श्रीमद्भागवत महापुराण: पंचम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः श्लोक 21-26 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
पंचम स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः
श्लोक
21-26 का हिन्दी अनुवाद


राजा रहूगण ने कहा- अहो! समस्त योनियों में यह मनुष्य जन्म ही श्रेष्ठ है। अन्यान्य लोकों में प्राप्त होने वाले देवादि उत्कृष्ट जन्मों से भी क्या लाभ है, जहाँ भगवान् हृषीकेश के पवित्र यश से शुद्ध अन्तःकरण वाले आप-जैसे महात्माओं का अधिकाधिक समागम नहीं मिलता। आपके चरणकमलों की रज का सेवन करने से जिनके सारे पाप-ताप नष्ट हो गये हैं, उन महानुभावों को भगवान् विशुद्ध भक्ति प्राप्त होना कोई विचित्र बात नहीं है। मेरा तो आपके दो घड़ी के सत्संग से ही सारा कुतर्क मूलक अज्ञान नष्ट हो गया है।

श्रीशुकदेव जी कहते हैं- उत्तरानन्दन! इस प्रकार उन परम प्रभावशाली ब्रह्मर्षि पुत्र ने अपना अपमान करने वाले सिन्धु नरेश रहूगण को भी अत्यन्त करुणावश आत्मतत्त्व का उपदेश दिया। तब राजा रहूगण ने दीनभाव से उनके चरणों की वन्दना की। फिर वे परिपूर्ण समुद्र के समान शान्तचित्त और उपरतेन्द्रिये होकर पृथ्वी पर विचरने लगे। उनके सत्संग से परमात्मतत्त्व का ज्ञान पाकर सौवीरपति रहूगण ने भी अन्तःकरण में अविद्यावश आरोपित देहात्म बुद्धि को त्याग दिया।

राजन्! जो लोग भगवदाश्रित अनन्य भक्तों की शरण ले लेते हैं, उनका ऐसा ही प्रभाव होता है-उनके पास अविद्या ठहर नहीं सकती।

राजा परीक्षित ने कहा- महाभागवत मुनिश्रेष्ठ! आप परम विद्वान् हैं। आपने रूपकादि के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से जीवों के जिस संसाररूप मार्ग का वर्णन किया है, उस विषय की कल्पना विवेकी पुरुषों की बुद्धि ने की है; वह अल्पबुद्धि वाले पुरुषों की समझ में सुगमता से नहीं आ सकता। अतः मेरी प्रार्थना है कि इस दुर्बोध विषय को रूपक का स्पष्टीकरण करने वाले शब्दों से खोलकर समझाइये। पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्याय श्रीमद्भागवत महापुराण: पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 1-6 का हिन्दी अनुवाद भवाटवी का स्पष्टीकरण श्रीशुकदेव जी कहते हैं- राजन्! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र- तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं। उन कर्मों के द्वारा ही निर्मित नाना प्रकार के शरीरों के साथ होने वाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीव को प्राप्त होता है, उसके अनुभव के छः द्वार हैं- मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनसे विवश होकर यह जीव समूह मार्ग भूलकर भयंकर वन में भटकते हुए धन के लोभी बनिजारों के समान परसमर्थ भगवान् विष्णु के आश्रित रहने वाली माया की प्रेरणा से बीहड़ वन के समान दुर्गम मार्ग में पड़कर संसार-वन में जा पहुँचाता है। यह वन श्मशान के समान अत्यन्त अशुभ है। इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीर से किये हुए कर्मों का फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेकों विघ्नों के कारण उसे अपने व्यापार में सफलता भी नहीं मिलती; तो भी यह उसके श्रम को शान्त करने वाले श्रीहरि एवं गुरुदेव के चरणारविन्द-मकरन्द-मधु के रसिक भक्त-भ्रमरों के मार्ग का अनुसरण नहीं करता। इस संसार-वन में मन सहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मों की दृष्टि से डाकुओं के समान हैं। पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्म में होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात् भगवान् परमपुरुष की आराधना के रूप होता है तो उसे परलोक में निःश्रेयस का हेतु बतलाया गया है। किन्तु जिस मनुष्य का बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वश में नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धन को ये मन सहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्प-विकल्प करना और निश्चय करना- इन वृत्तियों के द्वारा गृहस्थोचित विषय भोगों में फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती है, जिस प्रकार बेईमान मुखिया का अनुगमन करने वाले एवं असावधान बनिजारों के दल का धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं। ये ही नहीं, उस संसार-वन में रहने वाले उसके कुटुम्बी भी- जो नाम से तो स्त्री-पुत्रादि कहे जाते हैं, किन्तु कर्म जिनके साक्षात् भेड़ियों और गीदड़ों के समान होते हैं- उस अर्थलोलुप कुटुम्बी के धन को उसकी इच्छा न रहने पर भी उसके देखते-देखते इस प्रकार छीन ले जाते हैं, जैसे भेड़िये गड़रियों से सुरक्षित भेड़ों को उठा ले जाते हैं। जिस प्रकार यदि किसी खेत के बीजों को अग्नि द्वारा जला न दिया गया हो, तो प्रतिवर्ष जोतने पर भी खेती का समय आने पर वह फिर झाड़-झंखाड़, लता और तृण आदि से गहन हो जाता है- उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी कर्मभूमि है, इसमें भी कर्मों का सर्वथा उच्छेद कभी नहीं होता, क्योंकि यह घर कामनाओं की पिटारी है। उस गृहस्थाश्रम में आसक्त हुए व्यक्ति के धनरूप बाहरी प्राणों को डांस और मच्छरों के समान नीच पुरुषों से तथा टिड्डी, पक्षी, चोर और चूहे आदि से क्षति पहुँचती रहती है। कभी इस मार्ग में भटकते-भटकते यह अविद्या, कामना और कर्मों से कलुषित हुए अपने चित्त से दृष्टिदोष के कारण इस मर्त्य-लोक को, गन्धर्व नगर के समान असत् है, सत्य समझने लगता है। फिर खान-पान और स्त्री-प्रसंगादि व्यसनों में फँसकर मृगतृष्णा के समान मिथ्या विषयों की ओर दौड़ने लगता है।

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