श्रीमद्भागवत महापुराण: पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 30-40 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः
श्लोक
30-40 का हिन्दी अनुवाद


ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखे में हैं; जब यह भी उनकी ठगाई में आकर दुःखी होता है, तब ब्राह्मणों की शरण लेता है। किन्तु उपनयन-संस्कार के अनन्तर श्रौत-स्मार्त्त कर्मों से भगवान् यज्ञपुरुष की अराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचार के अनुकूल अपने में शुद्धि न होने के कारण यह कर्मशून्य शूद्र कुल में प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरों के समान केवल कुटुम्ब पोषण और स्त्री सेवन करना ही है। वहाँ बिना रोक-टोक स्वच्छन्द विहार करने से इसकी बुद्धि अत्यन्त दीन हो जाती है और एक-दूसरे का मुख देखना आदि विषय-भोगों में फँसकर इसे अपने मृत्युकाल का भी स्मरण नहीं होता। वृक्षों के समान जिनका लौकिक सुख ही फल है-उन घरों में ही सुख मानकर वानरों की भाँति स्त्री-पुत्रादि में आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगों में ही बिता देता है। इस प्रकार प्रवृत्तिमार्ग में पड़कर सुख-दुःख भोगता हुआ यह जीव रोगरूपी गिरी-गुहा में फँसकर उनमें रहने वाले मृत्युरूप हाथी से डरता रहता है। कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकार के आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों की निवृत्ति करने में जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयों की चिन्ता से यह खिन्न हो उठता है। कभी आपस में क्रय-विक्रय आदि व्यापार करने पर बहुत कंजूसी करने से इसे थोड़ा-सा धन हाथ लग जाता है। कभी धन नष्ट हो जाने से जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदि की भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलने से यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायों से पाने का निश्चय करता है। इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरों के हाथ से बहुत अपमानित होना पड़ता है। इस प्रकार धन की आसक्ति से परस्पर वैरभाव बढ़ जाने पर भी यह अपनी पूर्व वासनाओं से विवश होकर आपस में विवाहादि सम्बन्ध करता और छोड़ता रहता है। इस संसारमार्ग में चलने वाला यह जीव अनेक प्रकार के क्लेश और विघ्न-बाधाओं से बाधित होने पर भी मार्ग में जिस पर जहाँ आपत्ति आती है अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है; तथा नये जन्मे हुओं को साथ लगाता है, कभी किसी के लिये शोक करता है, किसी का दुःख देखकर मुर्च्छित हो जाता है, किसी के वियोग होने की आशंका से भयभीत हो उठता है, किसी से झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती है तो रोने-चिल्लाने लगता है, कहीं मन के अनुकूल बात हो गयी तो प्रसन्नता के मारे फूला नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हीं के लिये बँधने में भी नहीं हिचकता। साधुजन इसके पास कभी नहीं आते, यह साधु संग से सदा वंचित रहता है। इस प्रकार यह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है। जहाँ से इसकी यात्रा आरम्भ हुई है और जिसे इस मार्ग की अन्तिम अवधि कहते हैं, उस परमात्मा के पास यह अभी तक नहीं लौटा है। परमात्मा तक तो योगशास्त्र की भी गति नहीं है; जिन्होंने सब प्रकार के दण्ड (शासन) का त्याग कर दिया है, वे निवृत्तिपरायण संयतात्मा मुनिजन ही उसे प्राप्त कर पाते हैं। जो दिग्गजों को जीतने वाले और बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले राजर्षि हैं, उनकी भी वहाँ तक गति नहीं है। वे संग्रामभूमि में शत्रुओं का सामना करके केवल प्राण परित्याग ही करते हैं तथा जिसमें ‘यह मेरी है’, ऐसा अभिमान करके वैर ठाना था-उस पृथ्वी में ही अपना शरीर छोड़कर स्वयं परलोक को चले जाते हैं। इस संसार से वे भी पार नहीं होते।

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