महामृत्युंजय मंत्र. (सम्पूर्ण विधि)


महामृत्युंजय मंत्र.
(सम्पूर्ण विधि)

महामृत्युंजय मंत्र के जप व उपासना की विधि आवश्यकता अनुरूप होती हैं। काम्य उपासना के रूप में भी इस मंत्र का जप किया जाता है। जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों की संख्या से इनमें विविधता आती है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-

एकाक्षरी(1).. मंत्र- ‘हौं’ ।
त्र्यक्षरी(3)... मंत्र- ‘ॐ जूं सः’।
चतुराक्षरी(4)..मंत्र- ‘ॐ वं जूं सः’।
नवाक्षरी(9).. मंत्र- ‘ॐ जूं सः पालय पालय’।
दशाक्षरी(10)..मंत्र- ‘ॐ जूं सः मां पालय पालय’।

(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा जबकि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो ‘मां’ के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)

वेदोक्त मंत्र-
महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌ ॥
 


इस मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ’ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे ‘त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना है।

मंत्र विचार:


इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि शब्द ही मंत्र है और मंत्र ही शक्ति है। इस मंत्र में आया प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता है और देवादि का बोध कराता है।

शब्द बोधक.


‘त्र’ ध्रुव वसु ‘यम’ अध्वर वसु
‘ब’ सोम वसु ‘कम्‌’ वरुण
‘य’ वायु ‘ज’ अग्नि
‘म’ शक्ति ‘हे’ प्रभास
‘सु’ वीरभद्र ‘ग’ शम्भु
‘न्धिम’ गिरीश ‘पु’ अजैक
‘ष्टि’ अहिर्बुध्न्य ‘व’ पिनाक
‘र्ध’ भवानी पति ‘नम्‌’ कापाली
‘उ’ दिकपति ‘र्वा’ स्थाणु
‘रु’ भर्ग ‘क’ धाता
‘मि’ अर्यमा ‘व’ मित्रादित्य
‘ब’ वरुणादित्य ‘न्ध’ अंशु
‘नात’ भगादित्य ‘मृ’ विवस्वान
‘त्यो’ इंद्रादित्य ‘मु’ पूषादिव्य
‘क्षी’ पर्जन्यादिव्य ‘य’ त्वष्टा
‘मा’ विष्णुऽदिव्य ‘मृ’ प्रजापति
‘तात’ वषट
इसमें जो अनेक बोधक बताए गए हैं। ये बोधक देवताओं के नाम हैं।

शब्द की शक्ति-


शब्द वही हैं और उनकी शक्ति निम्न प्रकार से है-
शब्द शक्ति.......
‘त्र’ त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘म’ मंगल ‘ब’ बालार्क तेज
‘कं’ काली का कल्याणकारी बीज ‘य’ यम तथा यज्ञ
‘जा’ जालंधरेश ‘म’ महाशक्ति
‘हे’ हाकिनो ‘सु’ सुगन्धि तथा सुर
‘गं’ गणपति का बीज ‘ध’ धूमावती का बीज
‘म’ महेश ‘पु’ पुण्डरीकाक्ष
‘ष्टि’ देह में स्थित षटकोण ‘व’ वाकिनी
‘र्ध’ धर्म ‘नं’ नंदी
‘उ’ उमा ‘र्वा’ शिव की बांयी शक्ति
‘रु’ रूप तथा आँसू ‘क’ कल्याणी
‘व’ वरुण ‘बं’ बंदी देवी
‘ध’ धंदा देवी ‘मृ’ मृत्युंजय
‘त्यो’ नित्येश ‘क्षी’ क्षेमंकरी
‘य’ यम तथा यज्ञ ‘मा’ माँग तथा मन्त्रेश
‘मृ’ मृत्युंजय ‘तात’ चरणों में स्पर्श

यह पूर्ण विवरण ‘देवो भूत्वा देवं यजेत’ के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित हुआ है।

महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार जो भी मंत्र चाहें चयन कर लें और नित्य पाठ में या आवश्यकता के समय प्रयोग में लाएँ।
मंत्र निम्नलिखित हैं-

तांत्रिक बीजोक्त मंत्र-

ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ ॥


संजीवनी मंत्र अर्थात्‌ संजीवनी विद्या-
ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।

महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र-
ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

महामृत्युंजय मंत्र जाप में सावधानियाँ.

महामृत्युंजय मंत्र का जप करना परम फलदायी है। लेकिन इस मंत्र के जप में कुछ सावधानियाँ रखना चाहिए जिससे कि इसका संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के अनिष्ट की संभावना न रहे।

अतः जप से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए-

1. जो भी मंत्र जपना हो उसके शब्दों का उच्चारण की शुद्धता से करें।
2. एक निश्चित संख्या में जप करें। पूर्व दिवस में जपे गए मंत्रों से, आगामी दिनों में कम मंत्रों का जप न करें। यदि चाहें तो अधिक जप सकते हैं।
3. मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
4. जप काल में धूप-दीप जलते रहना चाहिए।
5. रुद्राक्ष की माला पर ही जप करें।
6. माला को गोमुखी में रखें। जब तक जप की संख्या पूर्ण न हो, माला को गोमुखी से बाहर न निकालें।
7. जप काल में शिवजी की प्रतिमा, तस्वीर, शिवलिंग या महामृत्युंजय यंत्र पास में रखना अनिवार्य है।
8. महामृत्युंजय के सभी जप कुशा के आसन के ऊपर बैठकर करें।
9. जप काल में दुग्ध मिले जल से शिवजी का अभिषेक करते रहें या शिवलिंग पर चढ़ाते रहें।
10. महामृत्युंजय मंत्र के सभी प्रयोग पूर्व दिशा की तरफ मुख करके ही करें।
11. जिस स्थान और समय पर जपादि का शुभारंभ हो, वहीं पर आगामी दिनों में भी निरधरित समय पर जप करना चाहिए।
12. जपकाल में ध्यान पूरी तरह मंत्र में ही रहना चाहिए, मन को इधर-उधर न भटकाएँ।
13. जपकाल में आलस्य व उबासी को न आने दें।
14. मिथ्या बातें न करें।
15. जपकाल में स्त्री सेवन न करें।
16. जपकाल में मांसाहार त्याग दें।

कब करें महामृत्युंजय मंत्र जाप?

महामृत्युंजय मंत्र जपने से अकाल मृत्यु तो टलती ही है, आरोग्यता की भी प्राप्ति होती है। स्नान करते समय शरीर पर लोटे से पानी डालते वक्त इस मंत्र का जप करने से स्वास्थ्य-लाभ होता है।

दूध में निहारते हुए इस मंत्र का जप किया जाए और फिर वह दूध पी लिया जाए तो यौवन की सुरक्षा में भी सहायता मिलती है साथ ही इस मंत्र का जप करने से बहुत सी बाधाएँ दूर होती हैं, अतः इस मंत्र का यथासंभव जप करना चाहिए।

निम्नलिखित स्थितियों में इस मंत्र का जाप कराया जाता है-

(1) ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म, मास, गोचर और दशा, अंतर्दशा, स्थूलदशा आदि में ग्रह-पीड़ा होने का योग है।
(2) किसी महारोग से कोई पीड़ित होने पर।
(3) जमीन-जायदाद के बँटबारे की संभावना हो।
(4) हैजा-प्लेग आदि महामारी से लोग मर रहे हों।
(5) राज्य या संपदा के जाने का अंदेशा हो।
(6) धन-हानि हो रही हो।
(7) मेलापक में नाड़ीदोष, षडाष्टक आदि आता हो।
(8) राजभय हो।
(9) मन धार्मिक कार्यों से विमुख हो गया हो।
(10) राष्ट्र का विभाजन हो गया हो।
(11) मनुष्यों में परस्पर घोर क्लेश हो रहा हो।
(12) त्रिदोष-वश रोग हो रहे हों।

महामृत्युंजय जपविधि – (मूल संस्कृत में)
संकल्पः

कृतनित्यक्रियो जपकर्ता स्वासने पांगमुख उदहमुखो वा उपविश्य धृतरुद्राक्षभस्मत्रिपुण्ड्रः। आचम्य। प्राणानायाम्य। देशकालौ संकीर्त्य मम वा यज्ञमानस्य अमुक कामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजय मंत्रस्य अमुक संख्यापरिमितं जपमहंकरिष्ये वा कारयिष्ये।

॥ इति प्रात्यहिकसंकल्पः॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ गुरवे नमः।
ॐ गणपतये नमः। ॐ इष्टदेवतायै नमः।
इति नत्वा यथोक्तविधिना भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कुर्यात्‌।

भूतशुद्धिः
विनियोगः

ॐ तत्सदद्येत्यादि मम अमुक प्रयोगसिद्धयर्थ भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च करिष्ये। ॐ आधारशक्ति कमलासनायनमः। इत्यासनं सम्पूज्य। पृथ्वीति मंत्रस्य। मेरुपृष्ठ ऋषि;, सुतलं छंदः कूर्मो देवता, आसने विनियोगः।

आसनः

ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय माँ देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌।
गन्धपुष्पादिना पृथ्वीं सम्पूज्य कमलासने भूतशुद्धिं कुर्यात्‌।
अन्यत्र कामनाभेदेन। अन्यासनेऽपि कुर्यात्‌।

पादादिजानुपर्यंतं पृथ्वीस्थानं तच्चतुरस्त्रं पीतवर्ण ब्रह्मदैवतं वमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। जान्वादिना भिपर्यन्तमसत्स्थानं तच्चार्द्धचंद्राकारं शुक्लवर्ण पद्मलांछितं विष्णुदैवतं लमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌।

नाभ्यादिकंठपर्यन्तमग्निस्थानं त्रिकोणाकारं रक्तवर्ण स्वस्तिकलान्छितं रुद्रदैवतं रमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। कण्ठादि भूपर्यन्तं वायुस्थानं षट्कोणाकारं षड्बिंदुलान्छितं कृष्णवर्णमीश्वर दैवतं यमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। भूमध्यादिब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त माकाशस्थानं वृत्ताकारं ध्वजलांछितं सदाशिवदैवतं हमिति बीजयुक्तं ध्यायेत्‌। एवं स्वशरीरे पंचमहाभूतानि ध्यात्वा प्रविलापनं कुर्यात्‌। यद्यथा-पृथ्वीमप्सु। अपोऽग्नौअग्निवायौ वायुमाकाशे। आकाशं तन्मात्राऽहंकारमहदात्मिकायाँ मातृकासंज्ञक शब्द ब्रह्मस्वरूपायो हृल्लेखार्द्धभूतायाँ प्रकृत्ति मायायाँ प्रविलापयामि, तथा त्रिवियाँ मायाँ च नित्यशुद्ध बुद्धमुक्तस्वभावे स्वात्मप्रकाश रूपसत्यज्ञानाँनन्तानन्दलक्षणे परकारणे परमार्थभूते परब्रह्मणि प्रविलापयामि।तच्च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावं सच्चिदानन्दस्वरूपं परिपूर्ण ब्रह्मैवाहमस्मीति भावयेत्‌। एवं ध्यात्वा यथोक्तस्वरूपात्‌ ॐ कारात्मककात्‌ परब्रह्मणः सकाशात्‌ हृल्लेखार्द्धभूता सर्वमंत्रमयी मातृकासंज्ञिका शब्द ब्रह्मात्मिका महद्हंकारादिप-न्चतन्मात्रादिसमस्त प्रपंचकारणभूता प्रकृतिरूपा माया रज्जुसर्पवत्‌ विवर्त्तरूपेण प्रादुर्भूता इति ध्यात्वा। तस्या मायायाः सकाशात्‌ आकाशमुत्पन्नम्‌, आकाशाद्वासु;, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अदभ्यः पृथ्वी समजायत इति ध्यात्वा। तेभ्यः पंचमहाभूतेभ्यः सकाशात्‌ स्वशरीरं तेजः पुंजात्मकं पुरुषार्थसाधनदेवयोग्यमुत्पन्नमिति ध्यात्वा। तस्मिन्‌ देहे सर्वात्मकं सर्वज्ञं सर्वशक्तिसंयुक्त समस्तदेवतामयं सच्चिदानंदस्वरूपं ब्रह्मात्मरूपेणानुप्रविष्टमिति भावयेत्‌ ॥

॥ इति भूतशुद्धिः ॥

अथ प्राण-प्रतिष्ठा
विनियोगः

अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्माविष्णुरुद्रा ऋषयः ऋग्यजुः सामानि छन्दांसि, परा प्राणशक्तिर्देवता, ॐ बीजम्‌, ह्रीं शक्तिः, क्रौं कीलकं प्राण-प्रतिष्ठापने विनियोगः।
डं. कं खं गं घं नमो वाय्वग्निजलभूम्यात्मने हृदयाय नमः।
ञं चं छं जं झं शब्द स्पर्श रूपरसगन्धात्मने शिरसे स्वाहा।
णं टं ठं डं ढं श्रीत्रत्वड़ नयनजिह्वाघ्राणात्मने शिखायै वषट्।
नं तं थं धं दं वाक्पाणिपादपायूपस्थात्मने कवचाय हुम्‌।
मं पं फं भं बं वक्तव्यादानगमनविसर्गानन्दात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्।
शं यं रं लं हं षं क्षं सं बुद्धिमानाऽहंकार-चित्तात्मने अस्राय फट्।
एवं करन्यासं कृत्वा ततो नाभितः पादपर्यन्तम्‌ आँ नमः।
हृदयतो नाभिपर्यन्तं ह्रीं नमः।
मूर्द्धा द्विहृदयपर्यन्तं क्रौं नमः।
ततो हृदयकमले न्यसेत्‌।
यं त्वगात्मने नमः वायुकोणे।
रं रक्तात्मने नमः अग्निकोणे।
लं मांसात्मने नमः पूर्वे ।
वं मेदसात्मने नमः पश्चिमे ।
शं अस्थ्यात्मने नमः नैऋत्ये।
ओंषं शुक्रात्मने नमः उत्तरे।
सं प्राणात्मने नमः दक्षिणे।
हे जीवात्मने नमः मध्ये एवं हदयकमले।

अथ ध्यानम्‌रक्ताम्भास्थिपोतोल्लसदरुणसरोजाङ घ्रिरूढा कराब्जैः
पाशं कोदण्डमिक्षूदभवमथगुणमप्यड़ कुशं पंचबाणान्‌।
विभ्राणसृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढया
देवी बालार्कवणां भवतुशु भकरो प्राणशक्तिः परा नः ॥

॥ इति प्राण-प्रतिष्ठा ॥

अथ महामृत्युंजय जपविधि
संकल्प

तत्र संध्योपासनादिनित्यकर्मानन्तरं भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कृत्वा प्रतिज्ञासंकल्प कुर्यात ॐ तत्सदद्येत्यादि सर्वमुच्चार्य मासोत्तमे मासे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रो अमुकशर्मा/वर्मा/गुप्ता मम शरीरे ज्वरादि-रोगनिवृत्तिपूर्वकमायुरारोग्यलाभार्थं वा धनपुत्रयश सौख्यादिकिकामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजयदेव प्रीमिकामनया यथासंख्यापरिमितं महामृत्युंजयजपमहं करिष्ये।

विनियोग

अस्य श्री महामृत्युंजयमंत्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः श्री त्र्यम्बकरुद्रो देवता, श्री बीजम्‌, ह्रीं शक्तिः, मम अनीष्ठसहूयिर्थे जपे विनियोगः।

अथ यष्यादिन्यासः

ॐ वसिष्ठऋषये नमः शिरसि।
अनुष्ठुछन्दसे नमो मुखे।
श्री त्र्यम्बकरुद्र देवतायै नमो हृदि।
श्री बीजाय नमोगुह्ये।
ह्रीं शक्तये नमोः पादयोः।

॥ इति यष्यादिन्यासः ॥

अथ करन्यासः

ॐ ह्रीं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्रायं शूलपाणये स्वाहा अंगुष्ठाभ्यं नमः।

ॐ ह्रीं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये माँ जीवय तर्जनीभ्याँ नमः।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌ ओं नमो भगवते रुद्राय चन्द्रशिरसे जटिने स्वाहा मध्यामाभ्याँ वषट्।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिव बन्धनात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरान्तकाय हां ह्रीं अनामिकाभ्याँ हुम्‌।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्योर्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यजुः साममन्त्राय कनिष्ठिकाभ्याँ वौषट्।

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मामृताम्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्निवयाय ज्वल ज्वल माँ रक्ष रक्ष अघारास्त्राय करतलकरपृष्ठाभ्याँ फट् ।

॥ इति करन्यासः ॥

अथांगन्यासः

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः त्र्यम्बकं ॐ नमो भगवते रुद्राय शूलपाणये स्वाहा हृदयाय नमः।

ॐ ह्रौं ओं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः यजामहे ॐ नमो भगवते रुद्राय अमृतमूर्तये माँ जीवय शिरसे स्वाहा।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय चंद्रशिरसे जटिने स्वाहा शिखायै वषट्।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः उर्वारुकमिव बन्धनात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिपुरांतकाय ह्रां ह्रां कवचाय हुम्‌।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मृत्यार्मुक्षीय ॐ नमो भगवते रुद्राय त्रिलोचनाय ऋग्यजु साममंत्रयाय नेत्रत्रयाय वौषट्।

ॐ ह्रौं ॐ जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः मामृतात्‌ ॐ नमो भगवते रुद्राय अग्नित्रयाय ज्वल ज्वल माँ रक्ष रक्ष अघोरास्त्राय फट्।

॥ इत्यंगन्यासः ॥

अथाक्षरन्यासः

त्र्यं नमः दक्षिणचरणाग्रे।
बं नमः,
कं नमः,
यं नमः,
जां नमः दक्षिणचरणसन्धिचतुष्केषु ।
मं नमः वामचरणाग्रे ।
हें नमः,
सुं नमः,
गं नमः,
धिं नम, वामचरणसन्धिचतुष्केषु ।
पुं नमः, गुह्ये।
ष्टिं नमः, आधारे।
वं नमः, जठरे।
र्द्धं नमः, हृदये।
नं नमः, कण्ठे।
उं नमः, दक्षिणकराग्रे।
वां नमः,
रुं नमः,
कं नमः,
मिं नमः, दक्षिणकरसन्धिचतुष्केषु।
वं नमः, बामकराग्रे।
बं नमः,
धं नमः,
नां नमः,
मृं नमः वामकरसन्धिचतुष्केषु।
त्यों नमः, वदने।
मुं नमः, ओष्ठयोः।
क्षीं नमः, घ्राणयोः।
यं नमः, दृशोः।
माँ नमः श्रवणयोः ।
मृं नमः भ्रवोः ।
तां नमः, शिरसि।
॥ इत्यक्षरन्यास ॥
अथ पदन्यासः
त्र्यम्बकं शरसि।
यजामहे भ्रुवोः।
सुगन्धिं दृशोः ।
पुष्टिवर्धनं मुखे।
उर्वारुकं कण्ठे।
मिव हृदये।
बन्धनात्‌ उदरे।
मृत्योः गुह्ये ।
मुक्षय उर्वों: ।
माँ जान्वोः ।
अमृतात्‌ पादयोः।

॥ इति पदन्यास ॥

मृत्युंजयध्यानम्‌

हस्ताभ्याँ कलशद्वयामृतसैराप्लावयन्तं शिरो,
द्वाभ्याँ तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्याँ वहन्तं परम्‌ ।

अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकांतं शिवं,
स्वच्छाम्भोगतं नवेन्दुमुकुटाभातं त्रिनेत्रभजे ॥

मृत्युंजय महादेव त्राहि माँ शरणागतम्‌,
जन्ममृत्युजरारोगैः पीड़ित कर्मबन्धनैः ॥

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्वच्चित्तोऽहं सदा मृड,
इति विज्ञाप्य देवेशं जपेन्मृत्युंजय मनुम्‌ ॥

अथ बृहन्मन्त्रः

ॐ ह्रौं जूं सः ॐ भूः भुवः स्वः। त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्‌। उर्व्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्‌। स्वः भुवः भू ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ॥

समर्पण

एतद यथासंख्यं जपित्वा पुनर्न्यासं कृत्वा जपं भगन्महामृत्युंजयदेवताय समर्पयेत।

गुह्यातिगुह्यगोपता त्व गृहाणास्मत्कृतं जपम्‌।
सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर ॥

॥ इति महामृत्युंजय जपविधिः ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण: द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 30-39 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 30-39 का हिन्दी अनुवाद

भगवान विष्णु के नेत्र अन्तरिक्ष हैं, उसमें देखने की शक्ति सूर्य है, दोनों पलकें रात और दिन हैं, उनका भ्रूविलास ब्रह्मलोक है। तालु जल है और जिह्वा रस। वेदों को भगवान का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यम को दाढ़ें। सब प्रकार के स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी माया को ही उनकी मुस्कान कहते हैं। यह अनन्त सृष्टि उसी माया का कटाक्ष-विक्षेप है। लज्जा ऊपर का होठ और लोभ नीचे का होठ है। धर्म स्तन और अधर्म पीठ है। प्रजापति उनके मूत्रेन्द्रिय हैं, मित्रावरुण अण्डकोश हैं, समद्र कोख है और बड़े-बड़े पर्वत उनकी हड्डियाँ हैं।

राजन्! विश्वमूर्ति विराट् पुरुष की नाड़ियाँ नदियाँ हैं। वृक्ष रोम हैं। परम प्रबल वायु श्वास है। काल उनकी चाल है और गुणों का चक्कर चलाते रहना ही उनका कर्म है।

परीक्षित! बादलों को उनके केश मानते हैं। सन्ध्या उन अनन्त का वस्त्र है। महात्माओं ने अव्यक्त (मूल प्रकृति) को ही उनका हृदय बतलाया है और सब विकारों का खजाना उनका मन चन्द्रमा कहा गया है। महत्तत्त्व को सर्वात्मा भगवान का चित्त कहते हैं और रुद्र उनके अहंकार कहे गये हैं। घोड़े, खच्चर, ऊँट और हाथी उनके नख हैं। वन में रहने वाले सारे मृग और पशु उनके कटि प्रदेश में स्थित हैं।

तरह-तरह के पक्षी उनके अद्भुत रचना-कौशल हैं। स्वायम्भुव मनु उनकी बुद्धि हैं और मनु की सन्तान मनुष्य उनके निवास स्थान हैं। गन्धर्व, विद्याधर, चारण और अप्सराएँ उनके षड्ज आदि स्वरों की स्मृति हैं। दैत्य उनके वीर्य हैं। ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जंघाएँ और शूद्र उन विराट् पुरुष के चरण हैं। विविध देवताओं के नाम से जो बड़े-बड़े द्रव्यमय यज्ञ किये जाते हैं, वे उनके कर्म हैं।

परीक्षित! विराट् भगवान के स्थूल शरीर का यही स्वरूप है, सो मैंने तुम्हें सुना दिया। इसी में मुमुक्षु पुरुष बुद्धि के द्वारा मन को स्थिर करते हैं; क्योंकि इससे भिन्न और कोई वस्तु नहीं है।

जैसे स्वप्न देखने वाला स्वप्नावस्था में अपने-आपको ही विविध पदार्थों के रूप में देखता है, वैसे ही सबकी बुद्धि-वृत्तियों के द्वारा सब कुछ अनुभव करने वाला सर्वान्तर्यामी परमात्मा भी एक ही है। उन सत्यस्वरूप आनन्द निधि भगवान का ही भजन करना चाहिये, अन्य किसी भी वस्तु में आसक्ति नहीं करनी चाहिये। क्योंकि यह आसक्ति जीव के अधःपतन का हेतु है।

क्रमश:



साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 15-29 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 15-29 का हिन्दी अनुवाद

मृत्यु का समय आने पर मनुष्य घबराये नहीं। उसे चाहिये कि वह वैराग्य के शस्त्र से शरीर और उससे सम्बन्ध रखने वालों के प्रति ममता को काट डाले। धैर्य के साथ घर से निकलकर पवित्र तीर्थ के जल में स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थान में विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठ जाये। तत्पश्चात् परम पवित्र ‘अ उ म्’ इन तीन मात्राओं से युक्त प्रणव का मन-ही-मन जप करे। प्राण वायु को वश में करके मन का दमन करे और एक क्षण के लिये भी प्रणव को न भूले। बुद्धि की सहायता से मन के द्वारा इन्द्रियों को उनके विषयों से हटा ले और कर्म की वासनाओं से चंचल हुए मन को विचार के द्वारा रोक कर भगवान के मंगलमय रूप में लगाये। स्थिर चित्त से भगवान के श्रीविग्रह में से किसी एक अंग का ध्यान करते-करते विषय-वासना से रहित मन को पूर्ण रूप से भगवान में ऐसा तल्लीन कर दे कि फिर और किसी विषय का चिन्तन ही न हो। वही भगवान विष्णु का परमपद है, जिसे प्राप्त करके मन भगवत्प्रेमरूप आनन्द से भर जाता है। यदि भगवान का ध्यान करते समय मन रजोगुण से विक्षिप्त या तमोगुण से मूढ़ हो जाये तो घबराये नहीं। धैर्य के साथ योग धारणा के द्वारा उसे वश में करना चाहिये; क्योंकि धारणा उक्त दोनों गुणों के दोषों को मिटा देती है। धारणा स्थिर हो जाने पर ध्यान में जब योगी अपने परम मंगलमय आश्रय (भगवान्) को देखता है, तब उसे तुरंत ही भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है।

परीक्षित ने पूछा- ब्रह्मन्! धारणा किस साधन से किस वस्तु में किस प्रकार की जाती है और उसका क्या स्वरूप माना गया है, जो शीघ्र ही मनुष्य के मन का मैल मिटा देती है?

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करके फिर बुद्धि के द्वारा मन को भगवान के स्थूल रूप में लगाना चाहिये। यह कार्यरूप सम्पूर्ण विश्व जो कुछ कभी था, है या होगा- सब-का-सब जिसमें दीख पड़ता है, वही भगवान का स्थूल-से-स्थूल और विराट् शरीर है। जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति- इन सात आवरणों से घिरे हुए इस ब्रह्माण्ड शरीर में जो विराट् पुरुष भगवान हैं, वे ही धारणा के आश्रय हैं, उन्हीं की धारणा की जाती है। तत्त्वज्ञ पुरुष उनका इस प्रकार वर्णन करते हैं- पाताल विराट् पुरुष के तलवे हैं, उनकी एड़ियाँ और पंजे रसातल हैं, दोनों गुल्फ-एड़ी के ऊपर की गाँठें महातल हैं, उनके पैर के पिंडे तलातल हैं। विश्व-मूर्ति भगवान के दोनों घुटने सुतल हैं, जाँघें वितल और अतल हैं, पेंडू भूतल है और परीक्षित! उनके नाभिरूप सरोवरों को ही आकाश कहते हैं। आदिपुरुष परमात्मा की छाती को स्वर्गलोक, गले को महर्लोक, मुख को जनलोक और ललाट को तपोलोक कहते हैं। उस सहस्र सिर वाले भगवान का मस्तक समूह ही सत्यलोक है। इन्द्रादि देवता उनकी भुजाएँ हैं। दिशाएँ कान और शब्द श्रवणेन्द्रिय हैं। दोनों अश्विनीकुमार उनकी नासिका के छिद्र हैं; गन्ध घ्राणेन्द्रिय है और धधकती हुई आग, उनका मुख है।


क्रमश:


साभार krishnakosh.org

केनोपनिषद.


केनोपनिषद
(सारांश)

शांतिपाठ

ॐ अप्यायंतु ममांगानि वाक्प्राणचक्षुषः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोद निराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तुतदात्मानि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि संतु।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।


आशय..मेरे अंग पुष्ट हों तथा मेरे वाक, प्राण चक्षु, श्रोत्र, बल और संपूर्ण इंद्रियां पुष्ट हों। यह सब उपनिषद विद्या ब्रह्म है। मैं ब्रह्म का निराकरण न करूं, ब्रह्म मेरा निराकरण न करे। इस प्रकार हमारा परस्पर अनिराकरण हो। उपनिषदों में जो धर्म है, वह आत्मज्ञान में लगे हुए मुझ में निहित हो, वह मुझ में निहित हो। त्रिविध तापों की शांति हो।

प्रथम खंड
(1) यह मन किसकी इच्छा से प्रेरित होकर अपने विषयों में गिरता है? यह प्राण किसके द्वारा प्रयुक्त होने पर चलता है? यह वाणी किसके द्वारा इच्छा किये जाने पर बोलती है? कौन देव नेत्रों तथा कानों को प्रेरित करता है?

(2) जो कानों का भी कान, मन का भी मन और वाणी की भी वाणी है, वही प्राणों का भी प्राण और चक्षु का भी चक्षु है। इस तथ्य को जानकर धीर पुरुष मृत्यु के पश्चात मुक्त होकर अमर हो जाते हैं।

(3) उस ब्रह्म तक आंखें, वाणी और मन पहुंच ही नहीं सकते। अतः उस ब्रह्म के विषय में शिष्य को किस प्रकार उपदेश देना चाहिए, यह हम नहीं जानते; यह हमारी बुद्धि में नहीं आता। वह विदित एवं अविदित से अन्य ही है, ऐसा हमने अपने पूर्व पुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें उसका उपदेश दिया था।

(4) जो वाणी से प्रकाशित नहीं हो सकता, किंतु जिससे वाणी प्रकाशित होती है उसी को ब्रह्म समझना चाहिए। यह जिस विशेष नाम युक्त ईश्वर (जैसे इंद्र, अग्नि, वायु, विष्णु, रुद्र आदि) की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

(5) जिसके विषय में मन मनन नहीं कर सकता, परंतु जिसकी सत्ता से मन मनन करने की सामर्थ्य रखता है, ऐसा कहा जाता है, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामयुक्त ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

(6) जिसे कोई नेत्र नहीं देखता, किंतु जिसकी सहायता से नेत्र अपने विषय को देखते हैं, उसी को ब्रह्म समझो, जिस विशेष नाम युक्त ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

(7) जिसे कोई कान नहीं सुनता, परंतु जिसकी सहायता से कान सुनने का कार्य करते हैं, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामधारी ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

(8) जो नासिका में स्थित प्राण, वायु का विषय नहीं बन सकता, अपितु जिससे प्राण अपने विषय (सूंघना) कार्य करते हैं, उसी को ब्रह्म समझो। जिस विशेष नामधारी ईश्वर की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।

द्वितीय खंड

(1) यदि तुम यह समझते हो कि तुम ईश्वर को अच्छी तरह जानते हो, तो निश्चय ही तुम ब्रह्म का अल्प रूप ही जानते हो। इसका जो रूप तुम जानते हो और जो रूप देवताओं में जाना जाता है, वह भी अल्प ही है। अतः तुम्हारे लिए ब्रह्म विचार करने योग्य है।’ इस पर एकांत में विचार करने के अनंतर शिष्य ने कहा कि, ‘वह अब ईश्वर को जान गया है।’

(2) मैं न तो यह मानता हूं कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जान गया हूं और न यही समझता हूँ कि उसे नहीं जानता हूं। इसलिए मैं उसे जानता भी हूं और नहीं भी जानता हूं। हम शिष्यों में ब्रह्म के विषय में जिसकी यह धारणा है कि मैं उसे जानता भी हूं और नहीं भी जानता हूं, वही ब्रह्म को जानता है।

(3) ब्रह्म जिसे ज्ञात नहीं है, उसी को ज्ञात है। जिसको ज्ञात है, वह उसे नहीं जानता, क्योंकि वह जाननेवालों को बिना जाना हुआ और न जाननेवालों का जाना हुआ है। अन्य वस्तुओं के समान दिखाई न पड़ने के कारण वह इंद्रियों का विषय नहीं बन सकता।

(4) सभी इंद्रियां ब्रह्म की सत्ता से ही कार्य करती हैं, अतः प्रत्येक इंद्रिय के विषय से उसका ही बोध होता है, इसी से वह जाना जाता है, यही उसका ज्ञान है। इसी ब्रह्मज्ञान से अमरता प्राप्त होती है। अमरता स्वयं से ही प्राप्त होती है; विद्या तो केवल अज्ञान के अंधकार को दूर करने में सहायक सिद्ध होती है।

(5) यदि इसी जन्म में ब्रह्म को जान लिया जाए, तब तो ठीक है। यदि ऐसा न हो पाए तो यह प्राणी के लिए सर्वाधिक हानि की बात है। ज्ञानी लोग प्रत्येक प्राणी में ब्रह्म की सत्ता को देखकर, मृत्यु के पश्चात् अमर हो जाते हैं।

तृतीय खंड

(1) यह प्रसिद्ध है कि पूर्व कथित लक्षणोंवाले परब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की थी। कहते हैं कि उस ब्रह्म की विजय से देवताओं ने विजय प्राप्त की थी।

(2) तब देवताओं ने सोचा यह विजय उनके निजी प्रयत्नों से मिली है। कहते हैं—वह ब्रह्म देवताओं के मनोभावों को जान गया और उनके सामने यक्ष के रूप में प्रादुर्भूत हुआ। यक्ष के रूप में आए हुए उस ब्रह्म को लोग नहीं पहचान सके कि यह कौन है?

(3) वे देवता अग्नि से बोले, ‘हे अग्नि यह ज्ञात करो कि यह यक्ष कौन है?’ अग्नि ने स्वीकृति दे दी।


(4) अग्नि यक्ष रूपी ब्रह्म के पास गया, यक्ष ने अग्नि से पूछा, ‘तुम कौन हो।’ इस पर अग्नि ने उत्तर दिया, ‘मैं अग्नि हूं। मेरा नाम जातवेदास भी है।’

(5) इस पर यक्ष ने पूछा, ‘हे जातवेदास, तेरे नाम के अनुरूप तुझमें कौन-सी शक्ति है?’ अग्नि ने उत्तर दिया, ‘पृथ्वी में दिखाई देनेवाले इस समस्त चराचर को मैं जला सकता हूं। आकाश में स्थित वस्तुएं भी मुझसे जल सकती हैं।’

(6) यक्ष ने अग्नि को एक तिनका दिया और कहा, ‘इसे जलाकर दिखाओ।’ अग्नि उस तिनके में प्रविष्ट हुआ, किंतु अपनी संपूर्ण शक्ति से भी उसे न जला सका और लौटकर देवताओं के पास चला आया तथा उनसे बोला, ‘यह यक्ष कौन है? मैं इस तथ्य का पता न लगा पाया।’

(7) तदनंतर देवताओं ने वायुदेव को आज्ञा दी, ‘हे वायु, अब तुम मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?’ वायु ‘बहुत अच्छा’ कहते हुए चल पड़ा।

(8) वायु यक्ष के पास गया। इस पर यक्ष ने प्रश्न किया, ‘तुम कौन हो?’ यह पूछे जाने पर वायु ने कहा, ‘मैं वायु हूं, मुझे मातरिश्वा भी कहते हैं।’

(9) तब यक्ष ने पूछा, ‘हे वायु! तुझमें क्या शक्ति है?’ वायु ने कहा, ‘पृथ्वी में जो कुछ भी है, उसे मैं उड़ा सकता हूं।’

(10) तब यक्ष ने एक तिनका देते हुए वायु से कहा, ‘इसे उड़ाओ’ इस पर वायु तिनके के पास गया, किंतु अपनी पूरी शक्ति से भी उसे उड़ा नहीं सका। तब वह भी देवताओं के पास लौट आया और बोला, मैं इस बात को नहीं जान पाया कि यह यक्ष कौन है?’

(11) तब देवताओं ने इंद्र से कहा, ‘हे मेघवन! अब तुम इस बात का पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है?’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर इंद्र यक्ष के पास गया, किंतु यक्ष इंद्र के सामने से अंतर्धान हो गया।

(12) जिस आकाश में वह यक्ष अंतर्धान हुआ था, इंद्र भी वहीं गया। वहीं उसने उस शोभामयी स्त्री हिमालय की पुत्री उमा (ब्रह्म विद्या) से पूछा, यह यक्ष कौन है?’

चतुर्थ खंड

उस विद्या देवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘यह ब्रह्म है, इसकी विजय से ही तुम महिमामय हुए हो।’ ऐसा कहते हैं कि तभी इंद्र ने जाना कि वह ब्रह्म था।

(2) अग्नि, वायु और इंद्र इन तीनों देवताओं ने ही सबसे पहले यह जाना कि ‘यह ब्रह्म है तथा इन तीनों ने ही सर्वप्रथम उसका स्पर्श किया था। वे अन्य देवताओं से श्रेष्ठ माने गए।

(3) इंद्र ने सर्वप्रथम समीपस्थ ब्रह्म का स्पर्श किया और जाना कि यह ब्रह्म है, अतः वह सभी देवताओं में प्रमुख माना गया।

(4) यह उस ब्रह्म का उपासना-संबंधी उपदेश है, जो पलक झपकने अथवा विद्युत चमकने के समान उत्पन्न हुआ। यह उस ब्रह्म का अधिदेवता रूप है।

(5) अब अध्यात्म उपासना का उपदेश इस प्रकार है—मन को गतिमान कहा जाता है। यह ब्रह्म इस प्रकार मन से ही बार-बार ब्रह्म का स्मरण होता है तथा निरंतर संकल्प किया जाता है।

(6) उस ब्रह्म ही वन अर्थात् भजन करने योग्य है, अतः उसकी वन नाम से उपासना करनी चाहिए। जो उसे इस तरह जानता है, उसी को सभी प्राणी अच्छी तरह चाहने लगते हैं।

(7) शिष्य द्वारा गुरु से उपनिषद् शिक्षा के विषय में अनुरोध किया गया। अतः इस शिक्षा को देने के बाद गुरु ने कहा—‘मैं तुम्हें ब्रह्म विषयक उपनिषद् का ज्ञान दे चुका हूं। अब तुम्हें ब्रह्म जाति संबंधी उपनिषद् का ज्ञान दूंगा।

(8) उस ब्राह्मी उपनिषद् की तप, दम, कर्म, वेद, और संपूर्ण वेदांग (व्याकरण, ज्योतिष, छंद आदि) यह सब प्रतिष्ठा है तथा सत्य उसका घर है।

(9) जो निश्चयपूर्वक इस उपनिषद को इस प्रकार जानता है, वह अपने पापों को नष्ट करके अनंत और महान स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है।

ईशोपनिषद.


ईशोपनिषद
(सारांश)

शांति पाठ.

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।।


आशय..वह ब्रह्म पूर्ण है, यह कार्य जगत भी पूर्ण है। उसी पूर्ण से इस पूर्ण की उत्पत्ति हुई है, अतः उस पूर्ण से इस पूर्ण को निकाल देने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।

(1) इस परिवर्तनशील जगत में यह जो कुछ भी चराचर दिखाई पड़नेवाली वस्तुएं हैं, ईश्वर उन सब में व्याप्त है। अतः उसका त्यागभाव से उपभोग करना चाहिए। जो वस्तु आपके पास नहीं है, उसका लोभ मत करो। भला यह धन किसका है?

(2) इस विश्व में जन्म लेकर श्रेष्ठ पुरुषार्थ करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार (पूर्व श्लोक तथा इस श्लोक में वर्णित) सभी उपदेशों के अनुसार आचरण करो। इससे अतिरिक्त उत्थान के लिए कोई मार्ग नहीं है। जो मनुष्य सांसारिक भोगों को भोगते हुए भी कर्म का परित्याग नहीं करता, उसे कर्म से उत्पन्न दोष नहीं छूते।

(3) जो लोग केवल शारीरिक बल प्रदर्शन अर्थात परपीड़न के लिए प्रसिद्ध हैं; जिनमें आदर्श मानवीय मार्ग को समझने की शक्ति नहीं है, वे वस्तुतः आत्मघाती हैं। प्राण त्याग करने के बाद भी वे आसुरी लोकों को प्राप्त होते हैं।

(4) वह ब्रह्म एक है, चंचलता रहित है, सबसे प्राचीन है, स्फूर्ति प्रदान करनेवाला है और मन से भी तेज चलनेवाला है। आंख, जिह्वा, कान आदि इंद्रियां उस तक नहीं पहुंच सकतीं। वह स्थिर रहने पर भी अन्य दौड़ते हुए लोगों से आगे बढ़ जाता है। मां के गर्भ में रहनेवाला जीव उसी ब्रह्म के आधार से अपने पूर्व में किए हुए कर्म फल को प्राप्त करता है।

(5) वह पूर्ण ब्रह्म समस्त सृष्टि को गति देते हुए भी स्वयं चंचलता रहित है। वह दूर भी है (अज्ञानियों के लिए) और पास भी है (ज्ञानियों के लिए)। वह इस चराचर जगत में प्रत्येक के अंदर भी है और बाहर भी है। क्योंकि ज्ञानी लोग उसे अपने अंदर देखते हैं और अज्ञानी नहीं देखते।

(6) जो मनुष्य सभी प्राणियों की आत्मा के अंदर आत्मा है, ऐसा अनुभव करता है और समस्त प्राणियों में उसी एक आत्मा का विश्वासपूर्वक अनुभव करता है, उसे किसी प्राणी के प्रति घृणा नहीं रहती।

(7) इस प्रकार की अवस्था में पहुंचने पर ज्ञानी मनुष्य को आत्मा सर्वभूतमय है—ऐसा अनुभव होता है। इस प्रकार का अनुभव होने पर उसे मोह बांध नहीं सकते।

(8) वह आत्मा सर्वत्र व्यापक है, शरीर रहित है, स्नायु एवं व्रण हीन है, शुद्ध, निष्पाप और तेजोमय है। इंद्रिय ज्ञान से परे हैं, मनीषी है, विजयी और स्वयंजन्मा है। उसने अनादिकाल से सभी इंद्रियों (जीभ, आंख, नाक, कान और त्वचा) तथा उसके विषयों (रस, देखना, सूंघना सुनना और स्पर्श) की व्यवस्था की है।

(9) जो—आत्मा नहीं है—इस प्रकार की अविद्या के अनुयायी हैं, वे अज्ञान के प्रगाढ़ अंधकार में प्रवेश करते हैं। साथ ही जो केवल आत्मज्ञान में ही डूब जाते हैं, वे अविद्या1 के उपासक से भी अधिक गहन अंधकार में जाते हैं, क्योंकि सांसारिक सुखसाधन भी जीवन-यात्रा के निर्वाह हेतु आवश्यक हैं।

(10) विद्या अर्थात् आत्मज्ञान से आत्मा की उन्नति होती है। अविद्या से सांसारिकता प्राप्त होती है। अतः इन दोनों का फल भिन्न-भिन्न है। ऐसा हमने धीरोदात्त मनीषियों से सुना है, जिन्होंने हमें इस विषय का उपदेश दिया था।

(11) विद्या से आत्मबल बढ़ता है और अविद्या से सांसारिक उन्नति प्राप्त होती है। जो इन दोनों को समान रूप से जानता है, वह अविद्या से अकाल मृत्यु को दूर करता है तथा विद्या से अमरत्व प्राप्त करता है।

(12) जो असंभूति (पृथकतावाद) की बात करते हैं, वे गहन अंधकार में प्रवेश करते हैं, और जो केवल संघवाद के ही उपासक हैं (व्यक्तिगत स्वतंत्रता के विरोधी हैं), वे असंभूतिवादियों से भी प्रगाढ़ अंधकार को प्राप्त करते हैं2 अतः संघवाद और वैयक्तिक स्वतंत्रता—(संभूति एवं असंभूति) दोनों की अतिवादिता उचित नहीं है।

(13) संघवाद और असंभूतिवाद, इन दोनों के फल भिन्न-भिन्न हैं—ऐसा कहा गया है। ऐसा हमने धीरे पुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें यह उपदेश दिया था।

(14) जो संघवाद और असंघवाद दोनों के समुचित प्रयोग को जानता है, वह असंघवाद से अपनी अकाल मृत्यु (रोग आदि) को दूर करके संघवाद से अमरता प्राप्त करता है।

(15) स्वर्णमय पान से सत्य का मुख बंद पड़ा है। भौतिकता सत्य को ढक देती है। हे परमात्मा ! सत्यधर्म का पालन करने के लिए तू उसे खोल दे। सत्यधर्म का पालन करने के लिए स्वर्ण अर्थात् धन-संपत्ति का लोभत्याग करना अनिवार्य है। तात्पर्य यह है कि धन संपत्ति का लालच व्यक्ति को सत्य से विमुख कर देता है। अतः हे परमात्मा तू हमें लोभ से बचा ले।
1. उपनिषदों में अविद्या शब्द का अर्थ वैद्यक, रसायन तंत्र आदि भौतिक विज्ञानों से है तथा विद्या शब्द का अर्थ अध्यात्म विद्या है।
2. संघवाद की चरमवादिता व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नष्ट कर देती है। इस चरमवादिता के कारण ही हिटलर जैसे अधिनायकों का अभ्युदय हुआ था, जो विश्वयुद्ध का कारण बना। कांट, हीगल आदि पाश्चात्य विचारक इसी विचारधारा के प्रबल समर्थक थे।

16. हे पोषक दृष्टा। नियामक, तेज स्वरूप, प्रजापालक ईश्वर! अपनी किरणों को एक ओर समेट लो (इनकी चकाचौंध मुझे देखने नहीं देती); और जो तेरा परम कल्याणकारक तेजस्वी स्वरूप है, उसे में देखता हूं। यह जो इस शरीर में प्राणों को धारण करनेवाला भक्त है, वह मैं ही हूं।

17. हमारा यह आत्मा अपार्थिव और अमृतरूपी शक्तिवाला है, और यह शरीर अंत में भस्म होनेवाला है। अतः हे कर्म करने वाले पुरुष अपने द्वारा किए जानेवाले कर्मों का ध्यान कर। सर्वरक्षक आत्मा का ध्यान कर हे कर्म करनेवाले पुरुष किए हुए कर्मों का ध्यान कर।

18. हे अग्निस्वरूप ईश्वर हमें उत्तम मार्ग से अभ्युदय की ओर ले चल। हे देव! तू हमारे सभी कर्मों को जानता है। हमारे पास के कुटिल पापों को दूर कर। हम तुझे विशेष रूप से नमन करते हुए, तेरी स्तुति करते हैं।

शुभासित-52


शुभासित
 1.एक समर्थ-गुरु ही अपने शिष्य को सक्षम बना सकता हैं; जैसे “गुरु” रामदासजी और उनका “शिष्य” शिवाजी महाराज।
2. “शील” गुण तभी कल्याणकारी हैं, जब वह “सत्य” से युक्त हो। जहाँ मिथ्या के साथ “शील” हैं, वहां ठगे जाने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती हैं। 
3. हमें सुख का भोगी नहीं; सुख का दाता बनना चाहिये। इससे आत्म-कल्याण का मार्ग खुलता हैं। 
4. व्यक्ति को सत्य का अनुगमन करना चाहिये, उसे किसी व्यक्ति विशेष या सम्प्रदाय का अनुयायी नहीं होना चाहिये।
5. आपस में मतभेद होना और अपने मत के अनुसार कर्म करके जीवन निर्माण करना, इसमें कोई दोष नहीं हैं; परन्तु दुसरो का मत बुरा लगना, उसके मत का खंडन करना एवं उसके मत से घृणा करना ही दोष के अंतर्गत आता हैं

6 .सुख और दुःख आने का कारण कर्म पर आधारित हैं; जो भोग से ही समाप्त होता हैं। उसके मार्जन का अन्य उपाय नहीं हैं।
7. उपासना से परमात्मा की प्राप्ति हो सकती हैं, जो सभी वर्णों और आश्रमों के लिए सुलभ हैं।
8. “जिंदगी” यथार्थ का ठोस दस्‍तावेज है। इसमें अफसोस के लिए अतीत की यादें तो हो सकती हैं, लेकिन यथार्थ की गति को अतीत से कोई अंतर नहीं पड़ता। जो होता है, जीवन उसके सहारे बढ़ने का नाम है। ऐसा हुआ होता, तो वैसा हो जाता, जैसी चीजें जिंदगी पर बहुत कम असर डालती हैं।
9. घड़े में एक बार पानी भरकर यदि फिर उसे कहीं यों ही रखा रहने दो तो कुछ दिन में पानी सूख जायेगा; किन्तु यदि पानी के भीतर ही वह घड़ा रखा रहे तो पानी कभी न सूखेगा। यदि एक बार सत्य मार्ग का अवलम्बन करके फिर उस ओर से उदासीन हो जाओ तो परिश्रम व्यर्थ चला जाएगा; किन्तु यदि उस पथ पर सदैव आरुढ़ रहो तो जीवन उसी तत्व से ओत-प्रोत हो जायेगा।
10. मानव योनी को क्रतुमय अर्थात कर्ममय माना गया हैं| इस लोक में जैसा भी कर्म किया जाता हैं, उसका फल जीवन सहित मृत्यु के पश्चात भी प्राप्त होता हैं|
11. ‘दुष्ट-पुरुष’ बल से उद्योग, बुद्धि के प्रयोग तथा पुरुषार्थ से धन भले ही प्राप कर ले; परंतु कुलीनता का आचरण और सदाचार प्राप्त करना सम्भव नहीं हैं।

12. फैसला लेते समय डरिए मत, याद रखिए गलत निर्णय भी अनिर्णय से लाख गुना बेहतर है। इसमें कुछ न करने के अपराधबोध से हम पूरी जिंदगी आजाद रहते हैं।
13. जिंदगी खूबसूरत नज़ारों से भरी, लेकिन खतरनाक मोड़ वाली घाटी है। इसमें अनेक खतरे हैं, तेज़ मोड़ हैं, कहीं-कहीं यह घुमावदार भी हैं; लेकिन अंतत: इस सफर में ही आनंद है। इसलिये कैसा भी दौर आएं, उसका सामना कीजिए। पीछे नहीं हटना, डरना नहीं। याद रखना “यह भी गुजर जाएगा”।

14. “रिस्ते” जिनसे जिन्दगी की साँस घुटने लगें, उनमें अटके रहना व्यर्थ हैं। कोई भी परम्परा का बंधन, जीवन से बड़ा नहीं होता। जिन्दगी पर किसी को भी भारी पड़ने मत दीजिये।
15. जिन्दगी की कला के सारे सूत्र केवल वर्तमान में सिमटे हैं। अगर हम आज को, सघन प्रसन्नता से जीना सीख सकें, तो अतीत और भविष्य दोनोँ सुखद हो जायेंगे।
16. अतीत की गलियों में बहुत अधिक भटकने के कारण हम वर्तमान से दूर होते जा रहे हैं। वर्तमान से दूर होने का अर्थ अतीत की घुटन और भविष्‍य से भटकाव है। अपने आपको वर्तमान मे केन्द्रित रखिये।
17. अगर आपके भीतर सत्‍यबोध है, तो केवल उस आवाज पर भरोसा करिये जो अंतर्मन से आए। दुनिया के नजरिए की चिंता मत करिए, बस अपने इरादे, चुनाव पर दृढ़ रहिए।
18. हमने सुख-दुख, जीवन के अनुभवों को विशेष मान लिया, जबकि यह जीवन के सामान्‍य राग हैं। इनमें कुछ भी विशेष नहीं। हमें इनका साक्षी बनकर जीवन जीना है, इनके चौकीदार बनकर नही।
19. सबसे बड़ी बीमारी, उदासी का कारण खुद को गंभीरता से लेना हैं। गंभीर-चुनौती भरे काम करने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि हमारा दिल एक इंच मुस्कान के लिए तरसता रह जाये।
20. सोशल मिडिया में मित्रता का दायरा विस्तार में कुछ गलत नहीं, लेकिन यह जिस कीमत पर हो रहा हैं, उस पर ध्यान देना होगा। हम इतने अधिक सोशल हो गए हैं कि समाज, परिवार सबके लिए “अ”सोशल होते जा रहे हैं, यह गलत हैं।

21. नींव=बुनियाद, जो सुंदर तो नहीं किन्तु मजबूत और पथरों की होती हैं। “बुनियाद” मजबूत हैं तो मकान भी जिंदगी अच्छी तरह जी लेगा और कमजोर हैं, तो पत्थर के भी मकान ढह जाएंगे। यह बात मानव जीवन से लेकर समाज और राष्ट्र पर भी लागू होती हैं।
22. मनुष्य के दोनों हाथ एक से हैं; किन्तु उनकी कार्य और शक्ति एक सी नहीं हैं, फिर भी उनमे सामंजस्य हैं। ऐसे ही सामंजस्य की अपेक्षा प्रकृति अपने मानव पुत्रों से रखती हैं।

23. संकट से जूझने पर आदमी, साहसी और समझदार हो जाता हैं।
24. “बुराई”, मनुष्य की आत्मा का बाह्य उपकरण है; वह इच्छा-शक्ति-द्वारा छिलके के समान उतार कर फेंका जा सकता है।
25. कष्ट और विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने वाले श्रेष्ठ गुण हैं। जो साहस के साथ उनका सामना करते हैं, वे विजयी होते हैं और समझदार बनते हैं।
26.
भले मुंह से न कहें पर अंदर से,
खोये आप भी हो, खोये हम भी हैं,
लाली आंखों की बताती हैं,
रोये आप भी ही, रोये हम भी हैं।

(पंजाबी कविता का हिंदी अनुवाद)

27. अजीब विडंबना हैं, विद्वान-विद्वान को देखकर, साधू-साधू को देखकर और कवि-कवि को देखकर जलता हैं, जबकि जुआरी-जुआरी को देखकर, शराबी-शराबी को देखकर और चोर-चोर को देखकर हर्षित होते हैं, और सहयोग करते हैं। बुराई से सब घृणा करते हैं इसलिए उनमें परस्पर प्रेम होता हैं. भलाई की सारा संसार प्रशंसा करता है, इसलिए भलों में विरोध होता हैं। बुराई को नहीं किन्तु उनके आपसी प्रेम और सहयोगी आचरण की सीख अपनाने के लिए भले लोगो को यह बुराई की चेतावनी हैं।
28. लक्ष्य प्राप्ति पर संतोष के साथ प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती हैं। 
29. विषमतायें चाहे जो भी हो, उससे उपजी हताशा के भंवर से जितनी जल्दी हो सकें निकल कर, अपने कर्मपथ पर अग्रसर हो जाना ही श्रेयष्कर होता हैं।
30. हर आरम्भ का अंत होता हैं, क्योकि अंत ही नव-सृजन की जननी कहीं गई हैं।
31. अपने हितकारी या शुभचिंतक की खोज बाहर करने में समय खराब करना हैं| इन्द्रिय निग्रह कर, स्वयं अपना हित, शुभ और कल्याण किया जा सकता हैं|
32. गुबरैला कीड़ा गोबर में ही रहना पसन्द करता है। कोई उसे अच्छे स्थान पर बिठा दे, तो भी वह उड़कर वहीं पहुँचेगा! दुष्ट मनुष्यों की सत्संग में रुचि नहीं होती, वे तो पाप कर्मों में ही खुश रहते हैं।

33. “स्मृति” आकाश से बड़ी हैं क्योकि “आकाश” में तो शब्द आता हैं और चला भी जाता हैं किन्तु स्मृति में आया शब्द स्मृति-पटल में स्थिर हो जाता हैं|
34. प्रकृति, समय और धैर्य ये तीन हर दर्द की दवा हैं।
35. सुख की यह संतुष्टि ही जीव को भ्रमित करती है। बार-बार संतुष्ट होना और फिर असंतुष्टि में घिरना एक ऐसे सतत् प्रवाह की तरह जीवन से जुड़ जाते हैं कि व्यक्ति को दुख में भी सुख का आभास होने लगता है। सुख में ही छिपकर बैठा होता है दुख। एक सिक्के के दो पहलू हैं ये। यह मोह या मूर्च्छा की स्थिति ही मनुष्य को आनंद से दूर ले जाती है।
36. भला बनने के लिये अधिक कुछ करने की आवश्यकता नहीं, केवल बुराई छोड़ दीजिये।
37. जो मनन नहीं करता, उसे कुछ भी समझ में नहीं आता| मनन करने से गूढ़ से गूढ़ रहस्य भी समझ में आ जाते हैं|
38. सुख, वैभव, ऐश्वर्य और कीर्ति सब लोग चाहते हैं, परन्तु तन-मन से परिश्रम किये बिना स्थायी रूप से इनमें से एक भी वस्तु प्राप्त नहीं हो सकती। आलस्य सुख का शत्रु और उद्यम आनन्द का सहचर है, जो इस तथ्य को भली भाँति जानकर सही दिशा में क्रियाशील होता हैं, उसे ही इनमे से कुछ मिलता हैं।
39. शिवजी को “विरुपाक्ष” भी कहा जाता हैं। यानी जिसका कोई आकार न हो, पर सब देखता हैं। वह जो देखता हैं और जो देखा जाता हैं, दोनों ही देखने की प्रक्रियां से प्रभावित हो जाते हैं। “तपो योगा गम्या”, जिनको तप और योग से जाना जा सकता हैं।
40. आत्मोत्थान की सिद्धि, कार्य क्षमता बढ़ाने की इच्छा, लोकप्रिय बनने की भावना तथा सफलता और मार्गदर्शन की महत्वाकांक्षा- यह सभी मनुष्य के चरित्र निर्माण में प्रभाव डालती हैं।
41. कैसी भी दुखदायक और विषम परिस्थिति क्यों न आ जाय, उत्साह, विश्वास की दृढ़ता और कर्मशीलता सदैव ही सहायक सिद्ध होती है।
42. किसी भी स्त्री का अपमान करना पाप है। ध्यान रखें कभी भी गर्भवती या मासिक धर्म के दौरान किसी महिला को बुरा बोलना, अपमान करना महापाप है। ये पाप करने वाले व्यक्ति को कभी भी सुख नहीं मिल पाता है।
43. दूसरों का धन पाने की इच्छा करना भी शास्त्रों के अनुसार पाप है।
44. किसी सीधे-साधे इंसान को या जीव को कष्ट देना, नुकसान पहुंचाना, उनके लिए बाधाएं पैदा करने की योजना बनाना भी पाप है।

45. अच्छा-बुरा, सही-गलत जानने और समझने के बाद भी गलत काम करना पाप है।

46. पराए स्त्री-पुरुष पर बुरी नजर रखना या उन्हें पाने की कोशिश करना या उनके बारे में गलत सोचना भी पाप है।
47. दूसरों के मान-सम्मान को नुकसान पहुंचने की नीयत से झूठ बोलना, छल-कपट करना, षड़यंत्र रचना पाप है।
48. मूर्खता और बुद्धिमता में मात्र एक ही अंतर होता हैं। बुद्धिमता की सीमा होती हैं और मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती।
49. छोटे बच्चों, महिलाओं या किसी भी कमजोर व्यक्ति या जीव के खिलाफ हिंसा करना, असामाजिक कर्म करना भी पाप है।
50. किसी मंदिर की चीजें चुराना या गलत तरीके से दूसरों की संपत्ति हथियाना भी पाप है।

51. गुरु, माता-पिता, पत्नी या पूर्वजों का अपमान करने वाले को शिवजी कभी क्षमा नहीं करते हैं।
52. नशा करना, दान की हुई चीजें या धन वापस लेना महापाप है। किसी भी प्रकार के अधर्म में भागीदार बनना पाप है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
द्वितीय स्कन्ध: प्रथम अध्यायः श्लोक 1-14 का हिन्दी अनुवाद

ध्यान-विधि और भगवान के विराट् स्वरूप का वर्णन.
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! तुम्हारा लोकहित के लिये किया हुआ यह प्रश्न बहुत ही उत्तम है। मनुष्यों के लिये जितनी भी बातें सुनने, स्मरण करने या कीर्तन करने की हैं, उन सब में यह श्रेष्ठ है। आत्मज्ञानी महापुरुष ऐसे प्रश्न का बड़ा आदर करते हैं। राजेन्द्र! जो गृहस्थ घर के काम-धंधों में उलझे हुए हैं, अपने स्वरूप को नहीं जानते, उनके लिये हजारों बातें कहने-सुनने एवं सोचने, करने की रहती हैं। उनकी सारी उम्र यों ही बीत जाती है। उनकी रात नींद या स्त्री-प्रसंग से कटती है और दिन धन की हाय-हाय या कुटुम्बियों के भरण-पोषण में समाप्त हो जाता है। संसार में जिन्हें अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है, वे शरीर, पुत्र, स्त्री आदि कुछ नहीं हैं, असत् हैं; परन्तु जीव उनके मोह में ऐसा पागल-सा हो जाता है कि रात-दिन उनको मृत्यु का ग्रास होते देखकर भी चेतता नहीं। इसलिये परीक्षित! जो अभय पद को प्राप्त करना चाहता है, उसे तो सर्वात्मा, सर्वशक्तिमान् भगवान श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिये। मनुष्य-जन्म का यही-इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे हो- ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से जीवन को ऐसा बना लिया जाये कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति अवश्य बनी रहे।

परीक्षित! जो निर्गुण स्वरूप में स्थित हैं एवं विधि-निषेध की मर्यादा को लाँघ चुके हैं, वे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी प्रायः भगवान के अनन्त कल्याणमय गुणगणों के वर्णन में रमे रहते हैं। द्वापर के अन्त में इस भगवदरूप अथवा वेदतुल्य श्रीमद्भागवत नाम के महापुराण का अपने पिता श्रीकृष्णद्वैपायन से मैंने अध्ययन किया था। राजर्षे! मेरी निर्गुणस्वरूप परमात्मा में पूर्ण निष्ठा है। फिर भी भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं ने बलात् मेरे हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। यही कारण है कि मैंने इस पुराण का अध्ययन किया। तुम भगवान के परम भक्त हो, इसलिये तुम्हें मैं इसे सुनाऊँगा। जो इसके प्रति श्रद्धा रखते हैं, उनकी शुद्ध चित्तवृत्ति भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेम के साथ बहुत शीघ्र लग जाती है।

जो लोग लोक या परलोक की किसी भी वस्तु की इच्छा रखते हैं या इसके विपरीत संसार में दुःख का अनुभव करके जो उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्ष पद को प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकों के लिये तथा योगसम्पन्न सिद्ध ज्ञानियों के लिये भी समस्त शास्त्रों का यही निर्णय है कि वे भगवान के नामों का प्रेम से संकीर्तन करें। अपने कल्याण-साधन की ओर से असावधान रहने वाले पुरुष की वर्षों लम्बी आयु भी अनजान में ही व्यर्थ बीत जाती है। उससे क्या लाभ। सावधानी से ज्ञानपूर्वक बितायी हुई घड़ी, दो घड़ी भी श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके द्वारा अपने कल्याण की चेष्टा तो की जा सकती है। राजर्षि खट्वांग अपनी आयु की समाप्ति का समय जानकर दो घड़ी में ही सब कुछ त्यागकर भगवान के अभयपद को प्राप्त हो गये।

परीक्षित! अभी तो तुम्हारे जीवन की अवधि सात दिन की है। इस बीच में ही तुम्हें अपने परम कल्याण के लिये जो कुछ करना चाहिये, सब कर लो।


क्रमश:


साभार krishnakosh.org

श्रीमद्भागवत महापुराण: प्रथम स्कन्धः एकोनविंश अध्यायः श्लोक 36-40 का हिन्दी अनुवाद


(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
प्रथम स्कन्धः एकोनविंश अध्यायः श्लोक 36-40 का हिन्दी अनुवाद

भगवान श्रीकृष्ण की कृपा न होती तो आप-सरीखे एकान्त वनवासी अव्यक्तगति परमसिद्ध पुरुष स्वयं पधारकर इस मृत्यु के समय हम-जैसे प्राकृत मनुष्यों को क्यों दर्शन देते।

आप योगियों के परम गुरु हैं, इसलिये मैं आपसे परमसिद्धि के स्वरूप और साधन के सम्बन्ध में प्रश्न कर रहा हूँ। जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिये?

भगवन्! साथ यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्र को क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण, किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें?

भगवत्स्वरूप मुनिवर! आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है; क्योंकि जितनी देर एक गाय दुही जाती है, गृहस्थों के घर पर उतनी देर भी तो आप नहीं ठहरते।

सूत जी कहते हैं- जब राजा ने बड़ी ही मधुर वाणी में इस प्रकार सम्भाषण एवं प्रश्न किये, तब समस्त धर्मों के मर्मज्ञ व्यासनन्दन भगवान श्रीशुकदेव जी उनका उत्तर देने लगे।


क्रमश:


साभार krishnakosh.org

विजया एकादशी.


विजया एकादशी.
             
हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत, महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिकमास या मलमास आता है, तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। विजया एकादशी अपने नामानुसार विजय प्रदान करने वाली है। शत्रुओं से जब घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो, उस विकट स्थिति में विजया नामक एकादशी, विजय दिलाती है। प्राचीन काल में कई राजे-महाराजे इस व्रत के प्रभाव से अपनी हार को जीत में बदल चुके हैं। इस महाव्रत के विषय में पद्म पुराण और स्कन्द पुराण मे अति सुन्दर वर्णन मिलता है।

व्रत कथा.

अर्जुन, भगवान श्री कृष्ण से एकादशी का महात्मय सुन कर आनन्द विभोर हो रहे हैं। जया एकादशी के महात्मय को जानने के बाद अर्जुन कहते हैं- माधव! फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महात्मय है? मैं जानना चाहता हूं, अत: कृपा करके इसके विषय में जो कथा है- वह सुनाएं।

अर्जुन द्वारा अनुनय पूर्वक प्रश्न किये जाने पर श्री कृष्णजी कहते हैं- प्रिय! अर्जुन, फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी, विजया एकादशी के नाम से जानी जाती है। इस एकादशी का व्रत करने वाला सदा विजयी रहता है। हे-अर्जुन, तुम मेरे प्रिय सखा हो, अत: मैं इस व्रत की कथा तुमसे कह रहा हूं, आज तक इस व्रत की कथा मैंने किसी को नहीं सुनाई। तुमसे पूर्व केवल देवर्षि नारद ही इस कथा को ब्रह्माजी से सुन पाए हैं। तुम मेरे प्रिय हो इसलिए तुम मुझसे यह कथा सुनो।

त्रेतायुग की बात है- श्री रामचन्द्रजी जो विष्णु के अंशावतार थे, अपनी पत्नी सीता को ढूंढते हुए सागर तट पर पहुंचे। सागर तट पर भगवान का परम भक्त जटायु नामक पक्षी रहता था। उस पक्षी ने बताया कि सीता माता को सागर पार लंका नगरी का राजा रावण ले गया है और माता इस समय आशोक वाटिका में हैं। जटायु द्वारा सीता का पता जानकर श्रीरामचन्द्रजी अपनी वानर सेना के साथ लंका पर आक्रमण की तैयारी करने लगे, परंतु सागर के जल जीवों से भरे दुर्गम मार्ग से होकर लंका पहुंचना प्रश्न बनकर खड़ा था।

भगवान श्रीराम इस अवतार में मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में दुनियां के समझ उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते थे; अत: आम मानव की भांति चिंतित हो गये। जब उन्हें सागर पार जाने का कोई मार्ग नहीं मिल रहा था, तब उन्होंने लक्ष्मण से पूछा कि हे लक्ष्मण इस सागर को पार करने का कोई उपाय मुझे सूझ नहीं रहा, अगर तुम्हारे पास कोई उपाय है, तो बताओ। श्री रामचन्द्रजी की बात सुनकर लक्ष्मण बोले प्रभु आपसे तो कोई भी बात छिपी नहीं है। आप स्वयं सर्वसामर्थवान है, फिर भी मैं कहूंगा कि यहां से आधा योजन दूर परम ज्ञानी वकदाल्भ्य मुनि का निवास हैं, हमें उनसे ही इसका हल पूछना चाहिए।

भगवान श्रीराम लक्ष्मण समेत वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम में पहुंचे और उन्हें प्रणाम करके, अपना प्रश्न उनके सामने रख दिया। मुनिवर ने कहा हे राम आप अपनी सेना समेत फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत रखें, इस एकादशी के व्रत से आप निश्चित ही समुद्र को पार कर रावण को पराजित कर देंगे। श्रीरामचन्द्रजी ने तब तिथि के आने पर अपनी सेना समेत मुनिवर के बताये विधान के अनुसार एकादशी का व्रत रखा और सागर पर पुल का निर्माण कर लंका पर चढ़ाई की। राम और रावण का युद्ध हुआ, जिसमें रावण मारा गया।

विधान.

हे! अर्जुन, विजया एकादशी की जो कथा है-वह, मैंने तुमसे कहा। अब इस व्रत का जो विधान है, वह तुम मुझसे सुनो। श्री रामचन्द्रजी ने जिस विधि से विजया एकादशी का व्रत किया, उसी विधि से विजया एकादशी का व्रत करना चाहिए। दशमी के दिन एक वेदी बनाकर उस पर सप्तधान रखें; फिर अपने सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण, रजत, ताम्बा अथवा मिट्टी का कलश बनाकर उस पर स्थापित करें। एकदशी के दिन उस कलश में पंचपल्लव रखकर श्री विष्णु की मूर्ति स्थापित करें और विधि सहित धूप, दीप, चंदन, फूल, फल एवं तुलसी से प्रभु का पूजन करें। व्रती पूरे दिन भगवान की कथा का पाठ एवं श्रवण करें और रात्रि मे कलश के सामने बैठकर जागरण करे। द्वादशी के दिन कलश को योग्य ब्राह्मण अथवा पंडित को दान कर दें।

महाशिवरात्रि.


महाशिवरात्रि.

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि पर्व मनाया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग (जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है) के उदय से हुआ। अधिक तर लोग यह मान्यता रखते है कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवि पार्वति के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

समुद्र मंथन. 

समुद्र-मंथन, अमर अमृत का उत्पादन करने के लिए निश्चित था, लेकिन इसके साथ ही कालकूट नामक विष भी पैदा हुआ। कालकूट विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव ही इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। जहर इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव अत्यधिक दर्द से पीड़ित हो गये थे और उनका गला बहुत नीला हो गया था। इस कारण से भगवान शिव 'नीलकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हैं। उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जागते रहने की सलाह दी। इस प्रकार, भगवान भगवान शिव के चिंतन में एक सतर्कता रखी। शिव का आनंद लेने और जागने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत बजाने लगे। जैसे सुबह हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते हैं, भगवान की महिमा गाते हैं और पूरी रात ध्यान करते हैं।

शिकारी की कथा.        

एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।'

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल-वृक्ष पर मचान बनाने लगा। बेल वृक्ष के नीचे शिवलिंग था, जो विल्वपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

मचान बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिन भर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।' शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी!' मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।

शिकारी हंसा और बोला, सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे। उत्तर में मृगी ने फिर कहा, जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान मांग रही हूं। हे पारधी! मेरा विश्वास कर, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं।

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में बेल-वृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हृष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला, हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया, उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञा बद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वास पात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।' उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गया। भगवान शिव की अनुकंपा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देवलोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहे थे। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प-वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए'।

शुभासित-51

शुभासित
1. एक आदमी जो विद्वान् है और भगवान् के सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्त्व को समझता है, किन्तु उपासना नहीं करता। दूसरा आदमी मूर्ख है, भगवान् के अवतार आदि का ध्यान करता है, तो उस विद्वान से यह मुर्ख श्रेष्ठ है।
2. जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है; वह कभी भी किसी का सहृदय नहीं हो सकता।

3. शास्त्रों का अध्ययन करना तथा उन बातों की, किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है; लेकिन किसी बकवासी से या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष, शास्त्र वचनों को कहना निषेध माना जाता है।

4. संशय, ”संदेह” को कहते हैं। यह मन और बुद्धि दोनों में ही रहता है। इन्द्रियों में ही इसका निवास है। यह कार्य को सफल नहीं होने देता और कर्तव्य में प्रवृति को रोकता हैं। इसके नाश का उपाय विवेक और विश्र्वास है।

5. मेहनत करने से दरिद्रता नहीं रहती। धर्म करने से पाप नहीं रहता। मौन रहने से कलह नहीं होती और जागते रहने से भय नहीं होता।

6. चिता से चिन्ता अधिक बलवती और भयानक मानी गई है; क्योंकि चिता तो मरे हुए को जलाती है परन्तु चिन्ता जीवित को हो जलाती रहती है। इसलिये चिंता-मुक्त होने का प्रयत्न करो।

7.हर अमावस्या को भोजन ग्रहण करने से पूर्व भोजन का कुछ भाग एवं जल अपने पितरो को जो अर्पित करता हैं। उसे अपने पितरों का आशीर्वाद जीवन में प्राप्त होता है।

8. ऐसी उलझन, जिसे स्वयं सुलझा न सकें, उत्पन्न नहीं करना चाहिये।

9. मनुष्य को वह काम करना चाहिये, जिसमें उसका हित हो, सबका हित हो, संसार का हित हो और परिणाम भी हितकारी हों।

10. “बन्धन” क्रिया से नहीं होता वरन आसक्ति और स्वार्थ से होता हैं।

11.साधक का उद्देश्य सीखने का नहीं बल्कि अनुभव करने का होना चाहिये। सीखे हुये ग्यान से वह विद्वान, वक्ता, लेखक तो हो सकता हैं, पर तत्वज्ञ, जीवनमुक्त, भगवत्प्रेमी नहीं हो सकता।

12. कोई बुरा करें तो बदले में उसका बुरा न चाहकर, यह समझो कि अपने ही दांतों से अपनी जीभ कट गई।

13. अपने भीतर दोष हों तभी कुसंग का असर पड़ता हैं; क्योकि आकर्षण सजातीय में होता हैं, विजातीय में नहीं।


14. प्रेमी की बात प्रेमी ही समझ सकता हैं, ग्यानी नहीं, फिर अग्यानी से तो आशा करना ही व्यर्थ हैं।

15. जिसका मन भगवान् में लगा रहता हैं, उसे सामान्य मनुष्य नहीं समझना चाहिये; क्योकि वह भगवान् के दरबार का सदस्य होता हैं।

16. दूसरों के प्रति बुरी-भावना रखने से, उसका बुरा होगा या नहीं, यह तो निश्चित नहीं हैं; पर यह निश्चित हैं कि उससेखुद का अंत:करण अवश्य मलीन हो जायेगा।

17. भलाई करने से सीमित भलाई होती हैं; पर बुराई छोड़ने से असीमित भलाई होती हैं।

18.मनुष्य का अंत:करण जितना मलिन होता हैं, उतना ही दोष, उसे दूसरों में दिखता हैं। रेडिओ तरंगों की तरह मलिन अंत:करण, मलिनता को ग्रहण करते हैं।

19. भोगी व्यक्ति तो कइयो का ॠणी होता हैं, परन्तु योगी किसी का भी ॠणी नहीं होता।

20.सत्संग, सदविचार, सद्शास्त्र और दुःख- ये विवेकी के लिए संसार से सम्बन्ध विच्छेद का कारण बनते हैं।

21. भोगों में जितनी आसक्ति होती हैं, बुद्धि में उतनी ही जड़ता आती हैं, इसी जड़ता के फलस्वरूप तात्विक बाते पढ़-सुनकर भी समझ में नहीं आती हैं|

22. भगवान “जगतगुरु” होते हुये भी, मनुष्य को कभी चेला नहीं बनाते, वरन “सखा” ही बनाते हैं।

23. जो हमसे कुछ भी चाहता हैं, वह हमारा गुरु कैसे हो सकता हैं?

24. तत्व ज्ञान अर्थात अज्ञानता का नाश, होता तो एक ही बार हैं; परन्तु जीवन पर्यंत साथ निभाता हैं।

25. बुद्धि के अनुसार मन और मन के अनुसार इन्द्रियाँ होने से उत्थान होता हैं; परन्तु इन्द्रियो के अनुसार मन और मन के अनुसार बुद्धि हो जाने से पतन होता हैं|

26. घर में रहने वाले सभी लोग, अपने को सेवक और दूसरों को सेव्य समझे तो पारिवारिक कलह उत्पन्न ही नहीं होगी।

27.भगवान् का भजन करते समय, संसार को याद नहीं करना चाहिये और संसार का काम करते समय भगवान् को भूलना नहीं चाहिये।

28. साधक को सत्य-तत्व का अनुयायी होना चाहिये, किसी व्यक्ति, सम्प्रदाय आदि का अनुयायी नहीं होना चाहिये।

29. ये सात चीजें संसार में कभी छुपती नहीं:-१- खैर,२- वैर, ३- खांसी,  ४- खुशी, ५- रीत, ६- प्रीति, और ७- मधपान। 
30.
घटना... सदैव अपूर्णता युक्त होती हैं।
कहानियाँ...सम्पूर्ण और अंत लिये होती हैं।
उदाहरण...कामयाबी और उपलब्धि युक्त होता हैं।
संयोग...आवश्यकता पर उपलब्धता युक्त होता हैं।

31. किसी भी साधना की पूर्णता होने पर जीने की इच्छा, मरने का भय, पाने का लालच और करने का राग-ये चारो मिट जाते हैं।


32. वर्ण, आश्रम आदि की जो व्यवस्था हैं, वह दुसरो की सेवा करने के लिए हैं, अभिमान करने के लिए नहीं हैं|

33. बाहर का प्रकाश तो सूर्य करता हैं; परन्तु भीतर का प्रकाश, संत-महात्मा करते हैं।

34. जिसमें, क्रूरता का अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम जैसे सतगुण होते हैं, वे सोच-विचारकर चुपचाप, बहुत से क्लेशों को सहन कर लेते हैं।

35. जो स्वयं दोषयुक्त वर्ताव करता हैं, दुसरों की निंदा करता हैं तथा जो असमर्थ होकर क्रोध करता हैं; वह मनुष्य महामूर्ख हैं।

36. जो अपने आश्रितों को छोडकर उत्तम भोजन करता और अच्छे वस्त्र पहनता हैं, उस व्यक्ति को क्रूर कहा गया हैं|

37. सब तीर्थों में स्नान और सब प्राणियों के साथ कोमलता का बर्ताव--दोनों को एक समान माना गया हैं; किन्तु कोमलता के वर्ताव को प्राथमिकता प्रदान हैं।

38. जिसका बलवान से विरोध हो, जिसका कुछ लुट गया हो, जो काम-वासना से ग्रस्त हो और जो चोर हो, उन्हें रात्रि में नींद नहीं आती|

39. दो प्रकार के पुरुष, सूर्य मण्डल को भेदकर उर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं:- १- योगयुक्त संयासी और २- संग्राम में लोहा लेते हुए मारा गया योध्दा।

40. बन्दूक से दागी गई गोली, संभव हैं किसी को मारे या न मारे, मगर राजनेताओं की कुव्यवस्था का प्रभाव सारे राष्ट्र का विनाश कर देती हैं।

41. दो ही अपने विपरीत कर्म के कारण शोभा नहीं पाते...१- अकर्मण्य गृहस्थ और २- प्रपंच में लगा हुआ सन्यासी।

42. दो प्रकार के व्यक्ति स्वर्ग से भी उपर स्थान पाते हैं...१- शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और २- निर्धन होने पर भी दान देनेवाला।

43. कपट पूर्वक व्यवहार करने वाले व्यक्ति का साथ “धर्म” उसी तरह छोड़ देता हैं, जैसे पंख निकल आने पर चिडियों के बच्चे घोंसला छोड़ देते हैं।

44. “देवता-वर्ग” चरवाहों की तरह डंडा लेकर पहरा नहीं देते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं; उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं और जिसे पराजय देना होता हैं, उसकी बुद्धि का हरण कर लेते हैं। बुध्दी की कमी ही सब उपद्रव की जड बनती हैं।

45. देवता, पितर, बुध्दिमान, सन्यासी, और अतिथि- इन पांचो का सत्कार करने वाला यशश्वी होता हैं।

46. शरीर, संसार, समय और सामग्री तो अपने आप छूट रहीं हैं; यह देखतें हुये-इनसे जो “मैं” और “अपनापन” जुड़ गया हैं, उसे हटा लीजिये। सिर्फ यही सार की बात हैं।

47. कुछ लोग गुण के धनी होते हैं और कुछ लोग धन के। जो धन के धनी होते हुये भी गुण के कंगाल होते हैं, उनसे दूर रहना चाहिये। 

48. व्यसनी, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस प्रकार के लोग धर्म को नहीं जानते-समझते। इनसे दूर रहे।

49. जितने भी विकार हैं, वे सब नाशवान वस्तु को महत्व देने से ही पैदा होते हैं।

50. दोषों की स्वन्त्रत सत्ता नहीं हैं। गुणों के आचरण में कमी का पर्याय ही दोष का कारण हैं।

51. “ठगने” में दोष हैं, ठगे जाने में कोई दोष नहीं हैं।