श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 25-37 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 25-37 का हिन्दी अनुवाद

सर्वेश्वर! इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझें वैसा दण्ड दें अथवा पुरस्कार रूप में इनकी वृत्ति बढ़ा दें-हम निष्कपट भाव से सब प्रकार आपसे सहमत हैं अथवा हमने आपके इन निरपराध अनुचरों को शाप दिया है, इसके लिये हमीं को उचित दण्ड दें; हमें वह भी सहर्ष स्वीकार है। श्रीभगवान् ने कहा- मुनिगण! आपने इन्हें जो शाप दिया है-सच जानिये, वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये शीघ्र ही दैत्ययोनि को प्राप्त होंगे और वहाँ क्रोधावेश से बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण सुदृढ़ योग सम्पन्न होकर फिर जल्दी ही मेरे पास लौट आयेंगे। श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- तदनन्तर उन मुनीश्वरों ने नयनाभिराम भगवान् विष्णु और उनके स्वयंप्रकाश वैकुण्ठधाम के दर्शन करके प्रभु की परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर तथा उनकी आज्ञा पा भगवान् के ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए प्रमुदित हो वहाँ से लौट गये। फिर भगवान् ने अपने अनुचरों से कहा, ‘जाओ, मन में किसी प्रकार का भय मत करो; तुम्हारा कल्याण होगा। मैं सब कुछ करने में समर्थ होकर भी ब्रह्मतेज को मिटाना नहीं चाहता; क्योंकि ऐसा ही मुझे अभिमत भी है। एक बार जब मैं योगनिद्रा में स्थित हो गया था, तब तुमने द्वार में प्रवेश करती हुई लक्ष्मी जी को रोका था। उस समय उन्होंने क्रुद्ध होकर पहले ही तुम्हें यह शाप दे दिया था। अब दैत्ययोनि में मेरे प्रति क्रोधाकार वृत्ति रहने से तुम्हें जो एकाग्रता होगी, उससे तुम इस विप्र-तिरस्कारजनित पाप से मुक्त हो जाओगे और फिर थोड़े ही समय में मेरे पास लौट आओगे। द्वारपालों को इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान् ने विमानों की श्रेणियों से सुसज्जित अपने सर्वादिक श्रीसम्पन्न धाम में प्रवेश किया। वे देवश्रेष्ठ जय-विजय तो ब्रह्मशाप के कारण उस अलंघनीय भगवद्धाम में ही श्रीहीन हो गये तथा उनका सारा गर्व गलित हो गया। पुत्रों! फिर जब वे वैकुण्ठलोक से गिरने लगे, तब वहाँ श्रेष्ठ विमानों पर बैठे हुए वैकुण्ठवासियों में महान् हाहाकार मच गया। इस समय दिति के गर्भ में स्थित जो कश्यप जी का उग्र तेज है, उसमें भगवान् के उन पार्षद प्रवरों ने ही प्रवेश किया है। उन दोनों असुरों के तेज से ही तुम सबका तेज फीका पड़ गया है। इस समय भगवान् ऐसा ही करना चाहते हैं, जो आदिपुरुष संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण हैं, जिनकी योगमाया को बड़े-बड़े योगिजन भी बड़ी कठिनता से पार पाते हैं-वे सत्त्वादि तीनों गुणों के नियन्ता श्रीहरि ही हमारा कल्याण करेंगे। अब इस विषय में हमारे विशेष विचार करने से क्या लाभ हो सकता है।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 13-24 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 13-24 का हिन्दी अनुवाद


श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- देवताओं! सनकादि मुनि क्रोधरूप सर्प से डसे हुए थे, तो भी उनका चित्त अन्तःकरण को प्रकाशित करने वाली भगवान् की मन्त्रमयी सुमधुर वाणी सुनते-सुनते तृप्त नहीं हुआ। भगवान् की उक्ति बड़ी ही मनोहर और थोड़े अक्षरों वाली थी; किन्तु वह इतनी अर्थपूर्ण, सारयुक्त, दुर्विज्ञेय और गम्भीर थी कि बहुत ध्यान देकर सुनने और विचार करने पर भी वे यह न जान सके कि भगवान् क्या करना चाहते हैं। भगवान् की इस अद्भुत उदारता को देखकर वे बहुत आनन्दित हुए और उनका अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर योगमाया के प्रभाव से अपने परम ऐश्वर्य का प्रभाव प्रकट करने वाले प्रभु से वे हाथ जोड़कर कहने लगे। मुनियों ने कहा- स्वप्रकाश भगवन्! आप सर्वेश्वर होकर भी जो यह कह रहे हैं कि ‘यह आपने मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया’ सो इससे आपका क्या अभिप्राय है-यह हम नहीं जान सके हैं। प्रभो! आप ब्राह्मणों के परम हितकारी हैं; इससे लोक शिक्षा के लिये आप भले ही ऐसा मानें कि ब्राह्मण मेरे आराध्यदेव हैं। वस्तुतः तो ब्राह्मण तथा देवताओं के भी देवता ब्रह्मादि के भी आप ही आत्मा और आराध्यदेव हैं। सनातन धर्म आपसे ही उत्पन्न हुआ है, आपके अवतारों द्वारा ही समय-समय पर उसकी रक्षा होती है तथा निर्विकारस्वरूप आप ही धर्म के परमगुह्य रहस्य हैं-यह शास्त्रों का मत है। आपकी कृपा से निवृत्तिपरायण योगीजन सहज में ही मृत्युरूप संसार सागर से पार हो जाते हैं; फिर भला, दूसरा कोई आप पर क्या कृपा कर सकता है। भगवन्! दूसरे अर्थार्थी जन जिनकी चरणरज सर्वदा अपने मस्तक पर धारण करते हैं, वे लक्ष्मी जी निरन्तर आपकी सेवा में लगी रहती हैं; सो ऐसा जान पड़ता है कि भाग्यवान् भक्तजन आपके चरणों पर जो नूतन तुलसी की मालाएँ अर्पण करते हैं, उन पर गुंजार करते हुए भौरों के समान वे भी आपके पादपद्मों को ही अपना निवास स्थान बनाना चाहती हैं। किन्तु अपने पवित्र चरित्रों से निरन्तर सेवा में तत्पर रहने वाली उन लक्ष्मी जी का भी आप विशेष आदर नहीं करते, आप तो अपने भक्तों से ही विशेष प्रेम रखते हैं। आप स्वयं ही सम्पूर्ण भजनीय गुणों के आश्रय हैं; क्या जहाँ-तहाँ विचरते हुए ब्राह्मणों के चरणों में लगने से पवित्र हुई मार्ग की धूलि और श्रीवत्स का चिह्न आपको पवित्र कर सकते हैं? क्या इनसे आपकी शोभा बढ़ सकती है? भगवन्! आप साक्षात् धर्म स्वरूप हैं। आप सत्यादि तीनों युगों में प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हैं तथा ब्राह्मण और देवताओं के लिये तप, शौच और दया-अपने इन तीन चरणों से इस चराचर जगत् की रक्षा करते हैं। अब आप अपनी शुद्धसत्त्वमयी वरदायिनी मूर्ति से हमारे धर्मविरोधी रजोगुण-तमोगुण को दूर कर दीजिये देव! यह ब्राह्मणकुल आपके द्वारा अवश्य रक्षणीय है। यदि साक्षात् धर्मरूप होकर भी आप सुमधुर वाणी और पूजनादि के द्वारा इस उत्तम कुल की रक्षा न करें तो आपका निश्चित किया हुआ कल्याण मार्ग ही नष्ट हो जाये; क्योंकि लोक तो श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण को ही प्रमाणरूप से ग्रहण करता है। प्रभो! आप सत्त्वगुण की खान हैं और सभी जीवों का कल्याण करने के लिये उत्सुक हैं। इसी से आप अपनी शक्तिरूप राजा आदि के द्वारा धर्म के शत्रुओं का संहार करते हैं; क्योंकि वेदमार्ग का उच्छेद आपको अभीष्ट नहीं है। आप त्रिलोकीनाथ और जगत्प्रतिपालक होकर भी ब्राह्मणों के प्रति इतने नम्र रहते हैं, इससे आपके तेज की कोई हानि नहीं होती; यह तो आपकी लीलामात्र है।
साभार krishnakosh.org

दोस्ती के पूर्व जानने योग्य 3 आवश्यक बाते.


दोस्ती के पूर्व जानने योग्य
3 आवश्यक बाते.

धर्म-ग्रंथ का लक्ष्य मनुष्य को केवल देवी-देवताओं के बारे में ज्ञान देना ही नहीं है, बल्कि हर उस बात को समझाना है, जो उसके लिए जानना जरूरी होती है। धर्म ग्रंथों का पाठ करने या उन्हें सुनने से हमें कई ऐसी बातें पता चलती हैं, जो की उसके जीवन में हर दिन काम आने वाली होती है।

महाभारत के वनपर्व में ऐसी तीन बातों के बारे में कहा गया है, कि किसी से दोस्ती करने से पहले हमें क्या-क्या बातें ध्यान रखनी चाहिए।

श्लोक
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।
ते सेव्यास्तैः समस्या हि शास्त्रेभ्योपि गरीयसी।। 


मनुष्य की शिक्षा और ज्ञान

महाभारत के अनुसार, किसी से भी दोस्ती करने से पहले यह जरूर देखना चाहिए कि उस व्यक्ति के ज्ञान का स्तर क्या है। कई लोगों का मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं होता। फालतू घूमना, हंसी-ठिठोली करना, दूसरों का मजाक उठाना आदि ही उनका स्वभाव होता है। ऐसे लोगों के जितना दूर रहा जाए, उतना ही अच्छा माना जाता है। अच्छी विद्या या ज्ञान वाला मनुष्य ही आपने दोस्तों गलत राह पर चलने से रोक सकता है।


उसके परिवार या परिवार के लोगों की जानकारी

जिस मनुष्य के परिवार में ऐसे लोग रहते हो जो दुष्ट, चोर या पापी प्रवृत्ति के हो, उससे भूलकर भी दोस्ती नहीं करनी चाहिए। चाहे मनुष्य खुद कितना ही अच्छा हो, लेकिन अपने परिवार की आदतों और कर्मों का परिणाम उसे भी झेलना ही पड़ता है। जिस तरह गेंहू के साथ घुन भी पिसता है, उसी तरह विपत्ति आने पर ऐसे व्यक्ति का परिवार उसके साथ-साथ आपके लिए भी मुसीबत का कारण बन सकता है। इसलिए किसी से भी दोस्ती करने से पहले इस बात की जांच जरूर कर लें।


उसकी आदतें और काम

मनुष्य की आदतें और उसका पेशा यानी काम जानना भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी की बुरी आदतों को जाने बिना ही या उन्हें नजरअंदाज करके आप किसी के दोस्ती कर लेंगे तो, कभी ना कभी इनका दुष्परिणाम आपको झेलना ही पड़ेगा। हो सकता है, उसकी आदतों या कामों की वजह से आपको भी अपमानित होना पड़ जाए। इसलिए, दोस्ती करने से पहले सामने वाले की आदतों के बारे में जरूर जान लें। यदि उसमें नशा करना, चोरी करना, बहुत ज्यादा गुस्सा करने जैसी कोई भी बुरी आदत हो तो ऐसा व्यक्ति से दूरी बनाए रखना ही बेहतर होगा।

इन 4 बातों को अपनाकर शांत और सुखी रह सकते हैं.


इन 4 बातों को अपनाकर
शांत और सुखी रह सकते हैं.

जीवन में शांति चाहने वाले लोगों को पहले खुद को शांत करना चाहिए यानी हर काम या हर बात में पहले खुद को संतुष्ट करें। दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करना और खुद मन मारकर रहना भी इसका एक हिस्सा है। हर बात में संतोष कर लेने से धीरे-धीरे जीवन में शांति आने लगती है। जीवन में हमेशा सुख- शांति और खुशियां बनाए रखने के लिए पद्मपुराण में 4 ऐसे काम बताए गए हैं, जिनसे दूर रहना चाहिए। जिस किसी में भी ये 4 आदतें होती हैं, उसके दोस्त और परिवार वाले उससे बार-बार नाराज हो जाते हैं।
1. न करें लड़ाई... 
कई लोगों को बिना कारण ही दूसरों से लड़ने की आदत होती है। इस वजह से कई बार दूसरों से दुश्मनी हो जाती है। इसलिए बिना कारण लड़ाई या दुश्मनी करना घातक हो सकता है। इसके अलावा लोग अपना हक लेने या अपनी बात मनवाने के लिए लड़ाई कर लेते हैं। ऐसा करने से सिर्फ अशांति ही होती है। क्योंकि लड़ाई से सिर्फ जितने वाला इंसान ही संतुष्ट होता है। हारने वाला इंसान अशांत ही रहता है। इसलिए अपनी बात मनावने या अपना हक लेने के लिए प्रेम से या बातचीत से मामले सुलझाना बेहतर है।

2. विवादों से दूर रहें... 
कई बार हम दूसरों के विवादों में इस तरह शामिल हो जाते हैं कि वह विवाद हमारा बन जाता है। इसलिए कभी भी किसी अन्य व्यक्ति के विवाद में शामिल न हों, ऐसी बातों से हमेशा दूर ही रहें। इसके अलावा हर बात कहने या सुनने में सावधानी रखनी चाहिए। किसी की बात या आदत ठीक न लगे तो भी कुछ कहने से बचना चाहिए। इस तरह आप विवादों से दूर रहने की कोशिश करें।

3. बुरा न कहें... 
दूसरों की बुराई करना और उन्हें नीचा दिखाना कई लोगों की आदत होती है। इस चक्कर में मनुष्य अच्छे -बुरे में फर्क नहीं कर पाता। इस वजह से खुद के लिए परेशानियां खड़ी कर लेता है। हमें लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसा हम अपने लिए बर्दाश्त नहीं कर सकते। अपनी बात समझाने या कहने के तरीके में बदलाव करने से किसी को नाराज़गी नहीं रहेगी।

4. दुख ना पहुंचाएं... 
बिना सोचे-समझे बोल देने से कोई भी इंसान सबसे ज्यादा दुखी हो जाता है। शब्द तीर की तरह होते हैं, एक बार मुंह से निकलने के बाद उन्हें वापस नहीं लिया जा सकता। अच्छी बातों से हम किसी के प्रिय बन सकते हैं और तो बुरे शब्दों के प्रयोग से दुश्मन बनने में देर नहीं लगती। आजकल हर इंसान अपने लिए अच्छा ही सुनना चाहता है। तनावभरे जीवन में हर इंसान सकारात्मक होने की कोशिश करता है। इसलिए नकारात्मक बातें करने से बचना चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी को दुख पहुंचे।

गलती होने पर कान क्यों पकड़ते हैं?


गलती होने पर
कान क्यों पकड़ते हैं?


गौतम, वसिष्ठ, आपस्तंब धर्मसूत्रों और पाराशर स्मृति सहित अन्य ग्रंथों में ज्ञान की कई बातें बताई गई हैं। इन ग्रंथों में रहन-सहन के नियम और तरीकों के बारे में बताया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार, हमारे शरीर में पंचतत्वों के अलग-अलग प्रतिनिधि अंग माने गए हैं जैसे- नाक भूमि का, जीभ जल का, आंख अग्नि का, त्वचा वायु का और कान आकाश का प्रतिनिधि अंग। विभिन्न कारणों से शेष सभी तत्व अपवित्र हो जाते हैं, लेकिन आकाश कभी अपवित्र नहीं होता। इसलिए ग्रंथों में दाहिने कान को अधिक पवित्र माना जाता है।

1. मनु स्मृति के अनुसार, मनुष्य के नाभि के ऊपर का शरीर पवित्र है और उसके नीचे का शरीर मल-मूत्र धारण करने की वजह से अपवित्र माना गया है। यही कारण है कि शौच करते समय यज्ञोपवित (जनेऊ) को दाहिने कान पर लपेटा जाता है क्योंकि दायां कान, बाएं कान की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दीक्षा लेता है तो गुरु उसे दाहिने कान में ही गुप्त मंत्र बताते हैं, यही कारण है कि दाएं कान को बाएं की अपेक्षा ज्यादा पवित्र माना गया है।

2. गोभिल गृह्यसूत्र के अनुसार, मनुष्य के दाएं कान में वायु, चंद्रमा, इंद्र, अग्नि, मित्र तथा वरुण देवता निवास करते हैं। इसलिए इस कान को अधिक पवित्र माना गया है।


गोभिल गृह्यसूत्र का श्लोक...
मरुत: सोम इंद्राग्नि मित्रावरिणौ तथैव च।
एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्टन्ति दक्षिणै।।


3. पराशर स्मृति के बारहवें अध्याय के 19 वें श्लोक में बताया गया है कि के छींकने, थूकने, दांत के जूठे होने और मुंह से झूठी बात निकलने पर दाहिने कान का स्पर्श करना चाहिए। इससे मनुष्य की शुद्धि हो जाती है।

पराशर स्मृति का श्लोक...
क्षुते निष्ठीवने चैव दंतोच्छिष्टे तथानृते।
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत्।।

आत्मचिंतन के क्षण.


आत्मचिंतन के क्षण.

👉भाग्य और भविष्य परमात्मा की जबर्दस्त शक्तियाँ हैं। मनुष्य की शक्ति इनके आगे छोटी है, पर वह अपने विवेक से यह निर्णय अवश्य ले सकता है कि उसका जन्म किसलिए हुआ है और वह ईश्वरीय विधान में किस हद तक सहायक हो सकता है। यदि वह इसके लिए तैयार हो सके तो इसी जीवन में अनेक आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करता हुआ, प्रत्येक व्यक्ति आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त कर सकता है। 

👉अच्छाई के विकास में चिन्ता, दुःख और भय भी हमारे सामने आयें तो भी उनके सुखप्रद परिणाम की आशा से हमें उस प्रक्रिया को बंद नहीं कर देना चाहिए। सरल, शुद्ध और सहन करने योग्य दुःखों ने सदैव आत्मा को बलवान् ही बनाया है-उसे ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की अनुभूति ही कराई है। यदि ये दुःख, चिन्ता ,भय, आदि अवरोध प्रेम, दया, कृतज्ञता और विश्वास का अंत करते हों तब हमें एक वीर योद्धा की भाँति उनका सामना भी करना चाहिए।

👉सत्य की उपेक्षा और प्रेम की अवहेलना करके छल, कपट और दम्भ के बल पर कोई कितना ही बड़ा क्यों न बन जाये, किन्तु उसका वह बड़प्पन एक विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ भी न होगा। 


👉हर मनुष्य के जीवन में अवसर आता है, किन्तु एक बार निराश होने पर दुबारा नहीं आता है। किसी भी अवसर से यह आशा करना मृग मरीचिका के तुल्य है कि वह आपका द्वार दुबारा खटखटायेगा। बुद्धिमान् लोग अवसर को आगे से आलिंगन करते हैं, घेरते हैं और पकड़ते हैं, क्योंकि इसके दुम नहीं होती जो आगे बढ़ जाने पर पकड़ी जा सके। 


👉हमें यह भ्रम निकाल ही देना चाहिए कि बेईमानी कुछ कमा सकती है। वह शराब की तरह उत्तेजना मात्र है, जिससे ठगने वाला और ठगा जाने वाला बुद्धिभ्रम में ग्रस्त हो जाते हैं। नशा उतरने पर नशेबाज की जो खस्ता हालत होती है वही पोल खुलने पर बेईमानी की होती है। उसका न कारोबार रहता है, न कोई ग्राहक, सहयोगी। अतएव हमें इस कंटकाकीर्ण पगडण्डी पर चलने की अपेक्षा ईमानदारी के राजमार्ग पर ही चलना चाहिए।



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श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 1-12 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 1-12 का हिन्दी अनुवाद

जय-विजय का वैकुण्ठ से पतन श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देवगण! जब योगनिष्ठ सनकादि मुनियों ने इस प्रकार स्तुति की, तब वैकुण्ठ-निवास श्रीहरि ने उनकी प्रशंसा करते हुए यह कहा।

श्रीभगवान् ने कहा- मुनिगण! ये जय-विजय मेरे पार्षद हैं। उन्होंने मेरी कुछ भी परवा न करके आपका बहुत बड़ा अपराध किया है। आप लोग भी मेरे अनुगत भक्त हैं; अतः इस प्रकार मेरी ही अवज्ञा करने के कारण आपने इन्हें जो दण्ड दिया है, वह मुझे भी अभिमत है। ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरों के द्वारा आप लोगों का जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आप लोगों से प्रसन्नता की भिक्षा माँगता हूँ। सेवकों के अपराध करने पर संसार उनके स्वामी का ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्ति को इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचा को कर्मरोग। मेरी निर्मल सुयश-सुधा में गोता लगाने से चाण्डालपर्यन्त सारा जगत् तुरंत पवित्र हो जाता है, इसीलिये मैं ‘विकुण्ठ’ कहलाता हूँ। किन्तु यह पवित्र कीर्ति मुझे आप लोगों से ही प्राप्त हुई है। इसलिये जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, वह मेरी भुजा हो क्यों न हो-मैं उसे तुरन्त काट डालूँगा। आप लोगों की सेवा करने से ही मेरी चरणरज को ऐसी पवित्रता प्राप्त हुई है कि वह सारे पापों को तत्काल नष्ट कर देती है और मुझे ऐसा सुन्दर स्वभाव मिला है कि मेरे उदासीन रहने पर भी लक्ष्मी जी मुझे एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती-यद्यपि इन्हीं के लेशमात्र कृपाकटाक्ष के लिये अन्य ब्रह्मादि देवता नाना प्रकार के नियमों एवं व्रतों का पालन करते हैं। जो अपने सम्पूर्ण कर्म फल मुझे अर्पण कर सदा सन्तुष्ट रहते हैं, वे निष्काम ब्राह्मण ग्रास-ग्रास पर तृप्त होते हुए घी से तर तरह-तरह के पकवानों का जब भोजन करते हैं, तब उनके मुख से मैं जैसा तृप्त होता हूँ वैसा यज्ञ में अग्निरूप मुख से यजमान की दी हुई आहुतियों को ग्रहण करके नहीं होता। योगमाया का अखण्ड और असीम ऐश्वर्य मेरे अधीन है तथा मेरी चरणोदकरूपिणी गंगाजी चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान् शंकर के सहित समस्त लोकों को पवित्र करती हैं। ऐसा परम पवित्र एवं परमेश्वर होकर भी मैं जिनकी पवित्र चरण-रज को अपने मुकुट पर धारण करता हूँ, उन ब्राह्मणों के कर्म को कौन नहीं सहन करेगा। ब्राह्मण, दूध देने वाली गौएँ और अनाथ प्राणी-ये मेरे ही शरीर हैं। पापों के द्वारा विवेकदृष्टि नष्ट हो जाने के कारण जो लोग इन्हें मुझसे भिन्न समझते हैं, उन्हें मेरे द्वारा नियुक्त यमराज के गृध-जैसे दूत-जो सर्प के समान क्रोधी हैं-अत्यन्त क्रोधित होकर अपनी चोंचो से नोचते हैं। ब्राह्मण तिरस्कारपूर्वक कटुभाषण भी करे, तो भी जो उसमें मेरी भावना मुखकमल से उसका आदर करते हैं तथा जैसे रूठे हुए पिता को पुत्र और आप लोगों को मैं मानता हूँ, उसी प्रकार जो प्रेमपूर्ण वचनों से प्रार्थना करते हुए उन्हें शान्त करते हैं, वे मुझे अपने वश में कर लेते हैं। मेरे इन सेवकों ने मेरा अभिप्राय न समझकर ही आप लोगों का अपमान किया है। इसलिये मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिये कि इनका यह निर्वासन काल शीघ्र ही समाप्त हो जाये, ये अपने अपराध के अनुरूप अधम गति को भोगकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आयें।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 44-50 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 44-50 का हिन्दी अनुवाद


भगवान् का मुख नीलकमल के समान था, अति सुन्दर अधर और कुन्दकली के समान मनोहर हास से उसकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। उसकी झाँकी करके वे कृतकृत्य हो गये और फिर पद्मराग के समान लाल-लाल नखों से सुशोभित उनके चरणकमल देखकर वे उन्हीं का ध्यान करने लगे। इसके पश्चात् वे मुनिगण अन्य साधकों से सिद्ध न होने वाली स्वाभाविक अष्टसिद्धियों से सम्पन्न श्रीहरि की स्तुति करने लगे-जो योगमार्ग द्वारा मोक्षपद की खोज करने वाले पुरुषों के लिये उनके ध्यान का विषय, अत्यन्त आदरणीय और नयनानन्द की वृद्धि करने वाले पुरुषरूप प्रकट करते हैं।

सनकादि मुनियों ने कहा- अनन्त! यद्यपि आप अन्तर्यामीरूप से दुष्टचित्त पुरुषों के हृदय में भी स्थित रहते हैं, तथापि उनकी दृष्टि से ओझल ही रहते हैं। किन्तु आज हमारे नेत्रों के सामने तो आप साक्षात् विराजमान हैं। प्रभो! जिस समय आपसे उत्पन्न हुए हमारे पिता ब्रह्मा जी ने आपका रहस्य वर्णन किया था, उसी समय श्रवणरन्ध्रों द्वारा हमारी बुद्धि में तो आप आ विराजे थे; किन्तु प्रत्यक्ष दर्शन का महान् सौभाग्य तो हमें आज ही प्राप्त हुआ है। भगवन्! हम आपको साक्षात् परमात्मातत्त्व ही जानते हैं। इस समय आप अपने विशुद्ध सत्त्वमय विग्रह से अपने इन भक्तों को आनन्दित कर रहे हैं। आपकी इस सगुण-साकार मूर्ति को राग और अहंकार से मुक्त मुनिजन आपकी कृपा दृष्टि से प्राप्त हुए सुदृढ़ भक्तियोग के द्वारा अपने हृदय में उपलब्ध करते हैं।

प्रभो! आपका सुयश अत्यन्त कीर्तनिय और सांसारिक दुःखों की निवृत्ति करने वाला है। आपके चरणों की शरण में रहने वाले जो महाभाग आपकी कथाओं के रसिक हैं, वे आपके आत्यन्तिक प्रसाद मोक्षपद को कुछ अधिक नहीं गिनते; फिर जिन्हें आपकी जरा-सी टेढ़ी भौंह ही भयभीत कर देती है, उन इन्द्रपद आदि अन्य भोगों के विषय में तो कहना ही क्या है।

भगवन्! यदि हमारा चित्त भौंरे की तरह आपके चरणकमलों में ही रमण करता रहे, हमारी वाणी तुलसी के समान आपके चरणसम्बन्ध से ही सुशोभित हो और हमारे कान आपकी सुयश-सुधा से परिपूर्ण रहें तो अपने पापों के कारण भले ही हमारा जन्म नरकादि योनियों में हो जाये-इसकी हमें कोई चिन्ता नहीं है। विपुलकीर्ति प्रभो! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नेत्रों को बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरुषों के लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त कठिन है। आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रों के सामने प्रकट हुए हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 35-43 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 35-43 का हिन्दी अनुवाद

सनकादि के ये कठोर वचन सुनकर और ब्राह्मणों के शाप को किसी भी प्रकार के शस्त्रसमूह से निवारण होने योग्य न जानकर श्रीहरि के वे दोनों पार्षद अत्यन्त दीनभाव से उनके चरण पकड़कर पृथ्वी पर लोट गये। वे जानते थे कि उनके स्वामी श्रीहरि भी ब्राह्मणों से बहुत डरते हैं। फिर उन्होंने अत्यन्त आतुर होकर कहा- ‘भगवन्! हम अवश्य अपराधी हैं; अतः आपने हमें जो दण्ड दिया है, वह उचित ही है और वह हमें मिलना ही चाहिये। हमने भगवान् का अभिप्राय न समझकर उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया है। इससे हमें जो पाप लगा है, वह आपके दिये हुए दण्ड से सर्वथा धुल जायेगा। किन्तु हमारी इस दुर्दशा का विचार करके यदि करुणावश आपको थोड़ा-सा भी अनुताप हो, तो ऐसी कृपा कीजिये कि जिससे उन अधमाधम योनियों में जाने पर भी हमें भगवत्स्मृति को नष्ट करने वाला मोह न प्राप्त हो। 

इधर जब साधुजनों के हृदयधन भगवान् कमलनाभ को मालूम हुआ कि मेरे द्वारपालों ने सनकादि साधुओं का अनादर किया है, तब वे लक्ष्मी जी के सहित अपने उन्हीं श्रीचरणों से चलकर ही वहाँ पहुँचे, जिन्हें परमहंस मुनिजन ढूँढ़ते रहते हैं- सहज में पाते नहीं। 

सनकादि ने देखा कि उनकी समाधि के विषय श्रीवैकुण्ठनाथ स्वयं उनके नेत्रगोचर होकर पधारे है, उनके साथ-साथ पार्षदगण छत्र-चमरादि लिये चल रहे हैं तथा प्रभु के दोनों ओर राजहंस के पंखों के समान दो श्वेत चँवर डुलाये जा रहे हैं। उनकी शीतल वायु से उनके श्वेत छत्र में लगी हुई मोतियों की झालर हिलती हुई ऐसी शोभा दे रही हैं मानो चन्द्रमा की किरणों से अमृत की बूँदें झर रही हों। प्रभु समस्त सद्गुणों के आश्रय हैं, उनकी सौम्य मुखमुद्रा को देखकर जान पड़ता था मानो वे सभी पर अनवरत कृपासुधा की वर्षा कर रहे हैं। अपनी स्नेहमयी चितवन से वे भक्तों का हृदय स्पर्श कर रहे थे तथा उनके सुविशाल श्याम वक्षःस्थल पर स्वर्णरेखा के रूप में जो साक्षात् लक्ष्मी विराजमान थीं, उनसे मानो वे समस्त दिव्यलोकों के चूड़ामणि वैकुण्ठधाम को सुशोभित कर रहे थे। उनके पीताम्बरमण्डित विशाल नितम्बों पर झिलमिलाती हुई करधनी और गले में भ्रमरों से मुखरित वनमाला विराज रही थी; तथा वे कलाइयों में सुन्दर कंगन पहने अपना एक हाथ गरुड़ जी के कंधे पर रख दूसरे से कमल का पुष्प घुमा रहे थे। उनके अमोल कपोल बिजली की प्रभा को भी लजाने वाले मकराकृत कुण्डलों की शोभा बढ़ा रहे थे, उभरी हुई उघड़ नासिका थी, बड़ा ही सुन्दर मुख था, सिर पर मणिमय मुकुट विराजमान था तथा चारों भुजाओं के बीच महामूल्यवान् मनोहर हार की और गले में कौस्तुभ मणि की अपूर्व शोभा थी। भगवान् का श्रीविग्रह बड़ा ही सौन्दर्यशाली था। उसे देखकर भक्तों के मन में ऐसा वितर्क होता था कि इसके सामने लक्ष्मी जी का सौंदर्याभिमान भी गलित हो गया है। 

ब्रह्मा जी कहते हैं- देवताओं! इस प्रकार मेरे, महादेव जी के और तुम्हारे लिये परम सुन्दर विग्रह धारण करने वाले श्रीहरि को देखकर सनकादि मुनीश्वरों ने उन्हें सिर झुकाकर प्रणाम किया। उस समय उनकी अद्भुत छवि को निहारते-निहारते उनके नेत्र तृप्त नहीं होते थे। सनकादि मुनीश्वर निरन्तर ब्रह्मानन्द में निमग्न रहा करते थे। किन्तु जिस समय भगवान् कमलनयन के चरणारविन्द मकरन्द से मिली हुई तुलसी मंजरी के गन्ध से सुवासित वायु ने नासिका रन्ध्रों के द्वारा उनके अन्तःकरण में प्रवेश किया, उस समय वे अपने शरीर को सँभाल न सके और उस दिव्य गन्ध ने उनके मन में भी खलबली पैदा कर दी।
साभार krishnakosh.org

महाभारत के योद्धाओ की विधवा.


महाभारत के योद्धाओ की विधवा.


महाभारत युद्ध में कई योद्धाओं ने भाग लेकर अपने प्राणों का बलिदान दिया था। जब महाभारत युद्ध समाप्त हो गया, तो विधवा औरतें अपने पतियों की याद में दिन रात आंसू बहाया करती थी। पृथ्वी पर चारों तरफ दुख दुख ही पसरा हुआ था।

जब इस बात का पता श्री कृष्ण को लगा तो उन्होंने सभी औरतों को इकट्ठा किया और गंगा नदी के किनारे दिव्य दृष्टि के माध्यम से उनके पतियों को मिलावाया और स्वर्ग में उनका हाल दिखाया।

उन विधवा महिलाओं ने श्री कृष्ण से आग्रह किया कि वह भी स्वर्ग में अपने पतियों के पास जाना चाहती हैं, तब श्री कृष्ण ने उनके आग्रह को स्वीकार करके, उन सभी महिलाओं को गंगा नदी में डुबकी लगाने के लिए कहा।

महिलाओ ने गंगा नदी में डुबकी लगाई, वे अपने सारे पाप कर्म से मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त हो गई थी।

उसके बाद पृथ्वी पर एक नए सवेरे की शुरुआत हुई जिसके अंतर्गत राजा परीक्षित और पांडवों ने स्वराज व्यवस्था स्थापित की थी।

आत्मचिंतन के क्षण.


आत्मचिंतन के क्षण.

👉 समस्त शुभ-अशुभ, सुख-दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान-पतन के मुख्य कारक विचारों को वश में रखना, मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिए, उनको मंगल मूलक बनाइए, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिए और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुँचा देंगे। इसके विपरीत यदि आपने विचारों को स्वतंत्र छोड़ दिया, उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिए तैयार रहना चाहिए। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।

👉 आज हमारे समाज में काम का फल जल्दी से जल्दी पाने की प्रवृत्ति हो गई है। लोग खेत को बिना जोते ही-बिना बोए या सींचे ही शान्ति और सफलता रूपी फसल काटने को तैयार बैठे हैं। जब कारण ही नहीं, तो कार्य कैसे हो? और जब कार्य नहीं, तो उसका फल कैसे हो सकता है? शून्य से कुछ भी पाने की आशा नहीं की जा सकती है। हमारा मन एक उपजाऊ खेत है, जिससे जो वस्तु चाहो सीधे रास्ते से पैदा कर सकते हो। उसका उचित चिंतन कीजिए। जैसा बोयेंगे-वैसा ही काटेंगे।


👉 आत्मोन्नति का अर्थ है-पशुत्व से मनुष्यत्व की ओर आना। पशुत्व क्या है- मनोविकारों के ऊपर तनिक भी शासन न कर पाना, जब जैसा मनोविकार आया, उसे ज्यों का त्यों प्रकट कर दिया, काम क्षुधा, भूख, प्यास आदि वासनाएँ जैसे ही उत्पन्न हुईं कि तुरन्त उनकी पूर्ति कर ली गई, यह पशुत्व की स्थिति है। जब इन वासनाओं पर संयम आना प्रारंभ होता है और मानवता के उच्चतम गुण-प्रेम, सहानुभूति, करुणा, दया, सहायता, संगठन, सहयोग, समष्टि के लिए व्यक्ति में त्याग इत्यादि भावनाओं का उदय होता है, तो मनुष्य मनुष्यत्व के स्तर पर निवास करता है।



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श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 26-34 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 26-34 का हिन्दी अनुवाद

जिस समय सनकादि मुनि विश्वगुरु श्रीहरि के निवास-स्थान, सम्पूर्ण लोकों के वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओं के विचित्र विमानों से विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाम में अपने योगबल से पहुँचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ। भगवद्दर्शन की लालसा से अन्य दर्शनीय सामग्री की उपेक्षा करते हुए वैकुण्ठधाम की छः ड्योढ़ियाँ पार करके जब वे सातवीं पर पहुँचे, तब वहाँ उन्हें हाथ में गदा लिये दो समान आयु वाले देवश्रेष्ठ दिखलायी दिये- जो बाजूबंद, कुण्डल और किरीट आदि अनेकों अमूल्य आभूषणों से अलंकृत थे। उनकी चार श्यामल भुजाओं के बीच में मतवाले मधुकारों से गुंजायमान वनमाला सुशोभित थी तथा बाँकी भौंहें, फड़कते हुए नासिकारन्ध्र और अरुण नयनों के कारण उनके चेहरे पर कुछ क्षोभ के-से चिह्न दिखायी दे रहे थे। उनके इस प्रकार देखते रहने पर भी वे मुनिगण उनके बिना कुछ पूछताछ किये, जैसे सुवर्ण और वज्रमय किवाड़ों से युक्त पहली छः ड्योढ़ी लाँघकर आये थे, उसी प्रकार उनके द्वार में भी घुस गये। उनकी दृष्टि तो सर्वत्र समान थी और वे निःशंक होकर सर्वत्र बिना किसी रोक-टोक के विचरते थे। वे चारों कुमार पूर्ण तत्त्वज्ञ थे तथा ब्रह्मा की सृष्टि में आयुध में सबसे बड़े होने पर भी देखने में पाँच वर्ष के बालकों-से जान पड़ते थे और दिगम्बर वृत्ति से (नंग-धडंग) रहते थे। उन्हें इस प्रकार निःसंकोच रूप से भीतर जाते देख उन द्वारपालों ने भगवान् के शील-स्वभाव के विपरीत सनकादि के तेज की हँसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक दिया, यद्यपि वे ऐसे दुर्व्यवहार के योग्य नहीं थे। जब उन द्वारपालों ने वैकुण्ठवासी देवताओं के सामने पूजा के सर्वश्रेष्ठ पात्र उन कुमारों को इस प्रकार रोका, तब अपने प्रियतम प्रभु के दर्शनों में विघ्न पड़ने के कारण उनके नेत्र सहसा कुछ-कुछ क्रोध से लाल हो उठे और वे इस प्रकार कहने लगे। 

मुनियों ने कहा- अरे द्वारपालों! जो लोग भगवान् की महती सेवा के प्रभाव से इस लोक को प्राप्त होकर यहाँ निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही समदर्शी होते हैं। तुम दोनों भी उन्हीं में से हो, किन्तु तुम्हारे स्वभाव में यह विषमता क्यों है? भगवान् तो परमशान्त स्वभाव हैं, उनका किसी से विरोध भी नहीं है; फिर यहाँ ऐसा कौन है, जिस पर शंका की जा सके? तुम स्वयं कपटी हो, इसी से अपने ही समान दूसरों पर शंका करते हो। भगवान् के उदर में यह सारा ब्रह्माण्ड स्थित है, इसीलिए यहाँ रहने वाले ज्ञानीजन सर्वात्मा श्रीहरि से अपना कोई भेद नहीं देखते, बल्कि महाकाश में घटाकाश की भाँति उनमें अपना अन्तर्भाव देखते हैं। तुम तो देवरूपधारी हो; फिर भी तुम्हें ऐसा क्या दिखायी देता है, जिससे तुमने भगवान् के साथ कुछ भेदभाव के कारण होने वाले भय की कल्पना कर ली। तुम हो तो इन भगवान् वैकुण्ठनाथ के पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द है। अतएव तुम्हारा कल्याण करने के लिये हम तुम्हारे अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते हैं। तुम अपनी मन्द भेदबुद्धि के दोष से इस वैकुण्ठलोक से निकलकर उन पापमय योनियों में जाओ, जहाँ काम क्रोध, लोभ-प्राणियों के ये तीन शत्रु निवास करते हैं।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 17-25 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 17-25 का हिन्दी अनुवाद

वहाँ विमानचारी गन्धर्वगण अपनी प्रियाओं के सहित अपने प्रभु की पवित्र लीलाओं का गान करते रहते हैं, जो लोगों की सम्पूर्ण पापराशि को भस्म कर देने वाली हैं। उस समय सरोवर में खिली हुई मकरन्दपूर्ण वासन्तिक माधवी लता की सुमधुर गन्ध उनके चित्त को अपनी ओर खींचना चाहती हैं; परन्तु वे उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते वरन उस गन्ध को उड़ाकर लाने वाले वायु को ही बुरा-भला कहते हैं। जिस समय भ्रमराज ऊँचे स्वर से गुंजार करते हुए मानो हरि कथा का गान करते हैं, उस समय थोड़ी देर के लिये कबूतर, कोयल, सारस, चकवे, पपीहे, हंस, तोते, तीतर और मोरों का कोलाहल बंद हो जाता है-मानो वे भी उस कीर्तानानन्द में बेसुध हो जाते हैं। श्रीहरि तुलसी से अपने श्रीविग्रह को सजाते हैं और तुलसी की गन्ध का ही अधिक आदर करते हैं-यह देखकर वहाँ के मन्दार, कुन्द, कुरबक (तिलक वृक्ष), उत्पल (रात्रि में खिलने वाले कमल), चम्पक, अर्ण, पुन्नाग, नाग केसर, बकुल (मौलसिरी), अम्बुज (दिन में खिलने वाले कमल) और पारिजात आदि पुष्प सुगन्धयुक्त होने पर भी तुलसी का ही तप अधिक मानते हैं। वह लोक वैदूर्य, मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्ण के विमानों से भरा हुआ है। ये सब किसी कर्मफल से नहीं, बल्कि एकमात्र श्रीहरि के पाद पद्मों की वन्दना करने से ही प्राप्त होते हैं। उन विमानों पर चढ़े हुए कृष्णप्राण भगवद्भक्तों के चिट्टों में बड़े-बड़े नितम्बों वाली सुमुखी सुन्दरियाँ भी अपनी मन्द मुस्कान एवं मनोहर हास-परिहास से कामविकार नहीं उत्पन्न कर सकतीं। परम सौन्दर्यशालिनी लक्ष्मी जी, जिनकी कृपा प्राप्त करने के लिये देवगण भी यत्नशील रहते हैं, श्रीहरि के भवन में चंचलतारूप दोष को त्यागकर रहती हैं। जिस समय अपने चरणकमलों के नूपुरों की झनकार करती हुई वे अपना लीलाकमल घुमाती हैं, उस समय उस कनकभवन कि स्फटिकमय दीवारों में उनका प्रतिबिम्ब पड़ने से ऐसा जान पड़ता है मानो वे उन्हें बुहार रही हों। प्यारे देवताओं! जिस समय दासियों को साथ लिये वे अपने क्रीड़ावन में तुलसीदल द्वारा भगवान् का पूजन करती हैं, तब वहाँ के निर्मल जल से भरे हुए सरोवरों में, जिनमें मूँगे के घाट बने हुए हैं, अपना सुन्दर अलकावली और उन्नत नासिका से सुशोभित मुखारविन्द देखकर ‘यह भगवान् का चुम्बन किया हुआ है’ यों जानकर उसे बड़ा सौभाग्यशाली समझती हैं। जो लोग भगवान् की पापहारिणी लीला कथाओं को छोड़कर बुद्धि को नष्ट करने वाली अर्थ-काम सम्बन्धिनी अन्य निन्दित कथाएँ सुनते हैं, वे उस वैकुण्ठलोक में नहीं जा सकते। हाय! जब वे अभागे लोग इन सारहीन बातों को सुनते हैं, तब ये उनके पुण्यों को नष्टकर उन्हें आश्रयहीन घोर नरकों में डाल देती हैं। अहा! इस मनुष्य योनि की बड़ी महिमा है, हम देवता लोग भी इसकी चाह करते हैं। इसी में तत्त्वज्ञान और धर्म की भी प्राप्ति हो सकती है। इसे पाकर भी जो लोग भगवान् की आराधना नहीं करते, वे वास्तव में उनकी सर्वत्र फैली हुई माया से ही मोहित हैं। देवाधिदेव श्रीहरि का निरन्तर चिन्तन करते रहने के कारण जिनसे यमराज दूर रहते हैं, आपस में प्रभु के सुयश की चर्चा चलने पर अनुरागजन्य विह्वलतावश जिनके नेत्रों से अविरल अश्रुधारा बहने लगती है तथा शरीर में रोमांच हो जाता है और जिनके-से शील स्वभाव की हम लोग भी इच्छा करते हैं-वे परमभागवत ही हमारे लोकों से ऊपर उस वैकुण्ठधाम में जाते हैं।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: पञ्चदश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

जय-विजय को सनकादि का शाप श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! दिति को अपने पुत्रों से देवताओं को कष्ट पहुँचने की आशंका थी, इसलिये उसने दूसरों के तेज का नाश करने वाले उस कश्यप जी के तेज (वीर्य) को सौ वर्षो तक अपने उदर में ही रखा। उस गर्भस्थ तेज से ही लोकों में सूर्यादि का प्रकाश क्षीण होने लगा तथा इन्द्रादि लोकपाल भी तेजोहीन हो गये। तब उन्होंने ब्रह्मा जी के पास जाकर कहा कि सब दिशाओं में अन्धकार के कारण बड़ी अव्यवस्था हो रही है। देवताओं ने कहा- भगवन्! काल आपकी ज्ञानशक्ति को कुण्ठित नहीं कर सकता, इसलिये आपसे कोई बात छिपी नहीं है। आप इस अन्धकार के विषय में भी जानते ही होंगे, हम तो इससे बड़े ही भयभीत हो रहे हैं। देवाधिदेव! आप जगत् के रचयिता और समस्त लोकपालों के मुकुटमणि हैं। आप छोटे-बड़े सभी जीवों का भाव जानते हैं। देव! आप विज्ञानबल सम्पन्न हैं; आपने माया से ही यह चतुर्भुजरूप और रजोगुण स्वीकार किया है; आपकी उत्पत्ति के वास्तविक कारण को कोई नहीं जान सकता। हम आपको नमस्कार करते हैं। आपमें सम्पूर्ण भुवन स्थित हैं, कार्य-कारणरूप सारा प्रपंच आपका ही शरीर है; किन्तु वास्तव में आप इससे परे हैं। जो समस्त जीवों के उत्पत्ति स्थान आपका अनन्य भाव से ध्यान करते हैं, उन सिद्ध योगियों का किसी प्रकार भी ह्रास नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपके कृपाकटाक्ष से कृतकृत्य हो जाते हैं तथा प्राण, इन्द्रिय और मन को जीत लेने के कारण उनका योग भी परिपक्व हो जाता है। रस्सी में बँधे हुए बैलों की भाँति आपकी वेदवाणी से जकड़ी हुई सारी प्रजा आपकी अधीनता में नियमपूर्वक कर्मानुष्ठान करके आपको बलि समर्पित करती है। आप सबके नियन्ता मुख्य प्राण हैं, हम आपक नमस्कार करते हैं । भूमन्! इस अन्धकार के कारण दिन-रात का विभाग अस्पष्ट हो जाने से लोकों के सारे कर्म लुप्त होते जा रहे हैं, जिससे वे दुःखी हो रहे हैं; उनका कल्याण कीजिये और हम शराणागतों की ओर अपनी अपार दयादृष्टि से निहारिये। देव! आग जिस प्रकार ईधन पकड़कर बढ़ती रहती है, उसी प्रकार कश्यप जी के वीर्य से स्थापित हुआ यह दिति का गर्भ सारी दिशाओं को अन्धकारमय करता हुआ क्रमशः बढ़ रहा है। 

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- महाबाहो! देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान् ब्रह्मा जी हँसे और उन्हें अपनी मधुर वाणी से आनन्दित करते हुए कहने लगे। 

श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देवताओं! तुम्हारे पूर्वज, मेरे मानस पुत्र सनकादि लोकों की आसक्ति त्यागकर समस्त लोकों में आकाश मार्ग से विचरा करते थे। एक बार वे भगवान् विष्णु के शुद्ध-सत्त्वमय सब लोकों के शिरोभाग में स्थित, वैकुण्ठ धाम में जा पहुँचे। वहाँ सभी लोग विष्णुरूप होकर रहते हैं और वह प्राप्त भी उन्हीं को होता है, जो अन्य सब प्रकार की कामनाएँ छोड़कर केवल भगवच्चरण-शरण की प्राप्ति के लिये ही अपने धर्म द्वारा उनकी आराधना करते हैं। वहाँ वेदान्तप्रति पाद्य धर्ममूर्ति श्रीआदि नारायण हम अपने भक्तों को सुख देने के लिये शुद्ध सत्त्वमयस्वरूप धारण कर हर समय विराजमान रहते हैं। उस लोक में नैःश्रेयस नाम का एक वन है, जो मूर्तिमान् कैवल्य-सा ही जान पड़ता है। वह सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करने वाले वृक्षों से सुशोभित है, जो स्वयं हर समय छहों ऋतुओं की शोभा से सम्पन्न रहते हैं।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 33-50 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 33-50 का हिन्दी अनुवाद


दिति बोली- ब्रह्मन्! भगवान् रुद्र भूतों के स्वामी हैं, मैंने उनका अपराध किया है; किन्तु वे भूतश्रेष्ठ मेरे इस गर्भ को नष्ट न करें। मैं भक्तवाञ्छाकल्पतरु, उग्र एवं रुद्ररूप महादेव को नमस्कार करती हूँ। वे सत्पुरुषों के लिये कल्याणकारी एवं दण्ड देने के भाव से रहित हैं, किन्तु दुष्टों के लिये क्रोधमूर्ति दण्डपाणि हैं। हम स्त्रियों पर तो व्याध भी दया करते हैं, फिर वे सतीपति तो मेरे बहनोई और परम कृपालु हैं; अतः वे मुझ पर प्रसन्न हों।

श्रीमैत्रेयजी ने कहा- विदुर जी! प्रजापति कश्यप ने सायंकालीन सन्ध्या-वन्दनादि कर्म से निवृत्त होने पर देखा कि दिति थर-थर काँपती हुई अपनी सन्तान की लौकिक और पारलौकिक उन्नति के लिये प्रार्थना कर रही है। तब उन्होंने उससे कहा।

कश्यप जी ने कहा- तुम्हारा चित्त कामवासना से मलिन था, वह समय भी ठीक नहीं था और तुमने मेरी बात भी नहीं मानी तथा देवताओं की भी अवहेलना की। अमंगलमयी चण्डी! तुम्हारी कोख से दो बड़े ही अमंगलमय और अधम पुत्र उत्पन्न होंगे। वे बार-बार सम्पूर्ण लोक और लोकपालों को अपने अत्याचारों से रुलायेंगे। जब उनके हाथ से बहुत-से निरपराध और दीन प्राणी मारे जाने लगेंगे, स्त्रियों पर अत्याचार होने लगेंगे और महात्माओं को क्षुब्ध किया जाने लगेगा, उस समय सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करने वाले श्रीजगदीश्वर कुपित होकर अवतार लेंगे और इन्द्र जैसे पर्वतों का दमन करता है, उसी प्रकार उनका वध करेंगे।

दिति ने कहा- प्रभो! यही मैं भी चाहती हूँ कि यदि मेरे पुत्रों का वध हो तो वह साक्षात् भगवान् चक्रपाणि के हाथ से ही हो, कुपित ब्राह्मणों के शापादि से न हो। जो जीव ब्राह्मणों के शाप से दग्ध अथवा प्राणियों को भय देने वाला होता है, वह किसी भी योनि में जाये-उस पर नारकी जीव भी दया नहीं करते।

कश्यप जी ने कहा- देवि! तुमने अपने किये पर शोक और पश्चाताप प्रकट किया है, तुम्हें शीघ्र ही उचित-अनुचित का विचार भी हो गया तथा भगवान् विष्णु, शिव और मेरे प्रति भी तुम्हारा बहुत आदर जान पड़ता है; इसलिये तुम्हारे एक पुत्र के चार पुत्रों में से एक ऐसा होगा, जिसका सत्पुरुष भी मान करेंगे और जिसके पवित्र यश को भक्तजन भगवान् के गुणों के साथ गायेंगे। जिस प्रकार खोटे सोने को बार-बार तपाकर शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार साधुजन उसके स्वभाव का अनुकरण करने के लिये निर्वेता आदि उपायों से अपने अन्तःकरण को शुद्ध करेंगे। जिनकी कृपा से उन्हीं का स्वरूपभूत यह जगत् आनन्दित होता है, वे स्वयंप्रकाश भगवान् भी उसकी अनन्यभक्ति से सन्तुष्ट हो जायेंगे।

दिति! वह बालक बड़ा ही भगवद्भक्त, उदारहृदय, प्रभावशाली और महान् पुरुषों का भी पूज्य होगा तथा प्रौढ़ भक्तिभाव से विशुद्ध और भावान्वित हुए अन्तःकरण में श्रीभगवान् को स्थापित करके देहाभिमान को त्याग देगा। वह विषयों में अनासक्त, शीलवान्, गुणों का भंडार तथा दूसरों की समृद्धि में सुख और दुःख में दुःख मानने वाला होगा। उसका कोई शत्रु न होगा तथा चन्द्रमा जैसे ग्रीष्म ऋतु के ताप को हर लेता है, वैसे ही वह संसार के शोक को शान्त करने वाला होगा। जो इस संसार के बाहर-भीतर सब ओर विराजमान हैं, अपने भक्तों के इच्छानुसार समय-समय पर मंगलविग्रह प्रकट करते हैं और लक्ष्मीरूप लावण्यमूर्ति ललना की भी शोभा बढ़ाने वाले हैं तथा जिनका मुखमण्डल झिलमिलाते हुए कुण्डलों से सुशोभित है-उन परम पवित्र कमलनयन श्रीहरि का तुम्हारे पौत्र को प्रत्यक्ष दर्शन होगा।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! दिति ने जब सुना कि मेरा पौत्र भगवान् का भक्त होगा, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ तथा यह जानकर कि मेरे पुत्र साक्षात् श्रीहरि के हाथ से मारे जायेंगे, उसे और भी अधिक उत्साह हुआ।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 18-32 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 18-32 का हिन्दी अनुवाद

मानिनी! स्त्री को तो विविध पुरुषार्थ की कामना वाले पुरुष का आधा अंग कहा गया है। उस पर अपनी गृहस्थी का भार डालकर पुरुष निश्चिन्त होकर बिचरता है। इन्द्रियरूप शत्रु अन्य आश्रम वालों के लिये अत्यन्त दुर्जय हैं; किन्तु जिस प्रकार किले का स्वामी सुगमता से ही लूटने वाले शत्रुओं को अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार हम अपनी विवाहिता पत्नी का आश्रय लेकर इन इन्द्रियरूप शत्रुओं को सहज में ही जीत लेते हैं। गृहेश्वरि! तुम-जैसी भार्या के उपकारों का बदला तो हम अथवा और कोई गुणग्राही पुरुष अपनी सारी उम्र अथवा जन्मान्तर में भी पूर्णरूप से नहीं चुका सकते। तो भी तुम्हारी इस सन्तान-प्राप्ति की इच्छा को मैं यथाशक्ति अवश्य पूर्ण करूँगा। परन्तु अभी तुम एक मुहूर्त ठहरो, जिससे लोग मेरी निन्दा न करें। यह अत्यन्त घोर समय राक्षसादि घोर जीवों का है और देखने में भी बड़ा भयानक है। इसमें भगवान् भूतनाथ के गण भूत-प्रेतादि घूमा करते हैं। साध्वी! इस सन्ध्याकाल में भूतभावन भूतपति भगवान् शंकर अपने गण भूत-प्रेतादि को साथ लिये बैल पर चढ़कर बिचरा करते हैं। जिनका जटाजूट श्मशाम भूमि से उठे हुए बवंडर की धूलि से धूसरित होकर देदीप्यमान हो रहा है तथा जिनके सुवर्ण-कान्तिमय गौर शरीर में भस्म लगी हुई है, वे तुम्हारे देवर (श्वशुर) महादेव जी अपने सूर्य, चन्द्रमा और अग्निरूप तीन नेत्रों से सभी को देखते रहते हैं। संसार में उनका कोई अपना या पराया नहीं है। न कोई अधिक आदरणीय और न निन्दनीय ही है। हम लोग तो अनेक प्रकार के व्रतों का पालन करके उनकी माया को ही ग्रहण करना चाहते हैं, जिसे उन्होंने भोगकर लात मार दी है। विवेकी पुरुष अविद्या के आवरण को हटाने की इच्छा से उनके निर्मल चरित्र का गान किया करते हैं; उनसे बढ़कर तो क्या, उनके समान भी कोई नहीं है और उन तक केवल सत्पुरुषों की ही पहुँच है। यह सब होने पर भी वे स्वयं पिशाचों का-सा आचरण करते हैं। यह नर शरीर कुत्तों का भोजन है; जो अविवेकी पुरुष आत्मा मानकर वस्त्र, आभूषण, माला और चन्दनादि से इसी को सजाते-सँवारते रहते हैं-वे अभागे ही आत्माराम भगवान् शंकर के आचरण पर हँसते हैं। हम लोग तो क्या, ब्रह्मादि लोकपाल भी उन्हीं की बाँधी हुई धर्म-मर्यादा का पालन करते हैं; वे ही इस विश्व के अधिष्ठान हैं तथा यह माया भी उन्हीं की आज्ञा का अनुसरण करने वाली है। ऐसे होकर भी वे प्रेतों का-सा आचरण करते हैं। अहो! उन जगद्व्यापक प्रभु की यह अद्भुत लीला कुछ समझ में नहीं आती’। 

मैत्रेय जी ने कहा- पति के इस प्रकार समझाने पर भी कामातुरा दिति ने वेश्या के समान निर्लज्ज होकर ब्रह्मार्षि कश्यप जी का वस्त्र पकड़ लिया। तब कश्यप जी ने उस निन्दित कर्म में अपनी भार्या का बहुत आग्रह देख दैव को नमस्कार किया और एकान्त में उसके साथ समागम किया। फिर जल में स्नान कर प्राण और वाणी का संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्म का ध्यान करते हुए उसी का जप करने लगे। विदुर जी! दिति को भी उस निन्दित कर्म के कारण बड़ी लज्जा आयी और वह ब्रह्मार्षि के पास जा, सिर नीचा करके इस प्रकार कहने लगी।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद

दिति का गर्भधारण श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! प्रयोजनवश सूकर बने श्रीहरि की कथा को मैत्रेय जी के मुख से सुनकर भी भक्तिव्रतधारी विदुर जी की पूर्ण तृप्ति न हुई; अतः उन्होंने हाथ जोड़कर फिर पूछा। विदुर जी ने कहा- मुनिवर! हमने यह बात आपके मुख से अभी सुनी है कि आदिदैत्य हिरण्याक्ष को भगवान् यज्ञमूर्ति ने ही मारा था। ब्रह्मन्! जिस समय भगवान् लीला से ही अपनी दाढ़ों पर रखकर पृथ्वी को जल में से निकाल रहे थे, उस समय उनसे दैत्यराज हिरण्याक्ष की मूठभेड़ किस कारण हुई? 

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! तुम्हारा प्रश्न बड़ा ही सुन्दर है; क्योंकि तुम श्रीहरि की अवतार कथा के विषय में ही पूछ रहे हो, जो मनुष्यों के मृत्युपाश का छेदन करने वाली है। देखो! उत्तानपाद का पुत्र ध्रुव बालकपन में श्रीनारद जी की सुनायी हुई हरिकथा के प्रभाव से ही मृत्यु के सिर पर पैर रखकर भगवान् के परमपद पर आरूढ़ हो गया था। पूर्वकाल में एक बार इसी वराह भगवान् और हिरण्याक्ष के युद्ध के विषय में देवताओं के प्रश्न करने पर देवदेव श्रीब्रह्मा जी ने उन्हें यह इतिहास सुनाया था और उसी के परम्परा से मैंने सुना है। विदुर जी! 

एक बार दक्ष की पुत्री दिति ने पुत्रप्राप्ति की इच्छा से कामातुर होकर सायंकाल के समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यप जी से प्रार्थना की। उस समय कश्यप जी खीर की आहुतियों द्वारा अग्निजिह्व भगवान् यज्ञपति की आराधना कर सूर्यास्त का समय जान अग्निशाला में ध्यानस्थ होकर बैठे थे। दिति ने कहा- विद्वन्! मतवाला हाथी जैसे केले के वृक्ष को मसल डालता है, उसी प्रकार यह प्रसिद्ध धनुर्धर कामदेव मुझ अबला पर जोर जताकर आपके लिये मुझे बेचैन कर रहा है। अपनी पुत्रवती सौतों की सुख-समृद्धि को देखकर मैं ईर्ष्या की आग से जली जाती हूँ। अतः आप मुझ पर कृपा कीजिये, आपका कल्याण हो। जिनके गर्भ से आप-जैसा पति पुत्ररूप से उत्पन्न होता है, वे ही स्त्रियाँ अपने पतियों से सम्मानित समझी जाती हैं। उनका सुयश संसार में सर्वत्र फैल जाता है। हमारे पिता प्रजापति दक्ष का अपनी पुत्रियों पर बड़ा स्नेह था। एक बार उन्होंने हम सबको अलग-अलग बुलाकर पूछा कि ‘तुम किसे अपना पति बनाना चाहती हो?’ वे अपनी सन्तान की सब प्रकार की चिन्ता रखते थे। अतः हमारा भाव जानकर उन्होंने उनमें से हम तेरह पुत्रियों को, जो आपके गुण-स्वभाव के अनुरूप थीं, आपके साथ ब्याह दिया। अतः मंगलमूर्ते! कमलनयन! आप मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये; क्योंकि हे महत्तम! आप-जैसे महापुरुषों के पास दीनजनों का आना निष्फल नहीं होता'। विदुर जी! 

दिति कामदेव के वेग से अत्यन्त बेचैन और बेबस हो रही थी। उसने इसी प्रकार बहुत-सी बातें बनाते हुए दीन होकर कश्यप जी से प्रार्थना की, तब उन्होंने उसे सुमधुर वाणी से समझाते हुए कहा। ‘भीरु! तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैं अभी-अभी तुम्हारा प्रिय अवश्य करूँगा। भला, जिसके द्वारा अर्थ, कर्म और काम- तीनों की सिद्धि होती है, अपनी ऐसी पत्नी की कामना कौन पूर्ण नहीं करेगा? जिस जहाज पर चढ़कर मनुष्य महासागर को पार कर लेता है, उसी प्रकार ग्रहस्थाश्रमी दूसरे आश्रमों को आश्रय देता हुआ अपने आश्रम द्वारा स्वयं भी दुःखसमुद्र के पार हो जाता है।
साभार krishnakosh.org

आत्मचिंतन के क्षण.


आत्मचिंतन के क्षण.

ये है तलवार कुछ भी काट दे, इतनी है धार- शत्रु का विनाश करने में सक्षम, दूसरी ओर है- ये ढाल किसी भी प्रहार को सहपाने में सक्षम, शत्रु से रक्षा की ढाल, रक्षा की दीवार है। इन दोनों के कार्य भिन्न हैं, इन दोनों का उद्देश्य भिन्न है, लेकिन इन दोनों का मूल एक ही हैं। दोनों बने हैं, लोहे से। लोहे के खण्ड से बनी है-ये तलवार, लोहे के खण्ड से बनी है-ये ढाल। तलवार का मंतव्य है-प्रहार, और ढाल का मंतव्य है-बचाव। अन्तर कितना है? अन्तर है-केवल सोच का। ये सोच ही है जो सच बनकर सामने आती है, संसाधन कभी भी व्यक्ति को सुखी नहीं करते, किन्तु सोच व्यक्ति का व्यक्तित्व बनाती है। या तो आप इन संसाधनों का प्रयोग नाश करने के लिये करो, या इन संसाधनों का प्रयोग, उद्धार करने के करो। चयन आपका है।

इस वृक्ष को देख रहे हैं-आप कितना अडिग, दिनभर धूप में खड़ा रहता है, धूप में बैठने वाले को छाया देने के लिए। अब जैसे-जैसे समय बीतता है, वैसे-वैसे इस वृक्ष की टहनियों पर पत्तों के साथ-साथ फूल खिलने लगते हैं। ये फूल बाद में फल बन जाते हैं। अब समय के साथ-साथ जब ऋतु बदलती है, तो ये फल तोड़े जाते हैं। कुछ फल गिर जाते हैं। पतझर आने पर इस पेड़ के पत्ते तक इसका साथ छोड़ देते हैं। किन्तु ये वृक्ष अडिग रहता है। नये फलों के आने का इंतजार करता रहता है। न फलों के आने का उत्सव मनाता है, न पतझड़ के आने का शोक और हम इस वृक्ष की पूजा करते हैं। क्योंकि ये वृक्ष अपने स्थान पर अडिग रहता है। इसी प्रकार सुख और दुःख हमारे जीवन का अभिन्न अंग हैं। सुख और दुःख हमेशा रहेंगे, इसलिये न कभी सुख के आने पर अभिमान से भर जाएँ, न कभी दुःख के आने पर शोक मनाएँ। क्योंकि सुख और दुःख जीवनरूपी वृक्ष के फल हैं, ये आते रहेंगे-जाते रहेंगे लेकिन सुख और दुःख में व्यक्ति अडिग होगा, वही पूजनीय होगा।

हीरा। हमारे लिए अत्यंत प्रिय, अत्यंत चमकदार, हीरे की चमक तो सभी जानते हैं। किन्तु ये चमक आती कैसे है? किसी दूसरे हीरे से इस हीरे को तराशा गया है। तब जाके ये संभव हो पाया है। कितनी अच्छी बात है। स्वयं से स्वयं को तराशो और स्वयं को ही और बेहतर बना दो। अब सोचिये क्या कीचड़ से कीचड़ को साफ किया जा सकता है? नहीं। उसके लिये आपको आवश्यकता होगी शुद्ध-निर्मल जल की। इसी प्रकार अच्छाई से अच्छाई को, और भी सुन्दर बनाया जा सकता है, किन्तु बुराई से बुराई को सुधारा नहीं जा सकता। सर्वप्रथम अपने मन को पावन करें, अपने मन को शुद्ध करें और फिर देखें इस दृष्टि से संसार को। ये संसार अपने आप शुद्ध लगने लगेगा। यदि किसी में आप विकार देखो तो शुभ कर्म करके उसका विकार दूर करो, उसकी सहायता करो। ना कि उसके विकार देख के स्वयं के मन में विकार लाओ। क्योंकि आप हीरे हो, किसी और हीरे को तराशने में उसकी सहायता करो। अच्छा लगेगा।



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सच्चे मित्र.


सच्चे मित्र.

कोई भी व्यक्ति संसार में अकेला नहीं जी सकता, क्योंकि वह अल्पशक्तिमान् है। इसलिए अपने सारे काम स्वयं नहीं कर सकता। एक दूसरे की सहायता लेनी ही पड़ती है। और सब लोग, सब की सहायता करते नहीं। सहायता लेने देने के लिए एक आपसी संबंध होता है, जिसे मित्रता कहते हैं। मित्र का अर्थ होता है, स्नेह करने वाला. यह स्नेह संबंध चाहे मां बेटी में हो, चाहे पिता पुत्र में हो, चाहे पति-पत्नी में हो, चाहे दो दोस्तों में हो, इन सब में जो स्नेह का संबंध है, वही मित्रता है।

मित्र ऐसा बनाएं, जो एक दूसरे के कष्ट को समझे, और हृदय से उसकी समस्याओं को दूर करने का पूरा प्रयत्न करे।

संसार में आपको बहुत से ऐसे लोग मिलेंगे, जिनमें इस प्रकार की मित्रता देखी जाती है। उदाहरण के लिए यदि बेटा बीमार हो जाए, तो माता-पिता को नींद नहीं आती। दिन-रात उसकी सेवा करते हैं। और पूरी शक्ति लगाकर वैद्य डॉक्टरों की सहायता से उसे स्वस्थ बना देते हैं। ऐसे ही यदि माता पिता को कष्ट हो, यदि वे रोगी या वृद्ध हो जाएँ, तो बच्चों को भी वैसी ही सेवा करनी चाहिए, जैसी माता पिता अपने बच्चों की करते हैं। बस इसी संबंध का नाम सच्ची मित्रता है। अन्यथा बहुत से लोग मित्रता का केवल दिखावा करते हैं। सच्ची मित्रता, सच्चा स्नेह उनमें नहीं होता। ऐसे नकली मित्रों से और नकली रिश्तेदारों से सावधान रहें।

सब लोगों को पहचानें। जो हृदय से सेवा करते हैं, सच्चे मित्र हैं, उनके साथ ही जीवन जीने में, जीवन का सच्चा आनंद है।

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श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 42-50 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 42-50 का हिन्दी अनुवाद

नाथ! चराचर जीवों के सुखपूर्वक रहने के लिये आप अपनी पत्नी इन जगन्माता पृथ्वी को जल पर स्थापित कीजिये। आप जगत् के पिता हैं और अरणि में अग्निस्थापन के समान आपने इसमें धारण शक्तिरूप अपना तेज स्थापित किया है। हम आपको और इस पृथ्वीमाता को प्रणाम करते हैं। प्रभो! रसातल में डूबी हुई इस पृथ्वी को निकालने का साहस आपके सिवा और कौन कर सकता था। किंतु आप तो सम्पूर्ण आश्चर्यों के आश्रय हैं, आपके लिये यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। आपने ही तो अपनी माया से इस अत्याश्चार्यमय विश्व की रचना की। जब आप अपने वेदमय विग्रह को हिलाते हैं, तब हमारे ऊपर आपकी गरदन के बालों से झरती हुई शीतल बूँदें गिरती हैं। ईश! उनसे भीगकर हम जनलोक, तपलोक और सत्यलोक में रहने वाले मुनिजन सर्वथा पवित्र हो जाते हैं। जो पुरुष आपके कर्मों का पार पाना चाहता है, अवश्य ही उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी है; क्योंकि आपके कर्मों का कोई पार ही नहीं है। आपकी योगमाया के सात्वादि गुणों से यह सारा जगत् मोहित हो रहा है। भगवन्! आप इसका कल्याण कीजिये। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! उन ब्रह्मवादी मुनियों के इस प्रकार स्तुति करने पर सबकी रक्षा करने वाले वराह भगवान् अपने खुरों से जल को स्तम्भित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। इस प्रकार रसातल से लीलापूर्वक लायी हुई पृथ्वी को जल पर रखकर वे विष्वक्सेन प्रजापति भगवान् श्रीहरि अन्तर्धान हो गये। विदुर जी! भगवान् के लीलामय चरित्र अत्यन्त कीर्तनिय हैं और उनमें लगी हुई बुद्धि सब प्रकार के पाप-तापों को दूर कर देती है। जो पुरुष उनकी इस मंगलमयी मंजुल कथा को भक्तिभाव से सुनता या सुनाता है, उसके प्रति भक्तवत्सल भगवान् अन्तस्तल से बहुत शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान् तो सभी कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं, उनके प्रसन्न होने पर संसार में क्या दुर्लभ है। किन्तु उन तुच्छ कामनाओं की आवश्यकता ही क्या है? जो लोग उनका अनन्यभाव से भजन करते हैं, उन्हें तो वे अन्तर्यामी परमात्मा स्वयं अपना परमपद ही दे देते हैं। अरे! संसार में पशुओं को छोड़कर अपने पुरुषार्थ का सार जानने वाला ऐसा कौन पुरुष होगा, जो आवागमन से छुड़ा देने वाली भगवान् की प्राचीन कथाओं में से एक बार पान करके फिर उनकी ओर से मन हटा लेगा।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 31-41 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 31-41 का हिन्दी अनुवाद

फिर वे जल में डूबी हुई पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर लेकर रसातल से ऊपर आये। उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। जल से बाहर आते समय उनके मार्ग में विघ्न डालने के लिये महापराक्रमी हिरण्याक्ष ने जल के भीतर ही उन पर गदा से आक्रमण किया। इससे उनका क्रोध चक्र के समान तीक्ष्ण हो गया और उन्होंने उसे लीला से ही इस प्रकार मार डाला, जैसे सिंह हाथी को मार डालता है। उस समय उसके रक्त से थूथनी तथा कनपटी सन जाने के कारण वे ऐसे जान पड़ते थे मानो कोई गजराज लाल मिट्टी के टीले में टक्कर मारकर आया हो। तात! जैसे गजराज अपने दाँतों पर कमल-पुष्प धारण कर ले, उसी प्रकार अपने सफ़ेद दाँतों की नोक पर पृथ्वी को धारण कर जल से बाहर निकले हुए, तमाल के समान नीलवर्ण वराह भगवान् को देखकर ब्रह्मा, मरीचि आदि को निश्चय को हो गया कि ये भगवान् ही हैं। तब वे हाथ जोड़कर वेदवाक्यों से उनकी स्तुति करने लगे। ऋषियों ने कहा- भगवान् अजित्! आपकी जय हो, जय हो। यज्ञपते! आप अपने वेदत्रयीरूप विग्रह को फटकार रहे हैं; आपको नमस्कार हैं। आपके रोम-कूपों में सम्पूर्ण यज्ञ लीन हैं। आपसे पृथ्वी का उद्धार करने के लिये ही यह सूक्ष्मरूप धारण किया है; आपको नमस्कार है। देव! दुराचारियों को आपके इस शरीर का दर्शन होना अत्यन्त कठिन है; क्योंकि यह यज्ञरूप है। इसकी त्वचा में गायत्री आदि छन्द, रोमावली में कुश, नेत्रों में घृत तथा चारों चरणों में होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा- इन चारों ऋत्विजों के कर्म हैं। ईश! आपकी थूथनी (मुख के अग्रभाग) में स्त्रुक् है, नासिका-छिद्रों में स्रुवा है, उदार में इडा (यज्ञीय भक्षण पात्र) है, कानों में चमस है, मुख में प्राशित्र (ब्रह्म भाग पात्र) है और कण्ठछिद्र में ग्रह (सोमपात्र) है। भगवन्! आपका जो चबाना है, वही अग्निहोत्र है। बार-बार अवतार लेना यज्ञस्वरूप आपकी दीक्षणीय इष्टि है, गरदन उपसद (तीन इष्टियाँ) हैं; दोनों दाढ़ें प्रायणीय (दीक्षा के बाद की इष्टि) और उदयनीय (यज्ञसमाप्ति की इष्टि हैं; जिह्वा प्रवर्ग्य (प्रत्येक उपसद के पूर्व किया जाने वला महावीर नामक कर्म) है, सिर सभ्य (होमरहित अग्नि) और आवसभ्य (औपासनाग्नि) हैं तथा प्राण चिति (इष्टकाचयन) हैं। देव! आपका वीर्य सोम है; आसन (बैठना) प्रातःसवनादि तीन सवन हैं; सातों धातु अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम नाम की सात संस्थाएँ हैं तथा शरीर की सन्धियाँ (जोड़) सम्पूर्ण सत्र हैं। इस प्रकार आप सम्पूर्ण यज्ञ (सोमरहित याग) और क्रतु (सोमरहित याग) रूप है। यज्ञानुष्ठानरूप इष्टियाँ आपके अंगों को मिलाये रखने वाली मांसपेशियाँ हैं। समस्त मन्त्र, देवता, द्रव्य, यज्ञ और कर्म आपके ही स्वरूप हैं; आपको नमसकर है। वैराग्य, भक्ति और मन की एकाग्रता से जिस ज्ञान का अनुभव होता है, वह आपका स्वरूप ही है तथा आप ही सबके विद्यागुरु है; आपको पुनः-पुनः प्रणाम है। पृथ्वी को धारण करने वाले भगवन्! आपकी दाढ़ों की नोक पर रखी हुई यह पर्वतादि-मण्डित पृथ्वी ऐसी सुशोभित हो रही है, जैसे वन में से निकलकर बाहर आये हुए किसी गजराज के दाँतों पर पत्रयुक्त कमलिनी रखी हो। आपके दाँतों पर रखे हुए भूमण्डल के सहित आपका यह वेदमय वराहविग्रह ऐसा सुशोभित हो रहा है, जैसे शिखरों पर छायी हुई मेघमाला से कुलपर्वत की शोभा होती है।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 18-30 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 18-30 का हिन्दी अनुवाद

निष्पाप विदुर जी! ब्रह्मा जी इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि उनके नासिकाछिद्र से अकस्मात् अँगूठे के बराबर आकार का एक वाराह-शिशु निकला। भारत! बड़े आश्चर्य की बात तो यही हुई कि आकाश में खड़ा हुआ वह वाराह-शिशु ब्रह्मा जी के देखते-ही-देखते बड़ा होकर क्षण भर में हाथी के बराबर हो गया। उस विशाल वाराह-मूर्ति को देखकर मरीचि आदि मुनिजन, सनकादि और स्वायम्भुव मनु के सहित श्रीब्रह्मा जी तरह-तरह के विचार करने लगे- अहो! सूकर के रूप में आज यह कौन दिव्य प्राणी यहाँ प्रकट हुआ है? कैसा आश्चर्य है! यह अभी-अभी मेरी नाक से निकला था। पहले तो यह अँगूठे के पोरुए के बराबर दिखायी देता था, किन्तु एक क्षण में ही बड़ी भारी शिला के समान हो गया। अवश्य ही यज्ञमूर्ति भगवान् हम लोगों के मन को मोहित कर रहे हैं। ब्रह्मा जी और उनके पुत्र इस प्रकार सोच ही रहे थे कि भगवान् यज्ञपुरुष पर्वताकार होकर गरजने लगे। सर्वशक्तिमान् श्रीहरि ने अपनी गर्जना से दिशाओं को प्रतिध्वनित करके ब्रह्मा और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को हर्ष से भर दिया। अपना खेद दूर करने वाली मायामय वराह भगवान् की घुरघुराहट को सुनकर वे जनलोक, तपलोक और सत्यलोक निवासी मुनिगण तीनों वेदों के परम पवित्र मन्त्रों से उनकी स्तुति करने लगे। भगवान् के स्वरूप का वेदों में विस्तार से वर्णन किया गया है; अतः उन मुनीश्वरों ने जो स्तुति की, उसे वेदरूप मानकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और एक बार फिर गरजकर देवताओं के हित के लिये गजराज की-सी लीला करते हुए जल में घुस गये। पहले से सूकररूप भगवान् पूँछ उठाकर बड़े वेग से आकाश में उछले और अपनी गर्दन के बालों को फटकारकर खुरों के आघात से बादलों को छितराने लगे। उनका शरीर बड़ा कठोर था, त्वचा पर कड़े-कड़े बाल थे, दाढ़े सफ़ेद थीं और नेत्रों से तेज निकल रहा था, उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रही थी। भगवान् स्वयं यज्ञपुरुष हैं तथापि सूकर रूप धारण करने के कारण अपनी नाक से सूँघ-सूँघकर पृथ्वी का पता लगा रहे थे। उनकी दाढ़े बड़ी कठोर थीं। इस प्रकार यद्यपि वे बड़े क्रूर जान पड़ते थे, तथापि अपनी स्तुति करने वाले मरीचि आदि मुनियों की और बड़ी सौम्य दृष्टि से निहारते हुए उन्होंने जल में प्रवेश किया। जिस समय उनका वज्रमय पर्वत के समान कठोर कलेवर जल में गिरा, तब उसके वेग से मानो समुद्र का पेट फट गया और उसमें बादलों की गड़गड़ाहट के समान बड़ा भीषण शब्द हुआ। उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अपनी उत्ताल तरंग रूप भुजाओं को उठाकर वह बड़े आर्तस्वर से ‘हे यज्ञेश्वर! मेरी रक्षा करो।’ इस प्रकार पुकार रहा है। तब भगवान् यज्ञमूर्ति अपने बाण के समान पैने खुरों से जल को चीरते हुए उस अपार जलराशि के उस पार पहुँचे। वहाँ रसातल में उन्होंने समस्त जीवों की आश्रयभूता पृथ्वी को देखा, जिसे कल्पान्त में शयन करने के लिये उद्यत श्रीहरि ने स्वयं अपने ही उदर में लीन कर लिया था।

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आत्मचिंतन के क्षण.


आत्मचिंतन के क्षण.

👉 धर्म ग्रन्थों में मामूली से कर्म काण्ड के फल बहुत ही बढ़ा-चढ़ा कर लिखे गये हैं। जैसे गंगा स्नान से सात जन्मों के पाप नष्ट होना, व्रत उपवास रखने से स्वर्ग मिलना, गौदान से वैतरणी तर जाना, मूर्ति पूजा से मुक्ति प्राप्त होना, यह सब बातें तत्व ज्ञान की दृष्टि से असत्य हैं; क्योंकि इन कर्मकाण्डों से मन में पवित्रता का संचार होना और बुद्धि का धर्म की ओर झुकना तो समझ में आता है, पर यह समझ में नहीं आता कि इतनी सी मामूली क्रियाओं का इतना बड़ा फल कैसे हो सकता है? यदि होता तो योग यज्ञ और तप जैसे महान साधनों की क्या आवश्यकता रहती? टके सेर मुक्ति का बाजार गर्म रहता। 

👉 भिक्षा अनैतिक है। भिक्षा व्यवसायी की मनोभूमि दिन-दिन पतित होती जाती है। उसका शौर्य, साहस, पौरुष, गौरव सब कुछ नष्ट हो जाता है और दीनता मस्तिष्क पर बुरी तरह छाई रहती है। अपराधी की तरह उसका सिर नीचा रहता है। अपनी स्थिति का औचित्य सिद्ध करने के लिए उसे हजार ढोंग रचने पड़ते हैं और लाख तरह की मूढ़ताएँ फैलानी पड़ती हैं। यह भार जनमानस को विकृत बनाने की दृष्टि से और भी अधिक भयावह है। हर विचारशील का कर्त्तव्य है कि भिक्षा व्यवसाय को निरुत्साहित करे। कुपात्रों को वाणी मात्र से भी उत्साह न दें।

👉 यह नहीं देखना चाहिए कि बुराई से वैभव बढ़ता है। यदि ऐसा हुआ भी तो वह क्षणिक ही होगा। बुराई जितनी जल्दी बढ़ती है, उतनी ही जल्दी नष्ट हो जाती है, साथ ही कर्त्ता को भी नष्ट कर डालती है। आकाश तक फैलती है और अंत में सिकुड़कर स्वयं बुराई करने वाले के सिर पर आकर पड़ती है।

👉 दुष्ट विचार हमारा सबसे बड़ा शत्रु है। पाप का विचार, चोरी, कपट, ईर्ष्या, निराशा का विचार, हमारा सर्वनाश कर सकता है। ईश्वर का एक मानसिक चित्र अंतःकरण में तैयार कर लें और सत्य, प्रेम, न्याय से अपना हृदय नित्य विकसित करते रहें। स्वतंत्रता, स्वच्छन्दता और शान्ति के विचार हमारे दोस्त हैं। ये हमें सिखाएँगे कि जीवन पूर्ण सुखमय है तथा उसके अनुभवों से झगड़ना मूर्खता में शामिल है।

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बोझ.


बो.


एक महात्मा ने पूछा कि सबसे ज्यादा बोझ कौन सा जीव उठा कर घुमता है? 


किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल तो किसी ने ऊंट अलग अलग प्राणियों के नाम बताए। 


लेकिन महात्मा किसी के भी जवाब से संतुष्ट नहीं हुए।

महात्मा ने हंसकर कहा- गधे, बैल और ऊट के ऊपर हम एक मंजिल तक बोझ रखकर उतार देते हैं, लेकिन इंसान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है। किसी ने बुरा किया है, उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल का बोझ, अपने किये पापों का बोझ। इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इंसान जीता है।

जिस दिन इस बोझ को इंसान उतार देगा, तब सही मायने मे जीवन जीना सीख जाएगा।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


वाराह-अवतार की कथा श्रीशुकदेव जी ने कहा- राजन्! मुनिवर मैत्रेय जी के मुख से यह परम पुण्यमयी कथा सुनकर श्रीविदुर जी ने फिर पूछा; क्योंकि भगवान् की लीला-कथा में इनका अत्यन्त अनुराग हो गया था। विदुर जी ने कहा- मुने! स्वयम्भू ब्रह्मा जी के प्रिय पुत्र महाराज स्वायम्भु मनु ने अपनी प्रिय पत्नी शतरूपा को पाकर फिर क्या किया? आप साधुशिरोमणि हैं। आप मुझे आदिराज राजर्षि स्वायम्भुव मनु का पवित्र चरित्र सुनाइये। वे श्रीविष्णु भगवान् के शरणापन्न थे, इसलिये उनका चरित्र सुनने में मेरी बहुत श्रद्धा है। जिनके हृदय में श्रीमुकुन्द के चरणारविन्द विराजमान हैं, उन भक्तजनों के गुणों को श्रवण करना ही मनुष्यों के बहुत दिनों तक किये हुए शास्त्राभ्यास के श्रम का मुख्य फल है, ऐसा विद्वानों का श्रेष्ठ मत है। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! विदुर जी सहस्रशीर्षा भगवान् श्रीहरि के चरणाश्रित भक्त थे। उन्होंने जब विनयपूर्वक भगवान् की कथा के लिये प्रेरणा की, तब मुनिवर मैत्रेय का रोम-रोम खिल उठा। उन्होंने कहा। श्रीमैत्रेय जी बोले- जब अपनी भार्या शतरूपा के साथ स्वायम्भुव मनु का जन्म हुआ, तब उन्होंने बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर श्रीब्रह्मा से कहा। ‘भगवन्! एकमात्र आप ही समस्त जीवों के जन्मदाता और जीविका प्रदान करने वाले पिता हैं। तथापि हम आपकी सन्तान ऐसा कौन-सा कर्म करें, जिससे आपकी सेवा बन सके? पूज्यपाद! हम आपको नमस्कार करते हैं। आप हमसे हो सकने योग्य किसी ऐसे कार्य के लिये हमें आज्ञा दीजिये, जिससे इस लोक में हमारी सर्वत्र कीर्ति हो और परलोक में सद्गति प्राप्त हो सके’। श्रीब्रह्मा जी ने कहा- तात! पृथ्वीपते! तुम दोनों का कल्याण हो। मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ; क्योंकि तुमने निष्कपट भाव से ‘मुझे आज्ञा दीजिये’ यों कहकर मुझे आत्मसमर्पण किया है। वीर! पुत्रों को अपने पिता की इसी रूप में पूजा करनी चाहिये। उन्हें उचित है कि दूसरों के प्रति ईर्ष्या का भाव न रखकर जहाँ तक बने, उनकी आज्ञा का आदरपूर्वक सावधानी से पालन करें। तुम अपनी इस भार्या से अपने ही समान गुणवती सन्तति उत्पन्न करके धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करो और यज्ञों द्वारा श्रीहरि की आराधना करो। राजन्! प्रजापालन से मेरी बड़ी सेवा होगी और तुम्हें प्रजा का पालन करते देखकर भगवान् श्रीहरि भी तुमसे प्रसन्न होंगे। जिन पर यज्ञमूर्ति जनार्दन भगवान् प्रसन्न नहीं होते, उनका सारा श्रम व्यर्थ ही होता है; क्योंकि वे तो एक प्रकार से अपने आत्मा का ही अनादर करते हैं। मनु जी ने कहा- पाप का नाश करने वाले पिताजी! मैं आपकी आज्ञा का पालन अवश्य करूँगा; किन्तु आप इस जगत् में मेरे और मेरी भावी प्रजा के रहने के लिये स्थान बतलाइ। देव! सब जीवों का निवास स्थान पृथ्वी इस समय प्रलय के जल में डूबी हुई है। आप इस देवी के उद्धार का प्रयत्न कीजिए। श्रीमैत्रेय जी ने कहा- पृथ्वी को इस प्रकार अथाह जल में डूबी देखकर ब्रह्मा जी बहुत देर तक मन में यह सोचते रहे कि ‘इसे कैसे निकालूँ। जिस समय मैं लोक रचना में लगा हुआ था, उस समय पृथ्वी जल में डूब जाने से रसातल में चली गयी। हम लोग सृष्टि कार्य में नियुक्त हैं, अतः इसके लिये हमें क्या करना चाहिये? अब तो, जिनके संकल्पमात्र से मेरा जन्म हुआ है, वे सर्वशक्तिमान् श्रीहरि ही मेरा यह काम पूरा करें।'
साभार krishnakosh.org