कविता- जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, उस-उस राही को धन्यवाद.


जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
उस-उस राही को धन्यवाद.

(शिवमंगल सिंह 'सुमन')


जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
 उस-उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही,
 हो जाता पथ पर मेल कहीं,

सीमित पग डग, लम्बी मंज़िल, 
तय कर लेना कुछ खेल नहीं।

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते, 
सम्मुख चलता पथ का प्रसाद --

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,
 उस-उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया, 
जब चलते-चलते चूर हुई,

दो स्नेह-शब्द मिल गये, 
मिली नव स्फूर्ति, थकावट दूर हुई।

पथ के पहचाने छूट गये, 
पर साथ-साथ चल रही याद --

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, 
उस-उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाये, 
उनसे कब सूनी हुई डगर?

मैं भी न चलूँ यदि तो क्या, 
राही मर लेकिन राह अमर।

इस पथ पर वे ही चलते हैं, 
जो चलने का पा गये स्वाद --

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, 
उस-उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि 
न मिला होता मुझको आकुल अंतर?

कैसे चल पाता यदि मिलते, 
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका, 
दे गये व्यथा का जो प्रसाद --

जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला, 
उस-उस राही को धन्यवाद।

कविता...विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸



विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸

(मैथलीशरण गुप्त)

विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸

विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी¸
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।

सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

"मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
  
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में
अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

ऋषि अत्री.


ऋषि अत्री.

ऋषि अत्रि, ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, जो ब्रह्मा जी के नेत्रों से उत्पन्न हुए थे. यह सोम के पिता थे, जो इनके नेत्र से आविर्भूत हुए. इन्होंने कर्दम ऋषि की पुत्री अनुसूया से विवाह किया था, जो महान पतिव्रता के रूप में विख्यात हुईं हैं. पुत्रोत्पत्ति के लिए इन्होंने ऋक्ष पर्वत पर पत्नी अनुसूया के साथ घोर तप किया था जिस कारण इन्हें त्रिमूर्तियों की प्राप्ति हुई, जिनसे त्रिदेवों के अशं रूप में दत्त (विष्णु) दुर्वासा (शिव) और सोम (ब्रह्मा) उत्पन्न हुए.

कथा

ऋषि अत्री और माता अनुसूइया अपने दाम्पत्य जीवन को बहुत सहज भाव से व्यतीत कर रहे थे. देवी अनुसूइया जी की पतिव्रतता के आगे सभी नतमस्तक थे. इनके जीवन को देखकर देवता भी प्रसन्न होते थे. एक बार देवी लक्ष्मी, पार्वती और सरस्वती को ऋषि अत्रि की पत्नि अनुसूइया के दिव्य पतिव्रत के बारे में ज्ञात होता है, तो उनकी परीक्षा लेने का विचार करती हैं और तीनों देवियां अपने पतियों यथा विष्णु,, शंकर व ब्रह्मा को अनुसूइया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने को कहती हैं.

विवश होकर त्रिदेव अपना रूप बदलकर एक साधू रूप में ऋषि अत्रि के आश्रम में आते हैं और अनुसूइया से भोजन की मांग सशर्त करते हैं कि भोजन निर्वस्त्र होकर कराना पड़ेगा. इस पर देवी अनुसूइया धर्मसंकट आ जातीं हैं. यदि याचक साधुओं को भोजन न दिया धर्माचरण के विरुद्ध होगा और भोजन करने पर शर्त के पालन से पतिव्रत का अपमान होता है. मन में विचार आता हैं कि बालक रूप में ही वह ऐसा कर सकती हैं, तब हाथ में जल लेकर संकल्प द्वारा वह तीनों साधुओं को शिशु रूप में परिवर्तित कर भोजन करती हैं.

इस प्रकार तीनों देवता ऋषी अत्रि के आश्रम में बालक रूप में रहने लगते हैं और देवी अनसूइया उनकी माँ के समान देखभाल करती हैं. कुछ समय पश्चात जब त्रिदेवियों को इस बात का बोध होता है तो वह अपने पतियों को पुन: प्राप्त करने हेतु ऋषि अत्रि के आश्रम में आतीं हैं और अपनी भूल के लिए क्षमा याचना करती हैं.

इस तरह से ऋषि अत्री के कहने पर माता अनुसूइया त्रिदेवों को मुक्त करती हैं. अपने स्वरूप में आने पर तीनों देव, ऋषि अत्रि व माता अनुसूइया को वरदान देते हैं कि वह कालान्तर में उनके घर पुत्र रूप में जन्म लेंगे, इसीलिए त्रिदेवों के अशं रूप में दत्तात्रेय , दुर्वासा और सोम रुप में उत्पन्न हुए थे.

वैदिक मन्त्रद्रष्टा.

महर्षि अत्रि वैदिक मन्त्रद्रष्टा ऋषि माने गए हैं. अनेक धार्मिक ग्रंथों में इनके आविर्भाव तथा चरित्र का सुन्दर वर्णन किया गया है. महर्षि अत्रि को ज्ञान, तपस्या, सदाचार, भक्ति एवं मन्त्रशक्ति के ज्ञाता रूप में व्यक्त किया जाता है.

ऋषि अत्रि और श्री राम.

भगवान श्री राम अपने भक्त महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया की भक्ति को सफल करने के लिए स्वयं उनके आश्रम पर पधारते हैं और माता अनुसूइया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था. उन्हें दिव्य वस्त्र एवं आभूषण भी प्रदान किया था. महर्षि अत्रि तीनों गुणों सत्त्व, रज, तम से से परे थे, अर्थात गुणातीत थे. महर्षि अत्रि सदाचार का जीवन व्यतीत करते हुए चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे.


ऋषि अत्रि जीवन वृतांत.

ऋषि अत्रि को अश्विनीकुमारों की कृपा प्राप्त थी. इस पर एक कथा भी प्राप्त होती है कि एक बार जब महर्षि अत्रि समाधिस्थ थे, तब दैत्यों ने इन्हें उठाकर शतद्वार यन्त्र में डाल कर जलाने का प्रयत्न करते हैं परंतु समाधी में होने के कारण इन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता तभी उचित समय पर अश्विनीकुमार वहाँ पहुँचकर ऋषि अत्रि को उन दैत्यों के चंगुल से बचाते हैं. यही कथा ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में भी बताई गई है. ऋग्वेद के दशम मण्डल में महर्षि अत्रि के तपस्या अनुष्ठान का वर्णन है एवं अश्विनीकुमारों ने इन्हें यौवन प्रदान किया, इस तथ्य को व्यक्त किया गया है.

ऋग्वेद के पंचम मण्डल में वसूयु, सप्तवध्रि नामक अनेक पुत्रों को ऋषि अत्रि के पुत्र कहा गया है. ऋग्वेद के पंचम ‘आत्रेय मण्डल′, ‘कल्याण सूक्त’ ऋग्वेदीय ‘स्वस्ति-सूक्त’ महर्षि अत्रि द्वारा रचित हैं. यह सूक्त मांगलिक कार्यों, शुभ संस्कारों तथा पूजा, अनुष्ठानों में पठित होते हैं. इन्होंने अलर्क, प्रह्लाद आदि को शिक्षा भी दी थी.

एकलव्य का वध श्रीकृष्ण ने किया.

            एकलव्य का वध
     श्रीकृष्ण ने किया.

महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी। निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी।

निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी। राजा, राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था। निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम “अभिद्युम्न” रखा गया। प्राय: लोग उसे “अभय” नाम से बुलाते थे। पाँच वर्ष की आयु मेँ अभय के शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई।

बालपन से ही अस्त्र शस्त्र विद्या मेँ बालक की लगन और एकनिष्ठता को देखते हुए गुरू ने इस (अभय) बालक का नाम “एकलव्य” संबोधित किया। एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दिया। एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी। पर वे केवल ब्राह्मण तथा क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और शूद्रोँ को शिक्षा देने के कट्टर विरोधी थे। महाराज हिरण्यधनु ने एकलव्य को काफी समझाया कि द्रोण तुम्हे शिक्षा नहीँ देँगे। पर एकलव्य ने पिता को मनाया कि उनकी शस्त्र विद्या से प्रभावित होकर आचार्य द्रोण स्वयं उसे अपना शिष्य बना लेँगे। पर एकलव्य का सोचना सही न था – द्रोण ने दुत्तकार कर उसे से भगा दिया।

एकलव्य हार मानने वालोँ मेँ से न था और बिना शस्त्र शिक्षा प्राप्त किये, वह घर वापस लौटना नहीँ चाहता था। इसलिए एकलव्य ने वन मेँ आचार्य द्रोण की एक प्रतिमा बनायी और धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। शीघ्र ही उसने धनुर्विद्या मेँ निपुणता प्राप्त कर ली। एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्योँ और एक कुत्ते के साथ उसी वन मेँ आए। उस समय एकलव्य धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहे थे। कुत्ता एकलव्य को देख भौकने लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी अतः उसने अपने बाणों से कुत्ते का मुँह बंद कर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी। कुत्ता द्रोण के पास भागा। द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देख आश्चर्य मेँ पड़ गए। वे उस महान धुनर्धर की खोज मेँ लग गए अचानक उन्हे एकलव्य दिखाई दिया, जिस धनुर्विद्या को वे केवल क्षत्रिय और ब्राह्मणोँ तक सीमित रखना चाहते थे उसे शूद्रोँ के हाथोँ मेँ जाता देख उन्हेँ चिँता होने लगी। तभी उन्हे अर्जुन को संसार का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के वचन की याद आयी। द्रोण ने एकलव्य से पूछा- तुमने यह धनुर्विद्या किससे सीखी? एकलव्य- आपसे आचार्य, एकलव्य ने द्रोण की मिट्टी की बनी प्रतिमा की ओर इशारा किया। द्रोण ने एकलव्य से गुरू दक्षिणा मेँ एकलव्य के दाएँ हाथ का अगूंठा मांगा एकलव्य ने अपना अगूंठा काट कर गुरु द्रोण को अर्पित कर दिया।

कुमार एकलव्य अंगुष्ठ बलिदान के बाद पिता हिरण्यधनु के पास चला आया। एकलव्य अपने साधनापूर्ण कौशल से बिना अंगूठे के धनुर्विद्या मेँ पुन: दक्षता प्राप्त कर लेता है। आज के युग मेँ आयोजित होने वाली सभी तीरंदाजी प्रतियोगिताओँ मेँ अंगूठे का प्रयोग नहीँ होता है, अत: एकलव्य को आधुनिक तीरंदाजी का जनक कहना उचित होगा।

पिता की मृत्यु के बाद वह श्रृंगबेर राज्य का शासक बना
। अमात्य परिषद की मंत्रणा से वह न केवल अपने राज्य का संचालन करता, बल्कि निषाद भीलोँ की एक सशक्त सेना और नौसेना गठित कर, अपने राज्य की सीमाओँ का विस्तार भी कर लिया।

विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ।

एकलव्य अकेले ही सैकड़ों यादव वंशी योद्धाओं को रोकने में सक्षम था। इसी युद्ध में श्रीकृष्ण ने छल से एकलव्य का वध किया था। उसका पुत्र केतुमान महाभारत युद्ध में भीम के हाथ से मारा गया था।

जब युद्ध के बाद सभी पांडव अपनी वीरता का बखान कर रहे थे तब श्रीकृष्ण ने अपने अर्जुन प्रेम की बात कबूली थी।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट कहा था कि “तुम्हारे प्रेम में मैंने क्या-क्या नहीं किया है। तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर कहलाओ इसके लिए मैंने द्रोणाचार्य का वध करवाया, महापराक्रमी कर्ण को कमजोर किया और न चाहते हुए भी तुम्हारी जानकारी के बिना भील पुत्र एकलव्य को भी वीरगति दी ताकि तुम्हारे रास्ते में कोई बाधा ना आए”।

मन को कुसंस्कारी न रहने दिया जाये.


मन को कुसंस्कारी
न रहने दिया जाये.

गुरुकुलों के अध्यापक, प्राचार्य अपने छात्रों को पढ़ाकर सुयोग्य बना देते हैं। व्यक्तिगत संपर्क में भी ऐसा ही होता है। अरस्तू ने सिकंदर का पढ़ाकर महान् पुरुषार्थी बनाया था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को, समर्थ ने शिवा को, परमहंस ने विवेकानंद को, विरजान्द ने दयानंद को, गाँधी ने विनोबा को इस प्रकार का शिष्य बनाया था कि गुरु और शिष्य दोनों ही धन्य हो गये। वसुदेव ने वासुदेव नाम को अपने पुत्र को प्रख्यात कर दिया। जनक की बेटी जानकी ने अपने पिता के गौरव में चार चाँद लगा दिये। पिता के नाम से पुत्र भी यशस्वी होते हैं और कई बार पुत्र भी पिता को निहाल कर देते हैं। श्रवण कुमार के कारण उनके माता पिता सर्वत्र जाने जाते हैं भले ही उनका नाम बहुतों को मालूम न हो। भागीरथी गंगा को इसलिये कहा जाता है कि स्वर्ग से भूमि पर उन्हें उतारने का उत्कृष्ट प्रयत्न भागीरथ ने ही किया। अर्जुन को कौन्तेय इसी कारण कहा जाता है कि उनकी असाधारण प्रतिभा उनकी माता ने भरी थी।

हममें से प्रत्येक को एक विद्यार्थी पढ़ाने, एक शिष्य गढ़ने, एक प्रतिमा बनाने का काम अपने जिम्मे लेना चाहिए। यों प्रतिभावान व्यक्ति एक साथ कई-कई काम हाथ में लेते हैं और पूरा कर दिखाते हैं। व्यस्त लोग भी कइयों की जिम्मेदारी अपने ऊपर उठा लेते हैं। पी.एच.डी.- वकालत- चार्टर्ड एकाउन्टेंट आदि पढ़ने वालों को अपने मार्ग दर्शक के साथ संपर्क में रहना और समाधान करना, अनुभव बढ़ना आदि में तत्पर रहना पड़ता है। यों वे पढ़ाने वाले भी अपने कामों में व्यस्त रहते हैं फिर भी किसी न किसी प्रकार समय निकाल कर उन्हें सिखाते समझाते रहते हैं जिन्हें सुयोग्य बनाने का जिम्मा उनने अपने कंधों पर लिया है।

हम एक छात्र को, शिष्य या पुत्र को सुयोग्य बनाने का जिम्मा लें। उसे स्वयं पढ़ायें। कितना, किस प्रकार उस पढ़ाई को हृदयंगम किया इसका भी ध्यान रखें। राजा लोग प्रत्येक राजकुमार के लिए एक ट्यूटर गार्जियन नियुक्त करते थे। विष्णु शर्मा ने एक राजा के उद्दण्ड बालकों को कथा कहानियाँ सुनाकर सुयोग्य बना दिया था। हम एक ऐसे बालक की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर उठायें जो अपना सगा है। साथ रहता है और वफादार सेवक तक है।

इस विद्यार्थी का नाम है- ‘अपना मन’। बाहर के कितनों को ही सलाह, सहायता दी गई पर खेद है कि इसकी ओर कभी आँख उठाकर भी नहीं देखा। यदि उसकी दुर्दशा का पर्यवेक्षण भर किया होता तो प्रतीत होता कि वह कैसी आवारागर्दी में फंस गया है। किस कुसंग में निरत रहने लगा है और कैसी अनगढ़ गतिविधियाँ अपना चुका है जो उसे नहीं ही अपनानी चाहिए। उसके पिछड़ेपन की- कुमार्गगामिता की जिम्मेदारी आपकी है। जब फेल होने वाले विद्यार्थी, स्कूल की, अध्यापक वर्ग की बदनामी भी कराते हैं। जब कपूत बेटा बाप को जलील करता है तो कोई कारण नहीं कि आपके साथ गुँथे हुए मन की अपनाई हुई अवांछनीयता, उद्दण्डता, मूर्खता आपको बदनाम न करें। इस स्थिति में मात्र बदनामी ही नहीं प्रत्यक्ष हानि भी है। ऐसी हानि जिसकी क्षति पूर्ति और कोई नहीं कर सकता।

मन को सुसंस्कृत बनाया जाना चाहिए। उसे हित-अनहित में- अनौचित्य-औचित्य में अन्तर करना सिखाया जाना चाहिए। अब तक जो ढर्रा चलता रहा है उनमें वह विवेचन विश्लेषण करना उसे सिखाया ही नहीं गया, फिर बेचारा करता क्या? जो समीपवर्ती लोगों से देखता सुनता रहा उसकी बन्दर की तरह नकल और तोते की तरह रटन्त हो जाती है। सुप्रचलन का स्वरूप कभी देखा ही नहीं, सुसंस्कारियों, विचारशीलों के साथ रहा ही नहीं तो उस मार्ग पर चलना कैसे सीखें?

सिखाने वाले मदारी साँप, बन्दर रीछ को नाचना सिखा लेते हैं। सरकस वाले शेर हाथी वनमानुष तक को ऐसा सधा लेते हैं कि दर्शकों का भरपूर मनोरंजन और कम्पनी वाले को पर्याप्त मुनाफा होता रहे। सिखाने वाले के कौशल की सर्वत्र प्रशंसा होती रहे। फिर कोई कारण नहीं कि मन को सुसंस्कारी न बनाया जा सके। उसे गलाकर स्वर्ण आभूषणों की भाँति मनोरम न बनाया जा सके।

मन की शक्ति अपार है। उसकी सत्ता शरीर और आत्मा को मिलाकर ऐसी बनी है जैसी सीप और स्वाति कण का समन्वय होने से मोती बनता है। जीवन सम्पदा का वही व्यवस्थापक और कोषाध्यक्ष है। साथ ही उसे इतना अधिकार भी प्राप्त है कि वह अपने मित्र को- अपने साधनों को पूरी तरह भला या बुरा उपयोग कर सके। इतने सत्तावान का अनगढ़ होना सचमुच ही एक सिर धुनने लायक दुर्भाग्य है।

इस विडम्बना का और कोई कारण नहीं, हमारी उपेक्षा ही असमंजस जैसी परिस्थितियों को निर्मित है। महावत के बिना चाहे जिस दिशा में चाहे जब चल सकता है और जिसका चाहे जितना अनर्थ कर सकता है। हाथी वह है जो अपनी और सवार की प्रतिष्ठा बढ़ाता है पर छुट्टल और बिगड़ैल होने पर तो वह आतंकवादी यमदूत जैसा डरावना बन जाता है।

हमारी सत्ता आत्मा है। हमारा साथी सहकारी विवेक है। दोनों मिलकर मन को सही कल्पना, सही इच्छा करने की शिक्षा दे सकते हैं और सन्मार्ग पर चलना सिखा सकते हैं। मन अनाड़ी भर है। अवज्ञाकारी नहीं। अभ्यस्त दुर्गुणों को छोड़ने और नये सिरे से सिखाये गये सद्गुणों को अपनाने में अभ्यासवश आना-कानी अवश्य करता है पर उसे कड़ा निर्देशन दिया जाये और जो करने योग्य है उसे करने के लिए बाधित किया जाये तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि सर्वथा इनकार करे और अपने को बदलने के लिए सहमत न हो।

मन को कुसंस्कारों से विरत करने के लिए चार पाठ पढ़ाये जाने चाहिए (1) विचार संयम (2) समय संयम (3) अर्थ संयम (4) इन्द्रिय संयम। मस्तिष्क में जो भी विचार उठें उनका तत्काल परीक्षण किया जाना चाहिए कि वे नीतियुक्त, उपयोगी और रचनात्मक हैं या नहीं। बेतुकी कल्पना ऐसी इच्छाएँ उठती हों तो उनकी जड़ आरम्भ से ही काट देनी चाहिए। गाड़ी एक कदम आगे नहीं बढ़ने देनी चाहिए। उसके स्थान पर सामयिक समाधान एवं अभ्युत्थान की बात सोचने में उसे जुटा दिया जाना चाहिए। दूसरी बात सुनियोजित दिनचर्या बनाने की है। समय को हीरे मोतियों के समान मानकर उसका एक क्षण भी बर्बाद नहीं होना चाहिए। उठाने से लेकर सोने तक की समयचर्या ऐसी बनानी चाहिए जिससे व्यक्तिगत का स्तर निखरता हो और योग्यता का, प्रगति का विस्तार होता हो। पैसे के सम्बन्ध में प्रदर्शन, और कौतुक कौतूहल में एक पाई भी व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। खर्च करने से पहले अनेक बार विचारा जाये कि यह नितान्त आवश्यक है या नहीं। पैसा और श्रम एक ही बात है। श्रम को निरर्थक प्रयासों में लगाना जिस प्रकार दुःखद परिणाम प्रस्तुत करता है उसी प्रकार धन का अपव्यय भी बदले में विपत्ति लेकर वापस लौटता है। चौथा निर्देशक है- इन्द्रिय निग्रह। इन्द्रिय निग्रह का अर्थ ही जीभ का चटोरापन और यौनाचार के प्रति अनावश्यक आकर्षण है। चटोरापन शरीर को विपत्ति में फँसाता है और कामुकता मस्तिष्क को खोखला करती है।

इन सभी असंयमों से बचते हुए ‘सादा जीवन उच्च विचार’ का सिद्धान्त मन को इस प्रकार पढ़ाना चाहिए कि वह उसे भुला देने की गलती न करे।

(अखंड ज्योति 1/1986)


शनिदेव की मंथर गति.


शनिदेव की मंथर गति.

नवग्रहों में शनिदेव को न्यायाधिपति का पद प्राप्त है। शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या के आते ही व्यक्ति के जीवन में उथल-पुथल प्रारम्भ हो जाती है। यद्यपि यह सच नहीं है, किन्तु फ़िर भी ऐसी मान्यता है कि शनि की साढ़ेसाती व ढैय्या प्राय: कष्टप्रद ही होती है। शनि मन्द गति से चलते हैं, क्योंकि वे लँगड़े हैं। शनि एक राशि में ढाई वर्ष तक रहते हैं। मन्द गति से चलने के कारण ही उन्हें "शनैश्चर" भी कहा जाता है। "शनैश्चर" अर्थात् "शनै:-शनै: चलने वाला"।

पौराणिक कथा.

प्राचीन काल में एक बड़े श्रेष्ठ व तपस्वी मुनि हुए हैं, जिनका नाम ’पिप्पलाद’ था। पिप्पलाद मुनि के पिता पर जब शनि की साढ़ेसाती प्रारम्भ हुई तो उन्हें बहुत कष्ट हुआ। कष्ट इतना भयँकर था कि इस कष्ट के कारण पिप्पलाद मुनि के पिता की मृत्यु हो गई।

जब अपनी माता से पिप्पलाद मुनि को अपने पिता की मृत्यु का कारण पता चला तो उन्हें शनिदेव पर बहुत क्रोध आया और उन्होंने ब्रह्मदण्ड का सँधान कर शनिदेव पर प्रहार कर दिया। शनिदेव को जब पिप्पलाद मुनि और ब्रह्मदण्ड के बारे में ज्ञात हुआ तब वे तीनों लोको में शरण के लिए गए, लेकिन उन्हें कहीं भी शरण नहीं मिली। तब शनिदेव भूतभावन चन्द्रमौलिश्वर भगवान शिव के पास गए और उन्हें पूरी कथा सुनाई। भगवान शिव ने शनिदेव को एक पीपल के वृक्ष पर छिपने का परामर्श दिया और पिप्पलाद मुनि को समझाया कि शनिदेव पर उनका क्रोध व्यर्थ है क्योंकि शनिदेव न्यायाधिपति होने के कारण केवल अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे थे। भगवान शिव के समझाने पर पिप्पलाद मुनि ने अपना क्रोध त्याग दिया। चूँकि ब्रह्मदण्ड को लौटाया नहीं जा सकता था, इसलिए पिप्ललाद मुनि ने ब्रह्मदण्ड से शनिदेव की एक टाँग को क्षतिग्रस्त कर, उन्हें सदैव के लिए लँगड़ा कर दिया। कथानुसार उसी दिन से शनिदेव लँगड़ाकर धीरे-धीरे चलने लगे। शनिदेव को भगवान शिव व पीपल ने शरण प्रदान की थी इसलिए शनिदेव ने भगवान शिव को यह वचन दिया कि साढ़ेसाती व ढैय्या की अवधि में जो उनकी अर्थात् भगवान शिव व पीपल की पूजा करेगा, वे उसे कभी कष्ट नहीं देंगे। 

कैसे पता चले कि हम कर्मों में फंस रहे हैं?


कर्म बंधन.
कैसे पता चले कि हम कर्मों में फंस रहे हैं?
(सद्गुरु जग्गी वासुदेव)

(आध्यात्मिक पथ पर हम कर्मों से छुटकारा पाना चाहते हैं, पर कैसे पता चले कि कहीं हम और कर्म तो नहीं पैदा कर रहे, जानते हैं सद्‌गुरु से) 

कर्म की प्रकृति आपके द्वारा किये गये कामों में नहीं होती। कर्म का अर्थ है कार्य, लेकिन पिछले कर्मों का संग्रह आपके द्वारा किये गए कार्यों के कारण नहीं है। जिन संकल्पों, मनोवृत्तियों और जिस तरह के मन को आप साथ ले कर चलते हैं, वही आपका कर्म है।

रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा.

रामकृष्ण अक्सर एक कहानी सुनाया करते थे। दो मित्र थे, वे हर शनिवार की शाम एक वैश्या के पास जाया करते थे। एक शाम जब वे वैश्या के घर जा रहे थे तब रास्ते में किसी का आध्यात्मिक प्रवचन चल रहा था। एक मित्र ने कहा कि वह आध्यात्मिक संभावनाओं पर प्रवचन सुनना पसंद करेगा और फिर उसने वैश्या के यहाँ नहीं जाने का फैसला किया।

दूसरे व्यक्ति ने उसे वहीं छोड़ दिया। अब प्रवचन में जो व्यक्ति बैठा था, वह दूसरे व्यक्ति के विचारो में डूबा हुआ था। वह सोचने लगा कि मेरा मित्र तो अभी जीवन का आनंद ले रहा होगा और मैं स्वयं एक ऐसी खुश्क जगह में फंस गया हूं। उसने सोचा कि मेरा मित्र ज़्यादा बुध्दिमान है क्योंकि उसने आध्यात्मिक प्रवचन की बजाए वैश्या के यहाँ जाने का फैसला किया। अब जो आदमी वैश्या के पास बैठा था, उसका दिमाग भी दूसरे आदमी में लगा हुआ था। वह सोच रहा था कि उसके मित्र ने वैश्या के घर की बजाए आध्यात्मिक प्रवचन में बैठना पसंद करके मुक्ति का मार्ग चुना है, जबकि वह खुद गंदगी में फंस गया है। आध्यात्मिक प्रवचन में बैठे व्यक्ति ने वैश्या के बारे में सोच कर बुरे कर्म बटोरकर कीमत चुकाई। अब वही दुख भोगेगा दूसरा नहीं। आप कीमत इसलिए नहीं चुकाते कि आप वैश्या के यहाँ जाते हैं; आपको कीमत चुकानी पड़ती है क्योंकि आप चालाकी करते हैं। आप अभी भी वहाँ जाना चाहते हैं, लेकिन आप सोचते हैं कि प्रवचन में जाने से आप स्वर्ग के एक कदम नज़दीक पहुँच जाएँगे। यह चालाकी आपको नरक में ले जाएगी। वह आदमी जो वैश्या के साथ है, वह जानता है कि इसमें कुछ नहीं रखा है और वह कुछ और तलाश करेगा; उसका कर्म अच्छा है। इसलिये यह किसी कार्य के संबंध में नहीं है।


अच्छे कर्म और बुरे कर्म समाज की सीख हैं.

अभी आप समाज के नैतिक नियमों के कारण ही ’अच्छे’ और ’बुरे’ के बारे में सोचते हैं। आपका स्वभाव आपको यह नहीं कह रहा कि यह सही है और वह गलत है। बात बस इतनी ही है कि समाज ने कुछ नियम बनाए हैं और वे हमेशा से कहते आए हैं, आपके बचपन से ही, कि यदि आप उनको तोड़ेंगे तो बुरे कहलाएंगे। इसलिए आप जब भी समाज के नियमो को तोड़ते हैं, खुद को आप एक बुरा बच्चा महसूस करने लगते हैं।

आप जैसा महसूस करते हैं, वैसे ही आप बन जाते हैं। मान लीजिये कि आप जूआ खेलने के आदी हैं। हो सकता है, अपनी माँ के सामने, अपनी पत्नी के सामने या अपने घर में, जूआ खेलना या ’जूआ’ शब्द मुँह से निकालना पाप है, लेकिन जैसे ही आप अपने गैंग से मिलते हैं, जूआ खेलना एकदम ठीक है। है न? जूआरियों के बीच जो व्यक्ति जूआ नहीं खेलता, वह जीने के काबिल नहीं है। हर जगह ऐसा ही है। अगर आप सब चोर हैं, तो आप सब ठीक हैं। है कि नहीं? चोरों के बीच, क्या उन्हें लगता है कि किसी को लूटना बुरा है? जब आप चोरी में असफल हो जाते हैं, तो वे सोचते हैं कि आप एक अच्छे चोर नहीं हैं। फिर वह एक बुरा कर्म हो जाता है, है कि नहीं? यह प्रश्न, कार्मिक वस्तु, ठीक उसी प्रकार होती है जिस तरह से आप उसे महसूस करते हैं। आप जो कर रहे हैं, उससे इसका संबंध नहीं है। जिस तरीके से आप उसको अपने दिमाग में ढोते हैं, उसका संबंध केवल उसी से है। हम हमेशा स्वीकृति की बात क्यों करते हैं, क्योंकि जब आप पूर्ण स्वीकृति में होते है, तब जीवन जो भी माँगता है, आप उसे सहज करते हैं।


समाज का अपना अहम् होता है.

अगर आपको कोई युद्ध लडऩा है, आप जाइये और लडिय़े; यह कोई कर्म नहीं है। कर्म स्थूल कार्य से नहीं बनता; कार्य के पीछे जो भावना है, जो संकल्प है उससे कर्म बनता है। बात बस इतनी ही है कि किसी बेवकूफ ने कुछ नियम बना दिये हैं और आप हर इंसान से उम्मीद करते हैं कि वह उनके अनुसार जिये। यह असंभव है। लेकिन समाज को अपना सामाजिक अहम् बनाए रखने के लिये ऐसे नियमों की ज़रूरत होती है।

समाज का अपना अहम् होता है, है कि नहीं? हर छोटी-मोटी बात को ले कर पूरा समाज क्षुब्ध हो जाता है। यह जरूरी नहीं कि वह गलत ही हो। जब अमेरिका में गर्मी का मौसम है, तब लोग बड़ी मुश्किल से कुछ पहनते हैं, वे मिनी स्कर्ट में होते हैं। अब मान लेते हैं कि आप पूरे कपड़ों में हैं। लोग क्षुब्ध हो जाएँगेः “यह क्या कर रही है? यह पूरी ढकी हुई क्यों है?” यहाँ भारत में, अगर आपने पूरे कपड़े नहीं पहने तो लोग परेशान हो जाएँंगे। असल में, यह एक तरह का अहम् है और वह दूसरी तरह का अहम् है। यही सामाजिक अहम् है, जो क्षुब्ध होता है और आपका कर्म सामूहिक कर्म का एक हिस्सा बन जाता हैं। मैं चाहता हूँ कि आप इसे वाकई एक खास गहराई से समझें। अच्छे और बुरे की सोच आपको सिखाई गई है। आप जिस सामाजिक परिवेश में रहे हैं, वहाँ से आपने इसे ग्रहण किया है। कर्म आपके जीवन के संदर्भ में होता है, न कि किये गये कार्य में।

सन्त जोगा परमानन्दजी.


सन्त जोगा परमानन्दजी.

महाराष्ट्र के सन्त जोगा परमानन्द की असीम भगवद्भ़क्ति से लोग उनके प्रति आकृष्ट होते और उनमें श्रद्धाभाव जाग्रत होता। एक बार जब वे कीर्तन में मग्न थे, तो कुछ लोग वहाँ से चुपचाप निकल आये और बाजार जाकर एक कीमती पीतवस्त्र (पीताम्बर) ले आये। जब कीर्तन समाप्त हुआ और आरती हुई, तो उन्होंने दक्षिणा के रूप में वह पीताम्बर उन्हें भेंट किया। किन्तु वीतरागी सन्त भला इतना कीमती उपहार कैसे लेते? उन्होंने उसे लेने से इन्कार कर दिया। मगर लोगों ने उनकी एक न सुनी और उन्होंने सन्त के शरीर पर उसे जबरदस्ती चढ़ा दिया। आरती के पश्चात जब वे भजन गाने लगे, तो उनका ध्यान भगवान् की ओर से हटने लगा। वे सोचने लगे कि इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं होता था। बात उनके ध्यान में आ गयी कि यह कीमती वस्त्र का ही असर है, जो भगवद्-भक्ति में बाधक बन रहा है। उन्होंने उसे नीचे उतार दिया और पुनः भजन में लीन हो गये।

कीर्तन समाप्त होने पर वे पीताम्बर लेकर घर आये। वे सोने की तैयारी कर रहे थे कि उनका ध्यान पीताम्बर की ओर गया और उन्हें आत्मग्लानि हुई कि उनके शरीर को पीताम्बर का मोह हुआ ही कैसे कि प्रभु की ओर से उनका ध्यान हटने लगा था। उन्होंने निश्चय किया कि इस लोभी देह को दण्ड दिया ही जाना चाहिए। फिर सोचने लगे कि क्या दण्ड दिया जाए? क्या इसे अग्नि की आँच दी जाए, या पानी में डुबाया जाए, अथवा 'अष्टांग योग साधन‌ ' द्वारा प्रायश्चित का सहारा लिया जाए। किन्तु उन्हें इनमें से कोई दण्ड पसन्द न आया। इसी चिन्ता में उन्हें रात भर नींद न आयी।

दूसरे दिन प्रातः वे फिर शरीर को दण्ड देने की सोचने लगे कि सामने से एक किसान अपने बैलों के साथ खेतों की ओर जाता दिखाई दिया। सन्त ने उसे बुलाकर बैलों की कीमत पूछी । उसके द्वारा बताने पर उन्होंने उतने रुपये दिये, साथ ही वह पीताम्बर भी सौंप दिया। उससे बैल लेकर उन्होंने स्वयं को हल के समान बाँधा और भगवान् का नाम लेकर बैलों को कोड़े लगाये। इससे बैलों ने जोर से भागना शुरू किया। लोगों ने जब उन्हें बैलों के साथ घिसटते देखा, तो उन्होंने उन्हें रोकने का प्रयास किया, लेकिन बैल इतने तेज दौड़ रहे थे कि रूक न पाये। किन्तु जिस परम दयालु भगवान् ने गजेन्द्र की आर्तवाणी सुनकर उसकी रक्षा की थी, उनसे अपने इस परम भक्त का यह कष्ट कैसे देखा जाता? वे तत्काल प्रकट हो गये और उन्होंने बैलों को रोककर जोगा को शान्त किया। प्रभु के दर्शन से वे भावविभोर हो गये और आँख मूँदकर भगवान् की प्रार्थना करने लगे और इधर दीनदयालु अन्तर्धान हो गये।

ज्योतिष में प्रश्न विचार.


ज्योतिष में प्रश्न विचार.

वैदिक ज्योतिष की अनेक शाखाएं हैं, जिससे फलित का विचार किया जाता है. उसमें से एक प्रश्न शास्त्र के नाम से है. प्रश्न शास्त्र एक ऎसी विद्या है, जो समय के अभाव में भी महत्वपूर्ण मार्ग-दर्शन करने में समर्थ होती है. प्रश्न का उत्तर तत-समय पूछे गए प्रश्न की कुण्डली बना कर दिया जाता है.

दिन-रात के मान को “अहोरात्र” कहते हैं. अहो का अर्थ होता है-दिन तथा रात्र का अर्थ होता है-रात. इसी प्रकार अहो से ‘हो’ तथा रात्रि से ‘रा’ लेकर शव्द बनता है-‘होरा’. ऋषि पराशरजी ने विस्तार पूर्वक अपनी पुस्तक बृहतपराशरहोरा में बताया है. इसी के साथ ही कल्याण वर्मा, वराहमिहिर और कालिदास जी ने भी इस पर काफी कुछ लिखा है.

प्रश्न शास्त्र में फलित के लिए व्यक्ति द्वारा पूछे गए प्रश्न पर ही विचार किया जाता है. परंतु कुछ ज्योतिषी इसके साथ जन्म कुण्डली और वर्ष कुण्डली का सम्यक अध्ययन कर प्रश्न-कर्ता का समाधान करते हैं.

प्रश्न कुण्डली के अध्ययन में पराशरी सिद्धातों के साथ-साथ ताजिक ज्योतिष व योगों की पूर्ण जानकारी एवं ग्रहों की स्थिति, डिग्री, लग्न सहित कारक ग्रहों इत्यादि का महत्त्व पूर्ण योगदान होता हैं.

प्रश्न शास्त्र के अनुसार प्रश्न पूछने वाले व्यक्ति का स्थान एवं उसके द्वारा पूछे गए प्रश्न का समय उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना की जन्म कुण्डली में जन्म-समय और स्थान का. इसलिए प्रश्न समय की कुंडली का निर्माण उसी प्रकार सर्वांग रूप से किया जाता हैं, जैसे जन्मांक का निर्माण करते हैं.

प्रश्न शास्त्र में चौदह प्रकार के लक्ष्णों को भी विचार में लिया जाता हैं. यथा सटीक समय, स्थान, जातक की स्वांस की प्रकृति, उसकी स्थिति, स्पर्श, आरूढा़, दिशा, प्रश्नाक्षर, स्थिति(प्रश्नकर्ता की चाल-ढाल), चेष्ठा, भाव (मानसिकता), अवलोकन, उसकी पोशाक और निमित्त (उस समय के शुभ, अशुभ संकेत चिह्न). इसमें से कुछ लक्षण-शास्त्र और स्वर-शास्त्र पर आधारित बात हैं. इसके जानकार इन लक्षणों के आधार पर भी पृथक से निष्कर्ष निकाल कर निर्मित प्रश्न कुंडली के फलादेश से मिलान करते हैं और जिस पक्ष में संकेत अधिक प्राप्त होत हैं, का मार्ग-दर्शन, जातक को देते हैं. यह सिर्फ प्रश्न कुंडली के बारे में ही लिखा जज रहा हैं.

प्रश्न कुण्डली का लग्न, प्रश्नकर्ता का प्रतिनिधित्व करता है. पूछे गए प्रश्न के भाव एवं उसके स्वामी द्वारा उसका निर्धारण किया जाता है.

प्रश्नकर्ता का प्रश्न रिस्ता, वित्तीय निवेश, कैरियर मुद्दों, पारिवारिक मामलों, संघर्ष और मुकदमों, वस्तुओं के खोने या लापता लोगों आदि के बारे में हो सकता है. उदाहरण के लिए यदि पति या पत्नी से संबंधित प्रश्न हो तो सप्तम भाव को देखा जाएगा तथा सप्तमेश उसका कारक होगा.

इसी प्रकार से बिजनेस या काम से संबंधित प्रश्न हो तो दशम भाव एवं दशमेश का अवलोकन किया जाता है. इस प्रकार प्रश्नकर्ता की समस्या में कारक ग्रह प्रभावित होता है. विशेष रूप से उस भाव में स्थित किसी भी अन्य ग्रहों का होना भी हो सकता है जो आगे वर्णनात्मक जानकारी प्रदान कर सकता है, लेकिन समस्या के लिए एक ही कारक लिया जाना चाहिए.

अधिकांशत: चंद्रमा अनेक स्थिति के लिए एक महत्वपूर्ण कारक रहता है. चंद्रमा की स्थिति प्रश्न के विषय में काफी कुछ बताने में सहायक होती है. परंतु हमेशा यह तथ्य कारगर सिद्ध नहीं हो पाता क्योंकि कुण्डली में कई अनेक बातें भी होती हैं जिन्हें जानना आवश्यक होता है.

प्रश्न कुण्डली के प्रत्येक भाव का संक्षिप्त विवरण.


भाव
विषय
प्रथम (लग्न) भाव
जातक के व्यक्तित्व,, स्वास्थ्य, विचार और सामान्य जीवन का पता चलता है.

द्वितीय भाव
कुटुम्ब पैतृक संपत्ति, धन, गहने, आभूषण और चल संपत्ति, मुंह के भीतरी भाग.
तृतीय भाव
छोटे भाई बहन, दोस्तों, पड़ोसियों, संचार, लेखन, घनिष्ठ संबंध, चचेरे भाई, छोटी यात्रा, साहस.

चतुर्थ भाव
माँ, घर, संपत्ति, भवनों, अचल संपत्ति, खेतों, कुओं, खानों और पृथ्वी के अन्य संसाधनों, वाहनों, परिवार से मिलने वाली खुशी.

पंचम भाव
बच्चे, रोमांस, प्रेम संबंधों, खुफिया, उच्च शिक्षा, रचनात्मकता, सट्टा, शेयर और स्टॉक में निवेश., चुनाव, मनोरंजन, इच्छाओं को दर्शाता है.

षष्ट भाव
बीमारी, रोग, दुश्मन, नौकर, मातहत, मुकदमेबाजी, अदालती मामलों, ऋण, प्रतियोगिता, पालतू जानवर, किरायेदारों, ऋण, चोर.

सप्तम भाव
जीवन साथी, प्रतिद्वंद्वी, विवाह, प्रेम, सार्वजनिक जीवन, सार्वजनिक छवि के साथ व्यवहार, दुश्मन, चोर, युद्ध.

सप्तम भाव
जीवन साथी, प्रतिद्वंद्वी, विवाह, प्रेम, सार्वजनिक जीवन, सार्वजनिक छवि के साथ व्यवहार, दुश्मन, चोर, युद्ध.

अष्टम भाव
दीर्घायु,, खतरा, बीमार स्वास्थ्य, गुप्त या असंवैधानिक शारीरिक रिश्ते, दुर्घटनाओं, बीमा, विरासत, पति या पत्नी का पैसा, करों, बंधक, पीड़ित, मनोगत विज्ञान से संबंधित मामलों, काला जादू, ध्यान.

नवम भाव
पिता, लंबी यात्रा, धार्मिकता, दिव्य पूजा, दिव्य गुरु, विदेशी देशों की यात्रा, कानून और अदालत, बच्चों की उच्च शिक्षा, मां की बीमारी.

दशम भाव
व्यवसाय, सेवा, कैरियर, नौकरी या पेशे के परिवर्तन, पदोन्नति, सामाजिक स्थिति, प्रसिद्धि, किए गए अच्छे या बुरे कर्म, सरकार या शासक, मालिक या नियोक्ता, पिता, पिता की स्थिति के साथ संबंधित होता है.

एकादश भाव
बडे़ भाई बहन, दोस्तों, लाभ व सफलता, जीवनसाथी का सुख, माता - पिता की दीर्घायु, पितृ कर्म.
द्वादश भाव
व्यय, अस्पताल, जेल, तनहाई, गुप्त व्यवहार, दुख, मृत्यु, दान, छिपाना दुश्मन, घाटा, विदेश यात्रा इत्यादि को दर्शाता है.