(लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)
श्रीमद्भागवत महापुराण:
पंचम स्कन्ध: दशम अध्यायः
श्लोक 7-15 का हिन्दी अनुवाद
(किन्तु) पालकी अब भी सीधी चाल से नहीं चल रही है-यह देखकर राजा रहूगण क्रोध से आग-बबूला हो गया और कहने लगा- ‘अरे! यह क्या? क्या तू जीता ही मर गया है? तू मेरा निरादर करके (मेरी) आज्ञा का उल्लंघन कर रहा है। मालूम होता है, तू सर्वथा प्रमादी है। अरे! जैसे दण्डपाणि यमराज जन-समुदाय को उसके अपराधों के लिये दण्ड देते हैं, उसी प्रकार मैं भी अभी तेरा इलाज किये देता हूँ। तब तेरे होश ठिकाने आ जायेंगे’। रहूगण को राजा होने का अभिमान था, इसलिये वह इसी प्रकार बहुत-सी अनाप-शनाप बातें बोल गया। वह अपने को बड़ा पण्डित समझता था, अतः रज-तमयुक्त अभिमान के वशीभूत होकर उसने भगवान् के अनन्य प्रीतिपात्र भक्तवर भरत जी का तिरस्कार कर डाला। योगेश्वरों की विचित्र कथनी-करनी का तो उसे कुछ पता ही न था। उसकी ऐसी कच्ची बुद्धि देखकर वे सम्पूर्ण प्राणियों के सुहृद् एवं आत्मा, ब्रह्मभूत ब्राह्मण देवता मुस्कराये और बिना किसी प्रकार का अभिमान किये इस प्रकार कहने लगे। जड भरत ने कहा- राजन्! तुमने जो कुछ कहा, वह यथार्थ है। उसमें कोई उलाहना नहीं है। यदि भार नाम की कोई वस्तु है तो ढोने वाले के लिये है, यदि कोई मार्ग है तो वह चलने वाले के लिये है। मोटापन भी उसी का है, यह सब शरीर के लिये कहा जाता है, आत्मा के लिये नहीं। ज्ञानीजन ऐसी बात नहीं करते। स्थूलता, कृशता, आधि, व्याधि, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, प्रेम, क्रोध, अभिमान और शोक- ये सब धर्म देहाभिमान को लेकर उत्पन्न होने वाले जीव में रहते हैं; मुझमें इनका लेश भी नहीं है। राजन्! तुमने जो जीने-मरने की बात कही-सो जितने भी विकारी पदार्थ हैं, उन सभी में नियमित रूप से ये दोनों बातें देखी जाती हैं; क्योंकि वे सभी आदि-अन्त वाले हैं। यशस्वी नरेश! जहाँ स्वामी-सेवक भाव स्थिर हो, वहीं आज्ञा पालनादि का नियम भी लागू हो सकता है। ‘तुम राजा हो और मैं प्रजा हूँ’ इस प्रकार की भेदबुद्धि के लिये मुझे व्यवहार के सिवा और कहीं तनिक भी अवकाश नहीं दिखायी देता। परमार्थ दृष्टि से देखा जाये तो किसे स्वामी कहें और किसे सेवक? फिर भी राजन्! तुम्हें यदि स्वामित्व का अभिमान है तो कहो, मैं तुम्हारी क्या सेवा करूँ। वीरवर! मैं मत्त, उन्मत्त और जड के समान अपनी ही स्थिति में रहता हूँ। मेरा इलाज करके तुम्हें क्या हाथ लगेगा? यदि मैं वास्तव में जड और प्रमादी ही हूँ, तो भी मुझे शिक्षा देना पिसे हुए को पीसने के समान व्यर्थ ही होगा। श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! मुनिवर जड भरत यथार्थ तत्त्व का उपदेश करते हुए इतना उत्तर देकर मौन हो गये। उनका देहात्मबुद्धि का हेतुभूत अज्ञान निवृत्त हो चुका था, इसलिये वे परमशान्त हो गये थे। अतः इतना कहकर भोग द्वारा प्रराब्ध्य क्षय करने के लिये वे फिर पहले के ही समान उस पालकी को कन्धे पर लेकर चलने लगे। सिन्धु सौवीर नरेश रहूगण भी अपनी उत्तम श्रद्धा के कारण तत्त्व जिज्ञासा का पूरा अधिकारी था। जब उसने उन द्विजश्रेष्ठ के अनेकों योग-ग्रन्थों से समर्थित और हृदय की ग्रन्थि का छेदन करने वाले ये वाक्य सुने, तब वह तत्काल पालकी से उतर पड़ा। उसका राजमद सर्वथा दूर हो गया और वह उनके चरणों में सिर रखकर अपना अपराध क्षमा कराते हुए इस प्रकार कहने लगा।
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