श्रीमद्भागवत महापुराण: पंचम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 11-20 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
पंचम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः
श्लोक
11-20 का हिन्दी अनुवाद


कभी शीत, घाम, आँधी और वर्षा से अपनी रक्षा करने में असमर्थ हो जाता है। कभी आपस में थोडा-बहुत व्यापार करता है, तो धन के लोभ में दूसरों को धोखा देकर उनसे वैर ठान लेता है। कभी-कभी उस संसार वन में इसका धन नष्ट हो जाता है तो इसके पास शय्या, आसन, रहने के लिये स्थान और सैर-सपाटे के लिये सवारी आदि भी नहीं रहते। तब दूसरों से याचना करता है; माँगने पर भी दूसरे से जब उसे अभिलषित वस्तु नहीं मिलती, तब परायी वस्तुओं पर अनुचित दृष्टि रखने के कारण इसे बड़ा तिरस्कार सहना पड़ता है। इस प्रकार व्यावहारिक सम्बन्ध के कारण एक-दूसरे से द्वेषभाव बढ़ जाने पर भी वह वणिक्-समूह आपस में विवाहादि सम्बन्ध स्थापित करता है और फिर इस मार्ग में तरह-तरह के कष्ट और धन क्षय आदि संकटों को भोगते-भोगते मृतकवत् हो जाता है। साथियों में से जो-जो मरते जाते हैं, उन्हें जहाँ-का-तहाँ छोड़कर नवीन उत्पन्न हुओं को साथ लिये वह बनिजारों का समूह बराबर आगे ही बढ़ता रहता है। वीरवर! उनमें से कोई प्राणी न तो आज तक वापस लौटा है और न किसी ने इस संकटपूर्ण मार्ग को पार करके परमानन्दमय योग की ही शरण ली है। जिन्होंने बड़े-बड़े दिक्पालों को जीत लिया है, वे धीर-वीर पुरुष भी पृथ्वी में ‘यह मेरी है’ ऐसा अभिमान करके आपस में वैर ठानकर संग्राम भूमि में जूझ जाते हैं। तो भी उन्हें भगवान् विष्णु का वह अविनाशी पद नहीं मिलता, जो वैरहीन परमहंसों को प्राप्त होता है। इस भवाटवी में भटकने वाला यह बनिजारों का दल कभी किसी लता की डालियों का आश्रय लेता है और उस पर रहने वाले मधुरभाषी पक्षियों के मोह में फँस जाता है। कभी सिंहों के समूह से भय मानकर बगुला, कंक और गिद्धों से प्रीति करता है। जब उनसे धोखा उठाता है, तब हंसों की पंक्ति में प्रवेश करना चाहता है; किन्तु उसे उनका आचार नहीं सुहाता, इसलिये वानरों में मिलकर उनके जाति स्वभाव के अनुसार दाम्पत्य सुख में रत रहकर विषय भोगों से इन्द्रियों को तृप्त करता रहता है और एक-दूसरे का मुख देखते-देखते अपनी आयु की अवधि को भूल जाता है। वहाँ वृक्षों में क्रीड़ा करता हुआ पुत्र और स्त्री के स्नेहपाश में बँध जाता है। इसमें मैथुन की वासना इतनी बढ़ जाती है कि तरह-तरह के दुर्व्यवहारों से दीन होने पर भी यह विवश होकर अपने बन्धन को तोड़ने का साहस नहीं कर सकता। कभी असावधानी से पर्वत की गुफा में गिरने लगता है तो उसमें रहने वाले हाथी से डरकर किसी लता के सहारे लटका रहता है। शत्रुदमन! यदि किसी प्रकार इसे उस आपत्ति से छुटकारा मिल जाता है, तो यह फिर अपने गोल में मिल जाता है। जो मनुष्य माया की प्रेरणा से एक बार इस मार्ग में पहुँच जाता है, उसे भटकते-भटकते अन्त तक अपने परम पुरुषार्थ का पता नहीं लगता। रहूगण! तुम भी इसी मार्ग में भटक रहे हो, इसलिये अब प्रजा को दण्ड देने का कार्य छोड़कर समस्त प्राणियों के सुहृद् हो जाओ और विषयों में अनासक्त होकर भगवत्सेवा से तीक्ष्ण किया हुआ ज्ञानरूप खड्ग लेकर इस मार्ग को पार कर लो।

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