उपनयन-संस्कार.

 

उपनयन-संस्कार.

शास्त्र में मानव समुदाय को वर्ण में विभाजित किया गया हैं; इसलिए अपने वर्णेश/शाखेश के अनुसार उपनयन संस्कार विधि अपनाना चाहिये, इससे मानसिक विकास और कर्तव्य बोध परिस्कृत होता हैं। उपनयन संस्कार विधि के लिए तथा उपनयन के प्रयोजन हेतु शास्त्र में बहुत कुछ बताया गया हैं, उसमें से जानने योग्य महत्वपूर्ण बाते निम्नानुसार हैं:-

वर्ण

वर्णेश

ब्राह्मण

गुरु, शुक्र

क्षत्रिय

सूर्य, मंगल

वैश्य

चन्द्र

शुद्र और

अन्त्यज

बुध और

शनि

शाखेश

ऋग्वेद

गुरु (वृहस्पति)

यजुर्वेद

शुक्र

सामवेद

मंगल

अथर्ववेद

बुध

 

 

 

 

 

 

 

  



विप्राधीशौ भार्गवेज्यौ कुजार्कौ
         राजन्यानामोषधीशो विशां च।
शूद्राणां ज्ञश्चान्त्यजानां शनि:
    स्याच्छाखेशा: स्युर्जीवशुक्रारसौम्या:।।                  (मुहूर्त्तचिंतामणिः-5/43)

प्रयोजन.

शाखेशवारतनुवीर्यमतीव शस्तं
    शाखेशसूर्यशशिजीवबले व्रतं सत्।
जीवे भृगौ रिपुगृहे विजिते च 
   नीचे स्याद् वेदशास्त्रविधिना रहितो व्रतेन।।       (मुहूर्त्तचिंतामणिः-5/44)

अर्थ- यज्ञोपवीत संस्कार में शाखेश (अपने वेद के स्वामी) का वार, लग्न और गोचर प्रकरणोक्त बल यज्ञोपवित में अत्यंत प्रशस्त होता है। 

ऋग्वेद वालों के लिए-बृहस्पतिवार और बृहस्पति की धनु या मीन लग्न और बृहस्पति का बल होना अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। 

यजुर्वेदियों के लिए- शुक्रवार और शुक्रकी तुला या वृषभ लग्न और शुक्रका बल ये सब अत्यंत श्रेष्ठ हैं।

 सामवेदियों के लिए- मंगलवार, मंगल की मेष या वृश्चिक लग्न और मंगल का बल यज्ञोपवीत में यदि प्राप्त होता है, तो बहुत ही श्रेष्ठ है।

 अथर्ववेदियों के लिए- बुधवार और बुध की मिथुन या कन्या लग्न और बुध का बल प्राप्त होना अत्युत्तम है।

 शाखेश, सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति का बली होना उपनयन में उत्तम होता है।

 यदि उपनयन के समय बृहस्पति और शुक्र (शाखेश एवं वर्णेश भी) अपने शत्रु की राशि में (अर्थात् गुरु- मिथुन,  वृषभ,  तुला राशि में और शुक्र- सिंह,  कर्क राशि में,  मंगल- मिथुन, कन्या राशि में तथा बुध- कर्क राशि में हो) या ये ग्रह-युद्ध में पराजित हों तथा अपनी नीच राशि में हों तो उपनीत बालक वेद और शास्त्र से रहित नास्तिक होता है।

 वर्णेश का वार, लग्न तथा बली होना उत्तम होता है।

अर्थात् शाखेश और वर्णेश के उत्तम योग होने पर बालक उत्तम ज्ञानवान् होता है और इनका सहयोग न होने पर नीच या हीन होने पर बालक के ज्ञान पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

 जिस प्रकार कन्या के विवाह में गुरुबल अत्यंत आवश्यक है,  इसी प्रकार बालकों के यज्ञोपवीत में गुरुबल अत्यंत आवश्यक है।

इसके लिए अपने वेद, अपनी शाखा का ज्ञान होना आवश्यक हैं, जिसके अनुसार यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार होना चाहिए।

 ब्राह्मणों का यज्ञोपवीत चैत्र मास में मीन की संक्रांति में अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है।

जन्मभाद् दुष्टगे सिंहे नीचे वा शत्रुभे गुरौ।
मौजीबन्धः शुभः प्रोक्तञ्चैत्रे मीनगते रवौ॥
गोचराष्टकवर्गाभ्यां यदि शुद्धिर्न जायते।
तदोपनयनं कार्य चैत्रे मीनगते रवौ।। 
मौजीबन्धः शुभः प्रोक्तश्चैत्रे मीनगते रवौ।।
मेखलाबन्धनं कार्यं चैत्रे मीनगते रवौ॥   (पीयूषधारायां_ज्योतिर्निबन्धे) 

हरौ सिंहांशके जीवे नीचः नीचभांशके
जीवभार्गवयोरस्ते सिंहस्थे देवतागुरौ।

 यद्यपि हमारे यहां सभी संस्कारोंका अपना-अपना महत्व है  फिर भी सभी संस्कारों में प्रमुख यज्ञोपवीत संस्कार ही है।

इसी से वेदों में इसका अधिकार प्राप्त होता है।

विधि-विधान से अपनाये गये क्रिया संपन्न उपनयन संकर से सिद्धि होती है और कल्याणकारी मार्ग प्रशस्त होता है।

 जिन ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों को यज्ञोपवीत का अधिकार है,  उनका समय पर  यज्ञोपवीत नहीं होता है तो उन्हें प्रायश्चित करके अधिक उम्र पर भी यज्ञोपवीत कराना चाहिए।

 तीन पीढ़ी तक यदि यज्ञोपवीत नहीं हो, तो वो व्रात्य पतित सावित्रीक कहलाते हैं।

उनको व्रात्यस्तोमादि प्रायश्चित्त करके फिर यज्ञोपवीत कराने का अधिकार होता है और उससे ज्यादा यानी चार पांच पीढ़ी तक यज्ञोपवीत (जनेऊ संस्कार) न हो तो वे शूद्र के समान ही कहे जाते हैं।

 जिसका यज्ञोपवीत संस्कार नहीं होता है, उसे गायत्री जप करने का भी अधिकार नहीं है और जो गायत्री जप संध्यादि नहीं करता,  उसे कोई भी शुभ कर्म करने का अधिकार नहीं हैं। यदि वह फिर भी करता है, तो उसे फल नहीं मिलता,  ऐसे व्यक्ति को शास्त्रों ने सदा अपवित्र ही बताया है।

 संध्याहीनोऽशुचिर्नित्यमनर्हः सर्वकर्मसु।
यदन्यत् कुरुते कर्म न तस्य फलभाग्भवेत्।।                (दक्षस्मृति: 2/27)

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 78-85 का हिन्दी अनुवाद

 

(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः
श्लोक 78-85 का हिन्दी अनुवाद

जीव जब इन्द्रियजनित भोगों का चिन्तन करते हुए बार-बार उन्हीं के लिये कर्म करता है, तब उन कर्मों के होते रहने से अविद्यावश वह देहादि के कर्मों में बँध जाता है। अतएव उस कर्मबन्धन से छुटकारा पाने के लिये सम्पूर्ण विश्व को भगवद्रूप देखते हुए सब प्रकार श्रीहरि का भजन करो। उन्हीं से इस विश्व की उत्पत्ति और स्थिति होती है तथा उन्हीं में लय होता है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! भक्त श्रेष्ठ श्रीनारद जी ने राजा प्राचीनबर्हि को जीव और ईश्वर के स्वरूप का दिग्दर्शन कराया। फिर वे उनसे विदा लेकर सिद्धलोक को चले गये। तब राजर्षि प्राचीनबर्हि ही प्रजापालन का भार अपने पुत्रों को सौंपकर तपस्या करने के लिये कपिलाश्रम को चले गये। वहाँ उन वीरवर ने समस्त विषयों की आसक्ति छोड़ एकाग्र मन से भक्तिपूर्वक श्रीहरि के चरणकमलों का चिन्तन करते हुए सारूप्यपद प्राप्त किया।

निष्पाप विदुर जी! देवर्षि नारद के परोक्ष रूप से कहे हुए इस आत्मज्ञान को जो पुरुष सुनेगा या सुनायेगा, वह शीघ्र ही लिंगदेह के बन्धन से छूट जायेगा। देवर्षि नारद के मुख के निकला हुआ यह आत्मज्ञान भगवान् मुकुन्द के यश से सम्बन्ध होने के कारण त्रिलोकी को पवित्र करने वाला, अन्तःकरण का शोधक तथा परमात्मपद को प्रकाशित करने वाला है। जो पुरुष इसकी कथा सुनेगा, वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जायेगा और फिर उसे इस संसार-चक्र में नहीं भटकना पड़ेगा।

विदुर जी! गृहस्थाश्रमी पुरंजन के रूपक से परोक्ष रूप में कहा हुआ यह अद्भुत आत्मज्ञान मैंने गुरु जी की कृपा से प्राप्त किया था। इसका तात्पर्य समझ लेने से बुद्धियुक्त जीव का देहाभिमान निवृत्त हो जाता है तथा उसका ‘परलोक में जीव किस प्रकार कर्मों का फल भोगता है’ यह संशय भी मिट जाता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 66-77 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः
श्लोक 66-77 का हिन्दी अनुवाद 

राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। मन ही मनुष्य के पूर्वरूपों को तथा भावी शरीरादि को भी बता देता है और जिनका भावी जन्म होने वाला नहीं होता, उन तत्त्व-वेत्ताओं की विदेहमुक्ति का पता भी उनके मन से ही लग जाता है। कभी-कभी स्वप्न में देश, काल अथवा क्रिया सम्बन्धी ऐसी बातें भी देखी जाती हैं, जो पहले कभी देखी या सुनी नहीं गयीं। (जैसे पर्वत की चोटी पर समुद्र, दिन में तारे अथवा अपना सिर कटा दिखायी देना, इत्यादि) इनके दीखने में निद्रादोष को ही कारण मानना चाहिये। मन के सामने इन्द्रियों से अनुभव होने योग्य पदार्थ ही भोगरूप में बार-बार आते हैं और भोग समाप्त होने पर चले जाते हैं; ऐसा कोई पदार्थ नहीं आता, जिसका इन्द्रियों से अनुभव ही न हो सके। इसका कारण यही है कि सब जीव मन सहित हैं। साधारणत: तो सब पदार्थों का क्रमशः ही भान होता है; किन्तु यदि किसी समय भगवच्चिन्तन में लगा हुआ मन विशुद्ध सत्त्व में स्थित हो जाये, तो उसमें भगवान् का संसर्ग होने से एक साथ समस्त विश्व का ही भान हो सकता है-जैसे राहु दृष्टि का विषय न होने पर भी प्रकाशात्मक चन्द्रमा के संसर्ग से दीखने लगता है।

राजन्! जब तक गुणों का परिणाम एवं बुद्धि, मन, इन्द्रिय और शब्दादि विषयों का संघात यह अनादि लिंग देह बना हुआ है, तब तक जीव के अंदर स्थूल देह के प्रति ‘मैं-मेरा’ इस भाव का अभाव नहीं हो सकता। सुषुप्ति, मूर्च्छा, अत्यन्त दुःख तथा मृत्यु और तीव्र ज्वरादि के समय भी इन्द्रियों की व्याकुलता के कारण  ‘मैं’  और  ‘मेरेपन’  की स्पष्ट प्रतीति नहीं होती; किन्तु उस समय भी उनका अभिमान तो बना ही रहता है। जिस प्रकार अमावस्या की रात्रि में चन्द्रमा रहते हुए भी दिखायी नहीं देता, उसी प्रकार युवावस्था में स्पष्ट प्रतीत होने वाला यह एकादश इन्द्रिय विशिष्ट लिंग शरीर गर्भावस्था और बाल्यकाल में रहते हुए भी इन्द्रियों का पूर्ण विकास न होने के कारण प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार स्वप्न में किसी वस्तु का अस्तित्व न होने पर भी जागे बिना स्वप्नजनित अनर्थ की निवृत्ति नहीं होती-उसी प्रकार सांसारिक वस्तुएँ यद्यपि असत् हैं, तो भी अविद्यावश जीव उनका चिन्तन करता रहता है; इसलिये उसका जन्म-मरणरूप संसार से छुटकारा नहीं हो पाता। इस प्रकार पंचतन्मात्राओं से बना हुआ तथा सोलह तत्त्वों के रूप में विकसित यह त्रिगुणमय संघात ही लिंग शरीर है। यही चेतना शक्ति से युक्त होकर जीव कहा जाता है। इसी के द्वारा पुरुष भिन्न-भिन्न देहों को ग्रहण करता और त्यागता है तथा इसी से उसे हर्ष, शोक, भय, दुःख और सुख आदि का अनुभव होता है, जिस प्रकार जोंक, जब तक दूसरे तृण को नहीं पकड़ लेती, तब तक पहले को नहीं छोड़ती-उसी प्रकार जीव मरणकाल उपस्थित होने पर भी जब तक देहारम्भक कर्मों की समाप्ति होने पर दूसरा शरीर प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक पहले शरीर के अभिमान को नहीं छोड़ता। राजन्! यह मनःप्रधान लिंग शरीर ही जीव के जन्मादि का कारण है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 55-65 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः
श्लोक 55-65 का हिन्दी अनुवाद

 इस प्रकार अपने को मृग की-सी स्थिति में देखकर तुम अपने चित्त को हृदय के भीतर निरुद्ध करो और नदी की भाँति प्रवाहित होने वाली श्रवणेन्द्रिय की बाह्य वृत्ति को चित्त में स्थापित करो। (अन्तर्मुखी करो) जहाँ कामी पुरुषों की चर्चा होती रहती है, उस गृहस्थाश्रम को छोड़कर परमहंसों के आश्रय श्रीहरि को प्रसन्न करो और क्रमशः सभी विषयों से विरत हो जाओ।

राजा प्राचीनबर्हि ने कहा- भगवन्! आपने कृपा करके मुझे जो उपदेश दिया, उसे मैंने सुना और उस पर विशेषरूप से विचार भी किया। मुझे कर्म का उपदेश देने वाले इन आचार्यों को निश्चय ही इसका ज्ञान नहीं है; यदि ये इस विषय को जानते तो मुझे इसका उपदेश क्यों न करते। विप्रवर! मेरे उपाध्यायों ने आत्मतत्त्व के विषय में मेरे हृदय में जो महान् संशय खड़ा कर दिया था, उसे आपने पूरी तरह से काट दिया। इस विषय में इन्द्रियों की गति न होने के कारण मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को भी मोह हो जाता है। वेदवादियों का कथन जगह-जगह सुना जाता है कि ‘पुरुष इस लोक में जिसके द्वारा कर्म करता है, उस स्थूल शरीर को यहीं छोड़कर परलोक में कर्मों से ही बने हुए दूसरी देह से उनका फल भोगता है। किन्तु यह बात कैसे हो सकती है?’ (क्योंकि उन कर्मों का कर्ता स्थूल शरीर तो यहीं नष्ट हो जाता है।) इसके सिवा जो-जो कर्म यहाँ किये जाते हैं, वे तो दूसरे ही क्षण में अदृश्य हो जाते हैं; वे परलोक में फल देने के लिये किस प्रकार पुनः प्रकट हो सकते हैं?

श्रीनारद जी ने कहा- राजन्! (स्थूल शरीर तो लिंग शरीर के अधीन है, अतः कर्मों का उत्तरदायित्व उसी पर है) जिस मनःप्रधान लिंग की सहायता से मनुष्य कर्म करता है, वह तो मरने के बाद भी उसके साथ रहता ही है, अतः वह परलोक में अपरोक्ष रूप से स्वयं उसी के द्वारा उनका फल भोगता है। स्वप्नावस्था में मनुष्य इस जीवित शरीर का अभिमान तो छोड़ देता है, किन्तु इसी के समान अथवा इससे भिन्न प्रकार के पशु-पक्षी आदि शरीर से वह मन में संस्काररूप से स्थित कर्मों का फल भोगता रहता है। इस मन के द्वारा जीव जिन स्त्री-पुत्रादि को ‘ये मेरे हैं’ और देहादि को ‘यह मैं हूँ’ ऐसा कहकर मानता है, उनके किये हुए पाप-पुण्यादिरूप कर्मों को भी यह अपने ऊपर ले लेता है और उनके कारण इसे व्यर्थ ही फिर जन्म लेना पड़ता है। जिस प्रकार ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों की चेष्टाओं से उनके प्रेरक चित्त का अनुमान किया जाता है, उसी प्रकार चित्त की भिन्न-भिन्न प्रकार की वृत्तियों से पूर्वजन्म के कर्मो का भी अनुमान होता है। (अतः कर्म अदृष्टरूप से फल देने के लिये कालान्तर में मौजूद रहते हैं) कभी-कभी देखा जाता है कि जिस वस्तु का इस शरीर से कभी अनुभव नहीं किया-जिसे न कभी देखा, न सुना ही-उसका स्वप्न में, वह जैसी होती है, वैसा ही अनुभव हो जाता है।

राजन्! तुम निश्चय मानो कि लिंग देह के अभिमानी जीव को उसका अनुभव पूर्वजन्म में हो चुका है; उसकी मन में वासना भी नहीं हो सकती।




श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 45-54 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः
श्लोक 45-54 का हिन्दी अनुवाद

वेद भी अत्यन्त विस्तृत हैं, उसका पार पाना हँसी-खेल नहीं है। अनेकों महानुभाव उसकी आलोचना करके मन्त्रों में बताये हुए वज्र-हस्तत्त्वादि गुणों से युक्त इन्द्रादि देवताओं के रूप में, भिन्न-भिन्न कर्मों के द्वरा, यद्यपि उस परमात्मा का ही यजन करते हैं तथापि उसके स्वरूप को वे भी नहीं जानते। हृदय में बार-बार चिन्तन किये जाने पर भगवान् जिस समय जीव पर कृपा करते हैं, उसी समय वह लौकिक व्यवहार एवं वैदिक कर्म-मार्ग की बद्धमूल आस्था से छुट्टी पा जाता है।

बर्हिष्मन्! तुम इन कर्मों में परमार्थबुद्धि मत करो। ये सुनने में ही प्रिय जान पड़ते हैं, परमार्थ का तो स्पर्श भी नहीं करते। ये जो परमार्थवत् दीख पड़ते हैं, इसमें केवल अज्ञान ही कारण है। जो मलिनमति कर्मवादी लोग वेदको कर्मपरक बताते हैं, वे वास्तव में उसका मर्म नहीं जानते। इसका कारण यही है कि वे अपने स्वरूपभूत लोक (आत्मतत्त्व) को नहीं जानते, जहाँ साक्षात् श्रीजनार्दन भगवान् विराजमान हैं, पूर्व की ओर अग्रभाग वाले कुशाओं से सम्पूर्ण भूमण्डल को आच्छादित करके अनेकों पशुओं का वध करने से तुम बड़े कर्माभिमानी और उद्धत हो गये हो; किन्तु वास्तव में तुम्हें कर्म या उपासना-किसी के भी रहस्य का पता नहीं है। वास्तव में कर्म तो वही है, जिससे श्रीहरि को प्रसन्न किया जा सके और विद्या भी वही है, जिससे भगवान् में चित्त लगे।

श्रीहरि सम्पूर्ण देहधारियों में आत्मा, नियामक और स्वतन्त्र कारण हैं; अतः उनके चरणतल ही मनुष्यों के एकमात्र आश्रय हैं और उन्हीं से संसार में सबका कल्याण हो सकता है। 'जिससे किसी को अणुमात्र भी भय नहीं होता, वही उसका प्रियतम आत्मा है’ ऐसा जो पुरुष जानता है, वही ज्ञानी है और जो ज्ञानी है, वही गुरु एवं साक्षात् श्रीहरि है।

श्रीनारद जी कहते हैं- पुरुषश्रेष्ठ! यहाँ तक जो कुछ कहा गया है, उससे तुम्हारे प्रश्न का उत्तर हो गया। अब मैं एक भलीभाँति निश्चित किया हुआ गुप्त साधन बताता हूँ, ध्यान देकर सुनो। ‘पुष्पवाटिका में अपनी हरिनी के साथ विहार करता हुआ एक हरिन मस्त घूम रहा है, वह दूब आदि छोटे-छोटे अंकुरों को चर रहा है। उसके कान भौंरों के मधुर गुंजार में लग रहे हैं। उसके सामने ही दूसरे जीवों को मारकर अपना पेट पालने वाले भेड़िये ताक लगाये खड़े हैं और पीछे से शिकारी व्याध ने बींधने के लिये उस पर बाण छोड़ दिया है। परन्तु हरिन इतना बेसुध है कि उसे इसका कुछ पता नहीं है।’ एक बार इस हरिन की दशा पर विचार करो।

राजन्! इस रूपक का आशय सुनो। यह मृतप्राय हरिन तुम्हीं हो, तुम अपनी दशा पर विचार करो। पुष्पों की तरह ये स्त्रियाँ केवल देखने में सुन्दर हैं, इन स्त्रियों के रहने का घर ही पुष्पवाटिका है। इसमें रहकर तुम पुष्पों के मधु और गन्ध के समान क्षुद्र सकाम कर्मों के फलरूप, जीभ और जननेद्रिय को प्रिय लगने वाले भोजन तथा स्त्रीसंग आदि तुच्छ भोगो को ढूँढ रहे हो। स्त्रियों से घिरे रहते हो और अपने मन को तुमने उन्हीं में फँसा रखा है। स्त्री-पुत्रों का मधुर भाषण ही भौरों का मधुर गुंजार है, तुम्हारे कान उसी में अत्यन्त आसक्त हो रहे हैं। सामने ही भेड़ियों के झुंड के समान काल के अंश दिन और रात तुम्हारी आयु को हर रहे हैं, परन्तु तुम उनकी कुछ भी परवा न कर गृहस्थी के सुखों में मस्त हो रहे हो। तुम्हारे पीछे गुप-चुप लगा हुआ शिकारी काल अपने छिपे हुए बाण से तुम्हारे हृदय को दूर से ही बींध डालना चाहता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 30-44 का हिन्दी अनुवाद.

 

(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
चतुर्थ स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः
 श्लोक 30-44 का हिन्दी अनुवाद.

वह कभी तो सात्त्विक कर्मों के द्वारा प्रकाशबहुल स्वर्गादि लोक प्राप्त करता है, कभी राजसी कर्मों के द्वारा दुःखमय रजोगुणी लोकों में जाता है-और कभी तमोगुणी कर्मों के द्वारा शोकबहुल तमोमयी योनियों में जन्म लेता है। इस प्रकार अपने कर्म और गुणों के अनुसार देवयोनि, मनुष्ययोनि अथवा पशु-पक्षीयोनि में जन्म लेकर वह अज्ञानान्ध जीव कभी पुरुष, कभी स्त्री और कभी नपुंसक होता है। जिस प्रकार बेचारा भूख से व्याकुल कुत्ता दर-दर भटकता हुआ आपने प्रारब्धानुसार कहीं डंडा खाता है और कहीं भात खाता है, उसी प्रकार यह जीव चित्त में नाना प्रकार की वासनाओं को लेकर ऊँचे-नीचे मार्ग से ऊपर, नीचे अथवा मध्य के लोकों में भटकता हुआ अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगता रहता है।

आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक- इन तीन प्रकार के दुःखों में से किसी भी एक से जीव का सर्वथा छुटकारा नहीं हो सकता। यदि कभी वैसा जान पड़ता है तो वह केवल तात्कालिक निवृत्ति ही है। वह ऐसी ही है, जैसे कोई सिर पर भारी बोझा ढोकर ले जाने वाला पुरुष उसे कंधे पर रख ले। इसी तरह सभी प्रतिक्रिया (दुःखनिवृत्ति) जाननी चाहिये-यदि किसी उपाय से मनुष्य एक प्रकार के दुःख से छुट्टी पाता है, तो दूसरा दुःख आकर उसके सिर पर सवार हो जाता है।

शुद्धहृदय नरेन्द्र! जिस प्रकार स्वप्न में होने वाला स्वप्नान्तर उस स्वप्न से सर्वथा छूटने का उपाय नहीं है, उसी प्रकार कर्मफल-भोग से सर्वथा छूटने का उपाय केवल कर्म नहीं हो सकता; क्योंकि कर्म और कर्मफल भोग दोनों ही अविद्यायुक्त होते हैं। जिस प्रकार स्वप्नावस्था में अपने मनोमय लिंग शरीर से विचरने वाले प्राणी को स्वप्न के पदार्थ न होने पर भी भासते हैं, उसी प्रकार ये दृश्य पदार्थ वस्तुतः न होने पर भी, जब तक अज्ञान-निद्रा नहीं टूटती, बने ही रहते हैं और जीव को जन्म-मरणरूप संसार से मुक्ति नहीं मिलती। (अतः इनकी आत्यन्तिक निवृत्ति का उपाय एकमात्र आत्मज्ञान ही है)

राजन्! जिस अविद्या के कारण परमार्थरूप आत्मा को यह जन्म-मरणरूप अनर्थ परम्परा प्राप्त हुई है, उसकी निवृत्ति गुरुस्वरूप श्रीहरि में सुदृढ़ भक्ति होने पर हो सकती है। भगवान् वासुदेव में एकाग्रतापूर्वक सम्यक् प्रकार से किया हुआ भक्तिभाव ज्ञान और वैराग्य का आविर्भाव कर देता है। राजर्षे! यह भक्तिभाव भगवान् की कथाओं के आश्रित रहता है। इसलिये जो श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रतिदिन सुनता या पढ़ता है, उसे बहुत शीघ्र इसकी प्राप्ति हो जाती है। राजन्! जहाँ भाग्वाद्गुणों को कहने और सुनने में तत्पर विशुद्धचित्त भक्तजन रहते हैं, उस साधु-समाज में सब ओर महापुरुषों के मुख से निकले हुए श्रीमधुसूदन भगवान् के चरित्र शुद्ध अमृत की अनेकों नदियाँ बहती रहती हैं। जो लोग अतृप्त-चित्त से श्रवण में तत्पर अपने कर्णकुहरों द्वारा उस अमृत का छककर पान करते हैं, उन्हें भूख-प्यास, भय, शोक और मोह आदि कुछ भी बाधा नहीं पहुँचा सकते।

हाय! स्वभावतः प्राप्त होने वाले इन क्षुधा-पिपसादि विघ्नों से सदा घिरा हुआ जीव-समुदाय श्रीहरि के कथामृत-सिन्धु से प्रेम नहीं करता। साक्षात् प्रजापतियों के पति ब्रह्मा जी, भगवान् शंकर, स्वयाम्भुव मनु, दक्षादि प्रजापतिगण, सनकादि नैष्ठिक ब्रह्मचारी, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ और मैं- ये जितने ब्रह्मवादी मुनिगण हैं, समस्त वाङ्मय एक अधिपति होने पर भी तप, उपासना और समाधि के द्वारा ढूँढ-ढूँढकर हार गये, फिर भी उस सर्वसाक्षी परमेश्वर को आज तक न देख सके।

मुन्था. (ज्योतिष)

 मुन्था. (ज्योतिष)

वर्ष कुण्डली में गणना के संदर्भ में मुंथा का अत्यधिक उपयोग किया जाता है. जन्म कुण्डली में मुन्था सदैव लग्न में स्थित होता है और हर वर्ष यह एक राशि आगे बढ़ जाता है. उदाहरण के लिए यदि किसी का जन्म मेष लग्न में हो तो जातक के जन्म समय मुन्था मेष राशि में होगा तथा आने वाले वर्ष में यह मुंथा वृष राशि में और इससे आगे आने वाले वर्ष में यह मिथुन में स्थित होगा. इस क्रम से प्रत्येक वर्ष मुंथा एक-एक राशि आगे बढ़ते जाती है. मुंथा कोई ग्रह नहीं है लेकिन यह नवग्रहों के समान ही महत्वपूर्ण है और इसके आधार पर ही वर्ष कुण्डली के अनेक प्रभावों का वर्णन किया जा सकता है. मुन्था का शुभ और अशुभ प्रभाव जातक के जीवन को पूर्ण रुप से प्रभावित करता हैं. ज्योतिष के अनेक शास्त्रों में हमें मुन्था के विषय में बहुत कुछ जानने को मिलता है, उससे मुंथा का महत्व परिलक्षित होता है और जन्म कुंडली के आधार पर मुथा की गणना कर वर्ष कुण्डली में जीवन की घटनाओं को वर्ष के लिए अनुमानित किया जाता हैं.

         मुंथा की गणना.

मान्य सूत्र हैं कि जन्म कुंडली के जन्म लग्न भाव में ही मुन्था स्तिथ होती हैं.  जैसे जन्म समय लग्न तुला हैं तो तुला में या अन्य जो भी लग्न हैं, उसमें ही मुन्था मानी जायेगी.

जातक के जिस वर्ष के लिए मुन्था ज्ञात करना हो, उसके जीवन के व्यतीत पूर्ण वर्ष में जन्म लग्न के अंक को जोड़कर यदि उत्तर 12 से अधिक अधिक आता है, तो उसमें 12 से भाग दिजिए और जो शेष संख्या आये उसी संख्या की राशी में मुंथा स्थित होगी. यदि शेष संख्या शून्य आती है तो इसे बारहवीं (मीन) राशि मानेगे.

गति- मुंथा प्रतिवर्ष एक राशि में, एक माह में ढ़ाई अंश तथा एक दिन में ढ़ाई कला चलती है। इसे कभी वक्री नहीं माना गया है.    

मुंथा का प्रभाव.

वर्ष कुण्डली में जन्म कुण्डली के लग्न की भांति मुंथा का महत्त्व होता है. वर्ष के फल तभी शुभ होंगे, जब मुंथेश उच्च युक्त या स्वराशि से युक्त हो. मुन्थेश शुभ ग्रहों से युक्त या उनसे प्रभावित है, तो परिणाम अच्छे प्राप्त होते हैं. मुन्था 2, 9 10, 11 भाव में स्थित होने पर मजबूत आर्थिक पक्ष और अच्छी व्यवसायिक स्थिति को भी दर्शाता है.

मुन्था की विपरित स्थिति.

भाव 4, 6, 8, 12  और सप्तम भाव में मुन्था अच्छी नहीं मानी जाती, यह अशुभ परिणामदायक हो सकती है. इस प्रकार यदि मुन्था षष्ठेश, अष्टमेश अथवा द्वादशेश युक्त हो तो भी शुभ परिणाम प्रदान करने वाली नहीं होती है. मुन्थेश यदि नीच का हो या नीचता से युक्त हो अथवा पिड़ित, निर्बल या शत्रु भाव में स्थित हो तो यह शुभ परिणाम प्रदान नहीं करता है. मुन्था यदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो विपरित फल प्रदान करती है.

वर्ष कुण्डली में मुन्था की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. वर्ष कुण्डली में जिस भाव में मुन्था स्थित होती है, उस भाव तथा भाव के स्वामी को मुन्थेश मानकर, उसके बलाबल अनुसार निर्णय लिया जाता हैं.

4,6,7,8,12 भाव में मुन्था का स्थित होना शुभ नहीं माना जाता है. इसी प्रकार वर्ष कुण्डली में वर्षेश तथा पंचाधिकारियों की स्थिति का भी आंकलन किया जाता है. वर्षेश की स्थिति कुण्डली में यदि कमजोर है तो शुभ नहीं है.

राहु-केतु से युक्त मुन्था अशुभ फ़लदायक होती है.  

वर्षकुंडली में यदि जन्मकुंडली का लग्नेश निर्बल, अष्टम या सूर्य आदि क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो तो उस वर्ष जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट होता है.  मुंथेश यदि वर्ष कुंडली में अस्त होकर शनि द्वारा दृष्ट हो तो उस वर्ष जातक को हानी, मानसिक कष्ट व भयंकर रोग से ग्रस्त होने की संभावना होती है.

वर्षलग्न यदि जन्मलग्न या जन्मराशि से अष्टम राशि का हो तो उस वर्ष जातक को भीषण कष्ट व रोग होने की संभावना होती है.  

वर्षकुंडली में यदि चन्द्र 1,6,7,8,12 भाव में पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो उस वर्ष जातक का प्रबल अरिष्ट होता है. जातक को मृत्यु तुल्य कष्ट की संभावना होती है.    

यदि चन्द्र वर्षकुंडली में मंगल से दृष्ट हो तब अग्नि-भय, राहु-केतु से दृष्ट हो तो शत्रु-भय, सूर्य से दृष्ट हो तो आर्थिक हानि का सामना जातक को करना पड़ता है.

यदि चन्द्र वर्षकुंडली में गुरु से दृष्ट हो तो शुभफलदायक होता हैं. गुरु की दृष्टी जिन भावों/ग्रह में पडती हैं, उनके कारक तत्वों में शुभता की वृध्दि होती है.

ज्योतिष में फलादेश हेतु ग्रहों के लिए निर्धारित सूत्र ही मुन्था के लिये यथावत लागू होते हैं, पर यह सब सिर्फ वर्ष कुंडली तक ही सिमित हैं.  


ग्रहों की मित्रता, शत्रुता एवं सम भाव का ज्ञान.

 

ग्रहों की मित्रता, शत्रुता एवं

सम भाव का ज्ञान.

किसी भी ग्रह की मूलत्रिकोण राशि से गिनने पर 2,4,5,8,9,12 भावों के अधिपति उस ग्रह के मित्र तथा शेष भावों के अधिपति उसके शत्रु होते हैं। जिस ग्रह की एक राशि मित्र भाव (2,4,5,8,9,12) में पड़ती हो और एक राशि शत्रु भाव में पड़ती तो वह सम होता है।

उदहारण..

बृहस्पति की मूलत्रिकोण राशि है; धनु। अब बृहस्पति के मित्र एवं शत्रु ग्रह कौन से हैं, यह जानने के लिए आप धनु राशि को लग्न मानकर निम्न प्रकार से देखें।

दूसरे स्थान में (मित्र भाव) में मकर राशि है और तीसरे (शत्रु भाव) में कुम्भ राशि है इसलिए मकर एवं कुम्भ राशि के अधिपति शनि महाराज बृहस्पति के लिए सम हैं। (न मित्र हैं न शत्रु)

चौथे स्थान में मीन राशि है, जो बृहस्पति की अपनी राशि है इसलिए मित्र-शत्रु आदि का प्रश्न ही नहीं उठता।

पंचम स्थान (मित्र भाव) में मंगल की मेष राशि है तथा द्वादश (मित्र भाव) में भी मंगल की ही वृश्चिक राशि है, इसलिए मंगल बृहस्पति के लिए मित्र हैं।

छठे स्थान (शत्रु भाव) में शुक्र की वृषभ राशि है तथा एकादश (शत्रु भाव) में भी शुक्र की ही तुला राशि है, इसलिए शुक्र बृहस्पति के लिए शत्रु हैं।

सप्तम स्थान में (शत्रु भाव) में मिथुन राशि है और दशम (शत्रु भाव) में कन्या राशि है इसलिए मिथुन एवं कन्या राशि के अधिपति बुध महाराज बृहस्पति के लिए शत्रु हैं।

अष्टम (मित्र भाव) में कर्क राशि है, चंद्र अन्य किसी राशि के अधिपति न होने के कारण वे बृहस्पति के मित्र हुए।

नवम (मित्र भाव) में सिंह राशि है, सूर्य अन्य किसी राशि के अधिपति न होने के कारण वे बृहस्पति के मित्र हुए।

आप यदि एक बार 2,4,5,8,9,12 इन अंकों को याद कर लेंगे तो ग्रहों के शत्रु-मित्रत्व को समझने में आसानी होगी।

अति-विशिष्ठ कारक ग्रह. (ज्योतिष)

 

अति-विशिष्ठ कारक ग्रह.

(ज्योतिष)

सभी नौ ग्रहों के अपने अपने कारक भाव होते हैं और कुछ भाव ऐसे भी होते हैं, जिनमें ग्रह दिग्बली होते हैं। इसी प्रकार लग्न कुंडली के कुछ भाव ऐसे भी होते हैं, जिनमे कुछ विशेष ग्रहों के स्थित होने पर भाव सम्बन्धी प्रभाव में वृद्धि हो जाती है। ऐसे ग्रहों को अतिविशिष्ठ कारक ग्रह कहा जाता है। अतिविशिष्ठ कारक ग्रह जिस भाव में अति विशिष्ट होता है, यदि उसी भाव में विराजमान हो जाए तो उस भाव विशेष के प्रभाव में वृद्धि हो जाती है। 

सूर्य.

लग्न और नवम में सूर्य कारक और दशम में दिग्बली होते हैं। ग्यारहवें भाव में स्थित होने पर सूर्य अतिविशिष्ठ ग्रह हो जाता हैं, जिससे इस भाव के प्रभाव में वृद्धिकारक होते हैं। जिस किसी जातक की जन्मकुंडली में ऐसा सूर्य विद्यमान हो उसे जीवन भर धन प्राप्त होता रहता है।

चंद्र.

चन्द्र चौथे भाव में कारक और चौथे भाव में ही दिग्बली भी होता हैं। यही चंद्र यदि लग्न अथवा सप्तम में स्थित हो तब अतिविशिष्ठ कारक हो जाता हैं। जिस किसी जातक की लग्नकुंडली में प्रथम भावस्थ चंद्र हो तो ऐसा जातक भावुक होता है और दूसरों का भला चाहने और करने वाला भी। ऐसे जातक का समाज हमेशा आदर करता है। यही चंद्र यदि सप्तम भावस्थ हो जाए तो जातक/जातिका को सौम्य स्वभाव का जीवनसाथी प्राप्त होता है, जो बड़ों का मान रखता है और सबको साथ लेकर चलता है।

मंगल.

मंगल तीसरे और छठे भाव में कारक और दशम भाव में दिग्बली हो जाता हैं। यही मंगल दशम भाव में स्थित होने पर अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह हो जाता हैं।

बुध.

चौथे और दसवें भाव में बुध कारक और प्रथम भाव में दिग्बली होता हैं। व्यापार और बुद्धि का कारक बुध यदि लग्नकुंडली के ग्यारहवें भाव में स्थित हो जाएँ तो अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह हो जाता हैं। ऐसा जातक किसी एक क्षेत्र से बंधा नहीं रहता बल्कि कई क्षेत्रों से धनार्जन करता है।

गुरु.

देवगुरु लग्नकुंडली के दुसरे, पांचवें, नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक और लग्न में दिग्बली होता हैं। यही गुरु लग्न कुंडली के पंचम एवं नवम भाव में अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह हो जाता हैं। ऐसा जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करता है।

शुक्र.

शुक्र सप्तम भाव का कारक और चतुर्थ भाव में दिग्बली होता हैं। यही शुक्र लग्नकुंडली के द्वादश भाव में स्थित होने पर अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह हो जाता हैं। चौथे भाव में स्थित होने पर भी शुक्र अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह बन जाता हैं लेकिन द्वादश से कम विशिष्ठ कारक गिना जाता हैं और सप्तम में भी अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह भी होता हैं, लेकिन चतुर्थ से कम प्रभावी माना जाता हैं।

शनि.

छठे, आठवें, दसवें, बारहवें भाव का कारक होता हैं और सातवें भाव में दिग्बली हो जाता हैं। यही शनि तीसरे और छठवें भाव में स्थित होने पर अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह हो जाता हैं।

राहु.

तीसरे, छठे और दसवें भाव में कारक होता हैं। राहु तीसरे, छठे और दसवें भाव में ही स्थित होने पर अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह माना जाता हैं।

केतु.

दुसरे और आठवें भाव में कारक होता हैं। केतु दुसरे और आठवें भाव में ही स्थित होने पर अतिविशिष्ठ योगकारक ग्रह होता हैं।

 

जन्म कुंडली में बाधक ग्रह. (ज्योतिष)

 

जन्म कुंडली में बाधक ग्रह.

(ज्योतिष)

कौन से लग्न के लिए कौन सा ग्रह बाधक होता है तथा बाधक ग्रह कब अशुभ फल देता है, इसकी जानकारी निम्नानुसार है:-

अ. चर राशियों की लग्नों (1,4,7,10) के लिए ग्यारहवें भाव का स्वामी बाधक होता है, अर्थात...

अ-1 मेष लग्न के ग्यारहवें भाव में कुंभ राशि होती है; इसलिए मेष लग्न के लिए कुंभ राशि के स्वामी शनि बाधक होते हैं।

अ-2 कर्क लग्न के ग्यारहवें भाव में वृषभ राशि होती है; इसलिए कर्क लग्न के लिए वृषभ राशि के स्वामी शुक्र बाधक होते हैं।

अ-3 तुला लग्न के ग्यारहवें भाव में सिंह राशि होती है; इसलिए तुला लग्न के लिए सिंह राशि के स्वामी सूर्य बाधक होते हैं।

अ-4 मकर लग्न के ग्यारहवें भाव में वृश्चिक राशि होती है; इसलिए मकर लग्न के लिए वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल बाधक होते हैं।

ब. स्थिर राशियों की लग्नों (2,5,8,11) के लिए नवम भाव का स्वामी बाधक होता है, अर्थात...

ब-1. वृषभ लग्न के नवम भाव में मकर राशि होती है; इसलिए वृषभ लग्न के लिए मकर राशि के स्वामी शनि बाधक होते हैं।

ब-2. सिंह लग्न के नवम भाव में मेष राशि होती है; इसलिए सिंह लग्न के लिए मेष राशि के स्वामी मंगल बाधक होते हैं।

ब-3. वृश्चिक लग्न के नवम भाव में कर्क राशि होती है; इसलिए वृश्चिक लग्न के लिए कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा बाधक होते हैं।

ब-4. कुंभ लग्न के नवम भाव में तुला राशि होती है; इसलिए कुंभ लग्न के लिए तुला राशि के स्वामी शुक्र बाधक होते हैं।

स- द्विस्वभाव राशियों की लग्नों (3,6,9,12) के लिए सप्तम भाव का स्वामी बाधक होता है, अर्थात...

स-1. मिथुन लग्न के सप्तम भाव में धनु राशि होती है; इसलिए मिथुन लग्न के लिए धनु राशि के स्वामी बृहस्पति/गुरु बाधक होते हैं।

स-2. कन्या लग्न के सप्तम भाव में मीन राशि होती है; इसलिए कन्या लग्न के लिए मीन राशि के स्वामी बृहस्पति/गुरु बाधक होते हैं।

स-3. धनु लग्न के सप्तम भाव में मिथुन राशि होती है; इसलिए धनु लग्न के लिए मिथुन राशि के स्वामी बुध बाधक होते हैं।

स-4. मीन लग्न के सप्तम भाव में कन्या राशि होती है; इसलिए मीन लग्न के लिए कन्या राशि के स्वामी बुध बाधक होते हैं।

कतिपय विद्वानों के मतानुसार बाधक ग्रह यदि बाधक होने के साथ ही 'खरेश' भी हो, तभी अशुभ फल देता है। 22वें द्रेष्काण को 'खर' द्रेष्काण कहा जाता है तथा 22 वें द्रेष्काण के स्वामी को 'खरेश' कहते हैं।

कोई भी ग्रह अपनी महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर-दशा, सूक्ष्म दशा या गोचर में जब भ्रमण करता हैं, तब वह अपना फल देता हैं।

मारकेश ग्रह - (ज्योतिष)

मारकेश ग्रह - (ज्योतिष)

जन्म कुण्डली में मारकेश का विचार करने के लिए जन्मांक के दूसरे, तीसरे, सातवें, आठवें और  बारहवें भाव पर विचार किया जाता है। जन्म कुण्डली के आठवें भाव से आयु का विचार होता है। लघु पाराशरी में तीसरे स्थान को भी आयु स्थान कहा गया है; क्योंकि यह आठवें से आठवें (अष्टम स्थान से अष्टम अर्थात लग्न से तृतीय) को आयु स्थान और सप्तम तथा द्वितीय स्थान को मृत्यु स्थान या मारक स्थान कहा गया हैं। इनमें दूसरा भाव प्रबल मारक कहलाता है। बारहवां भाव व्यय भाव कहा जाता है; इसलिये इसे भी विचार में लिया जाता हैं। सामान्यतया द्वितीयेश एवं सप्तमेश को मारकेश की संज्ञा दी जाती हैं।

मारकेश की दशा-अन्तर्दशा में जातक को मृत्यु अथवा मृत्यु तुल्य कष्ट सहना पड़ता हैं। मानसिक, शारीरिक परेशानी, दुर्घटना, बीमारी, तनाव, अपयश की संभावना बनती हैं। षष्ट, अष्टम और द्वादस भाव में विपरीत राजयोग और केंद्र में पञ्च-महापुरुष का निर्माण भी ये कष्टकारक ग्रह यदा-कदा निर्माण कर देते हैं। यदि लग्नेश ही 6, 8 या 12वे भाव में हो तब वह दोषी नहीं होता। मंगल और शुक्र आठवें भाव के स्वामी होने पर भी पापी नहीं माने जाते। सूर्य व चंद्रमा को मारकेश का दोष नहीं लगता है; इसलिये सिर्फ सामान्य जानकारी के आधार पर चिंतित नहीं होना चाहिये। शास्त्र में मारकेश की दशा हेतु अनेक उपाय भी बताये गये हैं।    

मेष लग्न के लिये शुक्र मारकेश होकर भी मारकेश का कार्य नहीं करता किंतु शनि और शुक्र का योग घातक सिध्द होता हैं। वृष लग्न के लिये गुरु, मिथुन लग्न के लिये मंगल और गुरु अशुभ है। कर्क लग्न के लिये शुक्र, सिंह लग्न के लिये शनि और बुध, कन्या लग्न के लिये मंगल, तुला लग्न के लिए मंगल, गुरु और सूर्य, वृश्चिक लग्न के लिए बुध, धनु लग्न का मारक शनि, शुक्र, मकर लग्न के लिये मंगल, कुंभ लग्न के लिये गुरु-मंगल, मीन लग्न के लिये मंगल-शनि मारकेश बनता है। छठे आठवें बारहवें भाव मे स्थित राहु भी मारक ग्रह का सहयोगी हो जाता  है।

यह लेख सामान्य लोगों की जानकारी और ज्योतिष-प्रेमियों के लिए ज्ञान के आदान-प्रदान हेतु लिखा गया हैं।