विवाह मुहूर्त. (ज्योतिष)

 

विवाह मुहूर्त.

(ज्योतिष)

 

भारतीय सनातन धर्म में विवाह संस्कार को मनुष्य जीवन के सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है; इसलिए विवाह से पूर्व विशेष रूप से मुहूर्त देखा जाता हैं और उसकी गणना करते समय सभी तथ्यों को सूक्ष्मता से परखा जाता है।
विषय पर महत्वपूर्ण जानकारी सर्व साधारण हेतु सामान्य ज्ञान के लिये बताई जा रही हैं। मुहूर्त निकालने के लिए ज्योतिष सूत्रों की जानकारी होना नितांत अनिवार्य हैं; इसलिए किसी जानकर से ही मुहूर्त का परामर्श कर लेना उपयुक्त होगा।
1-विवाह योग्य नक्षत्र.
आकाश मंडल में 27 नक्षत्र है परंतु उनमें से केवल कुछ ही जैसे- मूल, अनुराधा, मृगशिरा, रेवती, हस्त, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा आषाढ़, उत्तरा भाद्रपद, स्वाति, मघा और रोहिणी आदि नक्षत्र को विवाह आदि के लिए शुभ माने गये है।
2- विवाह योग्य माह.
शुभ नक्षत्र के साथ-साथ विवाह के लिए शुभ महीना का होना भी बहुत जरुरी माना जाता है, साल के 12 महीनों में विवाह संस्कार केवल इन 6 महीनों यथा - ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन, वैशाख, मार्गशीर्ष और आषाढ़ माह में ही विवाह करना शुभ माना जाता हैं।
3- पञ्चांग में अनुदेषित मुहूर्त.
ज्योतिष के अनुसार विवाह संस्कार में कन्या के लिए गुरुबल और वर के लिए सूर्यबल पर मुख्य रूप से विचार किया जाता हैं, एवं दोनों के लिए एक साथ चंद्रबल पर विचार होता हैं। पंचांग में विवाह मुहूर्त लिखे होते है, जिनमें शुभ संकेत के रूप में खड़ी रेखाएं और अशुभ संकेत के रूप में टेढ़ी रेखाएं होती है। कुल दस दोष होते है। सर्वश्रेठ मुहूर्त दस रेखाओं का होता है। जबकि मध्यम सात से आठ रेखाओं का होता है और जघन्य पांच रेखाओं का होता है। इससे कम रेखाओं के मुहूर्त को निन्द्य कहा जाता है।
4- कन्या के लिए गुरुबल - कन्या की राशि में बृहस्पति यदि नवम, पंचम, एकादश, द्वितीया और सप्तम भाव में हो तो शुभ माना जाता हैं और इसके अलावा बृहस्पति के दशम, तृतीया, षष्ठ और प्रथम भाव में होने पर दान-पूजन पश्चात शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भाव में अशुभ होता है।
5- वर के लिए सूर्यबल - वर की राशि में सूर्य यदि तृतीय, षष्ठ, दशम, एकादश भाव में हो तो शुभ माना जाता है। इसके अलावा सूर्य के प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम और नवम भाव में होने पर दान-पूजन के पश्चात शुभ और चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भाव में अशुभ होता है।
6- वर वधु दोनों के लिए चंद्रबल - वर और कन्या दोनों की ही कुंडली में चंद्रबल देखा जाता है। पंचांग के अनुसार चंद्रमा वर और कन्या की राशि में तीसरे, छठे, सातवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में हो तो शुभ मना जाता है। इसके अलावा चंद्रमा यदि पहले, दुसरे, पांचवें और नौवें भाव में हो तो दान-पूजन पश्चात शुभ माना जाता है और चौथे, आठवें, बाहरवें भाव में अशुभ होता है।
7- अन्धादि लग्न - दिन में तुला और वृश्चिक, रात्रि में तुला और मकर लग्न बधिर है एवं दिन में सिंह, मेष, वृष और रात्रि में कन्या, मिथुन, कर्क अंध संज्ञक हैं। दिन में कुम्भ और रात्रि में मीन लग्न पंगु होते है। धनु, तुला, वृश्चिक, ये तीनो अपराह्न में बधिर माने जाते हैं, जबकि मिथुन, कर्क व् कन्या ये लग्न रात्रि में अंधे होते है। सिंह, मेष, वृष ये लग्न दिन में अंधे होते है और मकर, कुम्भ, मीन प्रातःकाल तथा सायंकाल में कुबड़े होते है। यदि विवाह बधिर लग्न में हो जाये तो वर-कन्या दोनों दरिद्र हो जाते है, यदि दिवान्ध में लग्न हो तो कन्या विधवा हो जाती है, यदि रात्रान्ध में लग्न हो तो सन्तति मरण और पंगु में लग्न हो तो धन नाश होता है। वहीं विवाह के लिए शुभ लग्न तुला, मिथुन, कन्या, वृष और धनु माने जाते है; जबकि अन्य सभी लग्न मध्यम ही माने जाते है।

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