कृष्ण जरासंध युद्ध.
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "भरतवंश-शिरोमणि परीक्षित! कंस की दो रानियाँ थीं- 'अस्ति' और 'प्राप्ति'। पति की मृत्यु से उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे अपने पिता की राजधानी में चली गयीं। उन दोनों का पिता था, मगधराज जरासंध। उससे उन्होंने बड़े दुःख के साथ अपने विधवा होने के कारणों का वर्णन किया। परीक्षित! यह अप्रिय समाचार सुनकर पहले तो जरासंध को बड़ा शोक हुआ, परन्तु पीछे वह क्रोध से तिलमिला उठा। उसने यह निश्चय करके कि मैं पृथ्वी पर एक भी यदुवंशी नहीं रहने दूँगा, युद्ध की बहुत बड़ी तैयारी की और तेईस अक्षौहिणी सेना के साथ यदुवंशियों की राजधानी मथुरा को चारों ओर से घेर लिया।
भगवान श्रीकृष्ण ने देखा, जरासंध की सेना क्या है, उमड़ता हुआ समुद्र है। उन्होंने यह भी देखा कि उसने चारों ओर से हमारी राजधानी घेर ली है और हमारे स्वजन तथा पुरवासी भयभीत हो रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी का भार उतारने के लिये ही मनुष्य-सा वेष धारण किये हुए हैं। अब उन्होंने विचार किया कि मेरे अवतार का क्या प्रयोजन है और इस समय इस स्थान पर मुझे क्या करना चाहिये। उन्होंने सोचा यह बड़ा अच्छा हुआ कि मगधराज जरासंध ने अपने अधीनस्थ नरपतियों की पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियों से युक्त हुई अक्षौहिणी सेना इकट्ठी कर ली है। यह सब तो पृथ्वी का भार ही जुडकर मेरे पास आ पहुँचा है। मैं इसका नाश करूँगा। परन्तु अभी मगधराज जरासंध को नहीं मारना चाहिये। क्योंकि वह जीवित रहेगा तो फिर से असुरों की बहुत-सी सेना इकट्ठी कर लायेगा। मेरे अवतार का यही प्रयोजन है कि मैं पृथ्वी का बोझ हलका कर दूँ, साधु-सज्जनों की रक्षा करूँ और दुष्ट-दुर्जनों का संहार। समय-समय पर धर्म-रक्षा के लिये और बढ़ते हुए अधर्म को रोकने के लिये मैं और भी अनेकों शरीर ग्रहण करता हूँ।
परीक्षित! भगवान श्रीकृष्ण इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि आकाश से सूर्य के समान चमकते हुए दो रथ आ पहुँचे। उनमें युद्ध की सारी सामग्रियाँ सुसज्जित थीं और दो सारथि उन्हें हाँक रहे थे। इसी समय भगवान के दिव्य और सनातन आयुध भी अपने-आप वहाँ आकर उपस्थित हो गये। उन्हें देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलरामजी से कहा- "भाईजी! आप बड़े शक्तिशाली हैं। इस समय जो यदुवंशी आपको ही अपना स्वामी और रक्षक मानते हैं, जो आपसे ही सनाथ हैं, उन पर बहुत बड़ी विपत्ति आ पड़ी है। देखिये, यह आपका रथ है और आपके प्यारे आयुध हल-मूसल भी आ पहुँचे हैं। अब आप इस रथ पर सवार होकर शत्रु-सेना का संहार कीजिये और अपने स्वजनों को इस विपत्ति से बचाइये। भगवन! साधुओं का कल्याण करने के लिये ही हम दोनों ने अवतार ग्रहण किया हैं। अतः अब आप यह तेईस अक्षौहिणी सेना, पृथ्वी का यह विपुल भार नष्ट कीजिये।" भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने यह सलाह करके कवच धारण किये और रथ पर सवार होकर वे मथुरा से निकले। उस समय दोनों भाई अपने-अपने आयुध लिये हुए थे और छोटी-सी सेना उनके साथ-साथ चल रही थी। श्रीकृष्ण का रथ हाँक रहा था दारुक। पुरी से बाहर निकलकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया।
उनके शंख की भयंकर ध्वनि सुनकर शत्रुपक्ष की सेना के वीरों का हृदय डर के मारे थर्रा उठा। उन्हें देखकर मगधराज जरासंध ने कहा- "पुरुषधाम श्रीकृष्ण! तू तो अभी निरा बच्चा है। अकेले तेरे साथ लड़ने में मुझे लाज लग रही है। इतने दिनों तक तू न जाने कहाँ-कहाँ छिपा फिरता था। मन्द! तू तो अपने मामा का हत्यारा है। इसलिये मैं तेरे साथ नहीं लड़ सकता। जा, मेरे सामने से भाग जा। बलराम! यदि तेरे चित्त में यह श्रद्धा हो कि युद्ध में मरने पर स्वर्ग मिलता है तो तू आ, हिम्मत बाँधकर मुझसे लड़। मेरे बाणों से छिन्न-भिन्न हुए शरीर को यहाँ छोड़कर स्वर्ग में जा अथवा यदि तुझमें शक्ति हो तो मुझे मार डाल।"
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- "मगधराज! जो शूरवीर होते हैं, वे तुम्हारी तरह डींगे नहीं हाँकते, वे तो अपना बल-पौरुष ही दिखलाते हैं। देखो, अब तुम्हारी मृत्यु तुम्हारे सिर पर नाच रही है। तुम वैसे ही अक बक कर रह हो, जैसे मरने के समय कोई सन्निपात का रोगी करे। बक लो, मैं तुम्हारी बात पर ध्यान नहीं देता।"
श्रीशुकदेवजी कहते हैं- "परीक्षित! जैसे वायु बादलों से सूर्य को और धुएँ से आग को ढक लेती है, किन्तु वास्तव में वे ढकते नहीं, उनका प्रकाश फिर फैलता ही है; वैसे ही मगधराज जरासंध ने भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के सामने आकर अपनी बहुत बड़ी बलवान और अपार सेना के द्वारा उन्हें चारों ओर से घेर लिया, यहाँ तक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों और सारथियों का दिखना भी बंद हो गया। मथुरापुरी की स्त्रियाँ और महलों की अटारियों, छज्जों और फाटकों पर चढ़कर युद्ध का कौतुक देख रही थीं। जब उन्होंने देखा कि युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण की गरुड़चिन्ह से चिन्हित और बलरामजी की तालचिन्ह से चिन्हित ध्वजावाले रथ नहीं दीख रहे हैं, तब वे शोक के आवेग से मूर्च्छित हो गयीं। जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि शत्रु-सेना के वीर हमारी सेना पर इस प्रकार बाणों की वर्षा कर रहे हैं, मानो बादल पानी की अनगिनत बूँदें बरसा रहे हों और हमारी सेना उससे अत्यन्त पीड़ित, व्यथित हो रही है; तब उन्होंने अपने देवता और असुर-दोनों से सम्मानित सारंगधनुष का टंकार किया। इसके बाद वे तरकस में से बाण निकालने, उन्हें धनुष पर चढ़ाने और धनुष की डोरी खींचकर झुंड-के-झुंड बाण छोड़ने लगे। उस समय उनका वह धनुष इतनी फुर्ती से घूम रहा था, मानो कोई बड़े वेग से अलातचक्र (लुकारी) घुमा रहा हो। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण जरासंध की चतुरंगिणी-हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सेना का संहार करने लगे। इससे बहुत-से हाथियों के सिर फट गये और वे मर-मरकर गिरने लगे। बाणों की बौछार से अनेकों घोड़ो के सिर धड़ से अलग हो गये। घोड़े, ध्वजा, सारथि और रथियों के नष्ट हो जाने से बहुत-से रथ बेकाम हो गये। पैदल सेना की बाँहें, जाँघ और सिर आदि अंग-प्रत्यंग कट-कटकर गिर पड़े।
उस युद्ध में अपार तेजस्वी भगवान बलरामजी ने अपने मूसल की चोट से बहुत-से मतवाले शत्रुओं को मार-मारकर उनके अंग-प्रत्यंग से निकले हुए खून की सैकड़ों नदियाँ बहा दीं। कहीं मनुष्य कट रहे हैं तो कहीं हाथी और घोड़े छटपटा रहे हैं। उस नदियों में मनुष्यों की भुजाएँ साँप के समान जान पड़तीं और सिर इस प्रकार मालूम पड़ते, मानो कछुओं की भीड़ लग गयी हो। मरे हुए हाथी दीप-जैसे और घोड़े ग्राहों के समान जान पड़ते। हाथ और जाँघें मछलियों की तरह, मनुष्यों के केश सेवार के समान, धनुष तरंगों की भाँति और अस्त्र-शस्त्र लता एवं तिनकों के समान जान पड़ते। ढालें ऐसी मालूम पड़तीं, मानो भयानक भँवर हों। बहुमूल्य मणियाँ और आभूषण पत्थर के रोड़ों तथा कंकडों के समान बहे जा रहे थे। उन नदियों को देखकर कायर पुरुष डर रहे थे और वीरों का आपस में खूब उत्साह बढ़ रहा था। परीक्षित! जरासंध की वह सेना समुद्र के समान दुर्गम, भयावह और बड़ी कठिनाई से जीतने योग्य थी। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण और बलरामजी ने थोड़े ही समय में उसे नष्ट कर डाला। वे सारे जगत् के स्वामी हैं। उनके लिये एक सेना का नाश कर देना केवल खिलवाड़ ही तो है।
परीक्षित! भगवान के गुण अनन्त हैं। वे खेल-खेल में ही तीनों लोकों की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है कि वे शत्रुओं की सेना का इस प्रकार बात-की-बात में सत्यानाश कर दें। तथापि जब वे मनुष्य-सा वेष धारण करके मनुष्य-सी लीला करते हैं, तब उसका भी वर्णन किया ही जाता है। इस प्रकार जरासंध की सारी सेना मारी गयी। रथ भी टूट गया। शरीर में केवल प्राण बाकी रहे। तब भगवान श्रीबलरामजी ने जैसे एक सिंह दूसरे सिंह को पकड़ लेता है, वैसे ही बलपूर्वक महाबली जरासंध को पकड़ लिया। जरासंध ने पहले बहुत-से विपक्षी नरपतियों का वध किया था, परन्तु आज उसे बलरामजी वरुण की फाँसी और मनुष्यों के फंदे से बाँध रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण ने यह सोचकर कि यह छोड़ दिया जायगा तो और भी सेना इकट्ठी करके लायेगा तथा हम सहज ही पृथ्वी का भार उतार सकेंगे, बलरामजी को रोक दिया। बड़े-बड़े शूरवीर जरासंध का सम्मान करते थे। इसलिये उसे इस बात पर बड़ी लज्जा मालूम हुई कि मुझे श्रीकृष्ण और बलराम ने दया करके दीन की भाँति छोड़ दिया है। अब उसने तपस्या करने का निश्चय किया। परन्तु रास्ते में उसके साथी नरपतियों ने बहुत समझाया कि "राजन! यदुवंशियों में क्या रखा है? वे आपको बिलकुल ही पराजित नहीं कर सकते थे। आपको प्रारब्धवश ही नीचा देखना पड़ा है।" उन लोगों ने भगवान की इच्छा, फिर विजय प्राप्त करने की आशा आदि बतलाकर तथा लौकिक दृष्टान्त एवं युक्तियाँ दे-देकर यह बात समझा दी कि आपको तपस्या नहीं करनी चाहिये। परीक्षित! उस समय मगधराज जरासंध की सारी सेना मर चुकी थी। भगवान बलरामजी ने उपेक्षापूर्वक उसे छोड़ दिया था, इससे वह बहुत उदास होकर अपने देश मगध को चला गया।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें