श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: द्वाविंश अध्यायः श्लोक 17-31 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: द्वाविंश अध्यायः श्लोक 17-31 का हिन्दी अनुवाद

एक बार यह अपने महल की छत पर गेंद खेल रही थी। गेंद के पीछे इधर-उधर दौड़ने के कारण इसके नेत्र चंचल हो रहे थे तथा पैरों के पायजेब मधुर झनकार करते जाते थे। उस समय इसे देखकर विश्वावसु गन्धर्व मोहवश अचेत होकर अपने विमान से गिर पड़ा था। वही इस समय यहाँ स्वयं आकर प्रार्थना कर रही है; ऐसी अवस्था में कौन समझदार पुरुष इसे स्वीकार न करेगा? यह तो साक्षात् आप महाराज श्रीस्वायम्भुव मनु की दुलारी कन्या और उत्तानपाद की प्यारी बहिन है; तथा यह रमणियों में रत्न के समान है। जिन लोगों ने कभी श्रीलक्ष्मी जी के चरणों की उपासना नहीं की है, उन्हें तो इसका दर्शन भी नहीं हो सकता। अतः मैं आपकी इस साध्वी कन्या को अवश्य स्वीकार करूँगा, किन्तु एक शर्त के साथ। जब तक इसके संतान न हो जायेगी, तब तक मैं गृहस्थ-धर्मानुसार इसके साथ रहूँगा। उसके बाद भगवान् के बताये हुए संन्यासप्रधान हिंसारहित शम-दामादि धर्मों को ही अधिक महत्त्व दूँगा। जिनसे इस विचित्र जगत् की उत्पत्ति हुई है, जिनमें यह लीन हो जाता है और जिनके आश्रय से यह स्थित है-मुझे तो वे प्रजापतियों के भी पति भगवान् श्रीअनन्त ही सबसे अधिक मान्य हैं।

मैत्रेय जी कहते हैं- प्रचण्ड धनुर्धर विदुर! कर्दम जी केवल इतना ही कह सके, फिर वे हृदय में भगवान् कमलनाभ का ध्यान करते हुए मौन हो गये। उस समय उसके मन्द हास्ययुक्त मुखकमल को देखकर देवहूति का चित्त लुभा गया। मनु जी ने देखा कि इस सम्बन्ध में महारानी शतरूपा और राजकुमारी की स्पष्ट अनुमति है, अतः उन्होंने अनेक गुणों में सम्पन्न कर्दम जी को उन्हीं के समान गुणवती कन्या का प्रसन्नतापूर्वक दान कर दिया। महारानी शतरूपा ने भी बेटी और दामाद को बड़े प्रेमपूर्वक बहुत-से बहुमूल्य वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोचित पात्रादि दहेज में दिये। इस प्रकार सुयोग्य वर को अपनी कन्या देकर महाराज मनु निश्चिन्त हो गये। चलती बार उसका वियोग न सह सकने के कारण उन्होंने उत्कण्ठावश विह्वलचित्त होकर उसे अपनी छाती से चिपटा लिया और ‘बेटी! बेटी!’ कहकर रोने लगे। उनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गयी और उनसे उन्होंने देवहूति के सिर के सारे बाल भिगो दिये। फिर वे मुनिवर कर्दम से पूछकर, उनकी आज्ञा ले रानी के सहित रथ पर सवार हुए और अपने सेवकों सहित ऋषिकुल सेवित सरस्वती नदी के दोनों तीरों पर मुनियों के आश्रमों की शोभा देखते हुए अपनी राजधानी में चले आये।


जब ब्रह्मावर्त की प्रजा को यह समाचार मिला कि उसके स्वामी आ रहे हैं, तब वह अत्यन्त आनन्दित होकर स्तुति, गीत एवं बाजे-गाजे के साथ अगवानी करने के लिये ब्रह्मावर्त की राजधानी से बाहर आयी। सब प्रकार की सम्पदाओं से युक्त बर्हिष्मती नगरी मनु जी की राजधानी थी, जहाँ पृथ्वी को रसातल से ले आने के पश्चात् शरीर कँपाते समय श्रीवराह भगवान् के रोम झड़कर गिरे थे। वे रोम ही निरन्तर हरे-भरे रहने वाले कुश और कास हुए, जिनके द्वारा मुनियों ने यज्ञ में विघ्न डालने वाले दैत्यों का तिरस्कार कर भगवान् यज्ञपुरुष की यज्ञों द्वारा आराधना की है। महाराज मनु ने भी श्रीवराह भगवान् से भूमिरूप निवासस्थान प्राप्त होने पर इसी स्थान में कुश और कास की बर्हि (चटाई) बिछाकर श्रीयज्ञ भगवान् की पूजा की थी।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: अथ द्वाविंश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: अथ द्वाविंश अध्यायः श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

देवहूति के साथ कर्दम प्रजापति का विवाह.

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार जब कर्दम जी ने मनु जी के सम्पूर्ण गुणों और कर्मों की श्रेष्ठता का वर्णन किया तो उन्होंने उन निवृत्तिपरायण मुनि से कुछ सकुचाकर कहा। मनु जी ने कहा- मुने! वेदमूर्ति भगवान् ब्रह्मा ने अपने वेदमय विग्रह की रक्षा के लिए तप, विद्या और योग से सम्पन्न तथा विषयों में अनासक्त आप ब्राह्मणों को अपने मुख से प्रकट किया है और फिर उन सहस्र चरणों वाले विराट् पुरुष ने आप लोगों की रक्षा के लिये ही अपनी सहस्रों भुजाओं से हम क्षत्रियों को उत्पन्न किया है। इस प्रकार ब्राह्मण उनके हृदय और क्षत्रिय शरीर कहलाते हैं। अतः एक ही शरीर से सम्बद्ध होने के कारण अपनी-अपनी और एक-दूसरे की रक्षा करने वाले उन ब्राह्मण और क्षत्रियों की वास्तव में श्रीहरि ही रक्षा करते हैं, जो समस्त कार्यकारणरूप होकर भी वास्तव में निर्विकार हैं। आपके दर्शनमात्र से ही मेरे सारे सन्देह दूर हो गये, क्योंकि आपने मेरी प्रशंसा के मिस से स्वयं ही प्रजापालन की इच्छा वाले के धर्मों का बड़े प्रेम से निरूपण किया है। आपका दर्शन अजितेन्द्रिय पुरुषों को बहुत दुर्लभ है; मेरा बड़ा भाग्य है जो मुझे आपका दर्शन हुआ और मैं आपके चरणों की मंगलमयी रज अपने सिर पर चढ़ा सका। मेरे भाग्योदय से ही आपने मुझे राजधर्मों की शिक्षा देकर मुझ पर महान् अनुग्रह किया है और मैंने भी शुभ प्रारब्ध का उदय होने से ही आपकी पवित्र वाणी कान खोलकर सुनी है।

मुने! इस कन्या के स्नेहवश मेरा चित्त बहुत चिन्ताग्रस्त हो रहा है; अतः मुझ दीन की यह प्रार्थना आप कृपापूर्वक सुनें। यह मेरी कन्या-जो प्रियव्रत और उत्तानपाद की बहिन है-अवस्था, शील और गुण आदि में अपने योग्य पति को पाने की इच्छा रखती है। जब से नारद जी के मुख से आपके शील, विद्या, रूप, आयु और गुणों का वर्णन सुना है, तभी से यह आपको अपना पति बनाने का निश्चय कर चुकी है। द्विजवर! मैं बड़ी श्रद्धा से आपको यह कन्या समर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार कीजिये। यह गृहस्थोचित कार्यों के लिये सब प्रकार आपके योग्य है। जो भोग स्वतः प्राप्त हो जाये, उसकी अवहेलना करना विरक्त पुरुष को भी उचित नहीं है; फिर विषयासक्त की तो बात ही क्या है। जो पुरुष स्वयं प्राप्त हुए भोग का निरादर कर फिर किसी कृपण के आगे हाथ पसारता है, उसका बहुत फैला हुआ यश भी नष्ट हो जाता है और दूसरों के तिरस्कार से मान भंग भी होता है।

विद्वन्! मैंने सुना है, आप विवाह करने के लिये उद्यत हैं। आपका ब्रह्मचर्य एक सीमा तक है, आप नैष्ठित ब्रह्मचारी तो हैं नहीं। इसलिये अब आप इस कन्या को स्वीकार कीजिये, मैं इसे आपको अर्पित करता हूँ। श्रीकर्दम मुनि ने कहा- ठीक है, मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्या का अभी किसी से साथ वाग्दान नहीं हुआ है, इसलिये हम दोनों का सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मा विधि से विवाह होना उचित ही होगा। राजन्! वेदोक्त विवाह-विधि में प्रसिद्ध जो ‘गृभ्णामि ते’ इत्यादि मन्त्रों में बताया हुआ काम (संतानोत्पादनरूप मनोरथ) है, वह आपकी इस कन्या के साथ हमारा सम्बन्ध होने से सफल होगा। भला, जो अपनी अंगकान्ति से आभूषणादि की शोभा को भी तिरस्कृत कर रही है, आपकी उस कन्या का कौन आदर न करेगा?


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 45-56 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 45-56 का हिन्दी अनुवाद

आदिराज महाराज मनु ने उस उत्तम तीर्थ में कन्या के सहित पहुँचकर देखा कि मुनिवर कर्दम अग्निहोत्र से निवृत्त होकर बैठे हुए हैं। बहुत दिनों तक उग्र तपस्या करने के कारण वे शरीर से बड़े तेजस्वी दीख पड़ते थे तथा भगवान् के स्नेहपूर्ण चितवन के दर्शन और उनके उच्चारण किये हुए कर्णामृतरूप सुमधुर वचनों को सुनने से, इतने दिनों तक तपस्या करने पर भी वे विशेष दुर्बल नहीं जान पड़ते थे। उनका शरीर लम्बा था, नेत्र कमलदल के समान विशाल और मनोहर थे, सिर पर जटाएँ सुशोभित थीं और कमर में चीर-वस्त्र थे। वे निकट से देखने पर बिना सान पर चढ़ी हुई महामूल्य मणि के समान मलिन जान पड़ते थे।

महाराज स्वायम्भुव मनु को अपनी कुटी में आकर प्रणाम करते देख उन्होंने उन्हें आशीर्वाद से प्रसन्न किया और यथोचित आतिथ्य की रीति से उनका स्वागत-सत्कार किया। जब मनु जी उनकी पूजा ग्रहण कर स्वस्थचित्त से आसन पर बैठ गये, तब मुनिवर कर्दम ने भगवान् की आज्ञा का स्मरण कर उन्हें मधुर वाणी से प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहा- ‘देव! आप भगवान् विष्णु की पालनशक्तिरूप हैं, इसलिये आपका घूमना-फिरना निःसन्देह सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए ही होता है। आप साक्षात् विशुद्ध विष्णुस्वरूप हैं तथा भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम, धर्म और वरुण आदि रूप धारण करते हैं; आपको नमस्कार है।

आप मणियों से जड़े हुए जयदायक रथ पर सवार हो अपने प्रचण्ड धनुष की टंकार करते हुए उस रथ की घरघराहट से ही पापियों को भयभीत कर देते हैं और अपनी सेना के चरणों से रौंदे हुए भूमण्डल को कँपाते अपनी उस विशाल सेना को साथ लेकर पृथ्वी पर सूर्य के समान विचरते हैं। यदि आप ऐसा न करें तो चोर-डाकू भगवान् की बनायी हुई वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा को तत्काल नष्ट कर दें तथा विषयलोलुप निरंकुश मानवों द्वारा सर्वत्र अधर्म फैल जाये। यदि आप संसार की ओर से निश्चिन्त हो जायें तो यह लोक दुराचारियों के पंजे में पड़कर नष्ट हो जाये। तो भी वीरवर! मैं आपसे पूछता हूँ कि इस समय यहाँ आपका आगमन किस प्रयोजन से हुआ है; मेरे लिये जो आज्ञा होगी, उसे मैं निष्कपट भाव से सहर्ष स्वीकार करूँगा।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 29-44 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 29-44 का हिन्दी अनुवाद

वह तुम्हारा वीर्य अपने गर्भ में धारणकर उससे नौ कन्याएँ उत्पन्न करेगी और फिर तुम्हारी उन कन्याओं से लोकरीति के अनुसार मरीचि आदि ऋषिगण पुत्र उत्पन्न करेंगें। तुम भी मेरी आज्ञा का अच्छी तरह पालन करने से शुद्धचित्त हो, फिर अपने सब कर्मों का फल मुझे अर्पण कर मुझको ही प्राप्त होओगे। जीवों पर दया करते हुए तुम आत्मज्ञान प्राप्त करोगे और फिर सबको अभयदान दे अपने सहित सम्पूर्ण जगत् को मुझमें और मुझको अपने में स्थित देखोगे। महामुने! मैं भी अपने अंश-कलारूप से तुम्हारे वीर्य द्वारा तुम्हारी पत्नी देवहूति के गर्भ में अवतीर्ण होकर सांख्य शास्त्र की रचना करूँगा। मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! कर्दम ऋषि से इस प्रकार सम्भाषण करके, इन्द्रियों के अन्तर्मुख होने पर प्रकट होने वाले श्रीहरि सरस्वती नदी से घिरे हुए बिन्दुसर तीर्थ से (जहाँ कर्दम ऋषि तप कर रहे थे) अपने लोक को चले गये।

भगवान के सिद्धमार्ग (वैकुण्ठ मार्ग) की सभी सिद्धेश्वर प्रशंसा करते हैं। वे कर्दम जी के देखते-देखते अपने लोक को सिधार गये। उस समय गरुड़ जी के पक्षों से जो साम की आधार भूता ऋचाएँ निकल रही थीं, उन्हें वे सुनते जाते थे। विदुर जी! श्रीहरि के चले जाने पर भगवान कर्दम उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए बिन्दु सरोवर पर ही ठहरे रहे। वीरवर! इधर मनु जी भी महारानी शतरूपा के साथ सुवर्णजटित रथ पर सवार होकर तथा उस पर अपनी कन्या को भी बिठाकर पृथ्वी पर विचरते हुए, जो दिन भगवान ने बताया था, उसी दिन शान्तिपरायण महर्षि कर्दम के उस आश्रम पर पहुँचे। सरस्वती के जल से भरा हुआ यह बिन्दु सरोवर वह स्थान है, जहाँ अपने शरणागत भक्त कर्दम के प्रति उत्पन्न हुई अत्यन्त करुणा के वशीभूत हुए भगवान् के नेत्रों से आँसुओं की बूँदें गिरी थीं। यह तीर्थ बड़ा पवित्र है, इसका जल कल्याणमय और अमृत के समान मधुर है तथा महर्षिगण सदा इसका सेवन करते हैं। उस समय बिन्दु सरोवर पवित्र वृक्ष-लताओं से घिरा हुआ था, जिनमें तरह-तरह की बोली बोलने वाले पवित्र मृग और पक्षी रहते थे, वह स्थान सभी ऋतुओं के फल और फूलों से सम्पन्न था और सुन्दर वन श्रेणी भी उसकी शोभा बढ़ाती थी। वहाँ झुंड-के-झुंड मतवाले पक्षी चहक रहे थे, मतवाले भौंरे मंडरा रहे थे, उन्मत्त मयूर अपने पिच्छ फैला-फैलाकर नट की भाँति नृत्य कर रहे थे और मतवाले कोकिल कुहू-कुहू करके मानो एक-दूसरे को बुला रहे थे। वह आश्रम कदम्ब, चम्पक, अशोक, करंज, बकुल, असन, कुन्द, मन्दार, कुटज और नये-नये आम के वृक्षों से अलंकृत था। वहाँ जलकाग, बत्तख आदि जल पर तैरने वाले पक्षी हंस, कुरर, जलमुर्ग, सारस, चकवा और चकोर मधुर स्वर से कलरव कर रहे थे। हरिन, सूअर, स्याही, नीलगाय, हाथी, लंगूर, सिंह, वानर, नेवले और कस्तूरी मृग आदि पशुओं से भी वह आश्रम घिरा हुआ था।


साभार krishnakosh.org

संत की परीक्षा.

संत की परीक्षा.

सन्त पुरन्दर की निर्लोभिता एवं तपश्चर्या की चर्चा विजय नगर के महाराज कृष्णदेवराय ने बहुत सुनी थी- पर, उन्हें सहसा विश्वास नहीं होता था कि क्या ऐसा भी सम्भव है। क्या व्यक्ति स्वयं विद्वान होते हुए तथा साधनों के सहज उपलब्ध रहते हुए भी उन्हें ठुकरा दे और लोकसेवी का जीवन जिए? गृहस्थ जीवन और लोक सेवा ऐसी गरीबी में कैसे साथ- साथ निभ सकते हैं? 

''अपने मन्त्री व्यासराय की सहायता से उन्होंने सन्त की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने सन्त को परीक्षत: कहलवाया कि वे अपनी भिक्षा राजभवन से ले लिया करें। भिक्षा में दिये जाने वाले चावलों में उन्होंने रत्न- हीरे मिला दिये। नित्य उन्हें इसी प्रकार प्रसन्नभाव से आते देख उन्हें शंका हुई, अपने मन्त्री से बोले- ''आइये! जिन सन्त की निस्पृहता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, उसे उनके घर चलकर परखे। '' वहाँ पहुँचे तो बड़ा विचित्र दृश्य देखा। सादगी भरा जीवन जी रहे सन्त व उनकी पत्नी में परस्पर सम्वाद चल रहा था। पत्नी हीरे आदि बीनकर अलग रखती जाती थी व कहती जा रही थी-'' आजकल आप न जाने कहाँ से भिक्षा लाते हैं। इन चावलों में तो कंकड़- पत्थर भरे पड़े हैं। इतना कहकर छद्मवेशधारी राजा मन्त्री के सामने ही उसे वे कचरे के ढेर में फेंक आयीं।

राजा के आश्चर्य व्यक्त करने पर वे बोलीं- 'पहले हम भी यही सोचते थे कि ये हीरे- मोती हैं। पर जब से भक्ति का पथ अपनाया, लोक सेवा की ओर कदम बढ़ाया तो निर्वाह योग्य ब्राह्मणोचित आजीविका से ही काम चल जाता है। अब इस बाह्य सम्पदा का मूल्य हमारे लिए तो हीरो के नहीं, कंकड़- पत्थर के बराबर ही है।''

स्वतन्त्र विवेक बुद्धि ही है जो व्यक्ति को दो मार्गो- आत्मिक प्रगति तथा भौतिक समृद्धि के चयन, अनुपयोग, दुरुपयोग, सदुपयोग के माध्यम से स्वर्ग व नरक के दृश्य इसी जीवन में दिखाती है व उसका भविष्य निर्धारित करती है।

असफलताओं का कारण.


असफलताओं का कारण.

हम दूसरों को बरबस अपनी तरह विश्वास, मत, स्वभाव एवं नियमों के अनुसार कार्य करने और जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य करते हैं। दूसरों को बरबस सुधार डालने, अपने विचार या दृष्टिकोण को जबरदस्ती थोपने से न सुधार होता है, न मन प्रसन्न होता है।

यदि हम अमुक व्यक्ति को दबाए रखेंगे, तो अवश्य परोक्ष रूप से हमारी उन्नति हो जायेगी। अमुक व्यक्ति हमारी उन्नति में बाधक है। अमुक हमारी चुगली करता है, दोष निकालता है, मानहानि करता है। अत: हमें अपनी उन्नति न देखकर पहले अपने प्रतिपक्षी को रोके रखना चाहिए -ऐसा सोचना और दूसरों को अपनी असफलताओं का कारण मानना, भ्रम मूलक है।


(पं श्रीराम शर्मा आचार्य)

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 16-28 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 16-28 का हिन्दी अनुवाद

सर्वेश्वर! आप सम्पूर्ण लोकों के अधिपति हैं। नाना प्रकार की कामनाओं में फँसा हुआ यह लोक आपकी वेद-वाणीरूप डोरी में बँधा है। धर्ममूर्ते! उसी का अनुगमन करता हुआ मैं भी कालरूप आपको आज्ञापालनरूप पुजोपहारादि समर्पित करता हूँ। प्रभो! आपके भक्त विषयासक्त लोगों और उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करने वाले मुझ-जैसे कर्मजड़ पशुओं को कुछ भी न गिनकर आपके चरणों की छत्रच्छाया का ही आश्रय लेते हैं तथा परस्पर आपके गुणगानरूप मादक सुधा का ही पान करके अपने क्षुधा-पिपासादि देहधर्मों को शान्त करते रहते हैं। प्रभो! यह कालचक्र बड़ा प्रबल है। साक्षात् ब्रह्म ही इसके घूमने की धुरी है, अधिक माससहित तेरह महीने अरे हैं, तीन सौ साठ दिन जोड़ हैं, छः ऋतुएँ नेमि (हाल) हैं, अनन्त क्षण-पल आदि इसमें पत्राकार धाराएँ हैं तथा तीन चातुर्मास्य इसके आधारभूत नाभि हैं। यह अत्यन्त वेगवान् संवत्सररूप कालचक्र चराचर जगत् की आयु का छेदन करता हुआ घूमता रहता है, किंतु आपके भक्तों की आयु का ह्रास नहीं कर सकता। भगवन्! जिस प्रकार मकड़ी स्वयं ही जाले को फैलाती, उसकी रक्षा करती और अन्त में उसे निगल जाती है-उसी प्रकार आप अकेले ही जगत् की रचना करने के लिये अपने में अभिन्न अपनी योगमाया को स्वीकार कर उसे अभीव्यक्त हुई अपनी सत्त्वादि शक्तियों द्वारा स्वयं ही इस जगत् की रचना, पालन और संहार करते हैं।

प्रभो! इस समय आपने हमें अपनी तुलसी मालामण्डित, माया से परिच्छिन्न-सी दिखायी देने वाली सगुणमूर्ति से दर्शन दिया है। आप हम भक्तों को जो शब्दादि विषय-सुख प्रदान करते हैं, वे मायिक होने के कारण यद्यपि आपकी पसंद नहीं हैं, तथापि परिणाम में हमारा शुभ करने के लिये वे हमें प्राप्त हों-नाथ! आप स्वरूप से निष्क्रिय होने पर भी माया के द्वारा सारे संसार का व्यवहार चलाने वाले हैं तथा थोड़ी-सी उपासना करने वाले पर भी समस्त अभिलाषित वस्तुओं की वर्षा करते रहते हैं। आपके चरणकमल वन्दनीय हैं, मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ। मैत्रेय जी कहते हैं- भगवान् की भौंहें प्रणय मुस्कान भरी चितवन से चंचल हो रही थीं, वे गरुड़ जी के कंधे पर विराजमान थे। जब कर्दम जी ने इस प्रकार निष्कपट भाव से उनकी स्तुति की, तब वे उनसे अमृतमयी वाणी से कहते लगे।

श्रीभगवान् ने कहा- जिसके लिये तुमने आत्मसंयमादि के द्वारा मेरी आराधना की है, तुम्हारे हृदय के उस भाव को जानकर मैंने पहले से ही उसकी व्यवस्था कर दी है। प्रजापते! मेरी आराधना तो कभी भी निष्फल नहीं होती; फिर जिसका चित्त निरन्तर एकान्तरूप से मुझमें ही लगा रहता है, उन तुम-जैसे महात्माओं के द्वारा की हुई उपासना का तो और भी अधिक फल होता है। प्रसिद्ध यशस्वी सम्राट् स्वायम्भुव मनु ब्रह्मावर्त में रहकर सात समुद्र वाली सारी पृथ्वी का शासन करते हैं। विप्रवर! वे परम धर्मज्ञ महाराज महारानी शतरूपा के साथ तुमसे मिलने के लिये परसों यहाँ आयेंगे। उनकी एक रूप-यौवन, शील और गुणों से सम्पन्न श्यामलोचना कन्या इस समय विवाह के योग्य है। प्रजापते! तुम सर्वथा उसके योग्य हो, इसलिये वे तुम्हीं को वह कन्या अर्पण करेंगे। ब्रह्मन्! गत अनेकों वर्षों से तुम्हारा चित्त जैसी भार्या के लिये समाहित रहा है, अब शीघ्र ही वह राजकन्या तुम्हारी वैसी ही पत्नी होकर यथेष्ट सेवा करेगी।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिंदी अनुवाद.


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकविंश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिंदी अनुवाद.

कर्दम जी की तपस्या और भगवान् का वरदान. 


विदुर जी ने पूछा- भगवन्! स्वयाम्भुव मनु का वंश बड़ा आदरणीय माना गया है। उसमें मैथुन धर्म के द्वारा प्रजा की वृद्धि हुई थी। अब आप मुझे उसी की कथा सुनाइये। बह्मन्! आपने कहा था कि स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ने सातों द्वीपों वाली पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया था तथा उनकी पुत्री जो देवहूति नाम से विख्यात थी, कर्दम प्रजापति को ब्याही गयी थी। देवहूति योग के लक्षण यमादि से सम्पन्न थी, उससे महायोगी कर्दम जी ने कितनी संतानें उत्पन्न कीं? वह सब प्रसंग आप मुझे सुनाइये, मुझे उसके सुनने की बड़ी इच्छा है। इसी प्रकार भगवान् रुचि और ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति ने भी मनु जी की कन्याओं का पाणिग्रहण करके उनसे किस प्रकार क्या-क्या सन्तान उत्पन्न की, वह सब चरित भी मुझे सुनाइये।

मैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! जब ब्रह्मा जी ने भगवान् कर्दम को आज्ञा दी कि तुम संतान उत्पत्ति करो तो उन्होंने दस हजार वर्षों तक सरस्वती नदी के तीर पर तपस्या की। वे एकाग्रचित्त से प्रेमपूर्वक पूजनोपचार द्वारा शरणागत वरदायक श्रीहरि की आराधना करने लगे। तब सत्ययुग के आरम्भ में कमलनयन भगवान् श्रीहरि ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपने शब्द ब्रह्ममयस्वरूप से मूर्तिमान् होकर दर्शन दिये। भगवान् की वह भव्यमूर्ति सूर्य के समान तेजोमयी थी। वे गले में श्वेत कमल और कुमुद के फूलों की माला धारण किये हुए थे, मुखकमल नीली और चिकनी अलकावली से सुशोभित था। वे निर्मल वस्त्र धारण किये हुए थे। सिर पर झिलमिलाता हुआ सुवर्णमय मुकुट, कानों में जगमगाते हुए कुण्डल और करकमलों में शंख, चक्र, गदा आदि आयुध विराजमान थे। उनके एक हाथ में क्रीड़ा के लिये श्वेत कमल सुशोभित था। प्रभु की मधुर मुस्कान भरी चितवन चित्त को चुराये लेती थी। उनके चरणकमल गरुड़ जी के कंधों पर विराजमान थे, तथा वक्षःस्थल में श्रीलक्ष्मी जी और कण्ठ में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी। प्रभु की इस आकाशास्थित मनोहर मूर्ति का दर्शन करके कर्दम जी को बड़ा हर्ष हुआ, मानो उनकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो गयीं। उन्होंने सानन्दहृदय से पृथ्वी पर सिर टेककर भगवान् को साष्टांग प्रणाम किया और फिर प्रेमप्रवणचित्त से हाथ जोड़कर सुमधुर वाणी से वे उनकी स्तुति करने लगे।

कर्दम जी ने कहा- स्तुति करने योग्य परमेश्वर! आप सम्पूर्ण सत्त्वगुण के आधार हैं। योगिजन उत्तरोत्तर शुभ योनियों में जन्म लेकर अन्त में योगस्थ होने पर आपके दर्शनों की इच्छा करते हैं; आज आपका वही दर्शन पाकर हमें नेत्रों का फल मिल गया। आपके चरणकमल भवसागर से पार जाने के लिये जहाज हैं। जिनकी बुद्धि आपकी माया से मारी गयी है, वे ही उन तुच्छ क्षणिक विषय-सुखों के लिये, जो नरक में भी मिल सकते हैं, उन चरणों का आश्रय लेते हैं; किन्तु स्वामिन्! आप तो उन्हें वे विषय-भोग भी दे देते हैं। प्रभो! आप कल्पवृक्ष हैं। आपके चरण समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाले हैं। मेरा हृदय काम-कलुषित है। मैं भी अपने अनुरूप स्वभाव-वाली और गृहस्थ धर्म के पालन में सहायक शीलवती कन्या से विवाह करने के लिये आपके चरणकमलों की शरण में आया हूँ।


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 36-53 का हिन्दी अनुवाद


लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 36-53 का हिन्दी अनुवाद

सुन्दरि! जब तुम उछलती हुई गेंद पर अपनी हथेली की थपकी मारती हो, तब तुम्हारा चरण-कमल एक जगह नहीं ठहरता; तुम्हारा कटिप्रदेश स्थूल स्तनों के भार से थक-सा जाता है और तुम्हारी निर्मल दृष्टि से भी थकावट झलकने लगती है। अहो! तुम्हारा केशपाश कैसा सुन्दर है’। इस प्रकार स्त्रीरूप से प्रकट हुई उस सायंकालीन सन्ध्या ने उन्हें अत्यन्त कामासक्त कर दिया और उन मूढ़ों ने उसे कोई रमणीरत्न समझकर ग्रहण कर लिया।

तदनन्तर ब्रह्मा जी ने गम्भीर भाव से हँसकर अपनी कान्तिमयी मूर्ति से, जो अपने सौन्दर्य का मानो आप ही आस्वादन करती थी, गन्धर्व और अप्सराओं को उत्पन्न किया। उन्होंने ज्योत्स्ना (चन्द्रिका) रूप अपने उस कान्तिमय प्रिय शरीर को त्याग दिया। उसी को विश्वावसु आदि गन्धर्वों ने प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किया। इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्मा ने अपनी तन्द्रा से भूत-पिशाच उत्पन्न किये। उन्हें दिगम्बर (वस्त्रहीन) और बाल बिखेरे देख उन्होंने आँखें मूँद लीं। ब्रह्मा जी के त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीर को भूत-पिशाचों ने ग्रहण किया। इसी को निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवों की इन्द्रियों में शिथिलता आती देखी जाती है। यदि कोई मनुष्य जूठे मुँह सो जाता है तो उस पर भूत-पिशाचादि आक्रमण करते हैं; उसी को उन्माद कहते हैं।

फिर भगवान् ब्रह्मा ने भावना की कि मैं तेजोमय हूँ और अपने अदृश्यरूप से साध्यगण एवं पितृगण को उत्पन्न किया। पितरों ने अपनी उत्पत्ति के स्थान उस अदृश्य शरीर को ग्रहण कर लिया। इसी को लक्ष्य में रखकर पण्डितजन श्राद्धादि के द्वारा पितर और साध्यगणों को क्रमशः कव्य (पिण्ड) और हव्य अर्पण करते हैं। अपनी तिरोधान शक्ति से ब्रह्मा जी ने सिद्ध और विद्याधरों की सृष्टि की और उन्हें अपना वह अन्तर्धान नामक अद्भुत शरीर दिया।

एक बार ब्रह्मा जी ने अपना प्रतिबिम्ब देखा। तब अपने को बहुत सुन्दर मानकर उस प्रतिबिम्ब से किन्नर और किम्पुरुष उत्पन्न किये। उन्होंने ब्रह्मा जी के त्याग देने पर उनका वह प्रतिबिम्ब-शरीर ग्रहण किया। इसीलिये ये सब उषःकाल में अपनी पत्नियों के साथ मिलकर ब्रह्मा जी के गुण-कर्मादी का गान किया करते हैं। एक बार ब्रह्मा जी सृष्टि की वृद्धि न होने के कारण बहुत चिन्तित होकर हाथ-पैर आदि अवयवों को फैलाकर लेट गये और फिर क्रोधवश उस भोगमय शरीर को त्याग दिया। उससे जो बाल झड़कर गिरे, वे अहि हुए तथा उसके हाथ-पैर सिकोड़कर चलने से क्रूर स्वभाव सर्प और नाग हुए, जिनका शरीर फणरूप से कंधे के पास बहुत फैला होता है।

एक बार ब्रह्मा जी ने अपने को कृतकृत्य-सा अनुभव किया। उस समय अन्त में उन्होंने अपने मन से मनुओं की सृष्टि की। ये सब प्रजा की वृद्धि करने वाले हैं। मनस्वी ब्रह्मा जी ने उनके लिये अपना पुरुषाकार शरीर त्याग दिया। मनुओं को देखकर उनसे पहले उत्पन्न हुए देवता-गन्धर्वादि ब्रह्मा जी की स्तुति करने लगे। वे बोले, ‘विश्वकर्ता ब्रह्मा जी! आपकी यह (मनुओं की) सृष्टि बड़ी ही सुन्दर है। इसमें अग्निहोत्र आदि सभी कर्म प्रतिष्ठित हैं। इसकी सहायता से हम भी अपना अन्न (हविर्भाग) ग्रहण कर सकेंगे’। फिर आदिऋषि ब्रह्मा जी ने इन्द्रियसंयमपूर्वक तप, विद्या, योग और समाधि से सम्पन्न हो अपनी प्रिय सन्तान ऋषिगण की रचना की और उनमें से प्रत्येक को अपने समाधि, योग, ऐश्वर्य, तप, विद्या और वैराग्यमय शरीर का अंश दिया।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 18-35 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 18-35 का हिन्दी अनुवाद

सबसे पहले उन्होंने अपनी छाया से तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह- यों पाँच प्रकार की अविद्या उत्पन की। ब्रह्मा जी को अपना वह तमोमय शरीर अच्छा नहीं लगा, अतः उन्होंने उसे त्याग दिया। तब जिससे भूख-प्यास की उत्पत्ति होती है-ऐसे रात्रिरूप उस शरीर को उसी से उत्पन्न हुए यक्ष और राक्षसों ने ग्रहण कर लिया। उस समय भूख-प्यास से अभिभूत होकर वे ब्रह्मा जी को खाने को दौड़ पड़े और कहने लगे- ‘इसे खा जाओ, इसकी रक्षा मत करो’, क्योंकि वे भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे थे। ब्रह्मा जी ने घबराकर उनसे कहा- ‘अरे यक्ष-राक्षसों! तुम मेरी सन्तान हो; इसलिये मुझे भक्षण मत करो, मेरी रक्षा करो!’ (उनमें से जिन्होंने कहा ‘खा जाओ’, वे यक्ष हुए और जिन्होंने कहा ‘रक्षा मत करो’, वे राक्षस कहलाये)।

फिर ब्रह्मा जी ने सात्त्विक प्रभा से देदीप्यमान होकर मुख्य-मुख्य देवताओं की रचना की। उन्होंने क्रीड़ा करते हुए, ब्रह्मा जी के त्यागने पर, उनका वह दिनरूप प्रकाशमय शरीर ग्रहण कर लिया। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी ने अपने जघनदेश से कामासक्त असुरों को उत्पन्न किया। वे अत्यन्त कामलोलुप होने के कारण उत्पन्न होते ही मैथुन के लिये ब्रह्मा जी की ओर चले। यह देखकर पहले तो वे हँसे; किन्तु फिर उन निर्लज्ज असुरों को अपने पीछे लगा देख भयभीत और क्रोधित होकर बड़े जोर से भागे। तब उन्होंने भक्तों पर कृपा करने के लिये उनकी भावना के अनुसार दर्शन देने वाले, शरणागतवत्सल वरदायक श्रीहरि के पास जाकर कहा- ‘परमात्मन्! मेरी रक्षा कीजिये; मैंने तो आपकी ही आज्ञा से प्रजा उत्पन्न की थी, किन्तु यह तो पाप में प्रवृत्त होकर मुझको ही तंग करने चली है। नाथ! एकमात्र आप ही दुःखी जीवों का दुःख दूर करने वाले हैं और जो आपकी चरणशरण में नहीं आते, उन्हें दुःख देने वाले भी एकमात्र आप ही हैं’।

प्रभु तो प्रत्यक्षवत् सबके हृदय की जानने वाले हैं। उन्होंने ब्रह्मा जी की आतुरता देखकर कहा- ‘तुम अपने इस कामकलुषित शरीर को त्याग दो।’ भगवान् के यों कहते ही उन्होंने वह शरीर भी छोड़ दिया। (ब्रह्मा जी का छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री-संध्यादेवी के रूप में परिणत हो गया।) उसके चरणकमलों के पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनी की लड़ों से सुशोभित सजीली साड़ी से ढकी हुई थी। उसके उभरे हुए स्तन इस प्रकार एक-दूसरे से सटे हुए थे कि उनके बीच में कोई अन्तर ही नहीं रह गया था। उसकी नासिका और दन्तावली बड़ी ही सुघड़ थी तथा वह मधुर-मधुर मुसकराती हुई असुरों की ओर हाव-भावपूर्ण दृष्टि से देख रही थी। वह नीली-नीली अलकावली से सुशोभित सुकुमारी मानो लज्जा के मारे अपने अंचल में ही सिमटी जाती थी।

विदुर जी! उस सुन्दरी को देखकर सब-के-सब असुर मोहित हो गये। ‘अहो! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम कामपीड़ितों के बीच में यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है’।

इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्यों ने स्त्रीरूपिणी सन्ध्या के विषय में तरह-तरह के तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा- ‘सुन्दरि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? भामिनी! यहाँ तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है? तुम अपने अनूप रूप का यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागों को क्यों तरसा रही हो। अबले! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ-यह बड़े सौभाग्य की बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकों के मन को मथे डालती हो।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद

ब्रह्मा जी की रची हुई अनेक प्रकार की सृष्टि का वर्णन.

शौनक जी कहते हैं- सूत जी! पृथ्वीरूप आधार पाकर स्वायम्भुव मनु ने आगे होने वाली सन्तति को उत्पन्न करने के लिये किन-किन उपायों का अवलम्बन किया? विदुर जी बड़े ही भगवद्भक्त और भगवान् श्रीकृष्ण के अनन्य सुहृद् थे। इसीलिये उन्होंने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र को, उनके पुत्र दुर्योधन के सहित, भगवान् श्रीकृष्ण का अनादर करने के कारण अपराधी समझकर त्याग दिया था। वे महर्षि द्वैपायन के पुत्र थे और महिमा में उनसे किसी प्रकार कम नहीं थे तथा सब प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रित और कृष्णभक्तों के अनुगामी थे। तीर्थ सेवन से उनका अन्तःकरण और भी शुद्ध हो गया था। उन्होंने कुशावर्त क्षेत्र (हरिद्वार) में बैठे हुए तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ मैत्रेय जी के पास जाकर और क्या पूछा? सूत जी! उन दोनों में वार्तालाप होने पर श्रीहरिके चरणों से सम्बन्ध रखने वाली बड़ी पवित्र कथाएँ हुई होंगी, जो उन्हीं चरणों से निकले हुए गंगाजल के समान सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली होंगी।

सूत जी! आपका मंगल हो, आप हमें भगवान् की वे पवित्र कथाएँ सुनाइये। प्रभु के उदार चरित्र तो कीर्तन करने योग्य होते हैं। भला, ऐसा कौन रसिक होगा जो श्रीहरि के लीलामृत का पान करते-करते तृप्त हो जाये। नैमिषारण्यवासी मुनियों के इस प्रकार पूछने पर उग्रश्रवा सूत जी ने भगवान् में चित्त लगाकर उनसे कहा- ‘सुनिये’।

सूत जी ने कहा- मुनिगण! अपनी माया से वराहरूप धारण करने वाले श्रीहरि की रसातल से पृथ्वी को निकालने और खेल में ही तिरस्कारपूर्वक हिरण्याक्ष को मार डालने की लीला सुनकर विदुर जी को बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने मुनिवर मैत्रेय जी से कहा। विदुर जी ने कहा- ब्रह्ममन्! आप परोक्ष विषयों को भी जानने वाले हैं; अतः यह बतलाइये कि प्रजापतियों के पति श्रीब्रह्मा जी ने मरीचि आदि प्रजापतियों को उत्पन्न करके फिर सृष्टि को बढ़ाने के लिये क्या किया। मरीचि आदि मुनीश्वरों ने और स्वायम्भुव मनु ने भी ब्रह्मा जी की आज्ञा से किस प्रकार प्रजा की वृद्धि की? क्या उन्होंने इस जगत् को पत्नियों के सहयोग से उत्पन्न किया या अपने-अपने कार्य में स्वतन्त्र रहकर अथवा सबने एक साथ मिलकर इस जगत् की रचना की?

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! जिसकी गति को जानना अत्यन्त कठिन है-उन जीवों के प्रारब्ध, प्रकृति के नियन्ता पुरुष और काल-इन तीनों हेतुओं से तथा भगवान् की सन्निधि से त्रिगुणमय प्रकृति में क्षोभ होने पर उससे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। दैव की प्रेरणा से रजःप्रधान महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्त्विक), राजस और तामस- तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ। उसने आकाशादि पाँच-पाँच तत्त्वों के अनेक वर्ग प्रकट किये। वे सब अलग-अलग रहकर भूतों के कार्यरूप ब्रह्माण्ड की रचना नहीं कर सकते थे; इसलिये उन्होंने भगवान् की शक्ति से परस्पर संगठित होकर एक सुवर्णवर्ण अण्ड की रचना की। 


वह अण्ड चेतनाशून्य अवस्था में एक हजार वर्षों से भी अधिक समय तक कारणाब्धि के जल में पड़ा रहा। फिर उसमें श्रीभगवान् ने प्रवेश किया। उसमें अधिष्ठित होने पर उनकी नाभि से सहस्र सूर्यों के समान अत्यन्त देदीप्यमान एक कमल प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण जीव-समुदाय का आश्रय था। उसी से स्वयं ब्रह्मा जी का भी आविर्भाव हुआ है। जब ब्रह्माण्ड के गर्भरूप जल में शयन करने वाले श्रीनारायणदेव ने ब्रह्मा जी के अन्तःकरण में प्रवेश किया, तब वे पूर्वकल्पों में अपने ही द्वारा निश्चित की हुई नाम-रूपमयी व्यवस्था के अनुसार लोकों की रचना करने लगे।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 32-38 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 32-38 का हिन्दी अनुवाद


भगवान् अवतार लेकर जैसी लीलाएँ करते हैं और जिस प्रकार उन्होंने भीषण संग्राम में खिलौने की भाँति महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध कर डाला, मित्र विदुर जी! वह सब चरित्र जैसा मैंने गुरुमुख से सुना था, तुम्हें सुना दिया।

सूत जी कहते हैं- शौनक जी! मैत्रेय जी के मुख से भगवान् की कथा सुनकर परमभागवत विदुर जी को बड़ा आनन्द हुआ। जब अन्य पवित्रकीर्ति और परमयशस्वी महापुरुषों का चरित्र सुनने से ही बड़ा आनन्द होता है, तब श्रीवत्सधारी भगवान् की ललितललाम लीलाओं की तो बात ही क्या है।

जिस समय ग्राह के पकड़ने पर गजराज प्रभु के चरणों का ध्यान करने लगे और उनकी हथिनियाँ दुःख से चिग्घाड़ने लगीं, उस समय जिन्होंने उन्हें तत्काल दुःख से छुड़ाया और जो सब ओर से निराश होकर अपनी शरण में आये हुए सरल हृदय भक्तों से सहज में ही प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु दुष्ट पुरुषों के लिये अत्यन्त दुराराध्य हैं-उन पर जल्दी प्रसन्न नहीं होते, उन प्रभु के उपकारों को जानने वाला कौन ऐसा पुरुष है, जो उनका सेवन न करेगा?

शौनकादि ऋषियों! पृथ्वी का उद्धार करने के लिये वराहरूप धारण करने वाले श्रीहरि की इस हिरण्याक्ष-वध नामक परम अद्भुत लीला को जो पुरुष सुनता, गाता अथवा अनुमोदन करता है, वह ब्रह्महत्या-जैसे घोर पाप से भी सहज में ही छूट जाता हैं। यह चरित्र अत्यन्त पुण्यप्रद परमपवित्र, धन और यश की प्राप्ति कराने वाला तथा आयुवर्धक और कामनाओं की पूर्ति करने वाला तथा युद्ध में प्राण और इन्द्रियों की शक्ति बढ़ाने वाला है। जो लोग इसे सुनते हैं, उन्हें अन्त में श्रीभगवान् का आश्रय प्राप्त होता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 16-31 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 16-31 का हिन्दी अनुवाद

विदुर जी! जैसे हाथी पर पुष्पमाला की चोट का कोई असर नहीं होता, उसी प्रकार उसके इस प्रकार घूँसा मारने से भगवान् आदिवराह तनिक भी टस-से-मस नहीं हुए। तब वह महामायावी दैत्य मायापति श्रीहरि पर अनेक प्रकार की मायाओं का प्रयोग करने लगा, जिन्हें देखकर सभी प्रजा बहुत डर गयी और समझने लगी कि अब संसार का प्रलय होने वाला है। बड़ी प्रचण्ड आँधी चलने लगी, जिसके कारण धूल से सब ओर अन्धकार छा गया। सब ओर से पत्थरों की वर्षा होने लगी, जो ऐसे जान पड़ते थे मानो किसी क्षेपण यन्त्र (गुलेल) से फेंके जा रहे हों। बिजली की चमचमाहट और कड़क के साथ बादलों के घिर आने से आकाश में सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह छिप गये तथा उनसे निरन्तर पीब, केश, रुधिर, विष्ठा, मूत्र और हड्डियों की वर्षा होने लगी। 

विदुर जी! ऐसे-ऐसे पहाड़ दिखायी देने लगे, जो तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे। हाथ में त्रिशूल लिये बाल खोले नंगी राक्षसियाँ दीखने लगीं। बहुत-से पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियों पर चढ़े सनिकों के साथ आततायी यक्ष-राक्षसों का ‘मारो-मारो, काटो-काटो’ ऐसा अत्यन्त क्रूर और हिंसामय कोलाहल सुनायी देने लगा। इस प्रकार प्रकट हुए उस आसुरी माया-जाल का नाश करने के लिये यज्ञमूर्ति भगवान् वराह ने अपना प्रिय सुदर्शन चक्र छोड़ा। उस समय अपने पति का कथन स्मरण हो आने से दिति का हृदय सहसा काँप उठा और उसके स्तनों से रक्त बहने लगा। अपना माया-जाल नष्ट हो जाने पर वह दैत्य फिर भगवान् के पास आया। उसने उन्हें क्रोध से दबाकर चूर-चूर करने की इच्छा से भुजाओं में भर लिया, किंतु देखा कि वे तो बाहर ही खड़े हैं। अब वह भगवान् को वज्र के समान कठोर मुक्कों से मारने लगा। तब इन्द्र ने जैसे वृत्रासुर पर प्रहार किया था, उसी प्रकार भगवान् ने उसकी कनपटी पर एक तमाचा मारा। विश्व विजयी भगवान् ने यद्यपि बड़ी उपेक्षा से तमाचा मारा था, तो भी उसकी चोट से हिरण्याक्ष का शरीर घूमने लगा, उसके नेत्र बाहर निकल आये तथा हाथ-पैर और बाल छिन्न-भिन्न हो गये और वह निष्प्राण होकर आँधी से उखड़े हुए विशाल वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा। 

हिरण्याक्ष का तेज अब भी मलिन नहीं हुआ था। उस कराल दाढ़ों वाले दैत्य को दाँतों से होठ चबाते पृथ्वी पर पड़ा देख वहाँ युद्ध देखने के लिये आये हुए ब्रह्मादि देवता उसकी प्रशंसा करने लगे कि ‘अहो! ऐसी अलभ्य मृत्यु किसको मिल सकती है। अपनी मिथ्या उपाधि से छूटने के लिये जिनका योगिजन समाधियोग के द्वारा एकान्त में ध्यान करते हैं, उन्हीं के चरण-प्रहार उनका मुख देखते-देखते इस दैत्यराज ने अपना शरीर त्यागा। ये हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु भगवान् के ही पार्षद हैं। इन्हें शापवश यह अधोगति प्राप्त हुई है। अब कुछ जन्मों में ये फिर अपने स्थान पर पहुँच जायँगे’। 

देवता लोग कहने लगे- 'प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप सम्पूर्ण यज्ञों का विस्तार करने वाले हैं तथा संसार की स्थिति के लिये शुद्धसत्त्वमय मंगलविग्रह प्रकट करते हैं। बड़े आनन्द की बात है कि संसार को कष्ट देने वाला यह दुष्ट दैत्य मारा गया। अब आपके चरणों की भक्ति के प्रभाव से हमें भी सुख-शान्ति मिल गयी।' मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध करके भगवान् आदिवराह अपने अखण्ड आनन्दमय धाम को पधार गये। उस समय ब्रह्मादि देवता उनकी स्तुति कर रहे थे।

साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः श्लोक 1-15 का हिन्दी अनुवाद

हिरण्याक्ष वध.

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! ब्रह्मा जी के कपटरहित अमृतमय वचन सुनकर भगवान् ने उनके भोलेपन पर मुसकराकर अपने प्रेमपूर्ण कटाक्ष के द्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। फिर उन्होंने झपटकर अपने सामने निर्भय विचरते हुए शत्रु की ठुड्डी पर गदा मारी। किन्तु हिरण्याक्ष की गदा से टकराकर वह गदा भगवान् के हाथ से छूट गयी और चक्कर काटती हुई जमीन पर गिरकर सुशोभित हुई। किंतु यह बड़ी अद्भुत-सी घटना हुई। उस समय शत्रु पर वार करने का अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्ष ने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्ध धर्म का पालन करते हुए उन पर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान् का क्रोध बढ़ाने के लिये ही ऐसा किया था। गदा गिर जाने पर और लोगों का हाहाकार बंद हो जाने पर प्रभु ने उसकी धर्म बुद्धि की प्रशंसा की और अपने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया। चक्र तुरंत ही उपस्थित होकर भगवान् के हाथ में घूमने लगा। किंतु वे अपने प्रमुख पार्षद दैत्यधम हिरण्याक्ष के साथ विशेष रूप से क्रीड़ा करने लगे। उस समय उनके प्रभाव को न जानने वाले देवताओं के ये विचित्र वचन सुनायी देने लगे- ‘प्रभो! आपकी जय हो; इसे और न खेलाइये, शीघ्र ही मार डालिये’। 

जब हिरण्याक्ष ने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोध से तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतों से होंठ चबाने लगा। उस समय वह तीखी दाढ़ों वाला दैत्य, अपने नेत्रों से इस प्रकार उनकी ओर घूरने लगा मानो वह भगवान् को भस्म कर देगा। उसने छलकर ‘ले अब तू नहीं बच सकता’ इस प्रकार ललकारते हुए श्रीहरि पर गदा से प्रहार किया। 

साधुस्वभाव विदुर जी! यज्ञमूर्ति श्रीवाराह भगवान् ने शत्रु के देखते-देखते लीला से ही अपने बायें पैर से उसकी वह वायु के समान वेग वाली गदा पृथ्वी पर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान् के इस प्रकार कहने पर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा। गदा को अपनी ओर आते देखकर भगवान् ने, जहाँ खड़े थे वहीं से, उसे आते ही अनायास इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ साँपिनी को पकड़ कर लें। अपने उद्यम को इस प्रकार व्यर्थ हुआ देख उस महादैत्य का घमंड ठंडा पड़ गया और उसका तेज नष्ट हो गया। अबकी बार भगवान् के देने पर उसने उस गदा को लेना न चाहा। किन्तु जिस प्रकार कोई ब्राह्मण के ऊपर निष्फल अभिचार (मारणादि प्रयोग) करे-मूठ आदि चलाये, वैसे ही उसने श्रीयज्ञपुरुष पर प्रहार करने के लिये एक प्रज्वलित अग्नि के समान लपलपाता हुआ त्रिशूल लिया। महाबली हिरण्याक्ष का अत्यन्त वेग से छोड़ा हुआ वह तेजस्वी त्रिशूल आकाश में बड़ी तेजी से चमकने लगा। 

तब भगवान् ने उसे अपनी तीखी धार वाले चक्र से इस प्रकार काट डाला, जैसे इन्द्र ने गरुड़ जी के छोड़े हुए तेजस्वी पंख को काट डाला था। भगवान् के चक्र से अपने त्रिशूल के बहुत-से टुकड़े हुए देखकर उसे बड़ा क्रोध हुआ। उसने पास आकर उनके विशाल वक्षःस्थल पर, जिस पर श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित है, कसकर घूँसा मारा और फिर बड़े जोर से गरजकर अन्तर्धान हो गया।

साभार krishnakosh.org

दुःखद स्मृतियों को भूलो.


दुःखद स्मृतियों को भूलो.

जब मन में पुरानी दु:खद स्मृतियाँ सजग हों, तो उन्हें भूला देने में ही श्रेष्टता है। अप्रिय बातों को भुलाना आवश्यक है। भुलाना उतना ही जरूरी है, जितना अच्छी बात का स्मरण करना। यदि तुम शरीर से, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ।

माना कि किसी ‘अपने’ ने ही तुम्हें चोट पहुँचाई है, तुम्हारा दिल दुखाया है, तो क्या तुम उसे लेकर मानसिक उधेड़बुन में लगे रहोगे। अरे भाई! उन कष्टकारक अप्रिय प्रसंगों को भूला दो, उधर ध्यान न देकर अच्छे शुभ कर्मों से मन को केंद्रीभूत कर दो।

चिंता से मुक्ति पाने का सर्वोत्तम उपाय, दु:खों को भूलना ही है।


(पं श्रीराम शर्मा आचार्य)

स्वाद का लालच.


स्वाद का लालच.


दो उल्लू एक पेड़ पर एक साथ आकर बैठ गए। एक उल्लू के मुंह में सांप था। जबकि दूसरे के मुंह में चूहा था। लेकिन तभी सांप ने चूहे को देखा तो वह चूहे को खाने के लिए झटपटाने लगा। लेकिन यह भूल गया कि वह खुद मौत के मुंह में है।

जब चूहे ने सांप को देखा तो उसे डर लगने लगा कि सांप उसे खा लेगा। यह देखकर दोनों उल्लू काफी हैरान हो गए और दोनों ने अपने शिकार को मुंह में दबाकर मार डाला। फिर एक उल्लू ने दूसरे उल्लू से पूछा कि सांप और चूहे को देखकर तुम्हें क्या पता चला।

दूसरे उल्लू ने कहा कि पहली बात तो मुझे यह समझ आई कि जीभ के रस और स्वाद की इच्छा सबसे बड़ी होती है। जब किसी व्यक्ति की ये इच्छा प्रबल होती है, तो व्यक्ति को सामने खड़ी हुई मौत भी नजर नहीं आती है।

इस घटना से दूसरी बात यह पता चली कि मृत्यु से भी बड़ा मृत्यु होने का भय होता है। चूहा खुद मरने वाला था, लेकिन जब उसने सांप को देखा तो वह डरने लगा। लेकिन वह यह नहीं समझ पाया कि वह तो पहले से ही मौत के मुंह में था।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 12-28 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 12-28 का हिन्दी अनुवाद

तू पैदल वीरों का सरदार है, इसलिये अब निःशंक होकर-उधेड़-बुन छोड़कर हमारा अनिष्ट करने का प्रयत्न कर और हमें मारकर अपने भाई-बन्धुओं के आँसू पोंछ। अब इसमें देर न कर। जो अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता, वह असभ्य है-भले आदमियों में बैठने लायक नहीं है। 

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! जब भगवान् ने रोष से उस दैत्य का इस प्रकार खूब उपहास और तिरस्कार किया, वह पकड़कर खेलाये जाते हुए सर्प के समान क्रोध से तिलमिला उठा। वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोध से क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्य ने बड़े वेग से लपककर भगवान् पर गदा का प्रहार किया। किन्तु भगवान् ने अपनी छाती पर चलाई हुई शत्रु की गदा के प्रहार को कुछ टेढ़े होकर बचा लिया-ठीक वैसे ही, जैसे योगसिद्ध पुरुष मृत्यु के आक्रमण से अपने को बचा लेता है। फिर जब वह क्रोध से होठ चबाता अपनी गदा लेकर बार-बार घुमाने लगा, तब श्रीहरि कुपित होकर बड़े वेग से उसकी ओर झपटे। 

सौम्यस्वभाव विदुर जी! तब प्रभु ने शत्रु की दायीं भौंह पर गदा की चोट की, किन्तु गदायुद्ध में कुशल हिरण्याक्ष ने उसे बीच में ही अपनी गदा पर ले लिया। इस प्रकार श्रीहरि और हिरण्याक्ष एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से अत्यन्त क्रुद्ध होकर आपस में अपनी भारी गदाओं से प्रहार करने लगे। उस समय उन दोनों में ही जीतने की होड़ लग गयी, दोनों के ही अंग गदाओं की चोटों से घायल हो गये थे, अपने अंगों के घावों से बहने वाले रुधिर की गन्ध से दोनों का क्रोध बढ़ रहा था और वे दोनों ही तरह-तरह के पैतरे बदल रहे थे। इस प्रकार गौ के लिये आपस में लड़ने वाले दो साँडों के समान उन दोनों में एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। 

विदुर जी! जब इस प्रकार हिरण्याक्ष और माया से वराह रूप धारण करने वाले भगवान् यज्ञमूर्ति पृथ्वी के लिये द्वेष बाँधकर युद्ध करने लगे, तब उसे देखने वहाँ ऋषियों के सहित ब्रह्मा जी आये। वे हजारों ऋषियों से घिरे हुए थे। जब उन्होंने देखा कि वह दैत्य बड़ा शूरवीर है, उसमें भय नाम भी नहीं है, वह मुकाबला करने में भी समर्थ है और उसके पराक्रम को चूर्ण करना बड़ा कठिन काम है, तब वे भगवान् आदिसूकररूप नारायण से इस प्रकार कहने लगे। 

श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देव! मुझसे वर पाकर यह दुष्ट दैत्य बड़ा प्रबल हो गया है। इस समय यह आपके चरणों की शरण में रहने वाले देवताओं, ब्राह्मणों, गौओं तथा अन्य निरपराध जीवों को बहुत ही हानि पहुँचाने वाला, दुःखदायी और भयप्रद हो रहा है। इसकी जोड़ का और कोई योद्धा नहीं है, इसलिये यह महाकण्टक अपना मुकाबला करने वाले वीर की खोज में समस्त लोकों में घूम रहा है। यह दुष्ट बड़ा ही मायावी, घमण्डी और निरंकुश है। बच्चा जिस प्रकार क्रुद्ध हुए साँप से खेलता है; वैसे ही आप इससे खिलवाड़ न करें। देव! अच्युत! जब तक यह दारुण दैत्य अपनी बल-वृद्धि वेला को पाकर प्रबल हो, उससे पहले-पहले ही आप अपनी योगमाया को स्वीकार करके इस पापी को मार डालिये। प्रभो! देखिये, लोकों का संहार करने वाली सन्ध्या की भयंकर वेला आना ही चाहती है। सर्वात्मन्! आप उससे पहले ही इस असुर को मारकर देवताओं को विजय प्रदान कीजिये। इस समय अभिजित् नामक मंगलमय मुहूर्त का भी योग आ गया है। अतः अपन सुहृद् हम लोगों के कल्याण के लिये शीघ्र ही इस दुर्जय दैत्य से निपट लीजिये। प्रभो! इसकी मृत्यु आपके ही हाथ बदी है। हम लोगों के बड़े भाग्य हैं। अब आप युद्ध में बलपूर्वक इसे मारकर लोकों को शान्ति प्रदान कीजिये।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः श्लोक 1-11 का हिन्दी अनुवाद

हिरण्याक्ष के साथ वराह भगवान् का युद्ध

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- तात! वरुण जी की यह बात सुनकर वह मदोन्मत्त दैत्य बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने उनके इस कथन पर कि ‘तू उनके हाथ से मारा जायेगा’ कुछ भी ध्यान नहीं दिया और चट नारद जी से श्रीहरि का पता लगाकर रसातल में पहुँच गया। वहाँ उसने विश्वविजयी वराह भगवान् को अपनी दाढ़ों की नोक पर पृथ्वी को ऊपर की ओर ले जाते हुए देखा। वे अपने लाल-लाल चमकीले नेत्रों से उसके तेज को हरे लेते थे। उन्हें देखकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, ‘अरे! यह जंगली पशु यहाँ जल में कहाँ से आया’। फिर वराह जी से कहा, ‘रे नासमझ! इधर आ, इस पृथ्वी को छोड़ दे; इसे विश्वविधाता ब्रह्मा जी ने हम रसातलवासियों के हवाले कर दिया है। रे सूकररूपधारी सुराधम! मेरे देखते-देखते तू इसे लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकता। तू माया से लुक-छिपकर ही दैत्यों को जीत लेता और मार डालता है। क्या इसी से हमारे शत्रुओं ने हमारा नाश कराने के लिये तुझे पाला है? मूढ़! तेरा बल तो योगमाया ही है और कोई पुरुषार्थ तुझमें थोड़े ही है। आज तुझे समाप्त कर मैं अपने बन्धुओं का शोक दूर करूँगा। जब मेरे हाथ से छूटी हुई गदा के प्रहार से सिर फट जाने के कारण तू मर जायेगा, तब तेरी आराधना करने वाले जो देवता और ऋषि हैं, वे सब भी जड़ कटे हुए वृक्षों की भाँति स्वयं ही नष्ट हो जायँगे’।

हिरण्याक्ष भगवान् को दुर्वचन-बाणों से छेदे जा रहा था; परन्तु उन्होंने दाँत की नोक पर स्थित पृथ्वी को भयभीत देखकर वह चोट सह ली तथा जल से उसी प्रकार बाहर निकल आये, जैसे ग्राह की चोट खाकर हथिनी सहित गजराज। जब उसकी चुनौती का कोई उत्तर न देकर वे जल से बाहर आने लगे, तब ग्राह जैसे गज का पीछा करता है, उसी प्रकार पीले केश और तीखी दाढ़ों वाले उस दैत्य ने उनका पीछा किया तथा वज्र के समान कड़ककर वह कहने लगा, ‘तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? सच है, असत् पुरुषों के लिये कौन-सा काम न करने योग्य है?

भगवान् ने पृथ्वी को ले जाकर जल के ऊपर व्यवहार योग्य स्थान में स्थित कर दिया और उसमें अपनी आधारशक्ति का संचार किया। उस समय हिरण्याक्ष के सामने ही ब्रह्मा जी ने उनकी स्तुति की और देवताओं ने फूल बरसाये। तब श्रीहरि ने बड़ी भारी गदा लिये अपने पीछे आ रहे हिरण्याक्ष से, जो सोने के आभूषण और अद्भुत कवच धारण किये था तथा अपने कटुवाक्यों से उन्हें निरन्तर मर्माहत कर रहा था, अत्यन्त क्रोधपूर्वक हँसते हुए कहा।

श्रीभगवान् ने कहा- अरे! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुझ-जैसे ग्रामसिंहों (कुत्तों) को ढूँढ़ते फिरते हैं। दुष्ट! वीर पुरुष तुझ-जैसे मृत्युपाश में बँधे हुए अभागे जीवों की आत्मश्लाघा पर ध्यान नहीं देते। हाँ, हम रसातलवासियों की धरोहर चुराकर और लज्जा छोड़कर तेरी गदा के भय से यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-जैसे अद्वितीय वीर के सामने युद्ध में ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं; तुझ-जैसे बलवानों से वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं?

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 18-31 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 18-31 का हिन्दी अनुवाद

वे दोनों यमज थे। प्रजापति कश्यप जी ने उनका नामकरण किया। उनमें से जो उनके वीर्य से दिति के गर्भ में पहले स्थापित हुआ था, उसका नाम हिरण्यकशिपु रखा और जो दिति के उदर से पहले निकला, वह हिरण्याक्ष के नाम से विख्यात हुआ। हिरण्यकशिपु ब्रह्मा जी के वर से मृत्यु के भय से मुक्त हो जाने के कारण बड़ा उद्धत हो गया था। उसने अपनी भुजाओं के बल से लोकपालों के सहित तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। वह अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष को बहुत चाहता था और वह भी सदा अपने बड़े भाई का प्रिय कार्य करता रहता था। एक दिन वह हिरण्याक्ष हाथ में गदा लिये युद्ध का अवसर ढूँढता हुआ स्वर्गलोक में जा पहुँचा। उसका वेग बड़ा असह्य था। उसके पैरों में सोने के नूपुरों की झनकार हो रही थी, गले में विषयसूचक माला धारण की हुई थी और कंधे पर विशाल गदा रखी हुई थी। उसके मनोबल, शारीरिक बल तथा ब्रह्मा जी के वर ने उसे मतवाला कर रखा था; इसलिये वह सर्वथा निरंकुश और निर्भय हो रहा था। उसे देखकर देवता लोग डर के मारे वैसे ही जहाँ-तहाँ छिप गये, जैसे गरुड़ के डर से साँप छिप जाते हैं। जब दैत्यराज हिरण्याक्ष ने देखा कि मेरे तेज के सामने बड़े-बड़े गर्वीले इन्द्रादि देवता भी छिप गये हैं, तब उन्हें अपने सामने न देखकर वह बार-बार भयंकर गर्जना करने लगा। फिर वह महाबली दैत्य वहाँ से लौटकर जलक्रीड़ा करने के लिये मतवाले हाथी के समान गहरे समुद्र में घुस गया, जिसमें लहरों की बड़ी भयंकर गर्जना हो रही थी। ज्यों ही उसने समुद्र में पैर रखा कि डर के मारे वरुण के सैनिक जलचर जीव हकबका गये और किसी प्रकार की छेड़छाड़ न करने पर भी वे उसकी धाक से ही घबराकर बहुत दूर भाग गये। महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षों तक समुद्र में ही घूमता और सामने किसी प्रतिपक्षी को न पाकर वह बार-बार वायु वेग से उठी हुई उसकी प्रचण्ड तरंगों पर ही अपनी लोहमयी गदा को आजमाता रहा। इस प्रकार घूमते-घूमते वह वरुण की राजधानी विभावरीपुरी में जा पहुँचा। वहाँ पाताल लोक के स्वामी, जलचरों के अधिपति वरुण जी को देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्य की भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंग से कहा- ‘महाराज! मुझे युद्ध की भिक्षा दीजिये। प्रभो! आप तो लोक-पालक, राजा और बड़े कीर्तिशाली हैं। जो लोग अपने को बाँका वीर समझते थे, उनके वीर्यमद को भी आप चूर्ण कर चुके हैं और पहले एक बार आपने संसार के समस्त दैत्य-दानवों को जीतकर राजसूय यज्ञ भी किया था’। उस मदोन्मत्त शत्रु के इस प्रकार बहुत उपहास करने से भगवान् वरुण को क्रोध तो बहुत आया, किंतु अपने बुद्धिबल से वे उसे पी गये और बदले में उससे कहने लगे- ‘भाई! हमें तो अब युद्धादि का कोई चाव नहीं रह गया है। भगवान् पुराणपुरुष के सिवा हमें और कोई ऐसा दीखता भी नहीं जो तुम-जैसे रणकुशल वीर को युद्ध में सन्तुष्ट कर सके। दैत्यराज! तुम उन्हीं के पास जाओ, वे ही तुम्हारी कामना पूरी करेंगे। तुम-जैसे वीर उन्हीं का गुणगान किया करते हैं। वे बड़े वीर हैं। उनके पास पहुँचते ही तुम्हारी सारी शेखी पूरी हो जायेगी और तुम कुत्तों से घिरकर वीर शय्या पर शयन करोगे। वे तुम-जैसे दुष्टों को मारने और सत्पुरुषों पर कृपा करने के लिये अनेक प्रकार के रूप धारण किया करते हैं’।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म तथा हिरण्याक्ष की दिग्विजय.

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! ब्रह्मा जी के कहने से अन्धकार का कारण जानकर देवताओं की शंका निवृत्त हो गयी और फिर वे सब स्वर्गलोक को लौट आये। इधर दिति को अपने पतिदेव के कथानानुसार पुत्रों की ओर से उपद्रवादि की आशंका बनी रहती थी। इसलिये जब पूरे सौ वर्ष बीत गये, तब उस साध्वी ने दो यमज (जुड़वे) पुत्र उत्पन्न किये। उनके जन्म लेते समय स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अनेकों उत्पात होने लगे-जिनसे लोग अत्यन्त भयभीत हो गये। जहाँ-तहाँ पृथ्वी और पर्वत काँपने लगे, सब दिशाओं में दाह होने लगा। जगह-जगह उल्कापात होने लगा, बिजलियाँ गिरने लगीं और आकाश में अनिष्टसूचक धूमकेतु (पुच्छल तारे) दिखायी देने लगे। बार-बार सायं-सायं करती और बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ती हुई बड़ी विकट और असह्य वायु चलने लगी। उस समय आँधी उसकी सेना और उमड़ती हुई धूल ध्वजा के समान जान पड़ती थी। बिजली जोर-जोर से चमककर मानो खिलखिला रही थी। घटाओं ने ऐसा सघन रूप धारण किया कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के लुप्त हो जाने से आकाश में गहरा अँधेरा छा गया। उस समय कहीं कुछ भी दिखायी न देता था।

समुद्र दुःखी मनुष्य की भाँति कोलाहल करने लगा, उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उठने लगीं और उसके भीतर रहने वाले जीवों में बड़ी हलचल मच गयी। नदियों तथा अन्य जलाशयों में भी बड़ी खलबली मच गयी और उनके कमल सूख गये। सूर्य और चन्द्रमा बार-बार ग्रसे जाने लगे तथा उनके चारों ओर अमंगलसूचक मण्डल बैठने लगे। बिना बादलों के ही गरजने का शब्द होने लगा तथा गुफाओं में से रथ की घरघराहट का-सा शब्द निकलने लगा। गावों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द के साथ ही सियारियाँ मुख से दहकती हुई आग उगलकर बड़ा अमंगल शब्द करने लगीं। जहाँ-तहाँ कुत्ते अपनी गरदन ऊपर उठाकर कभी गाने कभी रोने के समान भाँति-भाँति के शब्द करने लगे।

विदुर जी! झुंड-के-झुंड गधे अपने कठोर खुरों से पृथ्वी खोदते और रेंकने का शब्द करते मतवाले होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। पक्षी गधों के शब्द से डरकर रोते-चिल्लाते और अपने घोंसलों से उड़ने लगे। अपनी खिरकों में बँधे हुए और वन में चरते हुए गाय, बैल आदि पशु डर के मारे मल-मूत्र त्यागने लगे। गौएँ ऐसी डर गयीं कि दुहने पर उनके थनों से खून निकलने लगा, बदल पीब की वर्षा करने लगे, देवमूर्तियों की आँखों से आँसू बहने लगे और आँधी के बिना ही वृक्ष उखड़-उखड़कर गिरने लगे। शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर चन्द्र, बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों तथा बहुत-से नक्षत्रों को लाँघकर वक्रगति से चलने लगे तथा आपस में युद्ध करने लगे। ऐसे ही और भी अनेकों भयंकर उत्पात देखकर सनकादि के सिवा और सब जीव भयभीत हो गये तथा उन उत्पातों का मर्म न जानने के कारण उन्होंने यही समझा कि अब संसार का प्रलय होने वाला है।

वे दोनों आदिदैत्य जन्म के अनन्तर शीघ्र ही अपने फौलाद के समान कठोर शरीरों से बढ़कर महान् पर्वतों के सदृश हो गये तथा उनका पूर्व पराक्रम भी प्रकट हो गया। वे इतने ऊँचे थे कि उनके सुवर्णमय मुकुटों का अग्रभाग स्वर्ग को स्पर्श करता था और उनके विशाल शरीरों से सारी दिशाएँ आच्छादित हो जाती थीं। उनकी भुजाओं में सोने के बाजूबंद चमचमा रहे थे। पृथ्वी पर जो वे एक-एक कदम रखते थे, उससे भूकम्प होने लगता था और जब वे खड़े होते थे, तब उनकी जगमगाती हुई चमकीली करधनी से सुशोभित कमर अपने प्रकाश से सूर्य को भी मात करती थी।

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 25-37 का हिन्दी अनुवाद


 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 25-37 का हिन्दी अनुवाद

सर्वेश्वर! इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझें वैसा दण्ड दें अथवा पुरस्कार रूप में इनकी वृत्ति बढ़ा दें-हम निष्कपट भाव से सब प्रकार आपसे सहमत हैं अथवा हमने आपके इन निरपराध अनुचरों को शाप दिया है, इसके लिये हमीं को उचित दण्ड दें; हमें वह भी सहर्ष स्वीकार है। श्रीभगवान् ने कहा- मुनिगण! आपने इन्हें जो शाप दिया है-सच जानिये, वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये शीघ्र ही दैत्ययोनि को प्राप्त होंगे और वहाँ क्रोधावेश से बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण सुदृढ़ योग सम्पन्न होकर फिर जल्दी ही मेरे पास लौट आयेंगे। श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- तदनन्तर उन मुनीश्वरों ने नयनाभिराम भगवान् विष्णु और उनके स्वयंप्रकाश वैकुण्ठधाम के दर्शन करके प्रभु की परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर तथा उनकी आज्ञा पा भगवान् के ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए प्रमुदित हो वहाँ से लौट गये। फिर भगवान् ने अपने अनुचरों से कहा, ‘जाओ, मन में किसी प्रकार का भय मत करो; तुम्हारा कल्याण होगा। मैं सब कुछ करने में समर्थ होकर भी ब्रह्मतेज को मिटाना नहीं चाहता; क्योंकि ऐसा ही मुझे अभिमत भी है। एक बार जब मैं योगनिद्रा में स्थित हो गया था, तब तुमने द्वार में प्रवेश करती हुई लक्ष्मी जी को रोका था। उस समय उन्होंने क्रुद्ध होकर पहले ही तुम्हें यह शाप दे दिया था। अब दैत्ययोनि में मेरे प्रति क्रोधाकार वृत्ति रहने से तुम्हें जो एकाग्रता होगी, उससे तुम इस विप्र-तिरस्कारजनित पाप से मुक्त हो जाओगे और फिर थोड़े ही समय में मेरे पास लौट आओगे। द्वारपालों को इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान् ने विमानों की श्रेणियों से सुसज्जित अपने सर्वादिक श्रीसम्पन्न धाम में प्रवेश किया। वे देवश्रेष्ठ जय-विजय तो ब्रह्मशाप के कारण उस अलंघनीय भगवद्धाम में ही श्रीहीन हो गये तथा उनका सारा गर्व गलित हो गया। पुत्रों! फिर जब वे वैकुण्ठलोक से गिरने लगे, तब वहाँ श्रेष्ठ विमानों पर बैठे हुए वैकुण्ठवासियों में महान् हाहाकार मच गया। इस समय दिति के गर्भ में स्थित जो कश्यप जी का उग्र तेज है, उसमें भगवान् के उन पार्षद प्रवरों ने ही प्रवेश किया है। उन दोनों असुरों के तेज से ही तुम सबका तेज फीका पड़ गया है। इस समय भगवान् ऐसा ही करना चाहते हैं, जो आदिपुरुष संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण हैं, जिनकी योगमाया को बड़े-बड़े योगिजन भी बड़ी कठिनता से पार पाते हैं-वे सत्त्वादि तीनों गुणों के नियन्ता श्रीहरि ही हमारा कल्याण करेंगे। अब इस विषय में हमारे विशेष विचार करने से क्या लाभ हो सकता है।
साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 13-24 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः श्लोक 13-24 का हिन्दी अनुवाद


श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- देवताओं! सनकादि मुनि क्रोधरूप सर्प से डसे हुए थे, तो भी उनका चित्त अन्तःकरण को प्रकाशित करने वाली भगवान् की मन्त्रमयी सुमधुर वाणी सुनते-सुनते तृप्त नहीं हुआ। भगवान् की उक्ति बड़ी ही मनोहर और थोड़े अक्षरों वाली थी; किन्तु वह इतनी अर्थपूर्ण, सारयुक्त, दुर्विज्ञेय और गम्भीर थी कि बहुत ध्यान देकर सुनने और विचार करने पर भी वे यह न जान सके कि भगवान् क्या करना चाहते हैं। भगवान् की इस अद्भुत उदारता को देखकर वे बहुत आनन्दित हुए और उनका अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर योगमाया के प्रभाव से अपने परम ऐश्वर्य का प्रभाव प्रकट करने वाले प्रभु से वे हाथ जोड़कर कहने लगे। मुनियों ने कहा- स्वप्रकाश भगवन्! आप सर्वेश्वर होकर भी जो यह कह रहे हैं कि ‘यह आपने मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया’ सो इससे आपका क्या अभिप्राय है-यह हम नहीं जान सके हैं। प्रभो! आप ब्राह्मणों के परम हितकारी हैं; इससे लोक शिक्षा के लिये आप भले ही ऐसा मानें कि ब्राह्मण मेरे आराध्यदेव हैं। वस्तुतः तो ब्राह्मण तथा देवताओं के भी देवता ब्रह्मादि के भी आप ही आत्मा और आराध्यदेव हैं। सनातन धर्म आपसे ही उत्पन्न हुआ है, आपके अवतारों द्वारा ही समय-समय पर उसकी रक्षा होती है तथा निर्विकारस्वरूप आप ही धर्म के परमगुह्य रहस्य हैं-यह शास्त्रों का मत है। आपकी कृपा से निवृत्तिपरायण योगीजन सहज में ही मृत्युरूप संसार सागर से पार हो जाते हैं; फिर भला, दूसरा कोई आप पर क्या कृपा कर सकता है। भगवन्! दूसरे अर्थार्थी जन जिनकी चरणरज सर्वदा अपने मस्तक पर धारण करते हैं, वे लक्ष्मी जी निरन्तर आपकी सेवा में लगी रहती हैं; सो ऐसा जान पड़ता है कि भाग्यवान् भक्तजन आपके चरणों पर जो नूतन तुलसी की मालाएँ अर्पण करते हैं, उन पर गुंजार करते हुए भौरों के समान वे भी आपके पादपद्मों को ही अपना निवास स्थान बनाना चाहती हैं। किन्तु अपने पवित्र चरित्रों से निरन्तर सेवा में तत्पर रहने वाली उन लक्ष्मी जी का भी आप विशेष आदर नहीं करते, आप तो अपने भक्तों से ही विशेष प्रेम रखते हैं। आप स्वयं ही सम्पूर्ण भजनीय गुणों के आश्रय हैं; क्या जहाँ-तहाँ विचरते हुए ब्राह्मणों के चरणों में लगने से पवित्र हुई मार्ग की धूलि और श्रीवत्स का चिह्न आपको पवित्र कर सकते हैं? क्या इनसे आपकी शोभा बढ़ सकती है? भगवन्! आप साक्षात् धर्म स्वरूप हैं। आप सत्यादि तीनों युगों में प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हैं तथा ब्राह्मण और देवताओं के लिये तप, शौच और दया-अपने इन तीन चरणों से इस चराचर जगत् की रक्षा करते हैं। अब आप अपनी शुद्धसत्त्वमयी वरदायिनी मूर्ति से हमारे धर्मविरोधी रजोगुण-तमोगुण को दूर कर दीजिये देव! यह ब्राह्मणकुल आपके द्वारा अवश्य रक्षणीय है। यदि साक्षात् धर्मरूप होकर भी आप सुमधुर वाणी और पूजनादि के द्वारा इस उत्तम कुल की रक्षा न करें तो आपका निश्चित किया हुआ कल्याण मार्ग ही नष्ट हो जाये; क्योंकि लोक तो श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण को ही प्रमाणरूप से ग्रहण करता है। प्रभो! आप सत्त्वगुण की खान हैं और सभी जीवों का कल्याण करने के लिये उत्सुक हैं। इसी से आप अपनी शक्तिरूप राजा आदि के द्वारा धर्म के शत्रुओं का संहार करते हैं; क्योंकि वेदमार्ग का उच्छेद आपको अभीष्ट नहीं है। आप त्रिलोकीनाथ और जगत्प्रतिपालक होकर भी ब्राह्मणों के प्रति इतने नम्र रहते हैं, इससे आपके तेज की कोई हानि नहीं होती; यह तो आपकी लीलामात्र है।
साभार krishnakosh.org

दोस्ती के पूर्व जानने योग्य 3 आवश्यक बाते.


दोस्ती के पूर्व जानने योग्य
3 आवश्यक बाते.

धर्म-ग्रंथ का लक्ष्य मनुष्य को केवल देवी-देवताओं के बारे में ज्ञान देना ही नहीं है, बल्कि हर उस बात को समझाना है, जो उसके लिए जानना जरूरी होती है। धर्म ग्रंथों का पाठ करने या उन्हें सुनने से हमें कई ऐसी बातें पता चलती हैं, जो की उसके जीवन में हर दिन काम आने वाली होती है।

महाभारत के वनपर्व में ऐसी तीन बातों के बारे में कहा गया है, कि किसी से दोस्ती करने से पहले हमें क्या-क्या बातें ध्यान रखनी चाहिए।

श्लोक
येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च।
ते सेव्यास्तैः समस्या हि शास्त्रेभ्योपि गरीयसी।। 


मनुष्य की शिक्षा और ज्ञान

महाभारत के अनुसार, किसी से भी दोस्ती करने से पहले यह जरूर देखना चाहिए कि उस व्यक्ति के ज्ञान का स्तर क्या है। कई लोगों का मन पढ़ाई-लिखाई में नहीं होता। फालतू घूमना, हंसी-ठिठोली करना, दूसरों का मजाक उठाना आदि ही उनका स्वभाव होता है। ऐसे लोगों के जितना दूर रहा जाए, उतना ही अच्छा माना जाता है। अच्छी विद्या या ज्ञान वाला मनुष्य ही आपने दोस्तों गलत राह पर चलने से रोक सकता है।


उसके परिवार या परिवार के लोगों की जानकारी

जिस मनुष्य के परिवार में ऐसे लोग रहते हो जो दुष्ट, चोर या पापी प्रवृत्ति के हो, उससे भूलकर भी दोस्ती नहीं करनी चाहिए। चाहे मनुष्य खुद कितना ही अच्छा हो, लेकिन अपने परिवार की आदतों और कर्मों का परिणाम उसे भी झेलना ही पड़ता है। जिस तरह गेंहू के साथ घुन भी पिसता है, उसी तरह विपत्ति आने पर ऐसे व्यक्ति का परिवार उसके साथ-साथ आपके लिए भी मुसीबत का कारण बन सकता है। इसलिए किसी से भी दोस्ती करने से पहले इस बात की जांच जरूर कर लें।


उसकी आदतें और काम

मनुष्य की आदतें और उसका पेशा यानी काम जानना भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि किसी की बुरी आदतों को जाने बिना ही या उन्हें नजरअंदाज करके आप किसी के दोस्ती कर लेंगे तो, कभी ना कभी इनका दुष्परिणाम आपको झेलना ही पड़ेगा। हो सकता है, उसकी आदतों या कामों की वजह से आपको भी अपमानित होना पड़ जाए। इसलिए, दोस्ती करने से पहले सामने वाले की आदतों के बारे में जरूर जान लें। यदि उसमें नशा करना, चोरी करना, बहुत ज्यादा गुस्सा करने जैसी कोई भी बुरी आदत हो तो ऐसा व्यक्ति से दूरी बनाए रखना ही बेहतर होगा।

इन 4 बातों को अपनाकर शांत और सुखी रह सकते हैं.


इन 4 बातों को अपनाकर
शांत और सुखी रह सकते हैं.

जीवन में शांति चाहने वाले लोगों को पहले खुद को शांत करना चाहिए यानी हर काम या हर बात में पहले खुद को संतुष्ट करें। दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करना और खुद मन मारकर रहना भी इसका एक हिस्सा है। हर बात में संतोष कर लेने से धीरे-धीरे जीवन में शांति आने लगती है। जीवन में हमेशा सुख- शांति और खुशियां बनाए रखने के लिए पद्मपुराण में 4 ऐसे काम बताए गए हैं, जिनसे दूर रहना चाहिए। जिस किसी में भी ये 4 आदतें होती हैं, उसके दोस्त और परिवार वाले उससे बार-बार नाराज हो जाते हैं।
1. न करें लड़ाई... 
कई लोगों को बिना कारण ही दूसरों से लड़ने की आदत होती है। इस वजह से कई बार दूसरों से दुश्मनी हो जाती है। इसलिए बिना कारण लड़ाई या दुश्मनी करना घातक हो सकता है। इसके अलावा लोग अपना हक लेने या अपनी बात मनवाने के लिए लड़ाई कर लेते हैं। ऐसा करने से सिर्फ अशांति ही होती है। क्योंकि लड़ाई से सिर्फ जितने वाला इंसान ही संतुष्ट होता है। हारने वाला इंसान अशांत ही रहता है। इसलिए अपनी बात मनावने या अपना हक लेने के लिए प्रेम से या बातचीत से मामले सुलझाना बेहतर है।

2. विवादों से दूर रहें... 
कई बार हम दूसरों के विवादों में इस तरह शामिल हो जाते हैं कि वह विवाद हमारा बन जाता है। इसलिए कभी भी किसी अन्य व्यक्ति के विवाद में शामिल न हों, ऐसी बातों से हमेशा दूर ही रहें। इसके अलावा हर बात कहने या सुनने में सावधानी रखनी चाहिए। किसी की बात या आदत ठीक न लगे तो भी कुछ कहने से बचना चाहिए। इस तरह आप विवादों से दूर रहने की कोशिश करें।

3. बुरा न कहें... 
दूसरों की बुराई करना और उन्हें नीचा दिखाना कई लोगों की आदत होती है। इस चक्कर में मनुष्य अच्छे -बुरे में फर्क नहीं कर पाता। इस वजह से खुद के लिए परेशानियां खड़ी कर लेता है। हमें लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए जैसा हम अपने लिए बर्दाश्त नहीं कर सकते। अपनी बात समझाने या कहने के तरीके में बदलाव करने से किसी को नाराज़गी नहीं रहेगी।

4. दुख ना पहुंचाएं... 
बिना सोचे-समझे बोल देने से कोई भी इंसान सबसे ज्यादा दुखी हो जाता है। शब्द तीर की तरह होते हैं, एक बार मुंह से निकलने के बाद उन्हें वापस नहीं लिया जा सकता। अच्छी बातों से हम किसी के प्रिय बन सकते हैं और तो बुरे शब्दों के प्रयोग से दुश्मन बनने में देर नहीं लगती। आजकल हर इंसान अपने लिए अच्छा ही सुनना चाहता है। तनावभरे जीवन में हर इंसान सकारात्मक होने की कोशिश करता है। इसलिए नकारात्मक बातें करने से बचना चाहिए और ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए जिससे किसी को दुख पहुंचे।