श्रीमद्भागवत महापुराण: पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः श्लोक 7-19 का हिन्दी अनुवाद

 (लगातार-सम्पूर्ण श्रीमद्भागवत पुराण)

श्रीमद्भागवत महापुराण:
पंचम स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः
श्लोक
7-19 का हिन्दी अनुवाद


कभी बुद्धि के रजोगुण से प्रभावित होने पर सारे अनर्थों की जड़ अग्नि के मल रूप सोने को ही सुख का साधन समझकर उसे पाने के लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़-धूप करने लगता है, जैसे वन में जाड़े से ठिठुरता हुआ पुरुष अग्नि के लिये व्याकुल होकर उल्मुक पिशाच की (अगिया बेताल की) ओर उसे आग समझकर दौड़े। कभी इस शरीर को जीवित रखने वाले घर, अन्न-जल और धन आदि में अभिनिवेश करके इस संसारारण्य में इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है। कभी बवंडर के समान आँखों में धूल झोंक देने वाली स्त्री गोद में बैठा लेती है, तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषों की मर्यादा का भी विचार नहीं करता। उस समय नेत्रों में रजोगुण की धूल भर जाने से बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मों के साक्षी दिशाओं के देवताओं को भी भुला देता है। कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयों का मिथ्यात्व जान लेने पर भी अनादिकाल से देह में आत्मबुद्धि रहने से विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाने के कारण उन मरुमरीचिकातुल्य विषयों की ओर ही फिर दौड़ने लगता है। कभी प्रत्यक्ष शब्द करने वाले उल्लू के समान शत्रुओं की और परोक्ष रूप से बोलने वाले झींगुरों के समान राजा की अति कठोर एवं दिल को दहला देने वाली डरावनी डाँट-डपट से इसके कान और मन को बड़ी व्यथा होती है। पूर्व पुण्य क्षीण हो जाने पर यह जीवित ही मुर्दे के समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलों वाले पाप वृक्षों, इसी प्रकार की दूषित लताओं और विषैले कुओं के समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनों के ही काम में नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्दे के समान हैं-उन कृपण पुरुषों का आश्रय लेता है। कभी असत् पुरुषों के संग से बुद्धि बिगड़ जाने के कारण सुखी नदी में गिरकर दुःखी होने के समान इस लोक और परलोक में दुःख देने वाले पाखण्ड में फँस जाता है। जब दूसरों को सताने से उसे अन्न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता-पुत्रों को अथवा पिता या पुत्र आदि का एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खाने के लिये तैयार हो जाता है। कभी दावानल के समान प्रिय विषयों से शून्य एवं परिणाम में दुःखमय घर में पहुँचता है, तो वहाँ इष्टजनों के वियोगादि से उसके शोक की आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्न होने लगता है। कभी काल के समान भयंकर राजकुलरूप राक्षस इसके परम प्रिय धनरूप प्राणों को हर लेता है, तो यह मरे हुए के समान निर्जीव हो जाता है। कभी मनोरथ के पदार्थों के समान अत्यन्त असत् पिता-पितामह आदि सम्बन्धों को सत्य समझकर उनके सहवास से स्वप्न के समान क्षणिक सुख का अनुभव करता है। गृहस्थाश्रम के लिये जिस कर्मविधि का महान् विस्तार किया गया है, उसका अनुष्ठान किसी पर्वत की कड़ी चढ़ाई के समान ही है। लोगों को उस ओर प्रवृत्त देखकर उनकी देखा-देखी जब यह भी उसे पूरा करने का प्रयत्न करता है, तब तरह-तरह की कठिनाइयों से क्लेशित होकर काँटे और कंकडों से भरी भूमि में पहुँच हुए व्यक्ति के समान दुःखी हो जाता है। कभी पेट की असह्य ज्वाला से अधीर होकर अपने कुटुम्ब पर ही बिगड़ने लगता है।

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