नवजात शिशु क्या सातों चक्रों के साथ पैदा होता है?


नवजात शिशु क्या सातों
चक्रों के साथ पैदा होता है?
(सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव)


गर्भधारण के बाद भ्रूण में ऊर्जा चक्र कब और कैसे बनते हैं? सद्‌गुरु उसकी प्रक्रिया और समय के बारे में बता रहे हैं, और साथ ही नवजात शिशु के भौहों के बीच विभूति लगाने के महत्व के बारे में बता रहे हैं।
प्रश्न: नमस्कारम सद्‌गुरु। जब एक बच्चा मां के गर्भ में आता है, तो चक्र कब और कैसे बनने शुरू होते हैं?

सद्‌गुरु: बारहवें सप्ताह के आस-पास सिर्फ एक चक्र, मूलाधार बनता है। पहले अट्ठाइस से तीस सप्ताह के भीतर, भ्रूण के विकास की क्वालिटी के आधार पर पहले पांच चक्र, – विशुद्धि तक, पूरी तरह बन जाते हैं।

बाकी के दो आज्ञा और सहस्रार हर इंसान में एक ही सीमा तक स्थापित नहीं होते। यही वजह है कि जैसे ही कोई बच्चा पैदा होता है, इस संस्कृति में पहली चीज यह की जाती है कि बच्चे को नहलाने के बाद, उसके दोनों भौंहों के बीच थोड़ी विभूति लगा दी जाती है। अगर आज्ञा चक्र अब तक विकसित न हुआ हो, तो हम चाहते हैं कि बच्चे का फ़ोकस उस दिशा में शुरू हो।

बच्चे के आज्ञा चक्र पर ध्यान देना. 

हालाँकि आपको इन बातों के आधार पर लोगों के बारे में राय तय नहीं करनी चाहिए। फिर भी मैं बताना चाहूँगा कि करीब तीस से पैंतीस प्रतिशत नवजात शिशुओं में, हो सकता है आज्ञा चक्र विकसित न हुआ हो। सहस्रार चक्र आम तौर पर अधिकांश में विकसित नहीं होता है, वह धीरे-धीरे विकसित होता है। अगर आप उनकी आंखों की पुतलियों की गतिविधि को ध्यान से देखें, तो आप जान सकते हैं कि किसी शिशु का आज्ञा चक्र स्थापित हो गया है या नहीं। पहले सिर्फ पुतलियों को देखकर लोग बता देते थे कि यह शिशु बड़ा होकर साधु बनेगा। साधु का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति जंगल या गुफा में जाकर बैठ जाए। साधु या संत एक तरह से ऐसा व्यक्ति होता है जो उन चीजों को देख सकता है, जिसे बाकी लोग नहीं देख सकते। वह कोई दूरदर्शी(दूर की देखने वाला) कारोबारी हो सकता है या कोई दूरदर्शी नेता – जो चीजों को बाकियों के मुकाबले अधिक साफ-साफ देख पाता है।

किसी बच्चे के जीवन के पहले तीन माह में हम साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि माता के गर्भ में आज्ञा चक्र किस सीमा तक विकसित हुआ है – इससे कई चीजें तय होती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि जिन लोगों का आज्ञा चक्र जन्म के समय तक विकसित नहीं हुआ है, वह उनके आगे के जीवनकाल में विकसित नहीं हो सकता। वे खुद प्रयास करके उसे विकसित कर सकते हैं। मगर उन्हें दूसरों के मुकाबले थोड़ी अधिक मेहनत करनी होगी।

भारतीय और यहूदी संस्कृति की परम्परा. 

अगर हम कुछ चीजों का ध्यान रखें तो यह पक्का कर सकते हैं कि माता के गर्भ में बच्चे का ज़्यादा से ज़्यादा विकास हो जाए। भारतीय संस्कृति में गर्भधारण से पहले से ही स्त्री की देखभाल एक खास तरह से की जाती थी। उसे किस तरह होना चाहिए और उसके साथ क्या-क्या होना चाहिए – इन सब बातों का ध्यान रखा जाता था। स्त्रियां उस समय खास तरह के मंदिरों में जाती हैं, उन्हें कुछ खास तरह का भोजन खिलाया जाता है और वे कुछ खास ग्रंथ पढ़ती हैं। आज की दुनिया में जन्म और मृत्यु दोनों एक कारोबार बन चुके हैं, इसलिए दुर्भाग्य से ये चीजें काफी हद तक खत्म होती जा रही हैं।

गर्भधारण के पूर्व से लेकर बच्चे के जन्म तक कई सारी हिदायतें होती थीं। उन्हें किस तरह के माहौल में रहना चाहिए, किनसे मिलना चाहिए किनसे नहीं, किस तरह के रंगों और आकारों को उन्हें देखना चाहिए और किन्हें नहीं – इन सभी चीजों का ध्यान रखा जाता था। इस संस्कृति के अलावा सिर्फ यहूदी संस्कृति में इस तरह की परंपराएं देखने को मिलती हैं। हो सकता है कि उन्होंने भारतीयों के मुकाबले इन्हें अधिक संभाल रखा हो। भारतीय लोग अपनी संस्कृति छोड़ने और पश्चिमी संस्कृति अपनाने के लिए अधिक आतुर रहते हैं, इसलिए अधिकांश भारतीय इन चीजों को छोड़ चुके हैं।

आँखों की स्थिरता और बच्चे के रोने का तरीका. 

जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो आप सबसे पहले यह देखते हैं कि उनकी आंखों की पुतलियां किस तरह से घूम रही हैं। पहला इंडिकेटर है – आंखों की स्थिरता, एक बच्चा चीजों को कैसे देखता, परखता है। कुछ शिशु बड़ों की तरह देखते हैं। दूसरी चीज यह है कि बच्चा रोता कैसे है। कुछ लोग पैदा होने के बाद बच्चे के रोने के तरीके को सुनकर यह बता सकते थे कि वह बच्चा क्या बनेगा। कुछ बच्चे एक नई जगह में होने की वजह से कंफ्यूज होकर रोते हैं, कुछ के रोने में ग़ुस्सा होता है क्योंकि वे जन्म के इस झंझट से परेशान होते हैं। आप देखेंगे कि हर बच्चे के रोने का तरीका अलग-अलग होता है। खास तौर पर बहुत सी दाइयां यह बता सकती थीं, जिन्होंने बहुत सारे बच्चे पैदा करवाए थे।

अगर हम माता के लिए कुछ चीजों का ध्यान रखें, तो उसके गर्भ में बच्चे के चक्रों का विकास कुछ हद तक तय किया जा सकता है। आजकल हमारी आर्थिक और सामाजिक गतिविधियाँ ऐसी हैं कि गर्भ के अंतिम समय तक महिलाएं काम करने ऑफिस जाती रहती हैं, पार्टी करती हैं, हर चीज़ खाती व, शराब और सिगरेट पीती हैं। ऐसे में सब कुछ प्रकृति के हाथों में है – इसमें हमारा कोई रोल नहीं होता। लेकिन अगर हम सही चीजें करें तो बच्चे में बेहतर गुण लाने के लिए कोशिश करने के तरीके मौजूद हैं। इसका नतीजा सौ फीसदी आपके हाथ में नहीं होता, लेकिन सभी सही चीजें करने पर नतीजा बेहतर होता है।

अगले पीढ़ी पर ध्यान देना होगा.
 

इन सब के पीछे मक़सद ये है कि हमारा बच्चा हमसे बेहतर गुणों वाला हो। मगर इसे संभव करने के लिए जो देखभाल, जिस तरह की भागीदारी जरूरी है, वह दुर्भाग्य से खत्म हो चुकी है। दरअसल हमारा अपना जीवन कुछ अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। हाल में जब मैं अमेरिका में था, हमने अपने एक प्रोजेक्ट के लिए एक कंसल्टेंट रखा था। वह बहुत दुबली-पतली, छोटी सी महिला थी। जब वह हमारे साथ काम करने आईं, तो वह गर्भावस्था के आखिरी महीनों में थी। मैंने उनसे पूछा, ‘बच्चे के पैदा होने में कितना समय है?’ वह बोलीं, ‘शायद कल सुबह तक।’ मैंने कहा, ‘फिर आप यहां क्या कर रही हैं?’ वह बोली, ‘यह मेरा दूसरा बच्चा है। पिछली बार भी मैं बच्चे के जन्म से दो घंटे पहले तक काम कर रही थी।’

हमारा अपना जीवन, आर्थिक मामले, पार्टी, सामाजिक बकवास इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि हमें अगली पीढ़ी में कोई दिलचस्पी ही नहीं है। हम इस जिम्मेदारी की भावना से नहीं सोचते कि अगली पीढ़ी को हमसे किस तरह बेहतर होना चाहिए। जबकि यह बहुत महत्वपूर्ण है। अगर अगली पीढ़ी किसी भी रूप में हमसे कमतर होती है, तो यह मानव जाति के ख़िलाफ़ एक अपराध है। आपको उसे आगे की ओर ले जाना है, पीछे की ओर नहीं। मुझे लगता है कि मुझे इस पर एक किताब लिखनी चाहिए कि आप बच्चे को प्रभावित करने के लिए क्या-क्या चीजें कर सकती हैं। लेकिन फिर हो सकता है कि कुछ ज्यादा ही महिलाएं गर्भवती होने लगें – यह भी एक समस्या है। मेरे ख्याल से मुझे अपने जीवन के अंत समय में इसे लिखना चाहिए। मैं दुनिया में रहते हुए जनसंख्या विस्फोट नहीं चाहता।

अप्रिय बात प्रकट करना.


अप्रिय बात प्रकट करना.


समाज में दूसरों से व्यवहार करते समय अनेक बार आपको अनेक कटु सत्यों का उद्घाटन करने के अवसर प्राप्त होते हैं। आप अफसर हैं, आपका मातहत काम नहीं करता है। आपको उसकी ताड़ना करनी है। आपका नौकर ठीक समय पर नहीं आता या काम से जी चुराता है। डाट फटकार करने से उसके भाग जाने का भी डर लगा है। आप दुकानदार हैं; ग्राहक उधार माँगता है उधार के कारण आपकी पूँजी व्यर्थ ही नष्ट होती जा रही है। ग्राहक से पुराने रुपयों का तकाजा या वसूल बाकी करनी है; नया उधार नहीं देना है। किस प्रकार यह अप्रिय बात प्रकट करें? आपका बड़ा पुत्र, पुत्री, पत्नि, माता या पिता कोई अनुचित बात करता है। उसे बिना नाराज किये आपको रोकना है। किस प्रकार की बातें करें कि वे अपनी आदत भी छोड़ दें, और आपके पारस्परिक सम्बन्ध भी मृदु बने रहें? आप अध्यापक या व्याख्याता हैं। आपको अपने शिष्यों की ताड़ना करनी है; श्रोताओं पर क्रोध प्रकट करना; वह भी उस ढंग से कि वे नाराज न हो जायं। आप मातहत हैं आपका अफसर आपके ऊपर अत्याचार करता है। आप अपने ऊपर होने वाले इस अत्याचार को कैसे प्रकट करें?

मनुष्य नाराज तब होता है, जब उसकी मान हानि हो; या जब वह यह समझे कि आपने उसकी “अहं” भावना पर अनुचित दबाव डाला है। “अहं” को ऊँचा रखना, आत्म-प्रतिष्ठा बनाये रखना प्रत्येक मानव का सहज स्वभाव है।

जब आप दूसरे को डाटें फटकारें, तो इस ढंग से अपने व्यवहार तथा शब्दों को व्यवहार में लाइये कि “अहं” भाव को न्यूनतम ठेस पहुँचे। एक फटकार सुनाकर फिर उसके अहं को धीरे धीरे उभार दें। अथवा पहले दूसरे व्यक्ति के शील गुण या योग्यताओं की प्रशंसा कर चतुराई से यह सुझा दे कि इस प्रकार की गलती करना उसके जैसे महान् व्यक्ति के लिए उचित नहीं है। यदि आप उसे ऊँचा उठाकर उसकी निर्बलताएँ दिखाएँगे तो दूसरा व्यक्ति बुरा न मानेगा।

यदि आपको दूसरे से कुछ काम निकालना है, तो यकायक अपना अभिप्राय न कह बैठिये, वरन् बातचीत का प्रारम्भ मित्रता से कीजिए। जब दूसरा व्यक्ति प्रसन्न मुद्रा में हो तब आप अपनी माँग पेश कर सकते हैं। दूसरे की परिस्थिति का ध्यान रखिए। किसी के सामने ऐसी माँग पेश न कर बैठिये जिसे वह पूर्ण न कर सके और अपनी आत्महीनता समझें।

बच्चों को ताड़ते समय ऐसे संकेतों का प्रयोग कीजिए जिसमें नकारात्मक या ध्वंसात्मक आलोचना न हो वरन् जिसके प्रत्येक शब्द से यह प्रतीत हो कि आप उसे बहुत ऊँचा समझते हैं। वह आपके द्वारा विज्ञापित स्तर तक उठाने के लिये जमीन आसमान एक कर डालेगा।

आप अफसर हैं; मातहत से काम निकालना है तो उसे इस प्रकार धमका दीजिए कि वह आपके संकेतों को समझ ले। उदाहरणार्थ आप कहिए, “मिस्टर शर्मा, आप तो इतना अच्छा टाइप करते हैं, आपका ड्राफ्ट इतना अच्छा होता है कि मुझे कलम लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। फिर आज कैसे यह गलतियाँ, यह गन्दगी, यह जल्द बाजी दीखती है। नहीं, आपको अपनी उत्कृष्टता से नीचे नहीं आना चाहिए। मैं समझता हूँ आप ऐसा कर ही नहीं सकते। यह काम आपका नहीं किसी दूसरे का हो सकता है, आदि।”

उधार माँगने वाले से दुकानदार को कहना चाहिए, “बाबूजी हाथ तंग है। नकद पैसों से काम चलता है। थोड़ी पूँजी से काम चलाते हैं। आपके लिए तो यह साधारण सी बात है। नकद पैसे देंगे, तो हमारे दस काम चलेंगे। कुछ ग्राहक कर्जे के पैसे देने में बड़ा तंग करते हैं। हमारा मतलब यह है कि बड़ी मुश्किल से देते हैं। अब सब के लिए यही नियम कर दिया कि नकद लेन देन चले” आदि।

पत्नि की ताड़ना में विशेष सतर्क रहिए, क्योंकि स्त्रियाँ अधिक अधिक संवेदनशील होती हैं। उनकी संवेदन शीलता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। एक कटु बात के साथ एक मृदु बात करनी चाहिए, कटु मृदु का सम्मिलित रूप उन्हें ग्राह्य हो सकता है। उनकी ताड़ना का स्वरूप कुछ इस प्रकार का हो सकता है-

“आप के कारण घर बड़ा सुव्यवस्थित रहता है। प्रत्येक वस्तु ठीक स्थान पर, झाडू बुहारी सब लगा हुआ। बच्चे साफ सुथरे पर अगर तुम स्वयं भी सलीके से कपड़े पहने रहो, तो क्या ही उत्तम रहे। तुम घर तो साफ रखती ही हो, यदि जरा रसोई घर भी साफ रहा करे, तो बड़ा मजा आये। पूजा पाठ पड़ोसिन से बातचीत में तुम्हारा समय जाता है। वह ठीक है। इन में समय करना चाहिए पर यदि तुम घंटा भर अध्ययन पठन पाठन भी कर लिया करो, तो तुम्हारी बराबरी करने वाला दूसरा कोई न होगा।” आदि।

अप्रिय बात एक दम मत पुकार कर बैठिये, वरन् उसके लिए प्रस्तावना बाँध कर धीरे-धीरे कौतुक से प्रकट कीजिए। जितने क्रम-2 से आप अग्रसर होंगे, उतनी ही दूसरों को मानसिक वेदना कम होगी।

क्या आपके परिवार में कलह, झगड़े और नाना प्रकार के बुरा मनव्वल होते रहते हैं? क्या कभी ऐसे समय आते हैं, जब आप एक दूसरे से नहीं बोलना पसन्द नहीं करते? या जब परिवार के किसी व्यक्ति पर आपको क्रोध हो आता है? क्या आपका परिवार आपको समझ नहीं पाता है?

यह स्मरण रखिये, कि आयु में कमी या अधिकता कार्य तथा दृष्टिकोण का अन्तर अनेक बार झगड़ो तथा कलह का प्रधान केन्द्र बन जाता है। अतः परिवार के हर व्यक्ति को अपने आपको प्रसन्नतापूर्वक या अप्रसन्नता से परिवार में ढालना या फिट करना होता है। कुछ आप अपनी स्वतन्त्रता छोड़िये कुछ दूसरे त्याग की भावना से काम लें, तो परिवार में स्वर्ग की सृष्टि हो सकती है। संभव है, जब आप यह समझते हैं कि आपके परिवार वाले आपको नहीं समझते हैं, स्वयं आप ही उनके लिए एक कठिन बन गये हों? यदि ऐसा है तो आपको अपनी आदतें सुधारनी होंगी।

मनुष्य का स्वभाव ही दूसरे में दोष निकालना है। इस प्रकार प्रत्येक अपनी बड़प्पन की भावना प्रदर्शित करना चाहता है। अतः दूसरों को क्षमा करते चलिए। उनके स्वभाव तथा परिस्थितियों को परखिये, और आयु, परिस्थिति के अनुसार उनसे कार्य की आशा रखिए। अप्रिय आलोचनाओं में सबके लिए प्रशंसा का मधु भी मिश्रित किया कीजिए।

(अखंड ज्योति-1/ 1952)


निवेदन.



प्रिय साथियों. 

एक विवाह उत्सव में सम्मिलित होने, मैं ग्वालियर जा रहा हूँ, 
साथ ही अन्य आवश्यक कार्य में व्यस्तता के फलस्वरूप 
आगामी पोस्टिंग अनुमानत: एक सप्ताह बाद ही कर सकूंगा।
 ईश्वर आप सभी का कल्याण करे। 

जय श्रीरामजी.

भगवान शिव का त्रिशूल, डमरू, नाग और चन्द्र.


भगवान शिव का
त्रिशूल, डमरू, नाग और चन्द्र.

भगवान शिवजी का ध्यान करने मात्र से मन में जो एक छवि उभरती है वो एक वैरागी पुरुष की। इनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे हाथ में डमरु, गले में सर्प माला, सिर पर त्रिपुंड चंदन लगा हुआ है। आप दुनिया में कहीं भी जाइये आपको शिवालय में शिव के साथ ये 4 चीजें जरुर दिखेगी।

1. त्रिशूल.

भगवान शिव सर्वश्रेष्ठ सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता हैं, लेकिन पौराणिक कथाओं में इनके दो प्रमुख अस्त्रों का जिक्र आता है, एक धनुष और दूसरा त्रिशूल। भगवान शिव के धनुष के बारे में तो यह कथा है कि इसका आविष्कार स्वयं शिवजी ने किया था। लेकिन त्रिशूल कैसे इनके पास आया इस विषय में कोई कथा नहीं है। माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मनाद से जब शिव प्रकट हुए तो साथ ही रज, तम, सत यह तीनों गुण भी प्रकट हुए। यही तीनों गुण शिवजी के तीन शूल यानी त्रिशूल बने। इनके बीच सांमजस्य बनाए बगैर सृष्टि का संचालन कठिन था। इसलिए शिवजी ने त्रिशूल रूप में इन तीनों गुणों को अपने हाथों में धारण किया।

2. डमरू.

भगवन शिव के हाथों में डमरू आने की कहानी बड़ी ही रोचक है। सृष्टि के आरंभ में जब देवी सरस्वती प्रकट हुईं तब देवी ने अपनी वीणा के स्वर से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया। लेकिन यह ध्वनि सुर और संगीत विहीन थी। उस समय भगवान शिव ने नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाए और इस ध्वनि से व्याकरण और संगीत के छन्द, ताल का जन्म हुआ। कहते हैं कि डमरू ब्रह्म का स्वरूप है, जो दूर से विस्तृत नजर आता है, लेकिन जैसे-जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचते हैं, वह संकुचित हो, दूसरे सिरे से मिल जाता है और फिर विशालता की ओर बढ़ता है। सृष्टि में संतुलन के लिए इसे भी भगवान शिव अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे।

3. नाग. 

भगवान शिवजी के साथ हमेशा नाग होता है। इस नाग का नाम है, “वासुकी”। इस नाग के बारे में पुराणों में बताया गया है कि यह नागों का राजा हैं और नागलोक पर इनका शासन है। सागर मंथन के समय इसका रस्सी के रूप में उपयोग किया गया था, जिससे सागर को मथा गया था। कहते हैं कि वासुकी नाग शिवजी का परम भक्त था। इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी ने इन्हें नागलोक का राजा बना दिया और साथ ही अपने गले में आभूषण की भांति लिपटे रहने का वरदान दिया।

4. चन्द्र.

शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से हुआ था। यह कन्याएं 27 नक्षत्र हैं। इनमें चन्द्रमा रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। इसकी शिकायत जब अन्य कन्याओं ने दक्ष से की तो दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया। इस शाप से बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिवजी की तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने चन्द्रमा के प्राण बचाए और उन्हें अपने शीश पर स्थान दिया। जहां चन्द्रमा ने तपस्या की थी, वह स्थान सोमनाथ कहलाता है। मान्यता है कि दक्ष के शाप से ही चन्द्रमा घटता-बढ़ता रहता है।

दैनिक व्यवहार की कुछ अशिष्टताएं.


दैनिक व्यवहार
की कुछ अशिष्टताएं.

राशन की दुकान है। खरीददारों की लम्बी भीड़ खड़ी है, “पहले मैं, पहले मैं” की चिल्लाहट सुन पड़ती है। धींगा मुश्ती चल रही है। लोग एक दूसरे के ऊपर गिरे पड़ते हैं, भीड़ में श्वास तक नहीं आता है। किसी की गठरी बिखरती है, तो किसी को कम तोल माल मिलता है। इसमें किसका दोष है? कम तोलना, वाक्-युद्ध होने तथा गालियों, गठरी बिखरने, घंटों बैठने का उत्तरदायित्व किस पर है? यह हमारे राष्ट्रीय चरित्र की कमजोरियाँ ही हैं।

व्यवहार की छोटी-छोटी भूलें हमें नीचे लाती हैं। हमारे राष्ट्रीय चरित्र को कमजोर करती हैं। कोई भी राष्ट्र अपने बड़े आदमियों के चरित्र पर नहीं, अपनी साधारण जनता के व्यवहार में बड़प्पन पाता है आचरण सभ्य है, सहृदय है, सज्जनता पूर्ण है, तो वह राष्ट्र उन्नत है। भारत में राष्ट्रीय चरित्र की निम्न कमजोरियाँ विशेष रूप से हटाने योग्य हैं:—

समय सम्बन्धी भूलें:- समय की पाबन्दी को पालन न करना। स्कूल, कालेजों, ऑफिसों रेल के स्टेशनों, गाड़ियों का समय पर न पहुँचना। विद्यार्थियों को समय की पाबन्दी का जरा भी ध्यान नहीं रहता। क्लर्क ऑफिसों में देर से पहुँचते हैं, डाकिया देर से डाक बाँटता हैं। यहाँ तक कि सिनेमा का मनोरंजन देखने वाले दर्शक भी समय की परवाह नहीं करते चाहे आधी फिल्म निकल जाय।

वायदे का पालन न करना:- जिस समय पर आने का वायदा किया जाय, उस समय पर न पहुँचना बड़ी अशिष्टता है। या तो वायदा ही न किया जाय, अन्यथा चाहे कुछ हो नियत समय पर, नियत स्थान पर अवश्य पहुँचा जाय।

पुलिस का निर्देश न मानना:- जब सड़क पर पुलिस मैन आपको एक ओर जाने को कहता है, तो उस ओर न बचकर दूसरी ओर बचना, फुटपाथ पर छोड़कर बीच सड़क पर चलना, सड़क पर छिलके कूड़ा करकट, गन्दी वस्तुओं को एकत्रित करना, सड़क या नालियों पर बच्चों को टट्टी बिठाना, अपने घर का पाखाना गन्दा रखना अशिष्टताएँ हैं। पुलिस की आज्ञा का उल्लंघन करना नागरिकता के नियम की अवहेलना करना है।

मनोरंजन के स्थानों में शोर:- स्कूल, कालेज, सिनेमा, या खेल के मैदान हमारी सामाजिक आदतों तथा चरित्रों के प्रतिबिम्ब हैं। इनमें हम अनुशासन और शिष्टाचार की अनेक भद्दी भूलें करते हैं। सबसे पहली बात शोर मचाना है। न जाने लोगों के पास कितनी बातें और विषय व्यर्थ की टीका-टिप्पणी करने के लिए आ जाते हैं। विद्यार्थी समुदाय कक्षाओं तक में इतना शोर करता है कि कुछ कहना कठिन हो जाता है। सिनेमा हाल की गन्दी गालियाँ, गन्दे गाने, अशिष्ट आचरण तो सर्वत्र आलोचना का विषय बन गये हैं।

पंक्तियों में खड़े न होना:- स्टेशनों पर टिकट घर की खिड़कियों पर जो धक्का मुक्की चलती है, उसे कौन नहीं जानता। सिनेमा घरों में लोगों के चोटें तक आती हैं, पर कोई पंक्ति में खड़ा नहीं होना चाहता यह नागरिकता का अभिशाप है।

स्त्रियों का मान अपमान:-सम्पूर्ण पाश्चात्य संसार में नारी जाति श्रद्धा और आदर की वस्तु समझी जाती है। प्रायः उन्हें उचित स्थान देने के लिए बस या रेल के डिब्बे में बैठे हुए व्यक्ति को उठकर अपनी सीट उन्हें दे देनी पड़ती है। इसे गर्व का विषय माना जाता है। हमारे यहाँ यह परवाह नहीं की जाती कि कौन स्त्री कितनी देर से कहाँ खड़ी है? क्या चाहती है? उसे किस वस्तु की आवश्यकता है? या लज्जावश वह क्या नहीं कह पाती है। न जाने कब हम यह प्रतिष्ठा सीखेंगे?

दूसरों की सीट पर अधिकार:- बस, या रेल के डिब्बे से आप पानी पीने या किसी जरूरी वस्तु को लेने के लिए उतरते हैं, जब वापस आते हैं; तो क्या देखते हैं कि कोई दूसरा व्यक्ति उस स्थान पर जमा बैठा है। इसे अपने कृत्य पर जरा भी ग्लानि विक्षोभ नहीं है। आप उससे अपने स्थान के विषय में इंगित करते हैं, वह कुछ नहीं सुनता, यह है हमारे राष्ट्रीय चरित्र की नीचाई, असत्यता, चोरी, हठधर्मी।

गुप्त अंगों को खुले रखना:- सभ्य समाज मैं बैठकर जाँघें खोलना, गले के बटन खोल कर नंगा गला दिखाना, या छाती उघाड़े रखना, गुप्त अंगों का स्पर्श करते रहना भारी असभ्यता है, इसी प्रकार नेत्रों का संचालन, विभिन्न अभिनयों की भूषा, अनुकरण हमारी असभ्यता की छाया है।

गालियाँ हमारा कलंक:- बात बात में अनेक भारतीय तकियाकलाम के रूप में अशिष्ट शब्दों, अश्लील अंगों, गालियों का प्रयोग करते रहते हैं। अनेक गन्दे शब्द तो समाज में निरन्तर व्यवहार में आ रहे हैं जब कि जनता उनका अभिप्राय नहीं समझती। आवश्यकता इस बात की है कि माँ बाप बच्चों को इन गालियों से बचावें। कुसंगति में रहकर प्रायः यह गन्दी आदत लगती है।

स्वतन्त्रता प्राप्त हो जाने के पश्चात् हमारा यह कर्त्तव्य हो जाता है कि अपने भाई बहिनों को सुसंस्कृत और सभ्य बनावें, जिससे हमारी नागरिकता का स्तर उच्च हो सके। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण का ध्यान रखे, तो आने वाली पीढ़ी सुसंस्कृत हो सकती है।

(अखंड ज्योति-1/ 1952)


क्या पुरानी आदतों का छूटना असम्भव है?


क्या पुरानी आदतों का
छूटना असम्भव है?

अनेक व्यक्तियों के सन्मुख जब नई व्यावहारिक योजनाएँ प्रस्तुत की जाती है, “जो आदत या स्वभाव पड़ गया है, उससे मुक्ति असम्भव है।”-यह धारणा नितान्त भ्रममूलक है। आदत को छोड़ना कठिन है किन्तु असंभव नहीं है। यदि मनोबल को दृढ़ता से आत्म-विकास एवं सुधार में लगाया जाय, और मनुष्य यह संकल्प करले कि मुझे अमुक निन्दनीय आदत से मुक्ति प्राप्त करनी है, तो वह अवश्य उसका उन्मूलन कर सकता है।

आदत क्या है? यह एक मानसिक मार्ग है। जिस प्रकार गाड़ी के पहिये के एक ही मार्ग पर जाने से एक लकीर बन जाती है, उसी प्रकार एक कार्य को पुनः करने से एक मानसिक मार्ग का निर्माण हो जाता है। यह मानसिक मार्ग हमारे कार्य करने की संख्या से उत्तरोत्तर गहरा होता है, यहाँ तक कि इससे भिन्न-2 प्रकार की आदतों का निर्माण हो जाता है। प्रत्येक आदत की जड़ें अंतर्मन में गहरी बैठी रहती हैं। जिस प्रकार धीरे धीरे एक कार्य करने से आदत बनती है, उसी प्रकार धीरे-2 उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया करने से उसका उन्मूलन होता है। प्रत्येक गन्दी आदत के विरुद्ध आप उलटा काम करें। जब मन पुनः पुरानी कुत्सित आदत की ओर जाय, तो दृढ़ता से उसका सामना किया जाय और उसकी पुनरावृत्ति न होने दी जाय। पुरानी आदत करने में आसान होती है; इसलिए उसकी ओर स्वाभाविक रुचि रहती है। नई आदत का विकास प्रारम्भ में बड़ा अड़चन पूर्ण रहता है। किन्तु पुनःपुनः उसी को करने से उसी को करने में आनन्द आने लगता है और वह स्वाभाविकता का एक अंग बन जाता है।

व्यावहारिक दृष्टिकोण से आप में जो न्यूनताएँ हैं, या जो असभ्यताएँ आ गई हैं, उनका परिष्कार दीर्घ कालीन अभ्यास तथा सतत् संकल्प शक्तियों के समन्वय से ही संभव है। प्रत्येक आत्म विश्वास का इच्छुक यदि चाहे, तो इसके द्वारा मानसिक और व्यावहारिक कायाकल्प कर सकता है।

इसके विपरीत जो शिष्टता की आदतें हमारे बचपन में बरबस अंतर्मन में प्रविष्ट कर दी जाती हैं, वे हमारे आकर्षण का विषय बन जाती हैं। छोटे बच्चों को शिष्टाचार सम्बन्धी शिक्षा न देने के कारण उनका उच्च सोसाइटी में प्रविष्ट होना कठिन हो जाता है। बच्चे निरन्तर हमारा अनुकरण किया करते हैं।

यदि हम अपने बच्चों को शिष्ट, सभ्य, आकर्षक सुन्दर और उत्तरदायित्व पूर्ण नागरिक बनाना चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि हम स्वयं उनके सन्मुख शिष्ट व्यवहार का ऐसा नमूना प्रस्तुत करें जिसका अनुकरण उन्हें जीवन में उत्साह और प्रेरणा प्रदान कर सके। जो माँ बाप स्वयं व्यवहार में ढीले ढाले हैं, प्रातः काल शय्या त्यागने, दन्त मंजन, स्नान, पूजा पाठ या वस्त्र धारण तथा उन्हें यथास्थान रखने में नियमों का पालन नहीं करते, उनके बच्चे, जो चौबीस घंटों में 15-16 घंटे उनके साथ रहते हैं, किस प्रकार सभ्यता और शिष्टाचार का पाठ पढ़ सकते हैं?

जैसे हम हैं, वैसा ही हमारा वातावरण भी है। सभ्य व्यक्ति की प्रत्येक वस्तु आपको यथा स्थान,साफ सुथरी,आकर्षक मिलेगी। जूतों से लेकर कमीज कोट टोपी या बाल काढ़ने का कंघा तक स्वच्छ रखा मिलेगा। उसके जूतों पर न मैल होगा, न कंघे में बाल लगे हुए होंगे। उसके कोट या पतलून या धोती में शिकन न मिलेंगी। वह वस्त्रों की देखभाल,सम्हाल के कारण दूसरों से आधे वस्त्रों में भी आकर्षक प्रतीत होगा। कम खर्चे में वह अधिक तरह के सुख-प्राप्त कर सकेगा। उसे लम्बा चौड़ा बढ़िया मकान नहीं चाहिए। छोटे से मकान में,या एक कमरे का ही वह इतना उत्कृष्ट प्रयोग करेगा कि उसकी सभ्यता प्रकट हो जायगी। शिष्टाचार का अर्थ यही नहीं कि आप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। स्वयं अपने साथ भी आपका व्यवहार उत्तम होना अनिवार्य है। यदि आप अपने साथ दुर्व्यवहार करते है तो बड़ा पाप करते हैं।

आप पूछेंगे कि हम अपने साथ किस प्रकार दुर्व्यवहार करते हैं? इसके अनेकों रूप हैं। आप जानते हैं कि ठीक समय पर उठने, व्यायाम करने टहलने, या विश्राम करने से आपका स्वास्थ्य ठीक रहता है। किन्तु शोक! आप न तो ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं, न व्यायाम, टहलना या विश्राम करते हैं। आप रुपये के लोभ में दिन रात तेलों के बैल की तरह पाई पाई इकट्ठी करने में मारे मारे फिरते हैं। आपके पास पर्याप्त धन है, जिसके द्वारा आप भोजन, वस्त्र, तथा अच्छे मकान का प्रबन्ध कर सकते हैं, किंतु आप कंजूसी के कारण इनमें से कोई भी काम नहीं करते। यह सब अपने प्रति दुर्व्यवहार है।

अपने शरीर की बुराई की तरह जानते बूझते आप अपने बच्चों की आदतों, या सभ्यता से गिरे हुए व्यवहार को नहीं रोकते, या उसकी गलती पर सजा नहीं देते, तो आप अन्याय करते हैं। अपनी पत्नी की असभ्यताओं को रोकना आपका एक पुनीत कर्त्तव्य हो जाता है। परिवार के और सदस्यों की खराबियों या अशिष्टताओं का आप शिष्ट रीतियों से परिष्कार कर सकते हैं, अपने मातहत,नौकरों, आदि को अशिष्टता से रोक कर आप समाज में अच्छाइयों के बीज बो सकते हैं। यदि ऐसा नहीं करते, तो यह आपका दुर्व्यवहार है।

आपकी दृष्टि कमजोर है, किन्तु फिर भी आप सिनेमा देखते हैं, मिर्च मसाले, खट्टी चीजों का व्यवहार करते हैं, यह अपने प्रति दुर्व्यवहार हुआ, अपने अन्दर किसी मादक दृव्य को लेने की आदत डाल कर विषपान करना आत्म-घात के बराबर गर्हित है।



(अखंड ज्योति-1/ 1952)


तब आप पर ईश्वर की कृपा हो जाती है.


तब आप पर ईश्वर की
कृपा हो जाती है.
(सुधांशु जी महाराज)

भक्ति और आराधना से तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि हम केवल हाथ में माला ही पकड़े रहें। भगवान की प्रार्थना, उपासना, स्तुति का मतलब भी इतना ही नहीं है कि हम केवल अपने लिए और अपनों की सलामती के लिए ही कामना करते रहें, भगवान के नाम की माला हाथ में थामे हुए अगर केवल अपने विषय में, मालामाल होने की प्रार्थना करते रहें तो यह अनुचित हो जाएगा।

इससे मनुष्य आध्यात्मिक सम्पत्ति से कंगाल हो जाएगा। वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि भगवान की भक्ति का सीधा सा अर्थ है उसकी आज्ञाओं का सहर्ष पालन करना और वही ईश्वरीय आज्ञाएं इंसान को सदगुरु प्रदान करते हैं।

इसलिए गुरु आज्ञा का कभी उलंघन न करें, सत्पुरुषों की न स्वयं निन्दा करें और न किसी के द्वारा किए जाने पर श्रवण करें, भगवान के अनेक नाम हैं और स्वरूप हैं। उनमें कभी भेद न करें।

जैसे शिव और विष्णु, राम और कृष्ण आदि उनमें कोई भेदभाव की दृष्टि न रखें, वैदिक विचारों की भी निन्दा अनुचित है, शास्त्रों का सम्मान करें और गुरु ज्ञानी जनों के प्रति अगाध श्रद्घा बनाए रखें। प्रेम भाव बनाए रखने से जीवन जगमगा उठता है।

ब्रह्मज्ञानी सदगुरु के द्वारा प्रदत्त सद्ज्ञान के प्रचार-प्रसार में, उनके द्वारा संचालित सेवा के महान कार्यों में सहयोगी बनकर जो व्यक्ति खड़ा हो जाता है, धर्म के प्रति जो कष्ट सहकर भी वफादारी निभाता है, उसके पुण्य के प्रताप से उसकी आने वाली सात पीढि़यां भवसागर से पार हो जाती हैं और वह भी तर जाता है।

इसलिए धर्म के पुण्य कार्यों में भागीदार बनना, सहयोग और सेवा प्रदान करना अपने जीवन का अंग बनाओ। गुरुचरणों में शीष नवाने वाले लोग, गुरु को मानने वाले लोग तो दुनिया में बहुत मिल जाएंगे। किंतु गुरु की आज्ञा का पालन करने वाले तो विरले ही होते हैं।

पर जो होते हैं उनके हृदय में स्वयं गुरु विराजमान हो जाते हैं, उन्हें ईश्वरीय असीम शक्तियों का अहसास होने लगता है, वे सुख-दुख, मान-अपमान, हानि-लाभ, जय- पराजय, यहां तक कि गुरुकार्यों की सम्पूर्णता के लिए अपना सर्वस्व लगाने से भी पीछे नहीं हटते। क्योंकि उन्हें गुरु का आदेश ईश्वर का संदेश प्रतीत होने लगता है।

गुरू भक्त आरूणी.


ऐसा ही एक शिष्य था जिसे गुरू का आदेश ईश्वर का आदेश लगता था। इस शिष्य का नाम था आरुणि। एक बार गुरू ने आरूणी को आदेश दिया कि खेत में पानी लगाना है। पानी का बहाव तेज था, जिससे खेत की मेंड़ टूट गई। आरुणि ने भरसक प्रयत्न किया पानी रोकने का।

लेकिन जैसे ही वह फावड़े से खोदकर मिट्टी लगाता, वैसे ही पानी की तीव्र धरा उसे अपने साथ बहा ले जाती। आरुणि के लिए गुरु की आज्ञा सर्वोपरि थी, उसके महत्व को वह भलीभांति जानता था। पानी और मिट्टी के कीचड़ में वह स्वयं मेड़ बनकर लेट गया और लेटा ही रहा। सुबह से शाम, शाम से रात्रि और भोर होने लगी।

गुरु ने अपने अन्य शिष्यों से कहा आरुणि कहां है? सभी मौन थे, गुरु ने कहा वह तो खेत में पानी लगाने गया था। क्या वहां से लौटकर अभी तक नहीं आया। बिना कुछ कहे सबने जानकारी न होने की असमर्थता जताई। गुरु ने आदेश दिया चलो, मेरे साथ आरुणि अब तक खेत में क्या कर रहा है? और जाकर देखते हैं।

वह नशारा अद्भुत था, भोर का समय और गुरु स्वयं चलकर आरुणि की खोज कर रहे हैं। जाकर देखा आरुणि मिट्टी में धंसा हुआ है और अपनी देह से पानी के प्रवाह को रोक रहा है। मुंह में भी मिट्टी, आंखों में भी मिट्टी, सर्दी से शरीर सुन्न हो गया।

किंतु गुरु-आज्ञा की पालना के सामने ये शारीरिक, मानसिक वेदना क्या महत्व रखती हैं? कीचड़ में सने हुए आरुणि को आज उनके गुरु ने अपने सीने से लगा लिया और सिर पर हाथ रखकर कहने लगे। आरुणि! मेरे प्यारे! तुम धन्य  हो, और तुम्हारी निष्ठा, तुम्हारी श्रद्घा, तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण भाव, तुम्हारी सेवा, तुम्हारी आज्ञा पालना केवल मैं नहीं ईश्वर भी देख रहे हैं, तुम्हें अवश्य ही इसका अभीष्ट फल प्राप्त होगा।

आरुणि की आंखों में आंसू हैं, पर गुरु उन प्रेम भाव में बहने वाले मोतियों को अपने हाथों में समेट रहे हैं और आरुणि के उपर हृदय से आशीर्वाद का अमृत बरसा रहे हैं। जो शिष्य गुरु के आदेश का प्राणपन से पालन करता है, प्रतिकूल स्थिति में भी विपदाओं की परवाह किए बिना, संकल्पित होकर सेवा कार्यों में लगा रहता है, उसके उपर ऐसे ही गुरु कृपा और प्रभु की दया बनी रहती है। ऐसे अनोखे शिष्य के लिए तो गुरु स्वयं चलकर उसके पास पहुंच जाते हैं।

साभारः विश्व जागृति मिशन

आध्यात्मिक विकास में साफ़-सफाई कैसे मदद करती है?


आध्यात्मिक विकास में
साफ़-सफाई कैसे मदद करती है?
(सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव)

साफ-सफाई केवल हमारे भौतिक जीवन के तरक्की के लिए ही जरुरी नहीं है, यह हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जानते हैं कि कैसे सिलवटों से भरे बिस्तर और हमारे आस-पास का अव्यवस्थित माहौल हमारी आध्यात्मिक प्रगति को मुश्किल बना सकते हैं।

सद्‌गुरु: शौच या साफ-सफाई, किसी के भी आध्यात्मिक विकास का एक अहम पहलू है। साफ-सफाई की बात करें तो यह केवल हमारे शरीर के बारे में नहीं, इसका हमारे आसपास के माहौल से भी गहरा नाता होता है। हम अपनी इंद्रियों(आँखों, कानों, छूने इत्यादि) के जरिए जो भी ग्रहण करते हैं, वह हमारे भीतर गंदगी पैदा कर सकता है, या फिर हमारे कल्याण का कारण बन सकता है।

बुरे अनुभवों से बचना होगा.

हम जो भी महसूस करते हैं, अगर वह खुशनुमा हो तो इसका एक अलग अनुभव होता है। अगर वही हमारी इंद्रियों(आँखों, कानों, छूने इत्यादि) के लिए खुशनुमा न हो, तो यह हमें एक बुरा अनुभव देता है। हमारे आसपास का माहौल हमारी इंद्रियों के लिए खुशनुमा नहीं होगा तो हमारे मन में बनने वाली छवी, हमारे अनुभव, सुखदायक नहीं होंगे। जब आप इस तरह अपने भीतर अप्रिय भाव पैदा करते हैं, तो ऐसे में अनुभव की आनंददायक अवस्था को पाना और उसे बनाए रखना कठिन हो जाता है।

आप दुखी हैं या आनंदित, यह मूल रूप से इस पर निर्भर करता है कि आप भीतरी तौर पर अपने साथ क्या कर रहे हैं। एक आध्यात्मिक प्रक्रिया का मतलब है कि आप जो भी कर रहे हैं, वह सचेतन होकर कर रहे हैं – आप अपने जीवन के अनुभव को खुद रच रहे हैं। अगर ऐसा होना है, तो यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम अपने इंद्रियों(आँखों, कानों, छूने इत्यादि) के माध्यम से मिलने वाले बोध को अप्रिय न बनाएं।

जब आप बिस्तर लगाएँ.

मुझे पूरा यकीन है कि हर संस्कृति में, चाहे आपके माता-पिता या फिर कम से कम आपके दादा-दादी ने आपको सिखाया होगा कि अपने कपड़े और बिस्तर को ठीक से रखना चाहिए। भारत में खासतौर पर कहा जाता है कि अगर आप अपने बिस्तर की चादर को तुड़ी-मुड़ी और सिलवटों से भरी छोड़ देंगे, तो उसमें भूत आ कर बस जाएँगे। जब आप सोएँगे तो वे आपके साथ सोएंगे और आपको परेशान करेंगे। इसी बात को अंग्रेजी में भी कहा जाता है कि आप जैसा बिस्तर बनाएंगे, वैसी ही आपकी नींद होगी। आज वैज्ञानिकों ने हमें बताया है कि सारा अस्तित्व एक ऊर्जा है जो लाखों रूपों में खुद को प्रकट कर रहा है। जैसे ऊर्जा रूपों को रचती है, रूप भी ऊर्जा को पैदा कर सकते हैं। आपके आसपास हर रूप, एक तरह की ऊर्जा पैदा कर रहा है।

हम जिस तरह के आकार बनाते हैं, हमारे आसपास जिस तरह के आकार हैं, या हम जिस तरह के ढांचों में रहते हैं, उनका हमारी हर चीज पर गहरा असर होता है। अगर हम अपने बैठने, खुद को व्यवस्थित रखने और आसपास की चीजों को जमाने के बारे में थोड़ी सजगता रखें, तो हम अपनी जगह को अपने भीतरी तरक्की के लायक बना सकेंगे जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति को कहीं आसान बना देगी। अगर आपको एक जगह से दूसरी जगह जाना हो, तो आप कैसे भी जा सकते हैं, लेकिन अगर रास्ता अच्छी तरह से बना हो तो आप वहां आसानी से पहुंच सकेंगे। इसी तरह अगर हमारे आसपास की जगह व्यवस्थित हो तो भीतर की ओर उतरने में आसानी होगी।

व्यक्ति-वाद नहीं, लक्ष्य -समाजवाद होना चाहिए.


व्यक्ति-वाद नहीं,
लक्ष्य-
समाजवाद होना चाहिए.

वह व्यक्ति जो समाज के उपकारों को भुलाकर अपने अस्तित्व एवं व्यक्तित्व को अलग रखते हैं, अथवा समाज के साथ असहयोग करते हैं, या समाज विरोधी आचरण करते हैं, वे मुख्य रूप से जीवन के नियमों, मूल सिद्धान्तों की ही उपेक्षा करते हैं। इस प्रकृति के कारण मनुष्य को सम्पूर्ण समाज का विरोध सहन करना पड़ता है और इससे उसके व्यक्तित्व का विकास बन्द हो जाता है। मनुष्य की शक्ति सीमित और अल्प है। समाज के साथ व्यक्तित्व का सामंजस्य एक आवश्यक नियम है। स्वार्थपरता की− मनोवृत्ति मनुष्य को आन्तरिक दृष्टि से भी दीन−हीन, एकाकी बना देती है।

शरीर के सभी अंगों के श्रम, सहयोग परस्पर योगदान में ही मानव जीवन का अस्तित्व निहित है। कदाचित विभिन्न अंग परस्पर विरोधी, एकाँगी, स्वार्थी आचरण करने लगे तो समस्त शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायगा। समाज में भी व्यक्तिगत भावशक्ति लालसा को रखकर किये जाने वाले कार्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। व्यक्तिगत- उत्कृष्टता, शक्ति, समृद्धि, वैभव, ऐश्वर्य की लालसा सारे समाज के लिए हानिकारक और स्वयं में विष बनने का रास्ता है।”

अशिष्टता, सार्वजनिक जीवन का अभिशाप.


अशिष्टता,
सार्वजनिक जीवन का अभिशाप.

भारत में आजकल अशिष्टता का जो व्यापक प्रचार है, उसे देख कर देश के गणमान्य नेता विक्षुब्ध हो उठे हैं। नेहरू जी ने सार्वजनिक जीवन में शिष्टता की आवश्यकता पर जोर देते हुए निर्देश किया है कि अशिष्टता जीवन का अभिशाप है और सर्वथा त्याज्य है।

अशिष्टता हमारे सार्वजनिक जीवन का अभिशाप है। अशिष्ट व्यक्ति पशु तुल्य है, जिसे दूसरे की मान प्रतिष्ठा आत्म सम्मान का कोई ध्यान नहीं है; जो अपने स्वार्थों में तो निरत है, किन्तु दूसरों के ‘अहं’ की ओर से निश्चित है। अशिष्ट व्यक्ति इस योग्य नहीं होता कि उसे सभ्य समाज में स्थान दिया जा सके।

जिस व्यक्ति को दूसरों से बातें करने का शिष्टाचार नहीं आता, उससे कौन बोलना पसन्द करेगा? जिसे दूसरों के व्यंग्य और मजाक उड़ाने, त्रुटियाँ निकालने, उपहास करने में ही आनन्द आता है, वह महा अज्ञानी है। वह मद के गहन अन्धकार में डूब कर दूसरों के अन्धकार मय पक्ष को ही देखता है तथा निज अन्तःकरण में आवृत हीनत्व की भावना का प्रदर्शन करता है।

अशिष्टता मानव जीवन का कलंक है। अशिष्ट पुरुष जहाँ जाता है, अनादर का पात्र होता है। योग्यता रखने पर भी अपनी बदतमीज़ी की वजह से वह नौकरी खो बैठता है, मातहतों के ऊपर निज प्रभाव नहीं डाल पाता, समाज में सभ्य व्यक्ति उसका तिरस्कार करते हैं।

छोटी-छोटी बातों से अशिष्टता प्रारंभ होती है। बचपन में प्रायः अविवेकी माता-पिता बालकों पर उचित नियन्त्रण नहीं करते। कुसंगति में पड़कर वे कुत्सित गालियों का प्रयोग सीखते हैं, गुप्त अंगों से सम्बन्धी कुवाक्य बात बात पर उच्चारण करते हैं, एक दूसरे से बातें करते समय कीचड़ उछालते, लज्जा का अनुभव नहीं करते। निम्न समाज में गाली-गलौज और मारपीट चलती रहती है। उसका प्रभाव कोमल हृदय बालकों पर निरन्तर पड़ता है। भाँति भाँति की कुप्रथाओं, अशिक्षा, कुसंग, सिनेमा, निम्न स्तर का साहित्य पढ़ने, अशिष्ट बातों के न रोकने से चरित्र में बदतमीज़ी का प्रारम्भ होता है।

माता-पिता को उचित है कि बच्चों के प्यार के नामों का प्रयोग कम करें; शिष्टता पूर्ण नाम का ही प्रयोग करें। मित्रों को भी शिष्टता पूर्ण नाम का उच्चारण करना चाहिए। “यह हमारा मित्र है, इससे हम जैसे चाहें संबोधन इस्तेमाल कर सकते हैं।”-यह अशिष्ट धारणाएं हैं। जिसका जो नाम हो, उसी का प्रयोग करना चाहिए। नाम के अन्त में “जी”का प्रयोग उत्तम है।

पत्र व्यवहार में अनेक व्यक्ति प्रारम्भ तथा अन्त में शिष्टतासूचक सम्बोधनों का प्रयोग नहीं करते हैं। पत्रों के प्रारम्भ में “पूज्य,” का प्रयोग अपने से बड़े व्यक्ति के लिए भी प्रायः नहीं किया जाता है। नौकरी पेशा अर्जियों के नीचे “आपका आज्ञाकारी” लिखना शान के खिलाफ समझते हैं। वे लिखते हैं-“आपका हितैषी“ या “भवदीय” । ये भी प्रायः अंग्रेजी में लिखा जाता है। अफसर ऐसे प्रार्थना पत्रों को रद्दी में फेंक देता हैं। किसी को आदर सूचक बातें कहना या बोलना आत्म-अभिमान को कम करना नहीं है।

आवेश में आकर प्रायः बदतमीज़ी की जाती है। आपके अफसर ने क्रोध में आकर डाट दिया। आप भी उद्विग्न हो उठे और दो-चार जलीकटी कह गये। फलतः नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

सभा, समितियों, क्लबों, बैठक, रेल में टिकट खरीदते समय या रेल में प्रवेश करते समय अशिष्टता अपने गन्दे रूप में नजर आती है। सभी स्थान पाने के लिये बुरी तरह दौड़ते, गालियाँ देते हुए नजर आते हैं। देर से आने पर स्थान न होते हुए पर भी आने वाला सबको लाँघ कर आगे जाना चाहता है। इस बात की चेष्टा नहीं करते कि समय से पूर्व ही पहुँच जायं। बैठे रहने वाले व्यक्ति स्थान होते हुए भी फैल-फैल कर बैठते हैं और दूसरे को जगह देना पसन्द नहीं करते, चाहे वह बेचारा खड़ा ही क्यों न हो?

स्वयंसेवकों तथा स्वयंसेविकाओं की अशिष्टता देख कर दंग रह जाना पड़ता है। उनमें सहानुभूति, मृदुलता, दूसरे की सहायता करने की भावना, नहीं होती प्रत्युत निज महत्ता का मिथ्या प्रदर्शन होता है। वे शान के साथ इधर से उधर घूमते हैं, सैनिकों के अनुरूप रौब प्रदर्शित करते हैं। निज इष्ट मित्रों के निमित्त समरत सुविधाएँ तथा सर्व साधारण के निमित्त डाट फटकार और जबरदस्ती का पालन करते हैं। यहाँ तक कि लड़ाई झगड़ों, हाथापाई और कुशब्दों के व्यवहार तक की नौबत आ जाती है।

अधिकाँश अफसर अपने मातहतों के प्रति अशिष्ट व्यवहार में ही शान समझते हैं। जैसा देखा समय-असमय डाट दिया, कुशब्दों का उच्चारण कर दिया, ऊँचा-नीचा कहने में कुछ हर्ज नहीं समझते। यह उनकी शिक्षा, सभ्यता तथा उच्च संस्कृति का एक उपहास है।

कालेज स्कूलों में छात्रों में अशिष्टता अभिवृद्धि पर है। गुरुजनों के “प्रणाम” या “नमस्ते” तो दूर की बात है, साधारण शिष्टाचार भी नहीं किया जाता, बोलने में अक्खड़पन दिखाया जाता है। अध्यापक की अनुपस्थिति में कुर्सी पर बैठने में कोई अशिष्टता नहीं मानी जाती। इसके अतिरिक्त कमीज के बटन खुले रखना, नेकर इतना ऊँचा पहनना कि जाँघ दिखाई दे, खुले आम सिगरेट पीना, गन्दे अश्लील शब्दों का प्रयोग; स्कूल की दीवारों, या डेस्कों पर अश्लील चित्र बनाना, लिख देना, कुशब्द बोल देना, सिनेमाओं की वेश्याओं के चित्र पास रखना, शोर मचाना, अध्ययन तथा अनुशासन के नाम पर उत्तेजित हो जाना, सभा में बैठ कर सीटी बजाना, शोर करना, तालियाँ पीटना, बच्चों की तरह चिल्लाना आदि नाना प्रकार की अशिष्टताएं चल रही हैं।

विद्यार्थी वर्ग अनीति और अशिष्टता के मार्ग पर चल रहा है। उन्हें यह विदित नहीं है कि ये ही आदतें आगे बढ़ कर पक जायेंगी और फिर उन्हें निकालना दुष्कर हो जायगा। विद्यार्थी वर्ग की अनुशासनहीनता देश के लिए कलंक है।

अभिवादन करना विद्यार्थी वर्ग में लुप्त होता जा रहा है। पश्चिमी देशों में चाहे कोई कितना ही कुशल कारीगर क्यों न हो, अपनी योग्यता का घमण्ड रखता है किन्तु अपने अफसर के पास जा कर उसे अभिवादन करना नहीं भूलता।

समय सम्बन्धी अशिष्टता के लिए भारत बदनाम है। क्लर्क दफ्तर में, विद्यार्थी स्कूल कालेजों में, मुसाफिर स्टेशन पर, दर्शकगण सिनेमा नाटकों में, समय की पाबन्दी का कोई भी ध्यान नहीं रखना चाहता। शोक का विषय है कि हमारे उठने-बैठने, सोने-जागने, दूसरों से मुलाकात करने तक का समय निश्चित नहीं है। भोजन सम्बन्धी नाना प्रकार की असभ्यता चलती रहती हैं। सम्पूर्ण पश्चिमी संसार में एक ही समय पर भोजन के लिए भिन्न-2 प्रकार के नामों की व्यवस्था है। अंग्रेज धनी हो या निर्धन, मजदूर हो या क्लर्क—उसके भोजन का समय निश्चित है। संयोग से यदि कोई अतिथि आ जाय, तो उसे भी नियत समय पर भोजन प्राप्त होगा। हमारे देश में रात हो या दिन, उचित समय हो या अनुचित आतिथ्य सत्कार चलता रहता है। जो देश खाने के समय का पालन नहीं कर सकता, उससे यह आशा नहीं की जाती कि वह जीवन के अन्य कार्यों में समय के पालन का ध्यान रखेगा।

यह कहना युक्ति संगत नहीं है कि विद्या से ही शिष्टाचार आता है। अनेक अशिक्षित व्यक्ति भी शिष्ट जन समुदाय की संगत में प्रविष्ट हो शिष्टता सीखते हैं।

अशिष्टता किसी भी राष्ट्र, देश, जाति, वर्ण के लिए अशोभनीय एवं त्याज्य है। बदतमीज आदमी शिष्ट समाज में प्रविष्ट नहीं कर पाता क्योंकि सर्वत्र उसका निरादर होता है। अनुशासन की अवज्ञा करने वाला, दूसरों के अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के प्रति निश्चेष्ट, वीतराग स्वार्थी व्यक्ति , दुर्व्यवहार करने वाला आदमी कभी शिष्ट समाज में आदर प्राप्त नहीं कर सकता। दैनिक सामाजिक जीवन की छोटी-2 बातों से हमारा चरित्र प्रकाशित हुआ करता है, जो हमें सभ्य, शिष्ट एवं सुसंस्कृत या अशिष्ट प्रमाणित करता रहता है।

(अखंड ज्योति-1/ 1952)


पंजीरी -(स्वास्थ्यवर्धक रूप).

पंजीरी,
(स्वास्थ्यवर्धक रूप)

सत्यनारायण भगवान की पूजा में पंजीरी (प्रसाद) का महत्व होता है। हर महीने की पूर्णिमा को सत्यनारायण की पूजा करने का विधान है, जिसमें पंचामृत के साथ ही पंजीरी जरूरी होती है। इसके बिना सत्यनारायण की पूजा अधूरी मानी जाती है।

उत्तर भारत और पंजाब के कुछ इलाकों में पंजीरी का कई अन्य आवश्यकताओं पर भी उपयोग किया जाता है। उत्तर भारत के कई राज्यों और पंजाब में, इसे सर्दियों का एक खास सेहत से भरे व्यंजन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है।

दरअसल, गेहूं के आटे, चीनी और घी में तली हुई भारी सूखे फल मेवों से बनाई जाने वाली पंजीरी आमतौर पर सर्दियों में शरीर को गरम रखने के लिए खाई जाती है। पंजीरी सामान्य रूप से जच्चा (प्रसव वाली औरत) और दूध पिलाने वाली माताओं को सेवन कराई जाती है।

यह मां के दूध में बढ़ोत्तरी करती हैं। इसका सेवन शरीर में उष्णता लाता हैं। यह हजारों साल से भारत में उपयोग की जाती रही है। गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग अधिक सार्थक होता है। 


पंजीरी बनाने की सामग्री.

1.  आटा 2 किलो
2.  घी 500 ग्राम
3.  मगज़ 50 ग्राम
4.  चीनी 1 किलो
5.  बादाम 400 ग्राम
6.  खाने वाली गोंद 20 ग्राम
7.  कमरकस 100 ग्राम
8.  2 चम्मच सौंफ
9.  माखाने 100 ग्राम
10. अजवाइन 20 ग्राम
11. 1 चम्मच इलायची का पाउडर
12. 3 चम्मच सोंठ का पाउडर
13. अखरोट 400 ग्राम
14. पिस्ता 200 ग्राम
१५. बूरा चीनी 1 किलो

पंजीरी बनाने की विधि.

एक भारी तले वाली कड़ाही में 500 ग्राम घी गर्म करें। सभी सूखे मेवे एक के बाद एक फ्राई करें, जब तक वे सुनहरे भूरे न हो जाएं। पहले बादाम, फिर काजू, अखरोट, पिस्ता नट्स, मखाने और अंत में तरबूज के बीज भून लें। इसके बाद कमरकस को भी फ्राई कर लें और इसको भी साइड पर रख ले। कसा हुआ नारियल भूने और एक तरफ रख दें।

सब फ्राइ किए हुए ड्राइ फ्रूट्स को दरदरा पीस लें, फिर सब दरदरे पीसे ड्राइ फ्रूट्स, किसा हुआ नारियल और मगज को एक बड़े बर्तन में मिला कर रख दें। कमरकस को भी पीस कर पाउडर बना कर एक तरफ रख लें। बचे हुए घी को गरम करे और मंद आंच पर आटे को सुनहरा होने तक कड़ाही में भूनें।

इसके बाद धीमी आंच पर गोंद कड़ाही में डालकर मिक्स्चर को अच्छे से मिला दें और तब तक हिलाते रहे जब तक गोंद फूटना बंद न हो जाए। इसके बाद सोंठ के पाउडर और अजवाइन को भुने आटे मे मिला दें और अच्छे से कड़ाही में सब को पूरी तरह से मिला लें। गैस बंद करने के बाद सारी सामग्री या मिक्स्चर को अगले 5 से 10 मिनिट तक ओर हिला कर अच्छे से मिला लें।


(टीप-प्रसाद रूप में उपयोग की जाने पंजीरी की सामग्री और निर्माण की विधि अलग हैं)

आत्मज्ञान का मार्ग.


आत्मज्ञान का मार्ग.

प्राचीन समय में एक राजा था। राजा महागुणी होने के साथ प्रजावत्सल, प्रतापी और शूरवीर भी था। उसके राज्य में प्रजा बड़ी सुखी थी। धन-धान्य का अभाव कहीं पर नहीं था। चारों और सुख और समृद्धी का साम्राज्य था। राज्य की सीमाएं दूर-दराज तक फैली हुई थी। इसलिए जगत प्रसिद्ध महाराज की कीर्ति भी दूर दूर तक फैली हुई थी। महाराज का यशोगान दसों दिशाओं में गुंजायमान था। महाराज को भी इस बात का अभिमान था कि मैं महाराज बनने की कसौटी पर खरा उतरता हूं और किसी राज्य का महाराज बनने के सभी गुण मेरे अंदर विद्यमान है। चारों तरफ अपनी महिमा का डंका बजाने वाले इस महाराज का नाम था जानश्रुति पौत्रायण।

एक बार पूर्णमासी के समय जैसे ही चंद्रमा आसमान पर आकर झिलमिलाया, राजहंसों की टोली मानसरोवर के प्रवास पर रवाना हो गई। हंस शिरोमणी श्वेताक्ष दल का नेतृत्व कर आगे- आगे उड़ते जा रहे थे और दल के पीछे भल्लाक्ष संरक्षण प्रदान करते हुए जा रहे थे। जब हंसों का दल राजा पौत्रायण के राज्य के ऊपर से गुजर रहा था तब भल्लाक्ष ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि ' महामहिम राजा पौत्रायण की यशगाथा पूर्णमासी के चंद्र की तरह चारों और फैल रही है। उन्होने अपना सारा जीवन अपनी प्रजा की भलाई में लगा दिया और उनके राज्य में कोई भी दुखी नहीं है।'

इतना सुनकर शिरोमणी श्वेताक्ष हंसते हुए बोले ' यह सच है तात! राजा पौत्रायण महान है, उनकी प्रजा भी उनका गुणगान करते नहीं थकती है और वह भी अपनी प्रजा का खास ख्याल रखते हैं, लेकिन इसके बावजूद वह ब्रह्मज्ञानी है इसमें संदेह है, क्योंकि ब्रह्मज्ञानी तो सारे संसार में केवल रैक्य मुनि है।'

महाराज जानश्रुति पौत्रायण पक्षियों की भाषा समझते थे इसलिए वह हंसों की बातचीत को समझ गए। पहले तो राजा ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन जब उन्होने अपने राज्य में अपनी प्रजा से रैक्य मुनि के चर्चे सुने तो उनका स्वाभिमान काफी आहत हुआ। राजा जानश्रुति ने सुबह होते ही अपने हाथी पर सवार होकर मुनि से मुलाकात करने के लिए महल से प्रस्थान किया। दिनभर चलने के बाद रैक्य मुनि उनको एक गांव के किनारे पर मिल गए। वह एक बैलगाड़ी के सहारे से साधारण से बिछौने पर बैठकर ग्रामीणों को सुखी जीवन के सूत्र बता रहे थे।

राजा वहीं खड़े होकर सभा के विसर्जन का इंतजार करने लगे। जैसे ही सभा विसर्जित हुई राजा ने अपने साथ लाए गए धन को मुनि को समर्पित करते हुए कहा कि ' मुनिवर आप महान है, लेकिन आप छोटी सी गाड़ी पर भ्रमण करते हैं इसलिए इस धन से अपनी गरीबी को दूर करें।' मुनि रैक्य ने राजा जानश्रुति की भेंट को अस्वीकार करते हुए कहा कि ' राजन यह धन जीवन के स्थूल अभाव को दूर कर सकता है, लेकिन आत्मकल्याण के मार्ग की प्राप्ति इस से नहीं की जा सकती है। ' इतना कहकर मुनि रैक्य ने अपनी गाड़ी तैयार की और आगे के ओर प्रस्थान कर गए। राजा को मुनि की बातों से काफी सुकून मिला और साथ ही यह सीख भी मिली कि निर्लिप्त भाव से यश-अपयश की चिंता किए बिना एक लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने से ही आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव है।

व्यवहार कुशलता तथा वाक्-चातुर्य.


व्यवहार कुशलता
तथा वाक्-चातुर्य.

शिष्टाचार का महत्व-

हमारा दूसरों के प्रति व्यवहार, हमारी मान-प्रतिष्ठा एवं योग्यता का परिचायक है। हम समाज में अनेक प्रकार के व्यक्तियों के संपर्क में आते हैं। मूल रूप से इन व्यक्तियों को तीन श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। (1) अपने से ऊँचे, (2) बराबर वाले, (3) अपने से वय, योग्यता, पद में छोटे। इन तीनों वर्गों के अंतर्गत हमारा शिष्टाचार, हमारी शिक्षा, सभ्यता एवं संस्कृति का द्योतक है। जब हम इनके संपर्क में आते हैं, तब हमें अनेक तत्वों को स्मरण रखना पड़ता है।

हमारी व्यवहार शिक्षा का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे चरित्र के सम्बन्ध में दूसरों पर पड़ता है। हमारा एक एक कार्य, रहन-सहन, वस्त्र, बोल-चाल का ढंग, उठने-बैठने तथा चलने की रीति निरन्तर हमारे चरित्र को प्रकट किया करता है। यदि हम तनिक भी असावधानी कर बैठते हैं, तो संसार में हमारे व्यवहार को लेकर टीका टिप्पणी होने लगती है। अच्छी से अच्छी योग्यता वाले व्यक्ति को अशिष्ट और असभ्य कह कर निकाल दिया जाता है। लोग उनसे बातें नहीं करना चाहते, कन्नी काटकर निकल जाते हैं। वे संसार में असफल होते हैं।

डॉक्टर जॉनसन अपने युग के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकार हो गये हैं। अँग्रेजी का एक युग उनकी विचारधारा से प्रभावित और आतंकित रहा। यही विद्वान् व्यावहारिक कुशलता से अनभिज्ञ था। पार्टी में जाता, तो उसे भोजन करना, ठीक तरह बैठना, बातचीत करना या हाथ मिलाना तक न आता था। वह सब्जियों के छींटे आस पास बैठी हुई स्त्रियों के वस्त्रों पर छिड़क देता, डकार इस अशिष्टता से लेता की लोग हँसने लगते, चाय के तीस चालीस प्याले पी डालता। इसी प्रकार एक नहीं अनेक विद्वानों की मूर्खता के दिये जा सकते हैं।

एक बार इंग्लैण्ड में एक सहभोज हो रहा था। बहुत से व्यक्ति उपस्थित थे। उनमें से एक हिन्दुस्तानी भी वहाँ मौजूद था। चाहे और अनेक दुर्गुण उनमें हों अंग्रेज जाति सभ्यता और शिष्टता में बहुत ऊँची है। हमारे हिन्दुस्तानी भाई ने चाय को प्लेट में डालकर पीना प्रारम्भ किया। उसकी सम्मान रक्षा के लिये अन्य उपस्थितजनों को भी वैसा ही करना पड़ा।

आपकी शिक्षा का प्रथम चिन्ह आपका दैनिक व्यवहार ही है। अशिष्ट व्यक्ति चाहे कुछ काल के लिये कृत्रिम व्यवहार द्वारा अपनी असभ्यता को छिपाते, किन्तु उसकी अशिष्ट आदतों हँसने, बोलने चालने, खाने पीने में किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाती हैं। हम अपनी आदतों को अकस्मात् ही नहीं परिवर्तित कर सकते क्योंकि उनकी जड़ें हमारे अंतर्मन में प्रविष्ट हो जाती हैं। हमारे माता-पिता या घरेलू परिस्थितियों का व्यापक प्रभाव हमारे अंतर्मन पर पड़ा करता है। एक अशिष्ट या असभ्य आदत जो माँ-बाप ने बच्चे को असावधानी से पालन पोषण करने में डाल दी है, इतनी जटिलता से जम जाति है कि विकसित अवस्था में उसका उन्मूलन कठिन हो जाता है। जो गन्दी गालियाँ या सेक्स सम्बन्धी घृणित आदतें, बचपन में कुसंगति द्वारा पड़ जाती हैं, वे बड़ेपन तक चलती रहती हैं।

(अखंड ज्योति-1/ 1952)


‘और बढ़िया’ की खोज दुख का कारण.


‘और बढ़िया’ की खोज
दुख का कारण.
(स्वामी सुखबोधानंद)

एक शिष्य ने मुझसे पूछा था कि मैं लगातार जीवन का अर्थ जानने के लिए उत्सुक रहा हूं लेकिन बहुत खोज के बावजूद मुझे कुछ हासिल नहीं हुआ। क्या मेरी इस खोज के विचार में ही कुछ गड़बड़ है? मैंने उसकी जिज्ञासा का जवाब देते हुए कहा कि मैं पशुओं से प्रेम करता हूं। मेरे पास दो श्वान और छह बिल्लियां हैं। मैंने कभी नहीं देखा कि उन्होंने कभी किसी चीज को लेकर चिंता की हो।

मुझे लगता है कि मनुष्य के सोचने और महसूस करने के तरीके में ही गड़बड़ है। कोई भी व्यक्ति यह नहीं सोचता है कि जीवन बेहतरीन है, हर कोई किसी न किसी तरह के सुख की खोज में ही लगा हुआ है। जीवन हमारे सामने है लेकिन हम उसकी खोज कर रहे हैं। याद रखिए कि किसी भी तरह की 'सफलता" हमें शांति नहीं देती है और न ही सांसारिक चीजों से किसी तरह का सुख मिल सकता है।

हम अक्सर जीवन को समझने के लिए दुनिया को देखते हैं। हम बढ़िया कार, बढ़िया घर और बढ़िया सुख-सुविधाओं से जोड़कर जीवन को समझना चाहते हैं। इसके बाद हम ज्यादा आनंद पाने और ज्यादा अच्छी स्थिति प्राप्त करने को लेकर प्रयत्नशील रहते हैं। हमारी जिंदगी इस 'और बेहतर" की प्रक्रिया में खो जाती है और हमारे भीतर बहुत कटुता आ जाती है।

फिर कड़वाहट ही हमारी जिंदगी बन जाती है। हम भीतर से बहुत कडवे हो जाते हैं। यह कडवाहट हमारी जिंदगी को खराब करती है और हमारे लिए बंधन पैदा करती है। फिर आप खुशी के लिए शर्तें लगाने लगते हैं। आप कहते हैं कि अगर मेरे पास यह होगा तो मैं खुश होऊंगा।

कडवाहट हमारे माइंडसेट से पैदा होती है। यह हमारे भीतर गहरे तक पैठ जाती है। हम अपनी स्थिति और सामर्थ्य का पूरा उपयोग करके जिंदगी में कुछ न कुछ पाना चाहते हैं।

जब बाहरी दुनिया में खोज करके हम थक जाते हैं तो खोज बाहर से हमारे भीतर आ जाती है। एक व्यक्ति अच्छा महसूस करना चाहता है, प्रेम और सुरक्षा चाहता है। वह कहता है, 'अगर मुझे सच्चा प्रेम करने वाला मिलेगा तब मैं सुरक्षित महसूस करूंगा।" तब एक अलग ही स्तर पर खोज शुरू हो जाती है। कडवाहट बढ़ती ही जाती है।

प्रेम पाने के लिए हम संबंधों की ओर देखते हैं ताकि हम अपने भीतर आनंद पा सकें, सुरक्षा पा सकें। तब एक गहरे स्तर पर हम दूसरों से फायदा उठाना शुरू कर देते हैं। यहां दूसरे से आशय पत्नी और हमारे मित्रों से है। ये लोग हमारे आनंद के लिए उपकरण बन जाते हैं। हम इन लोगों के जरिए अपने जीवन में प्रेम, सुरक्षा और आनंद की तलाश करते हैं मगर इन लोगों से बहुत अलग भी हो जाते हैं।

हम दूसरों से जुड़ने के बजाय उनसे दूर हो जाते हैं। हो सकता है कि दूसरे भी आपकी ही तरह सोच रहे हों और इसलिए भी लोग एकदूसरे से दूर हो रहे हैं। यही वजह है कि रिश्तों में लोगों को आनंद नहीं मिल रहा है, सुख नहीं मिल रहा है।

फिर एक व्यक्ति अध्यात्म की तरफ जाता है। मगर दूसरों से आनंद पाने का विचार यहां भी बना रहता है। वह सोचता है कि कोई गुरु मुझे राह बता दे मगर ऐसा कहां हुआ है। आखिरकर जब सभी तरफ से निराशा मिलती है तो व्यक्ति अध्यात्मिक रास्ते पर और आगे बढ़ता है। मगर जब तक व्यक्ति दूसरों के जरिए आनंद पाना चाहता है उसके हाथ निराशा ही लगती है।

कौन कहता है कि 'दूसरे" हमारी समस्याओं को हल कर सकते हैं? शायद ईगो ही हमें यह सुझाता है कि दूसरों से समाधान मिलेगा। मगर हम इस बात को ठीक से समझ नहीं पाते हैं। हर व्यक्ति के जीवन में ईगो होता ही है और इसलिए इंटेलीजेंस के लिए बहुत ही कम जगह बचती है। हमारी चेतन अवस्था की राह में ईगो बहुत बड़ी बाधा है। जब भी आप खुद को ही खास समझते हैं तो इंटेलीजेंस खो देते हैं।

बिल्ली में यह बुद्धि होती है कि वह जगह को ठीक से घेरकर बैठती है। कोई भी उसे ऐसा करना सिखाता नहीं है बल्कि वह खुद ही सीख जाती है। हमारे शरीर को देखो।

हमारे शरीर के सभी अंग एक बुद्धिमत्तापूर्ण तालमेल के साथ काम करते हैं और अगर किसी एक अंग में ईगो आ जाए तो चीजें गड़बड़ा जाएंगी। ईगो से बचने की कोशिश करना चाहिए क्योंकि तब हम बुद्धिमत्ता के लिए जगह नहीं रखते हैं। ईगो छोड़कर हम जिंदगी को आसान बना सकते हैं और तब हमें सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी।

संस्कार तथा भावनाओं का महत्व.


संस्कार तथा भावनाओं का महत्व.


शिक्षा का नया दृष्टिकोण-

मानव स्वभाव में भावना का सबसे अधिक महत्व है। भावना ही वह उत्पादक शक्ति है, जो समग्र कार्यों, सामाजिक राजनैतिक तथा अन्य व्यवहारों के मूल में रहने वाली मूल चालक वृत्ति है। मनुष्य के प्रारम्भिक संस्कार इसी भावना से सम्बन्ध रखने वाले होते हैं। प्रायः देखा जाता है कि अबोध बालक के मन में प्रारंभ में जिन भावनाओं के संपर्क, अभ्यास, परिस्थिति, पुनरावृत्ति द्वारा भर दिया जाता है, वे ही भावनाएँ विकसित होकर उसके गुप्त मन के संस्कारों का निर्माण करती हैं। भावना ही मनुष्य है। हम जिस भाव से प्रभावित हैं, उसे हृदय से निकाल नहीं पाते हैं।

अंतर्मन में वर्तमान भावना हमारे कार्यों को आगे बढ़ा कर हमें नवस्फूर्ति अन्तःप्रेरणा को प्रदीप्त करती हैं। हम सोचते विचारते या कार्य करते हैं किन्तु इनके जड़मूल में कोई न कोई भावना जुड़ी रहती है।

भावना का व्यापक प्रभाव-

तर्क, बुद्धि, विचार, दर्शन इत्यादि सब महत्वपूर्ण मानसिक व्यापार हैं किन्तु इन सबमें भावना का पद श्रेष्ठतम है। भावना बुद्धि पर राज्य करती है। जिस भावना के वश में हम होते हैं, उसी प्रकार बुद्धि तथा हमारा तर्क भी काम करता है। भावना कोई दलील नहीं सुनती। वह तर्क की दुनिया से ऊपर है। उसका सम्बन्ध मस्तिष्क से नहीं, हृदय से है।

मान लीजिए, किसी बच्चे के मन में देश प्रेम, माता पिता प्रेम की भावना अंतर्मन में जमा दी गई है। इस प्रकार के भावना युक्त व्यक्ति की बुद्धि यह तर्क उपस्थित करेगी, देश हमारा है, यह हमारी संस्कृति का आदि स्रोत, प्रतिष्ठा का सोपान है। हमें इसकी रक्षा करनी है; इसकी प्रतिष्ठा को निरन्तर ऊँचा उठाना है।’ आदि। इसके विपरीत यदि स्वदेश प्रेम की भावना अंतर्मन में न रहेगी तो बुद्धि इस प्रकार तर्क करेगी। “देश हुआ करे, हमारी जिन्दगी ही कितने दिन टिकने वाली है। हमें तो खाना पीना, मौज उड़ाना है। दुनिया का मजा लेना है, दूसरे मरें गलें चूल्हे में जायं। हमें देश, जाति से क्या प्रयोजन हैं?”

जर्मनी में हिटलर ने नाजियों की शिक्षा बचपन से ही भावना को लेकर की थी। वहाँ बच्चे बच्चे के हृदय में यह भावना भरी गई कि “तुम श्रेष्ठ हो, वीर हो, साहसी हो। जर्मन जाति संसार में सब जातियों से उच्च श्रेष्ठतम है। दूसरे तुम्हारे गुलाम हैं। तुम्हें उन पर राज करना है।” इन भावनाओं के संस्कार विकसित होकर जर्मन जाति उत्साह, वीरता, धैर्य, साहस के जीते जागते पुतले बने। यदि उनकी कहानियाँ, उनके नारे, उनके प्रारम्भिक गीत, राष्ट्र-प्रेम, स्वदेश भक्ति से भरे हुये न होते, तो उनकी बुद्धि कभी स्वदेश भक्ति के पक्ष में तर्क न करती।

आज शिक्षा संसार के सम्मुख सब से महत्वपूर्ण समस्या, भावनाओं की उचित शिक्षा, ठीक रीति तथा मार्गों में विकास, परिपुष्टि, उसी प्रकार का वातावरण निर्माण करने की है। यदि माता, पिता, देश, समाज, जाति हित, विश्व प्रेम, मातृत्व, की भावनाओं की शिक्षा हम प्रारम्भ से ही बच्चों में संस्कार के रूप में भर दें, तो उनकी बुद्धि भी विकसित होकर उसी प्रकार के तर्क उपस्थित करेगी।

भावना विकास के नियम-

भावना का यह नियम है कि प्रारम्भ में इसके मार्ग दर्शन तथा कुछ वस्तुओं से जोड़ने की आवश्यकता पड़ती है। यह अन्ध भक्ति है। बच्चे के सम्मुख कोई भी महान् पुरुष, देवता, गुरु, विद्वान या धर्म पुस्तक आती है तो हमारा कर्त्तव्य यह है कि इनके प्रति प्रारम्भ से ही उच्चतम भावनायें श्रद्धा, प्रेम, पवित्रता को जोड़ दें। माता-पिता गुरु के प्रति श्रेष्ठ, पूज्य भाव के अंकुर प्रारम्भ से ही जमा दें, देश भक्ति , स्वदेश की महत्ता भली भाँति उनकी भावनाओं में भर दें। शैशव की भावनायें हमारे वीर पूजा भाव का एक अंग बनती हैं। हम उनसे विलग नहीं रह सकते, वे गुप्त रूप से हमारे विचार तथा क्रियाओं को प्रभावित किया करती हैं। भावना सोचती समझती, तर्क वितर्क न कर अन्धे प्रेम जैसी जम जाती है। एक बार जम गई तो स्थायी रूप से जमी समझना चाहिये।

शोक है आज शिक्षा तथा आध्यात्म संसार में भावना की शिक्षा का महत्व कम हो गया है। इस दृष्टि से हमारी प्राचीन शिक्षा अधिक मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर निर्भर थी। बच्चों को गुरु, माता, पिता, बड़े व्यक्तियों, धर्म, धार्मिक कार्यों में रुचि उत्पन्न की जाती थी। उनके प्रति पूजनीय भाव प्रारम्भ से ही जोड़ दिये जाते थे, धार्मिक अंतःवृत्ति होने से बड़ा होने पर भी भारतीय भोगवाद की ओर प्रवृत्त न होते थे। ब्रह्मचर्य का संयम सदैव उन्हें संयमित किया करते थे, पवित्र भजन, पूजा, यज्ञ, चिंतन, अध्ययन, मनन आदि से जो गुप्त मन निर्मित होता था, वह पवित्रतम भावनाओं का प्रतीक होता था। घर का वातावरण भी उच्च नैतिकता से परिपूर्ण होता था, जिससे एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी उन्हीं संस्कारों को निरन्तर विकसित करती चली आती थी।

जैसा बीज, वैसा वृक्ष, तथा फल। जब हमारी भावनाओं में नैतिकता, श्रेष्ठता, पवित्रता का बीज नहीं डाला जायगा, तो किस प्रकार उत्तम चरित्र वाले मानव तथा समाज की या देश की सृष्टि हो सकती है?

खेद का विषय है कि हमारे बच्चों के हृदय में प्रारम्भिक भावना का बीज बोने वाले अध्यापकों की उचित शिक्षा नहीं होती। वे स्वयं गलत भावनाओं के शिकार होते हैं। यह गलती बढ़कर शिष्य का जीवन नष्ट करती है।

बच्चे के हृदय में उचित भावना की सृष्टि- 

यदि हम इस अंग को लेकर व्यावहारिक सभ्यता, शिष्टाचार, मर्यादा, संयम, अनुशासन का कार्य करें तो बच्चों तथा नवयुवकों के जीवन में क्रान्ति हो सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि पहले माता पिता स्वयं भावनाओं की शिक्षा की उपयोगिता समझें; स्वयं आदर की भावनाओं को संस्कार रूप में शिशु मन पर स्थापित करें। प्रारम्भ में बच्चा विचार करना नहीं जानता। इन भावनाओं को बरबश उसके शैशव मन पर जमाना पड़ता है। बच्चे अनुकरण प्रिय होते हैं, वे वीर पूजा भाव से परिचालित होते हैं। अध्यापक तथा माता पिता बच्चों के सम्मुख एक आदर्श के रूप में उपस्थित होते हैं। उनकी रहन सहन, आचार व्यवहार, सत्यता, पवित्रता, सब कुछ अनुकरण किया जाता है। अतः बच्चों के सम्मुख आने वाले ये आदर्श उच्च चरित्र वाले, नैतिक बल से पूर्ण, उच्च संस्कार वाले होने चाहिये।

वातावरण का भारी महत्व है। वातावरण का अर्थ व्यापक है। घर, तथा संगति तो यह महत्वपूर्ण है हीं, घर की पुस्तकें, दीवारों के चित्र, हमारे गाने, भजन, इत्यादि भी बड़े महत्व के हैं। यदि इन्हीं से उन्नति तथा सुधार की भावना में चलाई जायँ, तो आचार व्यवहार के क्षेत्र में क्रान्ति हो सकती है।

आपके मुख से निकलने वाला प्रत्येक शब्द, आपके शरीर का अंग संचालन, आपके वस्त्र, घर पर माता पिता की गालियाँ, साथ खेलने वाले बच्चों के विचार, सभी हमारे, बच्चों पर गुप्त रूप से प्रभाव डाला करते हैं।

भावना की जड़ जमाने में बड़े सतर्क रहिए। पुनः पुनः प्रयत्न कीजिये कि अपने बच्चे में दया, कोमलता, मानवता, सच्चाई, प्रेम, सहानुभूति, अनुशासन की भावनाएं आती रहें। इन्हें बरबस बच्चों के कोमल मन में बसाइये। अच्छे-अच्छे भजन, पवित्र कर्त्तव्य की शिक्षा देने वाली कहानियाँ, उत्तमोत्तम व्यवहार द्वारा नये राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हो सकता है। बचपन से ही शिशु के मन पर बड़ों के प्रति आदर प्रतिष्ठा सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, दया, सहानुभूति, सहकारिता, बराबर वालों से मैत्री, प्रेम, संगठन सहयोग की भावनाएं बच्चों के गुप्त मन में उत्पन्न करनी चाहिये। आचरण, आदर्श, तथा उचित निर्देशन से यह कार्य माता पिता, अध्यापक सभी कर सकते हैं।

मान लीजिये, एक बच्चा सिनेमा का एक भद्दा गाना अनजाने ही कुसंगति से सुनकर याद कर लेता है। वह उसका अर्थ नहीं समझता, किन्तु उसे पुनः पुनः दोहराता है। बड़ा होकर वह उसका अर्थ समझने लगता है और जीवन भर उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रहता। यही बच्चा यदि कोई राष्ट्रप्रेम का गीत, उत्तम भजन, पवित्र विचार वाली उक्ति अनजाने में सीख ले, (जो माता-पिता सतत् अभ्यास, पुनरावृत्ति से सिखा सकते हैं,) तो वह बड़ा होकर निरन्तर उच्च मार्ग की ओर ही अग्रसर होगा। हमारी आदि शिक्षा में अनेक पवित्र श्लोक, भजन, इत्यादि मौखिक रूप से स्मरण रखने की परिपाटी रही है। गुरुगण प्रारम्भ से ही बच्चों को अच्छे विचार वाली रचनाएँ, सुन्दर कविताएं भजन, स्तुतियाँ, प्रार्थनाएं याद कराते थे; मन्त्रों का निरन्तर उच्चारण होता था । इन्हें सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त बच्चा नहीं भूल सकता था। गुप्त रूप ये मंत्र हमारे संस्कारों में प्रविष्ट हो जाते थे। कालान्तर में हमारे नैतिक और धार्मिक जीवन की इस गहरी बुनियाद के कारण हमारे आचार व्यवहार श्रेष्ठ होते थे।

ऋग्वेद में लिखा है, (इला) मातृ-भाषा (सरस्वती) मातृ सभ्यता और (मही) मातृभूमि ये तीनों देवियाँ कल्याण करने वाली हैं। इसलिए तीनों देवियाँ अन्तःकरण में बिना भूले हुए स्थित हों।’ तात्पर्य यह है कि मातृभाषा, सभ्यता और मातृभूमि से प्रत्येक भारतीय बच्चे को अगाध प्रेम होना चाहिये। वह इसी भावना को सामने रख कर बड़ा किया जाय। ये ही बातें उसे प्रारम्भ से सिखाई जायें। वह इनके विषय में तर्क न करें, उसके मन में इनके प्रति संदेह उत्पन्न न हो। हम जब उपर्युक्त तीनों देवियों के प्रति पूजा भाव, श्रद्धा, जोड़ लेंगे तो इनके प्रति शुभ ही देखेंगे, शुभ ही सोचेंगे; शुभ योजनाओं को ही कार्यान्वित करेंगे, जो आपका हृदय स्वीकार करता है, वह बुद्धि या मस्तिष्क की परिधि से दूर है। यदि वे भावनाएं हृदय मजबूती से पकड़ लें तो भावी जीवन में वे विलग नहीं होतीं।

(अखंड ज्योति-1/ 1952)


भीड़ और चमत्कार से प्रभावित नहीं होना.


भीड़ और चमत्कार से
          प्रभावित नहीं होना.
(सुधांशु जी महाराज)

किसी के चमत्कार, किसी के बहुत बड़े विज्ञापन, किसी के नाटक से प्रभावित मत होइए। आपकी आत्मा और आपका हृदय जब गवाही दे तभी स्वीकार करना। इसलिए भी प्रभावित नहीं होना कि किसी के पास में बहुत भीड़ आ रही है।

इतने सारे लोग जा रहे हैं तो जरूर कोई बात होगी, यह बात मत सोचना कभी भी, क्योंकि आज का युग विज्ञापन का युग है, लोग नाटक और ड्रामा बहुत करते हैं।

अगर आप यह मानते हैं कि अपना कल्याण आपको करना है, तो किसी तरह के विज्ञापन, किसी तरह के चमत्कार, किसी तरह के ड्रामे और किसी तरह के वे लोग जिनको पहले से ही यह सिखाया जाता है कि खड़े होकर यह कहो हमें यह चमत्कार हो गया, हमें यह लाभ हो गया।

बीस-बीस आदमी एक साथ खड़े होकर घोषणा करते हैं, अमुक जगह चमत्कार हो गया और वही बीस आदमी हर जगह जाएंगे, चमत्कार की घोषणा करने के लिए। भोली जनता कभी नहीं समझ पाती। इसलिए सबसे पहले यह बात ध्यान रखना कि धर्म के नाम पर कोई भी किसी तरह का ड्रामा करता हो उसको देखकर प्रभावित नहीं होना।

सबसे पहले यह निश्चय करना कि जो कहा जा रहा है, वह आपके हृदय के अनुकूल है। दूसरी बात व्यवहारिक जगत् में, व्यवहार के पक्ष में वे बातें ठीक हैं। तीसरी बात सोचना शास्त्र सम्मत है, चौथी बात सोचना विज्ञान सम्मत है या नहीं, यह केवल अन्धविश्वास तो नहीं है।

सारी बातों का निश्चय करने के बाद एकान्त में बैठकर चिन्तन करना और जब लगे आपको कि कहीं सही जगह आप आ गए हैं, तो फिर हिलने नहीं देना अपने मन को। अगर आपको यह एहसास हो जाए कि आप सही जगह पहुंच गए हैं तो फिर एक ही स्थान पर खोदते चले जाना पानी जरूर मिल जाएगा।

अगर दस जगह आपने गड्ढा खोदना शुरू कर दिया तो पानी भी मिलने वाला नहीं है और शक्ति भी व्यर्थ हो जाएगी। अपने मन को एक जगह जरूर टिका लेना लेकिन यह बात ध्यान रखना कि सत्य तक पहुंचने के लिए शुरूआत में थोड़ा-सा परिश्रम करना पड़ेगा।

साभारः विश्व जागृति मिशन

अनाहत चक्र सभी छह चक्रों की खूबियों वाला चक्र.


अनाहत चक्र
 सभी छह चक्रों की खूबियों वाला चक्र.
(सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव)

अनाहत चक्र नीचे के तीन और ऊपर के तीन चक्रों के बीच का चक्र है। जानते हैं अनाहत साधना के लिए जरुरी स्थिरता और भावनाओं की मधुरता के बारे में और कैसे ये चक्र तंत्र साधना से जुड़ा है।

अनाहत एक दूसरे को काटते हुए दो त्रिकोणों का प्रतीक है, जिससे छह कोण वाले तारे की आकृति बनती है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि कैसे हमारे शरीर में मौजूद निचले तीन चक्र और ऊपर के तीनों चक्र इस बिंदु पर आकर मिलकर एक हो रहे हैं। इसका मतलब हुआ कि इस च्रक में छह चक्रों की खूबियां होती हैं। इसका एक मतलब यह भी हुआ कि सभी सातों चक्र एक खास तरीके से यहां आकर आपस में मिल जाते हैं। कई संस्कृतियां इस प्रतीक का इस्तेमाल कई अलग-अलग संदर्भों में कर रही हैं, लेकिन मूलरूप से यह इसी का प्रतीक है।

जीवन का हर रूप ऊपर उठना चाहता है.

बुनियादी रूप से हर जीव अपनी समझ के हिसाब से किसी न किसी रूप में ऊपर उठने की कोशिश कर रहा है। एक कीड़ा हो सकता है किसी पेड़ पर चढऩा चाहे, जबकि चिडिय़ा शायद आसमान में ऊंची उड़ान भरना चाहती हो, जबकि इंसान अमीर होना या नाम कमाना चाहता है अथवा ताकतवर होना चाहता है या फिर आत्मज्ञानी होना चाहता है।

ये सारी कोशिशें खुद को ऊपर उठाने के लिए ही हैं। सृष्टि की यही प्रकृति है, जहां हर जीव अपनी संपूर्ण संभावना के साथ खिलने में लगा हुआ है। कुछ लोग इस काम को सचेतन रूप से करते हैं, जबकि बाकी सब अनजाने में ही ऐसा करते हैं, लेकिन हर कोई ऊपर उठने की कोशिश में है। अनाहत के दो त्रिकोण दो चीजों का प्रतीक हैं, जिसमें ऊपर की ओर जाता त्रिकोण मानव रूपी उस जीव का प्रतीक है, जो ऊपर उठने की कोशिश में लगा है, जबकि दूसरा नीचे की ओर आता त्रिकोण प्रतीक है उस सृष्टि के स्रोत का, जो नीचे आ रहा है।

अनाहत साधना कंफ्यूज कर सकती है.

अनाहत वो बिंदु है, जहां ये दोनों त्रिकोण पूरी तरह से अलाइन्ड होकर एक दूसरे को काटते हैं और इस तरह वह एक छह बिंदु वाले सितारे का आकार बनाते हैं, जिसमें एक केंद्र होता है। इसका मतलब यह है कि इस एक जगह पर कई संभावनाएं छिपी हैं। यही एक जगह है, जहां बहुत सारे लोग सभी संभावनाओं को देखने से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि यहां बहुत सारी चीजें हो रही हैं।

कुछ को छोडक़र मैंने अधिकांश लोगों को हमेशा अनाहत साधना से दूर रखा है, क्योंकि अगर यहां बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं तो यहां बहुत दुविधा भी है। अनाहत साधना के लिए दो चीजों की जरूरत होती है – भावनाओं की मधुरता और बुद्धि की परम स्थिरता। इसके अलावा आपमें इतना विवेक होना चाहिए कि आप समझ सकें कि क्या वास्तविक है और क्या वास्तविक नहीं है, क्या अनुभव में है और क्या मनोवैज्ञानिक है। अगर आपमें यह विवेक नहीं होगा तो अनाहत पर काम करने या इस स्तर की साधना का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि यह एक ऐसी जगह है जहां आप चीजों को इस तरह से घटित होते हुए देखते व सुनते हैं, जिन्हें थोड़ा-बहुत समझदार व स्थिर व्यक्ति भी देख-सुनकर पागल हो सकता है। अनाहत का मतलब उस ध्वनि से है, जो बिना किन्हीं दो चीजों के स्पर्श के हो रही हो। धरती पर जितनी भी ध्वनियां हैं, वह इसलिए होती हैं, क्योंकि कोई चीज किसी दूसरी चीज से टकराती है। लेकिन यह वह ध्वनि है, जो आपके सहज मौन होकर बैठ जाने पर भी होती है। यहां कई तरह की ध्वनियां होती हैं – जिनकी पहचान एक सौ आठ अलग-अलग तरह की ध्वनियों के रूप में की गई है। इसी वजह से भारत में अलग-अलग देवी-देवता अलग-अलग ध्वनियों से जुड़े हुए माने गए हैं। अगर आप शिव कहते हैं, तो उनकी ध्वनि डमरू या ड्रम की होगी।

अनाहत पर महारत से ध्वनियाँ सुनाई देती हैं.

अगर कोई व्यक्ति अनाहत पर महारत हासिल कर लेता है तो वह अलग-अलग तरह की ध्वनियां सुनने में सक्षम हो जाता है, मसलन- घंटी की ध्वनि, डमरू या नगाड़े फिर वायु पर आधारित यंत्र जैसे बांसुरी आदि की ध्वनि। जब आप ध्वनियां सुनने लगते हैं तो आमतौर पर माना जाता है कि आप पागल हो गए हैं। इसलिए इससे पहले कि आप किसी तरह की कोई ध्वनि सुनें, आपका विवेक पूरी तरह से सुस्पष्ट व आपकी भावनाएं मधुरता से भरी होनी चाहिए। जब आप अपनी भावनाओं में पूरी तरह से मिठास या मधुरता भर लेते हैं तो फिर फर्क नहीं पड़ता कि अलग-अलग तरीके से आपके सामने क्या आ रहा है। अगर ऐसा हुए बिना आप अनाहत के स्तर पर साधना करें तो आपको जो दिखाई या सुनाई देगा, वह आपको डरा सकता है या पागल बना सकता है।

अनाहत और तन्त्र विद्या में सम्बन्ध.

तंत्र विद्या में एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें योगी अपनी देवी खुद तैयार करते हैं, उसके लिए एक खास स्वरूप का निर्माण किया जाता है, फिर उसे जीवंत किया जाता है। मुझे नहीं पता कि आपने डाकिनी, राकिनी या छिन्नमस्ता, काली की प्रतिमाएं देखी हैं या नहीं। ये सब नारी स्वरूप के भयावह रूप हैं।

हालांकि अब ऐसे योगी तो नहीं रहे, वे बहुत पहले ही चले गए। उन्होंने जिस मकसद से इन प्रतिमाओं या स्वरूपों को बनाया था, वह पूरा हो गया, लेकिन ये रूप अभी भी हैं। अगर आप अनाहत चक्र सिद्ध कर लेते हैं तो परा-शक्तियों को लगता है कि आप उनके स्वागत के लिए घंटी बजा रहे हैं और उन्हें आना है। अगर वे आ गईं तो आप उनके साथ खेल नहीं सकते, बल्कि आप उनसे भयभीत हो जाएंगे। मान लीजिए आपके सामने कोई ऐसी शक्ल आ जाए, जिसकी नाक न हो, बस उसकी जगह दो छेद हों तो आप उसे देखकर डर जाएंगे। अगर आप ऐसे हैं तो आपको अनाहत साधना नहीं करनी चाहिए। कोई भी ऐसा जीव या रूप जो सामान्य इंसानों जैसा न लगे, वह आपको अजीबोगरीब लगता है। तो आपकी सोच के मुताबिक अजीबोगरीब प्राणियों का रूप काली, छिन्नमस्ता, डाकिनी, राकिनी व लंकिनी आदि का है।

अनाहत सिद्ध होते ही ये सारी शक्तियां आपकी तरफ आने लगती हैं, यह अपने आप में एक जबरदस्त अनुभव है, लेकिन अगर आपकी भावनाओं की मधुरता और विवेक स्पष्ट नहीं बना रहा तो ये चीजें आपके लिए एक भयावह अनुभव साबित हो सकती हैं, हो सकता है कि आपके मानसिक संतुलन को हिला दें और आप पूरी तरह से अपना दिमाग खो बैठें। हकीकत की कौन कहे, अगर आपके सपने में भी रोज कुछ न कुछ अजीबोगरीब चीजें सामने आएं, तो बहुत सारे लोग अपना दिमागी संतुलन खो बैठेंगे। बहरहाल, उनमें ज्यादा दिमाग है भी नहीं। आधुनिक शिक्षा पद्धति ने मानवता का बड़ा नुकसान किया है, क्योंकि यह शिक्षा मन पर काम नहीं करती, बल्कि सिर्फ हमारी याद्दाश्त पर काम करती है।

तेज़ दिमाग और मधुर भावनाओं का संगम.

मानव दिमाग इस तरह से विकसित नहीं हुआ है कि वह इन दो चीजों को संभाल सके। जिन लोगों के पास एक ठीक-ठाक रूप से तेज दिमाग है, उनके भीतर की भावनात्मक स्थिति अकसर कड़वाहट भरी होती है। यह एक आम बात होती जा रही है। आपको ऐसे बहुत ही कम लोग दिखाई देंगे, जिनके दिमाग बहुत तेज हों और उनमें भावनाओं की मधुरता भी हो। तेज व तीक्ष्ण दिमाग का मतलब है कि आप हर व्यक्ति को काटते होंगे, जबकि भावनाओं की मधुरता का मतलब है कि आप एक मूर्ख व्यक्ति होंगे। यह चीज आज दुनिया में लगभग स्वीकार की जाने लगी है, जो किसी भी तरह से ठीक नहीं है। अनाहत एक शानदार जगह है, लेकिन आज की दुनिया में मुझे लगता है कि लोगों के दिमाग को तीक्ष्ण करना और उनकी भावनाओं में मधुरता भरना अपने आप में एक मुश्किल काम है।

अब अगर आप अपने विवेकी दिमाग को बेहद तीक्ष्ण व स्थिर बना लें तो अनाहत के आयाम पर आप सृष्टि और स्रष्टा दोनों के साथ आराम से खेल सकते हैं। अनाहत अपने आप में अद्भुत जगह है, क्योंकि यहां सारी चीजें एक ही स्थान पर हैं। इसलिए अनाहत की साधना काफी जटिल होती है, जो लोगों को भयभीत व तोडक़र रख सकती है, लेकिन जो लोग इसे संभालने में कामयाब हो जाते हैं, वे इस धरती के सबसे आश्चर्यजनक व शक्तिशाली इंसान बन जाते हैं।

वस्तुओं का उपयोग कैसे करें?


वस्तुओं का उपयोग कैसे करें?
(श्री अगरचन्दजी, नाहटा)

विश्व−अशान्ति के दो प्रधान कारण हैं—एक तो अभाव दूसरा तृष्णा। हमें अपने जीवनोपयोगी वस्तुओं के प्राप्त न होने या कम प्राप्त होने के कारण चित्त में अशान्ति का अनुभव होता है। विशेषकर जबकि दूसरों के पास उनकी आवश्यकता से अधिक विद्यमानता देखते हैं तो मन में एक संघर्ष−सा छिड़ जाता है कि हमें भी वैसे ही सुविधाएँ और वस्तुएँ मिलनी चाहिये और जहाँ तक उनका अभाव रहेगा अशान्ति मिट नहीं सकती। उसका सच्चा उपाय तो यही है कि हम अपनी आवश्यकताओं को यथासम्भव कम करें, उनकी पूर्ति स्वयं कर सकें वैसा श्रम करते रहें एवं जो साधन सामग्री प्राप्त हैं उनमें सन्तोष की भावना पनपायें। भारतीय प्राचीन संस्कृति इसी पर जोर देती आ रही है। पर मानव स्वभाव की कमजोरी समझें या संस्कार दोष, हमें प्राप्त वस्तुओं में सन्तोष नहीं होता है। अपितु हमारी तृष्णा बढ़ती ही रहती है। एक दूसरे के अनुकरण में भी हमारी आवश्यकताएँ बढ़ती चली जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में शान्ति प्राप्त हो कैसे? यही विचारणीय एक समस्या है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने बहुत प्रकार से अशान्ति का विश्लेषण करके मानव को अंतर्मुखी बनने को आकर्षित किया है। उन्होंने देखा कि वस्तुएं सीमित हैं, तथा अपरिमित हैं एवं यह जीवन क्षणभंगुर है, थोड़े से समय में ही इस देह से नाता छूट जाने वाला है। हम जियेंगे तो पचास−साठ वर्ष और सोचते रहते हैं सैकड़ों वर्ष की बातें! हमारा मन अन्त समय तक संग्रह वृत्ति में ही लगा रहता है। जो भी यहाँ से भौतिक शरीर को छोड़कर जाते हैं। सब कुछ यहीं छोड़ जाते हैं। कोई शरीर एवं धनादि पदार्थ साथ नहीं ले जा सकता। तब इनकी इतनी तृष्णा, भ्रम का चक्कर ही प्रतीत होता है। इसीलिये मनीषियों ने भोग को छोड़कर त्याग को स्वीकार कर उसे ही शान्ति का मार्ग बतलाया।

विश्व के सारे पदार्थ परिवर्तनशील हैं। कोई भी पदार्थ सदा एक−सा नहीं रहता। इसीलिये हमें बोध ग्रहण करना चाहिये। हमारे विचारकों ने ऐसा ही किया था, जिसके सैकड़ों दृष्टान्त भारतीय साहित्य में भरे पड़े हैं। हम उस परम सत्य की उपेक्षा कर इधर−उधर, बाहर ही बाहर भूले भटक रहे हैं। इससे शान्ति मिलने की नहीं। यह सही है कि सभी व्यक्ति इस भावना वाले नहीं बन सकते, पर जितने अधिक परिमाण में हमारी आध्यात्मिक संस्कृति का प्रचार होगा शान्ति उतनी ही अधिक सुलभ होगी। तात्पर्य यह है कि शान्ति का सच्चा उपाय सन्तोष है वह जो नहीं रख सकते हैं उनके लिये उपाय है श्रम द्वारा अधिक उत्पादन एवं विद्यमान वस्तुओं का सदुपयोग करना सीखना।

बहुत से व्यक्तियों का कहना है कि वस्तु की कमी है तब संघर्ष कैसे रुक सकता है? पर वास्तव में वस्तुओं की कमी उतनी नहीं, हमने अभी वस्तुओं के उपयोग की कला सीखी नहीं इससे हमें ऐसा लगता है। हम प्रतिदिन देखते हैं घरों में या सड़कों पर कूड़े करकट का ढेर पड़ा रहता है। जीवन में उपयोगी कितनी वस्तुएँ निकम्मी समझकर रद्दी में डाल दी जाती हैं। दफ्तरों में न मालूम नित्य कितने ही कागज रद्दी की टोकरी में डाल दिये जाते हैं, जबकि उन्हीं को संग्रह कर उपयोग किया जाय तो बहुत काम में आ सकते हैं। उन्हें पंसारियों, हलवाइयों, खोमचेवालों आदि को बेचा जाय तो पैसे मिल सकते हैं। महात्मा गाँधी का इन छोटी−छोटी बातों पर बड़ा ध्यान था। जहाँ तक जिस वस्तु का उपयोग हो सकता है वे उसे व्यर्थ नहीं गँवाते थे। ये जो भी लिफाफे आते या जो कागज काम के लायक होते, उन्हें उलटकर लिफाफा बनाकर काम में लेते थे। पर हमें तो वस्तुओं को व्यर्थ बरबाद करने की आदत पड़ गयी है। अतः इस ओर हम तनिक भी ध्यान नहीं देते। कोई चीज हमारे काम की न हो, पर वह हमारे अन्य भाई के काम की हो सकती है तो हमें उसे दे देनी चाहिये, ताकि उसकी आवश्यकता की पूर्ति हो जाय। अपनी उपभोग्य वस्तुओं में से थोड़ी−थोड़ी बचत की जाय तो बहुत वस्तुएं बच जाएंगी।

घरों में देखते हैं, कोई कपड़ा थोड़ा−सा फट गया था मैला हो गया तो उसे व्यवहार में अनुपयुक्त समझ फाड़कर झाड़न आदि में उसको काम में लेकर फेंक देते हैं। यदि हम विवेक रखें जो काम किसी दूसरी साधारण वस्तु से हो जाय, उसके लिए वस्त्र को न गँवाकर उस वस्त्र को किसी गरीब भाई के उपयोग के लिए दिया जा सकता है। वह व्यक्ति उससे अपनी सर्दी−गर्मी और लज्जा का बचाव कर सुखी हो सकता है।

विद्यार्थी ज्यों−ज्यों आगे की कक्षा में जाता है पहिले की पाठ्यपुस्तकें बेकार हो जाती हैं और उन्हें योंही बरबाद किया जाता है। यदि उन्हें उस कक्षा के किसी गरीब विद्यार्थी को दे दिया जाय तो कितना सुन्दर हो। विदेशों में जहाँ अशुचि और कूड़े−करकट को भी खाद बनाने आदि के काम में ले लेते हैं। वहाँ हमारे यहाँ काम में आने योग्य वस्तु को भी व्यर्थ ही बरबाद करते रहते हैं। यह बहुत ही दुःख की बात है। वस्तुओं के उपयोग की कला सीखना आज भारतवासियों के लिए परमावश्यक है।

हमारे यहाँ गाय, भैंस आदि ढोर रहते हैं। उन्हें घास−फूस आदि डालने में असावधानी रखने से इधर−उधर कितना ही घास और दाना जमीन में पड़कर व्यर्थ जाता है। ढोर चरते समय दाना इधर−उधर फैला देते हैं। वह पैरों के नीचे या भीगे स्थानों में योंही नष्ट हो जाता है तथा गन्दगी और बीमारी फैलाता है जबकि ध्यान देकर उसे तत्काल ही उठा दिया जाय तो बेचारे कितने ही भूखे ढोरों का इससे पेट भर सकता है।

हम खाने बैठते हैं तो कोई वस्तु अधिक ले लेते हैं या भाती नहीं है तो योंही जूठन में छोड़ उसकी बरबादी करते हैं। यदि खाद्य−पदार्थ लेते समय ध्यान रक्खा जाय जिससे जूठन न निकले तो रोज कितना ही खाद्य−पदार्थ बचा सकते हैं और भूखों के पेट भर सकते हैं। इसी प्रकार जलादि का प्रयोग भी हम ठीक तरह से नहीं करते और कितना ही जल व्यर्थ इधर−उधर बरबाद होता रहता है, जिसे पौधों में डाला जाय तो सूखते हुए पौधे ताजे हरे हो सकते हैं। ऐसे अनेक दृष्टान्त दिये जा सकते हैं। वास्तव में हम रात−दिन ऐसी अनेक बातें देखते रहते हैं पर इन पर विचार नहीं करते। यदि कोई विचार करते भी हैं तो उसे कार्य रूप में परिणत नहीं करते।

प्राचीन समय की बात जाने दें तो भी कुछ समय पूर्व तक और किसी अंश में अब भी हमारे ग्रामों में निरुपयोगी मानी जाने वाली वस्तुओं का उपयोग होता नजर आता है। गाँव वाले फटे वस्त्रों के बिछौने बना लेते हैं। पुराने जमाने में रद्दी कागजों को कूट कर अनेक उपयोगी वस्तुएँ बना लेते थे। ऐसे कूटे हुये कागज के डब्बे, सिंहासन, कलमदान आदि हमारे कलाभवन हैं जिनकी मजबूती और सुन्दरता देखते ही बनती है। खाताबही के रद्दी कागजों के एक ओर के खाली पृष्ठ पर अनेक कलापूर्ण चित्र बनाये हुए हमारे संग्रह में हैं। इसी प्रकार ठाठे के सिंहासन दर्शनीय हैं।

वस्तुओं की व्यर्थ बरबादी से जितना नुकसान होता है, उससे कहीं अधिक समय की बरबादी से होता है जो समय चला गया है वह पुनः मिलने की सम्भावना नहीं। अतः जीवन के पल पल का सदुपयोग सीखें। क्षण मात्र भी व्यर्थ न खोवें। जीवन की अवनति होने वाले कार्यों से बच उसके उत्कर्ष के कार्यों में लगे रहें।

मन, वचन, काया की शक्ति का अपव्यय करने से हमारा सारा जीवन बरबाद हो रहा है। अतः हमें चारों ओर, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होने वाली इस बरबादी से बच कर, विवेक पूर्वक सदुपयोग करने की कला का प्रतिदिन अभ्यास बढ़ाते रहना चाहिए। यही जीवन का सबसे अच्छा सद्व्यवहार है।

मन हमें प्राप्त हुआ है सुविचार के लिये, वाक् शक्ति प्राप्त हुई है सत्य, हित, मित भाषण के लिये, प्रभु भजन व सदुपदेश देने के लिये, शरीर प्राप्त हुआ है आत्मोन्नति की साधना एवं सेवा के लिए, यह ध्यान में रखें भूलें नहीं। इनके द्वारा कोई बुराई नहीं हो भलाई ही हो, इसके विषय में सतर्क रहें धन प्राप्त हुआ है भोग के साथ साथ परोपकार के लिए। इन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं ज्ञान सम्पादन व सदाचरण के लिये, उन्हें अच्छे अच्छे कार्यों में लगाये रखें। प्राप्त सभी साधनों का सदुपयोग करिये, कम से कम दुरुपयोग तो नहीं ही कीजिए।

आवश्यकताओं को कम करना, तृष्णाओं को घटाना, प्राप्त सामग्री का सदुपयोग करना यही मानव जीवन का सार है।