अद्वेत और द्वेत्वाद..



अद्वेत और द्वेत्वाद..

अद्वेत और द्वेत्वाद वाद पर  विवाद होता रहता है |   जो मानते भी हैं कि ईश्वर हैं – वे भी दो तरह के हैं | एक वे जो मानते हैं कि ईश्वर और हम “जीवात्माएं” अलग हैं|  दूसरे मानते हैं कि  “अहम् ब्रह्मास्मि”  अर्थात – जब मैं अपने ज्ञान पर पड़े परदे से मुक्त हो जाऊंगा – तब मैं  “ब्रह्म” हो जाऊंगा |  इस परिपेक्ष्य में एक कथानक सुनने में आता हैं|

 लंका  विजयी  कर , सीताजी सहित  श्री रामचन्द्रजी  अयोध्या पहुंचे , तब अयोध्या में  विशाल भोज का आयोजन हुआ | जिसमें वानर सेना के सभी लोग भी आमंत्रित थे|   सब तो वानर ही थे, इसलिए  सुग्रीवजी ने उन सब को खूब समझाया – देखो – यहाँ हम मेहमान हैं और प्रभु के गाँव के लोग हमारे मेजबान | तुम सब यहाँ खूब अच्छे से पेश आना – हम वानर जाती वालों को लोग शिष्टाचार विहीन न समझें, इस बात का ध्यान रखना |

वानर भी अपनी जाती का मान रखने के लिए तत्पर थे, किन्तु एक वानर आगे आया और हाथ जोड़ कर श्री सुग्रीवजी  से कहने लगा ” प्रभो – हम प्रयास तो करेंगे कि अपना आचार-व्यवहार अच्छा रखें, किन्तु हैं तो   बन्दर ही, कहीं भूल चूक भी हो सकती है – तो अयोध्या-वासियों के आगे हमारी अच्छी छवि रहे – इसके लिए मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप किसी को हमारा अगुवा बना दें, जो न सिर्फ हमें मार्गदर्शन देता रहे, बल्कि हमारे बैठने आदि का प्रबंध भी सुचारू रूप से चलाये, कि कही किसी चीज़ के लिए वानर आपस में  भिड़ने लगें तब, वह नियंत्रण करता रहे|"

वानरों में सबसे ज्ञानी, व श्रीराम के सर्वप्रिय तो हनुमान ही माने जाते थे – तो यह जिम्मेदारी भी उन पर रख दी गई |

भोज के दिन श्री हनुमानजी,  सब बानरो के  बैठने  की व्यवस्था कर , सबको अच्छी तरह से समझाने के बाद  श्रीराम के समीप पहुंचे|   श्रीरामजी ने  प्रेम-पूर्वक, हनुमानजी से कहा  कि तुम भी मेरे साथ ही बैठ कर भोजन करो | अब हनुमानजी  द्विविधा  में आ गए | उनकी योजना में प्रभु के बराबर बैठना तो था ही नहीं – वे तो अपने प्रभु के जीमने के बाद ही प्रसाद के रूप में भोजन ग्रहण करने के आदि थे | 

न तो उनके लिए बैठने की जगह ही थी ना ही केले का पत्ता (अपने हिंदी भाषी साथियों को बताना चाहूंगी – जैसे उत्तर भारत में पत्तलों में भोज परोसे जाने का रिवाज़ है – उसी तरह यहाँ केले के पत्तों में भोजन परोसा जाता है उत्सवों में और भोजों में |)

हनुमान बेचारे पशोपेश में थे – न ही  प्रभु की आज्ञा टाली  जा सकती हैं और  न उनके साथ भोजन ग्रहण किया जा सकता हैं | किन्तु प्रभु  श्रीरामजी ने अपने बाजु से हनुमानजी के लिए स्थान बनवा दिया और भोज हेतु एक केले का पत्ता  (उस समय केले के पत्ते में भोज्य पदार्थ रखे जाते थे, जिसे आज की भाषा में पत्तल कहते हैं), दोनों के मध्य रखवा दिया| 

  प्रभु ने कहा ” हनुमानजी, मेरे प्रिय भाई भरत के सदृश्य हैं, इसलिए मेरे साथ एक ही पत्ते में भोजन करेंगे|" ...................(अद्वेतवाद )

 इस पर हनुमान जी बोले – “हे प्रभु – आप मुझे कितना ही अपने बराबर बताएं, मैं कभी आप नहीं होऊँगा, न तो कभी हो सकता हूँ – और न ही होने की अभिलाषा है |– मैं सदा सर्वदा से आपका सेवक हूँ, और रहूँगा – आपके चरणों में ही मेरा स्थान था – और रहेगा | इसलिए एक ही पत्ते में  आपके साथ भोजन ग्रहण करने का  प्रश्न ही नहीं उठता|....... (यह है द्वैतवाद)

अब श्रीराम प्रभु ने  अपने सीधे हाथ की मध्यमा अंगुली से  केले के पत्ते के मध्य में एक रेखा खींच दी – जिससे वह पत्ता एक भी रहा और दो भी हो गया | एक भाग में प्रभु ने भोजन किया -और दूसरे अर्ध में हनुमान को कराया |

जीवात्मा और परमात्मा के ऐक्य और द्वैत,  दोनों के चिन्ह के रूप में केले के पत्ते में आज भी मध्य भाग में एक विभाजित रेखा हैं| पत्ता एक होते हुए भी दो भागों में हैं – और दो होते हुए भी एक हैं|

अद्वेतवाद और द्वेत्वाद को स्पष्ट करती यह स्तिथि कोई कहानी नहीं हैं बल्कि समझने का एक तरीका हैं|

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