के कारण वह पर्वत अपने प्रियतमों के साथ विहार करती हुई सिद्धपत्नियों का क्रीड़ा-स्थल बना हुआ है। वह सब ओर मोरों के शोर, मदान्ध भ्रमरों के गुंजार, कोयलों की कुहू-कुहू ध्वनि तथा अन्यान्य पक्षियों के कलरव से गूँज रहा है। उसके कल्पवृक्ष अपनी ऊँची-ऊँची डालियों को हिला-हिलाकर मानो पक्षियों को बुलाते रहते हैं। तथा हाथियों के चलने-फिरने के कारण वह कैलास स्वयं चलता हुआ-सा और झरनों की कलकल-ध्वनि से बातचीत करता हुआ-सा जान पड़ता है। मन्दार, पारिजात, सरल, तमाल, शाल, ताड़, कचनार, असन और अर्जुन के वृक्षों से वह पर्वत बड़ा ही सुहावना जान पड़ता है। आम, कदम्ब, नीप, नाग, पुन्नाग, चम्पा, गुलाब, अशोक, मौलसिरी, कुन्द, कुरबक, सुनहरे शतपत्र कमल, इलायची और मालती की मनोहर लताएँ तथा कुब्जक, मोगरा और माधवी की बेलें भी उसकी शोभा बढाती हैं।


साभार krishnakosh.org

सच्चा ज्ञान


सच्चा ज्ञान


एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम के जो बुढे गुरु थे वह कुछ थोड़ी सी बातें जानते थे, रोज उन्हीं को दोहरा देते थे।

फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, 'यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।'

लेकिन उसी रात एक ऐसी घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया?

दरअसल रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत करने और उसकी बातें सुनने।

उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना।

उस युवा संन्यासी के मन में हुआ; 'गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठे हैं, उन्हे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी—कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।'

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि 'आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत—बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा।'

तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि- "आपको मेरी बातें कैसी लगीं?"

बूढा गुरु खिलखिला कर हंसने लगा  और बोला - "तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूँ, तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल भी बोलते ही नहीं हो।"

वह संन्यासी बोला- "मै दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूँ।"

वृद्ध ने कहा- "हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।"

एक ज्ञान वह है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं।

हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें लगता है कि हमें ईश्वर के संबंध में पता है। पर भला ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी-कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है।