शिशुपाल वध.



शिशुपाल वध.

श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! अपने आसन पर बैठा हुआ शिशुपाल यह सब देख-सुन रहा था। भगवान श्रीकृष्ण के गुण सुनकर उसे क्रोध हो आया और वह उठकर खड़ा हो गया। वह भरी सभा में हाथ उठाकर बड़ी असहिष्णुता किन्तु निर्भयता के साथ भगवान को सुना-सुना कर अत्यन्त कठोर बातें कहने लगा-

"सभासदों! श्रुतियों का यह कहना सर्वथा सत्य है कि काल ही ईश्वर है। लाख चेष्टा करने पर भी वह अपना काम करा ही लेता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने देख लिया कि यहाँ बच्चों और मूर्खों की बात से बड़े-बड़े वयोवृद्ध और ज्ञानवृद्धों की बुद्धि भी चकरा गयी है। पर मैं मानता हूँ कि आप लोग अग्रपूजा के योग्य पात्र का निर्णय करने में सर्वथा समर्थ हैं। इसलिये सदसस्पतियों! आप लोग बालक सहदेव की यह बात ठीक न मानें कि ‘कृष्ण ही अग्रपूजा के योग्य हैं।' यहाँ बड़े-बड़े तपस्वी, विद्वान, व्रतधारी, ज्ञान के द्वारा अपने समस्त पाप-तापों को शान्त करने वाले, परम ज्ञानी परमर्षि, ब्रह्मनिष्ठ आदि उपस्थित हैं, जिनकी पूजा बड़े-बड़े लोकपाल भी करते हैं। यज्ञ की भूल-चूक बतलाने वाले उन सदसस्पतियों को छोड़कर यह कुलकलंक ग्वाला भला, अग्रपूजा का अधिकारी कैसे हो सकता है? क्या कौआ कभी यज्ञ के पुरोडाश का अधिकारी हो सकता है? न इसका कोई वर्ण है और न तो आश्रम। कुल भी इसका ऊँचा नहीं है। सारे धर्मों से यह बाहर है। वेद और लोकमर्यादाओं का उल्लंघन करके मनमाना आचरण करता है। इसमें कोई गुण भी नहीं है। ऐसी स्थिति में यह अग्रपूजा पात्र कैसे हो सकता है? आप लोग जानते हैं कि राजा ययाति ने इसके वंश को शाप दे रखा है। इसलिये सत्पुरुषों ने इस वंश का ही बहिष्कार कर दिया है। ये सर्वदा व्यर्थ मधुपान में आसक्त रहते हैं। फिर ये अग्रपूजा के योग्य कैसे हो सकते हैं? इन सबने ब्रह्मर्षियों के द्वारा सेवित मथुरा आदि देशों का परित्याग कर दिया और ब्रह्मवर्चस के विरोधी समुद्र में किला बनाकर रहने लगे। वहाँ से जब ये बाहर निकलते हैं तो डाकुओं की तरह सारी प्रजा को सताते हैं।'

परीक्षित! सच पूछो तो शिशुपाल का सारा शुभ नष्ट हो चुका था। इसी से उसने और भी बहुत-सी कड़ी-कड़ी बातें भगवान श्रीकृष्ण को सुनायीं। परन्तु जैसे सिंह कभी सियार की ‘हुआँ-हुआँ’ पर ध्यान नहीं देता, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण चुप रहे, उन्होंने उसकी बातों का कुछ भी उत्तर न दिया। परन्तु सभासदों के लिये भगवान की निन्दा सुनना असह्य था। उसमें से कई अपने-अपने कान बंद करके क्रोध से शिशुपाल को गाली देते हुए बाहर चले गये। परीक्षित! जो भगवान की या भगवत्परायण भक्तों की सुनकर वहाँ से हट नहीं जाता, वह शुभकर्मों से च्युत हो जाता है और उसकी अधोगति होती है।

परीक्षित! अब शिशुपाल को मार डालने के लिये पाण्डव, मत्स्य, केकय और सृंजयवंशी नरपति क्रोधित होकर हाथों में हथियार ले उठ खड़े हुए। परन्तु शिशुपाल को इससे कोई घबड़ाहट न हुई। उसने बिना किसी प्रकार का आगा-पीछा सोचे अपनी ढाल-तलवार उठा ली और वह भरी सभा में श्रीकृष्ण के पक्षपाती राजाओं को ललकारने लगा। उन लोगों को लड़ते-झगड़ते देख भगवान श्रीकृष्ण उठ खड़े हुए। उन्होंने अपने पक्षपाती राजाओं को शान्त किया और स्वयं क्रोध करके अपने ऊपर झपटते हुए शिशुपाल का सिर छुरे के समान तीखी धारवाले सुदर्शन चक्र से काट लिया। शिशुपाल के मारे जाने पर वहाँ बड़ा कोलाहल मच गया। उसके अनुयायी नरपति अपने-अपने प्राण बचाने के लिये वहाँ से भाग खड़े हुए। जैसे आकाश से गिरा हुआ लूक धरती में समा जाता है, वैसे ही सब प्राणियों के देखते-देखते शिशुपाल के शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्रीकृष्ण में समा गयी।

परीक्षित! शिशुपाल के अन्तःकरण में लगातार तीन जन्म से वैर भाव की अभिवृद्धि हो रही थी और इस प्रकार, वैरभाव से ही सही, ध्यान करते-करते वह तन्मय हो गया-पार्षद हो गया। सच है, मृत्यु के बाद होने वाली गति में भाव ही कारण है। शिशुपाल की सद्गति होने के बाद चक्रवर्ती धर्मराज युधिष्ठिर ने सदस्यों और ऋत्विजों को पुष्कल दक्षिणा दी तथा सबका सत्कार करके विधिपूर्वक यज्ञान्त-स्नान-अवभृथ-स्नान किया। परीक्षित! इस प्रकार योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ पूर्ण किया और अपने सगे-सम्बन्धी और सुहृदों की प्रार्थना से कुछ महीनों तक वहीं रहे। इसके बाद राजा युधिष्ठिर की इच्छा न होने पर भी सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे अनुमति ले ली और अपनी रानियों तथा मन्त्रियों के साथ इन्द्रप्रस्थ से द्वारकापुरी की यात्रा की।

परीक्षित! मैं यह उपाख्यान तुम्हें बहुत विस्तार से सुना चुका हूँ कि बैकुण्ठवासी जय और विजय को सनकादि ऋषियों के शाप से बार-बार जन्म लेना पड़ा था। महाराज युधिष्ठिर राजसूय का यज्ञान्त-स्नान करके ब्राह्मण और क्षत्रियों की सभा में देवराज इन्द्र के समान शोभायमान होने लगे। राजा युद्धिष्ठिर ने देवता, मनुष्य और आकाशचारियों का यथायोग्य सत्कार किया तथा वे भगवान श्रीकृष्ण एवं राजसूय यज्ञ की प्रशंसा करते हुए बड़े आनन्द से अपने-अपने लोकों को चले गये। परीक्षित! सब तो सुखी हुए, परन्तु दुर्योधन से पाण्डवों की यह उज्ज्वल राज्यलक्ष्मी का उत्कर्ष सहन न हुआ। क्योंकि वह स्वभाव से ही पापी, कलहप्रेमी और कुरुकुल का नाश करने के लिये एक महान् रोग था। परीक्षित! जो पुरुष भगवान श्रीकृष्ण की इस लीला- शिशुपाल वध, जरासंध वध, बंदी राजाओं की मुक्ति और यज्ञानुष्ठान का कीर्तन करेगा, वह समस्त पापों से छूट जायगा।

(श्रीमद्भागवत महापुराण)

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